फौजी मेहर सिंह

फौजी मेहर सिंह

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सोनीपत जिले के बरोणा गांव साधारण किसान परिवार में जन्म (कुछ विद्वान सन् 1916 तो कुछ 1918 मानते हैं)। बहुत अच्छे गायक थे। गायन के लिए अपने परिवार की प्रताडऩा सहन करनी पड़ी। 1936 में फौज में भर्ती हुए। फौजी जीवन और फौजियों की पत्नियों की पीड़ा को विशेष तौर पर अभिव्यक्त किया। मुक्तक रागनी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान। सन् 1944 में देहावसान। रामफल चहल व रघुबीर मथाना ने तथा डा. रणबीर सिंह दहिया ने इनकी रचनाओं को एकत्रित करके प्रकाशित किया है।

 

1

पीसण खातर चाक्की झो दी फौजी की होगी त्यारी

दुख का कैसे पता लगाऊं सुण धर्मकौर मेरी प्यारी

 

छ साल गाळां में हांड्या आठ साल पढ़ाया

चार साल थारी म्हैंस चराई दो साळ हळ बाह्या

फेर फौज म्हं भरती होग्या कुछ ना खेल्या खाया

वो माणस ना किसे काम का जिसने आगै की नहीं बिचारी

 

कदे कदे तेरा त्योर कुढाळा मेरी छाती म्हं आज्या सै

सुपने के म्हं दिल गोरी मेरा तेरै धोरै आज्या सै

सामण जैसी लौर चलें जब बादळ सा छाज्या सै

होल्दार मेजर हुक करै वो पाड़ पाड़ कै खाज्या सै

तूं तो सोवै पैर फैला कै मैं द्यूं ड्यूटी सरकारी

 

एक दिन रोटी खाते खाते याद मेरै तूं आई

लंगर म्हं तै चाल्या उठकै रोटी भी ना खाई

खाट म्हं जाकै मुंधा पड़ग्या रो कै नाड़ झुकाई

फेर उठकै देखण लाग्या चोगरदे खड़े सिपाई

कदे नौकरी कदे सैल्यूट करूं कदे चलाऊं लारी

 

इबकै नाम ड्रम म्हं आग्या तै पड़ै मिश्र म्हं जाणा

उपर तैं हो हवाई हमले पहाड़ां म्हं ल्हुक जाणा

बैठ जहाज म्हं सफर करैं उड़ै चाय बिस्कुट का खाणा

मरणे म्हं कुछ कसर रही ना वापस मुशकल आणा

कहै मेहरसिंह उल्टे आगै तै सोवैंगें महल अटारी

 

2

मैं कदकी रूक्के दे रही तूं रोटी खा लिए हाळी

दिल ढळज्या जब फेर खेत नै बाह लिए हाळी

 

बोल दिये जब बोल्या कोन्या दे लिए बोल हजार मनैं

रोटी पाणी भर्या छाबड़ा मुश्किल तार्या न्यार मनैं

बारा बज कै दो बजग्ये जाण नै हो सै वार मनैं

सारे पड़ोसी जा लिए ईब तूं भी चालिए हाळी

 

एक मील तैं रोटी ले कै बड़ी मुश्किल तैं आई मैं

हाळी गेल्यां ब्याह करवा कै बहोत घणी दु:ख पाई मैं

मत रेते बीच रळावे पिया पन्नेदार मिठाई मैं

तेरे मरते बैल तिसाये तूं पाणी प्या लिए हाळी

 

बैठ आम कै नीचै पिया मैं तेरी सेवा कर द्यंूगी

मिट्ठी -मिट्ठी बातां तै मेरा सारा पेटा भर द्यंूगी

मनैं जी तैं प्यारा लागै सै मैं गात तोड़ कै धर द्यंूगी

तेरी हूर खड़ी मटकै सै तूं गळ कै ला लिए हाळी

 

गरमी पड़ती लू चालै सैं पड़ै कसाई घाम किसा

दोफारी म्हं भी टिकता कोन्या जुल्मी सै तेरा चाम किसा

फूंक दिया सै गात मेरा जुल्मी सै यो राम किसा

तूं मेहर सिंह की सीख रागनी गा लिए हाळी

 

3

छुट्टी के दिन पूरे होग्ये न्यू सोचण लाग्या मन म्हं

बांध बिस्तरा चाल पड्या कुछ बाकी रही ना तन म्हं

 

छाती कै ला कै माता रोई जिसनै पाळया पोष्या जाम्यां था

बुआ बाहण पुचकारण लागी भाई भी रोया राम्भा था

दरिया केसी झाल उठती मनैं कालजा थांब्या था

छोटे भाई नै घी पीपी म्हं गूंद खाण का बांध्या था

न्यूं बोले दिये छोड़ नौकरी के दब कै मरैगा धन म्हं

 

