गांधी के विचार ‘गांधी का भारत : भिन्नता में एकता’  नामक पुस्तक से जिसका अनुवाद किया है सुमंगल प्रकाश ने।

1.  ‘हिंद स्वराज’ से,    2. लाहौर के सिखों के लिए संदेश’  3. मानवता बनाम देशभक्ति,  4.   स्वराज की परिभाषाएं, 5.   आम जनता के लिए,  6.  राष्ट्रीयता बनाम अंतर्राष्ट्रीयता, 7.   बुराई से घृणा, बुरे से नहीं,  8.    मानव-भ्रातृत्व, 9.  पूर्ण स्वराज्य,  10.  भारत और विश्व,  11.     धर्म और देश,  12.     मेरा लक्ष्य,  13.  धर्मांधता मूर्तिपूजा ही है, 14.     ईश्वर एक है, 15.     सहिष्णुता, 16.     कन्याकुमारी में, 17.     हिंदू धर्म,  18.     परम व्यापक सहिष्णुता, 19.     धर्मों की समानता, 20.     धर्म: एक व्यक्तिगत मामला, 21.     एक अभिशाप, 22.     अनिवार्य सुधार, 23.     कई सिरों वाला दैत्य, 24.     अस्पृश्यता-निवारण, 25.     पृथक निर्वाचन,  26.     वर्ण, 27.     पृथक निर्वाचन नहीं,  28.     सर सैमुअल होर को लिखे पत्र से उद्धरण, 29.     जरूरत है: एक पक्के समझौते की, 30.     सभी का पतन,  31.     विरोध नहीं,  32.     सुदूरव्यापी परिणाम,  33.     घोषणा के बाद, 34.     स्वराज्य का रास्ता,  35.     आदिवासियों की सेवा,  36.     स्वेच्छापूर्वक अति-शूद्र,  37.     एकता ही शक्ति है, 38.     मैत्री धर्म,  39.     21 दिन के उपवास की घोषणा वाला वक्तव्य,  40.       उपवास के ही बारे में, 41.     उपवास का अंत करने के पहले का वक्तव्य,  42.     सांप्रदायिक समस्या का हल,  43.     ‘मेरे लिए प्रार्थना करें’,  44.     उनका स्वप्न,  45.     हमारा कर्तव्य,  46.     हिंदी सीखें,  47.     संस्कृत,  48.     हिंदी-हमारी राष्ट्रभाषा, 49.     अखिल भारतीय राष्ट्रीयता,  50.     एक अखिल भारतीय आम बोली, 51.     राज्यों का भाषावार विभाजन, 52.     जनता के साथ तादाम्य  53. आर्थिक स्वाधीनता,  54.     ऊपर छंटाई, नीचे भराई,  55.     अधिकार नहीं, कर्तव्य पर जोर

1.  ‘हिंद स्वराज’ से

संपादक:…अंग्रेजों ने हमें सिखाया है कि हम एक राष्ट्र के रूप में कभी थे ही नहीं और एक राष्ट्र का रूप लेने में हमें सदियां लग जाएंगी। यह बात बेबुनियाद है। उनके भारत आने से पहले हम एक राष्ट्र के रूप में ही थे। एक ही विचार हमें प्रेरणा देते थे। हमारी जिंदगी एक ही तरह की थी। हम एक राष्ट्र के रूप में ही थे। एक ही विचार हमें प्रेरणा देते थे। हमारी जिंदगी एक ही तरह की थी। हम एक राष्ट्र के रूप में थे। इसीलिए एक राज्य की स्थापना कर सके थे। बाद में उन्होंने ही हमें अलग-अलग कर दिया।

