गांधी जी की कुछ स्मरणीय सूक्तियां-

  • हमें ये सारी बातें भुला देनी हैं कि ‘मैं हिंदू हूं, तुम मुसलमान हो’, या ‘मैं गुजराती हूं, तुम मद्रासी हो।’ ‘मैं’ और ‘मेरा’ को हमें भारतीय राष्ट्रीयता की भावना के अंदर डुबो देना है। हम आजाद तभी होंगे, जब एक ही साथ जीने या मरने का निश्चय करने वालों की काफी बड़ी संख्या तैयार हो जाएगी।
  • मेरे धर्म की भौगोलिक सीमाएं हैं ही नहीं। उसमें मेरी आस्था सच्ची है तो भारत के लिए जो मेरा प्रेम है, उसे भी वह पार कर पाएगी।
  • मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के चारों ओर दीवारें खड़ी कर दी जाएं और मेरी खिड़कियों से आने वाली हवा रोक दी जाए। मैं चाहता हूं कि सभी देशों की संस्कृतियों के झोंके मेरे घर के चारों ओर ज्यादा से ज्यादा आजादी के साथ आते रहें। पर उनमें से किसी के भी झोंके के साथ उड़ जाने को मैं खुद कतई तैयार नहीं। घुसपैठिये की तरह या भिखारी की तरह अथवा गुलाम की तरह, किसी दूसरे के घर में रहने को मैं राजी नहीं हूं।
  • मेरा धर्म कैदखाने का धर्म नहीं है। परमात्मा की सृष्टि के तुच्छातितुच्छ के लिए भी उसमें जगह है। पर उसमें गुस्ताखी की या जातिगत, धर्मगत अथवा वर्णत अभिमान की गुंजाइश नहीं है