पिता जी खड़े दरवाजे म्हं उनकी कान्ही चाल्या था

कोळै लागी मेरी बहू रोवै थी सांस सबर का घाल्या था

आंख्यां के म्हं नीर देख कै मेरा काळजा हाल्या था

न्यूं बोली पिया मेरे नाम का किसतैं दिया हवाला था

गश खाकै नै पड़ी घर आळी होश रही ना तन म्हं

 

हाथ फेर कै पुचकार दई कुछ ना चाल्या जोर मेरा

छ: महीने म्हं आल्यूंगा जै ना आया तो चोर तेरा

रस्ते म्हं सुसराड़ पड़ै थी उड़ै बी लाग्या दौर मेरा

जीजा आया जीजा आया साळा करता आया शोर मेरा

सासू नैं पुचकार दिया मेरै सीळक हुई बदन म्हं

 

उडै़ रोटी तक भी खाई कोन्या करी चलण की त्यारी

जीजा जी कद आओगे न्यू बूझै साळी प्यारी

म्हारे आवण का बेरा ना तुम आस छोड़ दियो म्हारी

इतने ए दिन की जोड़ी थी या थारे तैं रिश्तेदारी

मेरी लियो आखरी राम राम थारे कर चाल्या दर्शन मैं

 

टेशन ऊपर छोड़ण खातर साळा संग म्हं आया था

बाबू जी तैं करी नमस्ते वारंट चेंज कराया था

गाड़ी के म्हं बैठग्या मनै पाला गस का खाया था

सिंगापुर म्हं जा पहोंच्या डांगर ज्यूं डकराया था

कर बदली मैं भेज दिया उस केहरी बबरी बण म्हं

 

यूनिट म्हं दई हाजरी मनैं पक्का देणा पहरा हो

घर की याद बहू की चिन्ता यो भी दुख गहरा हो

फौज के म्हां वो जाइयो जो बिन ब्याहा रह रह्या हो

फौजियों तैं बूझ लियो जो मेहर सिंह गलत कह रह्या हो

कोए बहुआं आळा सुणता हो तो मत दियो पैर बिघन म्हं

 

4

जब इकतालीस के सन म्हं सिंगापुर की त्यारी होग्यी

प्रेम कौर मनैं तेरे ओड़ की चिन्ता भारी होग्यी

 

डीपू म्हं तै चाल पड़े हम टेशन ऊपर आग्ये

एक गोरा एक मेम मिली वे दो दो हार पहराग्ये

कड़ थेपड़ कै दी शाबासी गाड़ी बीच बैठाग्ये

अठारहा दिन के अरसे म्हं म्हारी तबीयत खारी होग्यी

 

एक जहाज मनैं इसा देख्या जिस म्हं बसता गाम

एक ओड नैं टट्टू घोड़े रंगरूटा का काम

एक ओड नैं बिस्तर पेटी माहें माल गोदाम

जहाज के ऊपर चढ़कै देख्या सिर पै दिख्या राम

बैठे बैठे बतलावैं थे घरां रोवती नारी होग्यी

 

इसे देश म्हं जा छोडे जड़ै मोटर रेल नहीं सै

कई किस्म के मिलैं आदमी मिलता मेळ नहीं सै

ब्याह करवा कै देख लियो जिसनै देखी जेळ नहीं सै

नौकरी का कर्णा छोर्यो हांसी खेल नहीं सै

साढ़े तीन हाथ की काया थी या भी सरकारी होग्यी

 

हम आये थे लडऩ की खातर पहाड़ी ऊपर चढ़ग्ये

दम दम करकै हुई छमा छम आगै सी नै बढग्ये

सी.ओ. साहब नैं सीटी मारी हम मोर्चा म्हं बड़ग्ये

और किसे का दोष नहीं करमां के नक्से झड़ग्ये

घर कुणबे तैं दूर महेर सिंह मोटी लाचारी होग्यी

 

5

बज्जर कैसा हृदय करकै पकड़ काळजा थाम लिए

रणभूमि म्हं जां सूं गोरी मेरी राम राम लिए

 

देश प्रेम की आग बुरी मनैं पड़ै जरूरी जाणा

घर बैठे ना काम चलै मनैं जाकै देश बचाणा

तेरी नणद का भाई चाल्या पहर केसरी बाणा

मरणा जीणा देश की खातर यो मनैं फर्ज निभाणा

रखणी होगी लाज वतन की प्यारी रट घनश्याम लिए

 

सिर फोडूं और फुड़वा ल्यूंगा दुश्मन गेल्यां भिड़कै

बेशक जान चली जा गोरी ना शीश समझता धड़ पै

दो बट आली रफल कै आगै खडय़ा रहूंगा अड़कै

रह्या जींवता तो फेर मिलूंगा चाल्या आज बिछड़कै

कर कै याद पति नै गौरी मत रोवण का नाम लिए

 