पाठक: इसे जरा साफ कीजिए।

संपादक: मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि राष्ट्र होने के नाते हमारे अंदर अलगाव था ही नहीं, पर हमारा आशय है कि हमारे बड़े-बड़े लोग देश भर में, पैदल या बैलगाड़ियों पर, भ्रमण किया करते थे। वे लोग एक-दूसरे की भाषा सीखते थे और उनके बीच आपस में अलगाव नहीं रहता था। आपके ख्याल से हमारे उन दूरदर्शी पुरखों की मंशा क्या रही होगी, जब उन्होंने दक्षिण में सेतुबंध (रामेश्वर) की, पूरब में जगन्नाथ की और उत्तर में हरिद्वार की स्थापना तीर्थस्थानों के रूप में की? यह तो आप मानेंगे ही कि वे बेवकूफ नहीं थे। वे जानते थे कि ईश्वर की उपासना घर बैठे भी उतने ही अच्छी तरह से हो सकती थी। उन्होंने ही हमें सीख दी थी कि जिनके हृदय में धर्म का वास है उनके घरों में ही गंगा बहती है। पर उन्होंने देखा कि भारत एक अखंड देश है, जिसे प्रकृति ने ही वैसा रचा है। इसलिए उनका कहना था कि उसे एक राष्ट्र का रूप लेना ही होगा। इसी विचार से उन्होंने भारत के विभिन्न भागों में तीर्थस्थानों की स्थापना की और लोगों के अंदर राष्ट्रीय भावना की ज्योति जगाने का एक ऐसा ढंग अपनाया, जो संसार के और किसी भी देश को नहीं मालूम था। हम भारतीय जिस तरह एक हैं उस तरह तो कोई दो अंग्रेज भी एक नहीं हैं। सिर्फ आप और मैं और हमीं जैसे दूसरे लोग, जो अपने को सभ्य और ऊंचे दर्जे का आदमी समझते हैं, यह मान बैठे हैं कि हम कई राष्ट्रों में बंटे हुए हैं।

पाठक: आपने मेरे सामने उस भारत का खाका खींचा है, जो मुसलमानों के इस देश में आने के पहले था, पर आज तो हमारे यहां मुसलमान हैं, पारसी हैं, ईसाई हैं। वे सब एक ही राष्ट्र कैसे कहे जा सकते हैं? हिन्दू और मुसलमान तो पुराने दुश्मन हैं। हमारी कहावतों तक से यह बात सिद्ध होती है। अपनी उपासना करने के लिए मुसलमान जहां पश्चिम की ओर मुंह करते हैं, वहां हिंदू पूरब की ओर। मुसलमान हिंदुओं को हिकारत की निगाह से देखते हैं कि वे मूर्तिपूजक हैं। हिंदू गोमाता की पूजा करते हैं, पर मुसलमान उसकी हत्या कर डालते हैं। हिन्दू अहिंसा के सिद्धांत को मानने वाले हैं, मुसलमान उसे नहीं मानते। इस तरह, कदम-कदम पर तो हमें भिन्नता ही दिखाई पड़ती है। तब भारत एक राष्ट्र कैसे है?

संपादक: भारत में कई धर्मों को मानने वाले रहते हैं। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वह एक राष्ट्र नहीं रहा। विदेशियों के आ जाने भर से किसी राष्ट्र का अस्तित्व नहीं खत्म हुआ करता, उलटे वे ही उसमें घुलमिल कर एक हो जाते हैं। कोई देश तभी राष्ट्र कहलाता है जब वह इस कसौटी पर खरा उतरता हो। ऐसे देश में दूसरों को आत्मसात कर लेने की क्षमता तो होनी ही चाहिए। भारत सदा से ऐसा ही देश रहा है। दरअसल धर्मों की संख्या उतनी ही है, जितनी व्यक्तियों की, पर जिनके अंदर राष्ट्रीय भावना की चेतना मौजूद है, वे एक-दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते। अगर हिंदू यह समझते हैं कि भारत में सिर्फ हिंदुओं को ही रहने का अधिकार है तो वह किसी सपने की दुनिया में रह रहे हैं। हिंदू, मुसलमान, पारसी और ईसाई- वे सभी जिन्होंने भारत को अपना देश माना है, एक ही देश के रहने वाले भाई-भाई हैं और उन्हें और कुछ नहीं तो अपने ही हित में, आपस में एक बनाए रखकर यहां रहना होगा। संसार के किसी भी भाग में राष्ट्रीयता और धर्म पर्यायवाची शब्द नहीं हैं औ न भारत में ही कभ ऐसा रहा है।

