कविता

डरे हुए समय का कवि

मंगतराम शास्त्री

तब डरे हुए समय का कवि वहाँ पर विराजमान था
जब बिना शहीद का दर्जा पाए लोट रहा था अर्ध सैनिक शहीद
और स्वागत में लीपा जा रहा था आंगन गाय के गोबर से
पवित्र किया जा रहा था
गंगा जल से।
जब समय की दुहत्थड़ खायी विधवा नागाओं की पेंशन घोषणा सुन कुड़ रही थी और बच्चे लिपटे
हुए थे ताबूत से
वह पेंशन की बात टालता कुर्बानी के मन्त्र जुगाल रहा था और सारे घर को देख रहा था बिलखते हुए।

जब राष्ट्रीय गर्व से लिपटा वीर कोरी दो गज सरकारी जमीन के लिए जातीय गौरव से पराजित आंगन में शहादत और सियासत की जंग लड़ रहा था और भीड़
फुंकार रही थी देश भक्ति का उन्माद
तब वह भी फुंकार रहा था गलियों में।

जब आसमानी बिजली की कड़क सा बदले की हवस का शोर
धरती कंपा रहा था और भीड़ सामूहिक शोक का जश्न मना रही थी तब भी वह भीड़ में शामिल था।

वह तब भी वहीं था जब पहाड़ में चाक चौबंद प्रबंधन हुंकार रहा था
और सेंध लग रही थी पहाड़ सी।

जब सत्ता लोलूप मंच दनदना रहा था घृणा की दुर्गंध भरी दम्भ ध्वनि
गोली की तरह
तब भी वह सबसे बाखबर
बेखबरी ओढ़े हुए भीड़ से भयभीत खड़ा शुतुरमुर्ग सा
खुद में ही सिमटता जा रहा था।

उस डरे हुए समय में
न जाने वह खुद डरा हुआ था या डराया गया था
मगर यह सच है
वह भेड़ बनता जा रहा था
और कविता को खा रहा था।

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