  • ईश्वर का दर्शन हमें कुरान, बाइबल, तालमूद, अवस्थ या गीता के अलग-अलग माध्यमों से होता है-इसलिए क्या हमें एक-दूसरे से झगड़ना चाहिए और ईश्वर की ही निंदा करनी चाहिए? जो सूरज हिमालय पर्वत पर चमकता है, वही मैदानों पर। क्या मैदान के लोगों को बर्फ पर रहने वालों के साथ झगड़ना होगा कि सूरज का ताप एक जगह ज्यादा अैर दूसरी जगह कम क्यों है? विभिन्न ग्रंथों और सिद्धांतों को हम अपने ही को जकड़ देने वाली इतनी सारी बेड़ियों के रूप में क्यों परिणम कर डालें, जबकि उन्हें हम अपनी मुक्ति का और हृदयों के मिलन का साधन बना सकते हैं।
  • सारी दुनिया का मुकाबला करके भी, पर किसी से शत्रुता करके नहीं, भारत को अपने बुनियादी उद्योगों की रक्षा करनी ही होगी। हिंसात्मक राष्ट्रवाद तो, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, अभिशाप ही है। अहिंसात्मक राष्ट्रवाद सामूहिक या सभ्य जीवन की एक आवश्यक शर्त है।
  • इस्लाम को मैं उसी रूप में शांति चाहने वाला धर्म मानता हूं, जिस रूप में ईसाई, बौद्ध और हिंदू-धर्म को। निस्संदेह इनके बीच मात्रा-भेद तो है, पर इन सभी धर्मों का लक्ष्य शांति ही है।
  • राष्ट्रीयता की सबसे खरी परीक्षा तो आखिर यही है न, कि अपने परिवार के ही पांच-छह व्यक्तियों या अपनी जाति अथवा वर्ग के ही सौ-एक आदमियों की चिंता न कर, हम उस समूह का हित, जिसे हम अपना राष्ट्र कहते हैं, बिल्कुल इस तरह देखें, मानो वह हमारा अपना ही व्यक्तिगत हित है।
  • शास्त्रों की रचना उस उद्देश्य से कदापि नहीं हुई थी कि तर्क का गला ही घोंट दिया जाए, वे उसके पूरक के ही रूप में रहे हैं और अन्याय या असत्य के समर्थन में उनकी दुहाई कदापि नहीं दी जा सकती।
  • यह बात उठाई गई है कि भारतीय स्वराज्य बहुसंख्यक संप्रदाय का, यानी हिंदुओं का, राज होगा। इससे बड़ी गलती और कुछ हो नहीं सकती। अगर यह बात सच हो तो कम-से-कम मैं तो उसे स्वराज्य मानने से इंकार कर दूंगा और अपनी सारी ताकत लगाकर उसके विरुद्ध संघर्ष करूंगा, क्योंकि मेरी धारणा वाला हिंद-स्वराज समूची जनता का राज है, न्याय का राज है। उस राज के मंत्री चाहे हिंदू हों या मुसलमान या सिख और उसके विधान मंडल चाहे एकमात्र हिंदुओं से, या मुसलमानों से या किसी दूसरे ही संप्रदाय के लोगों से पूरी तरह भर जाएं, फिर भी उन्हें चलना तो निष्पक्ष न्याय के ही मार्ग पर होगा।
  • मैं भारत का एक विनम्र सेवक हूं और भारत की सेवा करने के प्रयत्न में मैं सारे मानव-समाज की ही सेवा कर रहा हूं। मैंने अपने प्रारंभिक जीवन में ही यह आविष्कार किया था कि भारत की सेवा का मानव-समाज मात्र की सेवा से कोई विरोध नहीं है। जैसे-जैसे मेरी अवस्था बढ़ती गई और मैं तो आशा करता हूं कि मेरी समझदारी भी, वैसे-वैसे मैं यह महसूस करता गया कि मेरा वह आविष्कार सही ही था और लगभग पचास वर्ष के सार्वजनिक जीवन के बाद मैं आज यह कहने की स्थिति में हूं कि इस सिद्धांत में कि अपने राष्ट्र की सेवा का विश्व की सेवा के साथ कोई विरोध नहीं है, मेरी आस्था दृढ़ ही होती गई है। यह एक बढ़िया सिद्धांत है। एकमात्र इसे ही स्वीकार करने से संसार का आज का तनाव ढीला पड़ सकेगा और हमारे इस पृथ्वी मंडल को आबाद करने वाले राष्ट्रों के आपसी ईर्ष्या-द्वेष दूर होंगे।
  • मेरे हिंदुत्व में सांप्रदायिकता नहीं है। इस्लाम, ईसाई, बौद्ध और ज़रथुस्त्र धर्मों में मैं जो कुछ सर्वोत्तम पाता हूं, उस सबका इसमें समावेश है। इन सभी क्षेत्रों की भांति, राजनीति के प्रति भी, मेरा दृष्टिकोण धार्मिक ही है। सत्य मेरा धर्म है और अहिंसा उसकी प्राप्ति का एकमात्र साधन।
  • स्वयं गुरुदेव अंतर्राष्ट्रवादी हैं, क्योंकि वह सही मायने में राष्ट्रवादी हैं।
  • हम अपने को अपनी संपति का स्वामी नहीं ट्रस्टी ही मान सकते हैं और समाज की सेवा के लिए ही उसका इस्तेमाल कर सकते हैं-अपने लिए सिर्फ उतना ही लेते हुए जितना हमारी सेवाओं के बदले उचित रूप में लिया जा सकता है। इस व्यवस्था में न कोई अमीर रह जाएगा, न गरीब। सभी धर्म समान माने जाएंगे। धर्म, जाति या आर्थिक शिकायतों से पैदा होने वाल सभी झगड़े, जो इस पृथ्वी की शांति को भंग कर रहे हैं, बंद हो जाएंगे।
  • धर्म वह है जो धर्मशास्त्रों में बताया गया है, जिस पर ऋषि-मुनि चलते आए हैं, विद्वान पंडितों ने जिसकी व्याख्या की है और जो दिल को छूता है। यह चौथी शर्त तभी लागू होती है, जब पहली तीन शर्तें पूरी की जा चुकी हों। इस प्रकार, किसी अज्ञानी पुरुष या किसी बदमाश की कही हुई कोई बात हमारे दिल को अगर पसंद भी जाए, तब भी हमें उस पर चलने का अधिकार नहीं है। धर्म की व्यवस्था देने का अधिकार उसी व्यक्ति को प्राप्त हो सकता है, जिसने कम-से-कम, दूसरे की कोई क्षति न पहुंचाने की, शत्रु-भाव न रखने की और वैराग्य की, साधना कर ली हो।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-75.

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