पाठक: अब मैं गोरक्षा के संबंध में आपके विचार जानना चाहूंगा।

संपादक: मैं खुद भी गाय का सम्मान करता हूं, अर्थात् उसके प्रति मेरी श्रद्धाा है। गाय भारत की रक्षक है, क्योंकि, कृषि-प्रधान देश होने के कारण, भारत को गाय के आसरे रहना पड़ता है। गाय एक ऐसा पशु जो सैंकड़ों तरह से परम उपयोगी है। हमारे मुसलमान भाई भी इतना तो मानेंगे ही।

पर जिस प्रकार मैं गाय का आदर करता हूं, ठीक उसी प्रकार अपने देशवासियों का। आदमी भी गाय की ही तरह उपयोगी है, चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू। तो फिर, क्या गाय को बचाने के लिए मैं उस मुसलमान का ही नहीं, उस गाय का भी दुश्मन बन जाऊंगा। इसलिए गोरक्षा का मुझे तो एक ही तरीका मालूम है कि मैं अपने उस मुसलमान भाई को जाकर समझाऊं कि देश की खातिर गाय की रक्षा करने में वह भी मेरा साथ दे। अगर वह मेरी बात नहीं सुनता तो फिर मेरे सामने सिवा इसके कोई चारा नहीं रह जाता कि मैं उस गाय को उसके हाल पर छोड़ दूं, क्योंकि और कुछ करना मेरी सामर्थ्य से बाहर है। अगर उस गाय के लिए मेरे हृदय में करुणा ही करुणा उमड़ पड़ती है, तो मैं उसे बचाने के लिए अपने प्राण झोंक दूंगा, पर अपने भाई के प्राण नहीं लूंगा। मेरा विश्वास है कि हमारे धर्म का विधान यही है।

लोग जब अपनी-अपनी जगह पर अड़ने लगते हैं तब मुश्किल पैदा हो जाती है। अगर मैं एक तरफ खींचूं तो मेरा मुसलमान भाई दूसरी तरफ खींचेगा। अगर मैं नम्रता के साथ उसके सामने झुक जाऊं, तो वह और भी ज्यादा झुक जाएगा और अगर वह नहीं झुकता, तब भी यह तो नहीं ही कहा जा सकता कि खुद झुकर मैंने गलती की। हिंदू अड़ने लगे, तो गोहत्याएं बढ़ गईं। मेरी राय में, गोरक्षा समितियों को गोहत्या समिति समझना चाहिए। यह हमारी शान के खिलाफ है कि हमें ऐसी समितियों की जरूरत पड़े। मेरा ख्याल है कि ऐसी समितियों की जरूरत हमें तभी पड़ी, जब हम गायों की रक्षा करना भूल गए।

मेरा सगा भाई जब गोहत्या करने जा रहा हो, तब मैं क्या करूं? उसको मार डालूं या उसके पांवों पर गिरकर उससे अनुनय-विनय करूं? अगर आप यह मानते हों कि मुझे यह दूसरा तरीका ही अख़्तियार करना चाहिए तो अपने मुसलमान भाई के साथ भी तो मुझे वैसा ही करना होगा।

गायों के साथ जब हिंदू ही क्रूरता का बरताव करते हैं और उन्हें मृत्यु की ओर धकेलते हैं, तब उन्हें कौन बचाने जाता है?  गायों की संतान पर जब हिंदू निर्ममता के साथ डंडे बरसाते हैं, तब उन्हें कौन समझाने-बुझाने की फिक्र करता है? पर इस सब के बावजूद, हम एक राष्ट्र के रूप में बने हुए हैं।

और आखिरी बात यह है कि अगर हिंदू अहिंसा का सिद्धांत मानते हैं और मुसलमान नहीं मानते, तो कृपा कर यह तो बताइए कि ऐसी हालत में हिंदुओं का कर्तव्य क्या है? यह कहीं नहीं लिखा है कि अहिंसा धर्म का अनुयायी किसी दूसरे मनुष्य की हत्या करे। उसके लिए रास्ता साफ है। एक प्राणी की रक्षा के लिए वह दूसरे की हत्या न करे। यह सिर्फ अनुनय-विनय कर सकता है-उसका कर्तव्य सिर्फ इतना ही है।

पाठक: पर अंग्रेज क्या कभी भी इन दोनों संप्रदायों को एक-दूसरे से हाथ मिलाने देंगे?