सीना ताण देश की खातिर जो हंस हंस प्राण गंवादें

सीधा रोड सुरग का मिलज्या सच्चा धाम दिखा दे

के जीणा सै जग म्हं उनका जो मां का दूध लजा दें

धन-धन सै वैं लाल देश पै जो अपणा खून बहा दें

तन मन धन सब इसकै हाजर सुण पैगाम लिए

 

कहै मेहर सिंह सब जाणैं सैं अकलमंद घणी स्याणी

पतिरूप परमेश्वर हो सै या वेदां की बाणी

दुश्मन का दिया घटा मान थी चूडावत छत्राणी

देश की खातर कटा दिया सिर थी झांसी की राणी

कर कर याद कहाणी मतकर दिल नै कती मुलायम लिये

 

6

के बातां का जिक्र करूं बस कोन्या तन म्हं बाकी

सुपने म्हं सुसराड़ डिगरग्या बांध कै साफा खाकी

 

दिन छिपणे नैं होर्या था जणू दीखै�� दीवे चसते

गाम कै गोरै पहोंच गया मैं बूझण लाग्या रस्ते

आगै सी नै साला मिलग्या भाजकै करी नमस्ते

घरकै बारणें पहोंच गये हम दोनूं हंस्ते हंस्ते

साळी पाणी ल्याण लागरी अदा दिखारी बांकी

 

साळै नै मेरा बिस्तर लाया कर दिया ठाठ निराळा

जूती काढ कै बैठ गया मैं खाट का देख बिचाळा

इन्डीदार गिलास दूध का मोटा रोप्या चाळा

हूर परी की एक नजर पड़ी मैं खाकै पड्या तिवाळा

दूध म्हं मीठा कम लाग्या मनैं खाण्ड की मारी फांकी

 

रोटियां तांई आया बुलावण नाई तावळ करकै

सासू जी तै स्याहमी बैठी थाळी म्हं रोटी धरकै

घाल दिया घी बूरा साळी नै आगै कै फिरकै

सहज सहज मैं लाग्या खावण थोड़ा थोड़ा डरकै

ठेक्या पाछै झांक रही थी मेवा ईब तलक ना चाखी

 

छोटी साळी धोरै कै लिकड़ी करगी हेरा फेरी

ऊट मटीला मेरा करग्यी कूदण लाय्क बछेरी

न्यून पडूं तै कुआ दिखै न्यून पडूं तै झेरी

आंख मारकै न्यूं कहग्यी मैं बहू बणूंगी तेरी

कहै मेहर सिंह तनैं पडै़ काटणी खेती खड़ी जो पाकी

 

7

परदेशां म्हं चाल दिया दिल तोड़ कै नार नवेली का

तेरे बिना भरतार अड़ै जी लागै नही अकेली का

 

हो चाहे कितना ए खेद बीर नै मरदां नै के बेरा

तारे गिण गिण रात चली जा होज्या न्यूएं सवेरा

बिना पति के ओड हवेली हो भूतां का डेरा

तेरे बिना रहै घोर अंधेरा तू दीपक महल हवेली का

 

दिल की दिल म्हं रहै पति बिना होता ना मन चाह्या

ओड़ उम्र म्हं छोड़ चल्या तूं कुछ ना खेल्या खाया

कुछ भी अच्छा लागै कोन्या धन दौलत और माया

तीज ज्यौहार चले जां सुक्के मन लागै नहीं उनम्हाया

मद जौबन म्हं भरी सै काया मद पै फूल चमेली का

 

हाळी बिन धरती सुन्नी और बिना सवार के घोड़ी

बिना मेल के कलह रहै नित घणी नहीं तो थोड़ी

जल बिन मीन तडफ़ कै मरज्या न्यूए बीर मर्द की जोड़ी

बिना पति के बीर की कीमत उठै ना धेला कोड़ी

बिन परखणियां लाल करोड़ी होज्या सस्ता धेली का

 

सारी उम्र बिता द्यूं मैं पिया तेरे गुण गा कै

याद राखिए कदे भूलज्या प्रदेशां म्हं जा कै

राजी खुशी की चिट्ठीगेरिए खुश हो ज्यांगी पा कै

आवण की लिखैगा मैं तो गाऊं गीत उनम्हा कै

मेहर सिंह कद रंग लूटैगा मद जौबन अलबेली का

 

 

स्रोतः  सं. सुभाष चंद्र,  हरियाणवी लोकधारा – प्रतिनिधि रागनियां, आधार प्रकाशन, पंचकुला, पृ.-115 से 122

 

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