सम्पादक: यह सवाल आपकी कायरता के कारण पैदा हुआ है। इससे हमारा छिछलापन प्रकट होता है। दो भाई अगर आपस में शांतिपूर्वक  रहना चाहें तो क्या किसी तीसरी ताकत के लिए यह संभव है कि वह उन्हें अलग कर दे? अगर वे बुरी सलाह मानकर चलने लगें तो यह तो उनकी बेवकूफी ही कहलाएगी। इसी तरह, दोष हम हिंदू-मुसलमानों की बेवकूफी के ही सिर आएगा न कि अंग्रेजों के, अगर वे हमें एक-दूसरे से अलग कर देते हैं मिट्टी के बर्तन को चोट पड़ेगी तो वह टूटेगा ही-पहले पत्थर की नहीं, तो दूसरे की चोट से। उसे बचाने का तरीका यह नहीं है कि हम उसे वहां से हटा दें, बल्कि यह कि उसे पकाकर इतना मजबूत बनाएं कि कोई भी पत्थर उसे तोड़ न सके। तो हमें अपने दिल पक्के तरीके से पकाई गई मिट्टी के बनाने हैं। उस हालत में हम सभी खतरों के मुकाबले फौलाद की तरह बने रहेंगे। हिंदुओं के लिए ऐसा करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। आबादी में वह कहीं ज्यादा है, ज्यादा शिक्षित होने का दावा यह करते ही हैं, इस तरह, मुसलमानों और उनके बीच के सौहार्द पर जो हमले हों, उनका मुकाबला करने की ताकत उनमें कहीं ज्यादा है।

दोनों संप्रदायों में एक-दूसरे के लिए अविश्वास बना हुआ है। इसलिए मुसलमानों ने लार्ड मार्ले से कुछ रियायतों की मांग की है। हिंदुओं को इसका विरोध क्यों करना चाहिए? अगर हिंदू ऐसा न करते तो अंग्रेजों का इस ओर ध्यान जाता है, मुसलमान भी धीरे-धीरे हिंदुओं का विश्वास करने लग जाते और नतीजा यह होता कि हमारे बीच भाई-चारे का भाव बढ़ने लगता। अपने आपसी झगड़ों को अंग्रेज-दरबार में ले जाना हमारे लिए शर्म की बात होनी चाहिए।  हर कोई खुद यह पता लगा ले सकता है कि इस तरह का विरोध न करने से हिंदुओं का कोई नुक्सान नहीं हो सकता।

मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि हिंदू और मुसलमान कभी लड़ेंगे ही नहीं। साथ-साथ रहने वाले दो भाइयों के बीच भी अकसर लड़ाई हो जाती है। कभी-कभी हम अपने सिर भी तुड़वाएंगे ही। ऐसा जरूर होना नहीं चाहिए, पर सभी लोग तो निष्पक्ष नहीं होते। गुस्से में आकर लोग कितनी ही बेवकूफियां कर बैठते हैं इन्हें तो हमें बरदाश्त करना ही होगा। पर जब हम झगड़ बैठें, तब हम यह कभी नहीं चाहेंगे कि अपने-अपने वकील करके अंग्रेजों की या कैसी भी अदालत का दरवाजा खटखटाएं। दो आदमियों में लड़ाई होती है, दोनों के सिर फूटते हैं या एक ही का सही। कोई तीसरा पक्ष उनके बीच न्याय का बंटवारा कैसे करेगा? जो लड़ते हैं, उन्हें चोट के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-1.

2. लाहौर के सिखों के लिए संदेश

अकाली लोगों का यह दल विशुद्धिवादियों का एक भारी दल है। गुरुद्वारों में जो बुराइयां घर कर गई हैं, उन्हें दूर करने के लिए बहुत ही बेताब है। सभी गुरुद्वारों में एक ढंग की उपासना हो, उस पर उनका बड़ा जोर है। यह आंदोलन कई साल से चल रहा है। असहयोग आंदोलन के समय से ही, सहयोग करने वाले और असहयोग करने वाले, दोनों तरह के सिख ही, कम से कम गुरुद्वारों के इस आंदोलन में तो एक होकर काम करते आए हैं। और आखिर में जाकर अगर यह पता चला कि अकाली दल ने एक ऐसे महंत को गद्दी से उतारने के लिए जोर-जबरदस्ती का सहारा ले ननकाना साहब पर चढ़ाई की थी, जिसने अपनी महंती से बेजा फायदा उठाया था, तब भी इतिहास इस बलिदान को शहादत का ही नाम देगा और उसे तारीफ ही मिलेगी।…

पर इस शहादत की सही कीमत आंकने का वक्त अभी नहीं आया है। अभी तो इस पर विचार करना ज्यादा जरूरी है कि अभी फौरन क्या कदम उठाए जाएं। मैं तो इस दुखद घटना पर भारतीय राष्ट्रीयता के दृष्टिकोण से ही विचार कर सकता हूं। इस काम में जो बहादुरी दिखलाई गई, उसके लिए तारीफ सिर्फ सिखों को ही नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र को मिलनी चाहिए। और इसलिए, अपने सिख दोस्तों को मैं तो यही सलाह दूंगा कि अपने अगले कदमों के बारे में फैसला करते वक्त वे राष्ट्र की जरूरत को ही अपने सामने रखें। हत्यारों के खिलाफ न्याय की मांग करने का सबसे अधिक निर्मल तरीका तो यह है कि यह मांग की ही न जाए। जिन्होंने यह कृत्य किया वे हमारे देशवासी ही हैं, चाहे वे सिख हों, अथवा पठान या हिंदू। उन्हें सजा दिला देने से मरे हुए जी नहीं जाएंगे। जिन लोगों के दिल घायल हुए हैं। उनसे में तो यही कहूंगा कि वे उन्हें माफ कर दें, किसी कमजोरी की वजह से नहीं-क्योंकि वह हर तरह से उन्हें सजा दिला सकने की स्थिति में हैं-बल्कि इसलिए कि उनकी ताकत बेहिसाब है, जिसमें ताकत है वही माफ कर सकता है। अपने प्यारों की शहादत में आप चार चांद लगा देंगे। अगर आप बदला लेने से इंकार कर दें।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-5.

3. मानवता बनाम देशभक्ति

मेरी उस चिट्ठी में सिखों से, उनके भारतीय होने के नाते, अपील की गई है। और मेरे लिए अपनी अपील को वहीं तक सीमित रखना काफी था जहां तक कि वे लोग, जिनसे वह की गई थी, उसकी आसानी से कद्र कर सके और उसे अपना सकें। मुख्य तर्क तो सभी लोगों पर और सभी कालों में, लागू होने वाला है। सिखों के लिए लिखे गए मेरे पत्र का जोर किसी हद तक कम पड़ जाता, अगर मैं अपनी अपील का दायरा देशभक्ति से बढ़ाकर मानवता तक ले जाता। जो सिख किसी गैर-सिख अपराधी को तो सजा देना चाहेगा, पर सिख अपराधी को माफ कर देगा, उसे यह बताया जाना चाहिए कि इस तरह की घटना के मामलों में उसके लिए किसी का सिख या भारतीय होना एक-बराबर होना चाहिए। हां, किसी अंग्रेज के खिलाफ किसी भारतीय से कोई अपील करनी हो, तब जरूर वह उसकी देशभकित के नाते नहीं, मानवता के नाते की जाएगी।

पर यह मैं बिना संकोच के स्वीकार कर ले सकता हूं कि हमारी भावनाओं की आज की स्थिति में किसी अंग्रेज को इस पत्र की नीयत के बारे में आसानी से गलतफहमी हो सकती है। मेरे लिए देशभक्ति  और मानवता एक ही जैसे हैं। मुझमें देशभक्ति इसलिए है कि मैं मानव हूं, मेरे अंदर मानवोचित भावनाएं हैं। मेरी देशभकित दूसरों को पराया नहीं मानती। भारत की सेवा करेन के लिए मैं इंग्लैंड या जर्मनी को चोट नहीं पहुंचाऊंगा। मेरी जीवन-योजना में साम्राज्यवाद के लिए कोई जगह नहीं है। देशभक्त का विधान किसी कुल-पिता के विधान से भिन्न नहीं है। और अगर किसी देशभक्त के मानवतावाद में कुछ कमी है, तो उसकी देशभक्ति में भी उतनी ही कमी है। व्यक्तिगत और राजनैतिक विधान आपस में टकराते नहीं हैं। उदाहरण के लिए, कोई असहयोगी जिस तरह आज सरका के साथ पेश आ रहा है ठीक उसी तरह अपने पिता या भाई के साथ पेश आएगा।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-6

4.   स्वराज की परिभाषाएं

मेरे दिमाग में स्वराज की जो कई परिभाषाएं चक्कर काटती रही हैं, उन्हें मैं पाठकों के सामने रखने की इजाज़त चाहता हूं।

(1) स्वराज का मतलब है-अपने ऊपर राज। जो यह कर ले सका है उसने अपनी व्यक्तिगत प्रतिज्ञा पूरी कर ली है।

(2) किंतु हमने स्वराज को किसी प्रतीक या भावना के रूप में लिया है। इसलिए स्वराज का मतलब है देश के आयात और निर्यात पर, उसकी फौज और उसकी अदालतों पर जनता का पूरा अधिकार। दिसम्बर में जो प्रतिज्ञा ली गई थी उसका यही अर्थ है। इस तरह के स्वराज में अंग्रेजों के साथ संबंध रखने की गुंजाइश रह भी सकती है और नहीं भी रह सकती। पंजाब और ख़िलाफ़त के मसलों का अगर कोई हल नहीं निकलता, तो इस तरह के संबंध की गुंजाइश नहीं रह जाती।

(3) लेकिन, व्यक्तिगत रूप में तो शायद साधु-सन्यासियों को आज भी स्वराज मिला ही हुआ है और दूसरी ओर हमारी अपनी पार्लियामेंट हो जाने के बाद भी लोग महसूस कर सकते हैं कि वह आजाद नहीं हैं। इसलिए स्वराज का मतलब है अन्न और वस्त्र का सहज सुलभ होना, ताकि उनकी कमी की वजह से कोई भूखा या नंगा न रह पाए।

(4) यह सब हो जाने पर भी, हो सकता है कि एक संप्रदाय या समाज दूसरे को दबाना चाहे। इसलिए स्वराज का मतलब वह स्थिति है जिसमें कोई जवान लड़की आधी रात को भी बिना किसी ख़तरे के अकेली कहीं आ-जा सके।

(5) इन्हीं चार परिभाषाओं के अंदर दूसरी कई परिभाषाएं समाई हुई हैं। फिर भी, अगर स्वराज ने इस राष्ट्र की रचना करने वाले हर वर्ग और तबके अंदर नई जान डाली है-जैसी कि उसे डालनी चाहिए ही-तो इसका मतलब यह होगा कि अंत्यजों के साथ अछूत जैसा बरताव करने की प्रथा हमारे बीच बिल्कुल ही नहीं रह जाएगी।

(6) ब्राह्मण-अब्राह्मण के बीच के झगड़े का अंत।

(7) हिंदुओं और मुसलमानों के दिलों से गर्हित मनोभावों का पूरा ख़ातमा। इसका मतलब यह है कि हिंदुओं के दिल में मुसलमानों की भावनाओं के लिए आदर का भाव हो, और उनके लिए वह अपनी जान देने के लिए तैयार रहें। और ठीक यही बात मुसलमानों पर भी लागू हो। हिंदुओं का दिल दुखाने के लिए मुसलमानों को गोहत्या नहीं करनी चाहिए, उल्टे, खुद ही उनकी भावनाओं का ख़्याल कर उन्हें गोहत्या से बचना चाहिए। उसी तरह  हिंदुओं को भी, बदले में कोई आशा किए बिना, मुसलमानों का जी दुखाने की नीयत से मसजिदों के सामने बाजा बजाना छोड़ देना चाहिए, बल्कि  किसी मसजिद के सामने से गुजरते वक्त उन्हें यह गर्व महसूस करना चाहिए कि वे बाजा नहीं बजा रहे हैं।

(8) स्वराज का मतलब यह है कि हिंदू, मुसलमान, सिख, पारसी, ईसाई और यहूदी-सभी अपने-अपने धर्मों का पालन और दूसरों के धर्मों का आदर कर सकें।

(9) स्वराज का मतलब यह है कि हर शहर और गांव में इतनी शक्ति हो कि चोर-डाकुओं से वह अपना बचाव कर सकें और अपनी जरूरत भर का अन्न और कपड़ा पैदा कर सकें।

(10) स्वराज का मतलब यह है कि राजा-महाराजों और ज़मींदारों का अपनी प्रजाओं और किसानों वगैरह के साथ जो आपसी संबंध हो, उसमें दोनों ही एक-दूसरे का ख्याल रखें। पहले पक्ष के लोग दूसरे पक्ष के लोगों को परेशान न करें और फिर दूसरे पक्ष के लोग भी पहले की परेशानियां न बढ़ाएं।

(11) स्वराज का मतलब यह है कि अमीरों और श्रमजीवी वर्ग के लोगों के बीच सद्भाव रहे। इसका मतलब यह है कि र्प्याप्त मज़दूरी लेते हुए श्रमिक लोग खुशी-खुशी अमीरों के लिए काम करें।

(12) स्वराज का मतलब यह है कि हर स्त्री को मां या बहन समझा जाए और उसे ज्यादा से ज्यादा सम्मान दिया जाए। इसका मतलब यह है कि ऊंच-नीच का भेद मिट जाए और सभी लोगों का दूसरों के प्रति वैसा सद्भाव हो जैसा अपने भाई या बहन के लिए होता है।

इन परिभाषाओं से यह साफ हो जाता है कि (1) सरकार शराब, अफीम और ऐसी ही दूसरी चीजों का व्यापार नहीं करेगी, (2) अन्न और कपास के व्यापार में सट्टा नहीं चलने दिया जाएगा, (3) कोई भी आदमी कानून को भंग नहीं करेगा, (4) किसी के लिए भी मनमानी करने की गुंजाइश नहीं रहेगी, जिसका मतलब यह हुआ कि किसी पर अगर कोई इल्जाम लगाया जाए तो वह खुद ही उसका फैसला करने नहीं बैठने पाएगा, बल्कि विधिवत स्थापित की गई देश की किसी अदालत में उसकी जांच होने देगा।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-7

5.   आम जनता के लिए

हम अपने को ईसाई कह सकते हैं, या हिंदू या मुसलमान। हम जो भी हों, हमारी भिन्नता के बीच भी एकत्व की एक ऐसी भावना है जो बिल्कुल साफ दिखाई पड़ती है और अनेक धर्मों की तह में भी एक ही धर्म है। जहां तक मेरा अपना अनुभव है, एक-न-एक वक्त आता है जब हममें से सभी को, चाहे वह मुसलमान हो, ईसाई हो या हिंदू, यह पता चलता है कि हमारे बीच संपर्क के स्थल तो अनेक हैं, पर भिन्नता के बहुत ही कम। तो फिर मैं चाहूंगा कि आप अपने से यह तो पूछें कि क्या आपके पास कोई ऐसा भी संदेशा है जो गांव वालों के लिए हो, गांवों की स्त्रियों के लिए, वहां रहने वाली आपकी बहनों के लिए। मुझे डर है कि मेरी तरह आप भी इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि आपके पास तब तक ऐसा कोई संदेशा नहीं रहेगा, जब तक कि आपकी शिक्षा में कुछ और वृद्धि न हो। यह सही है कि वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था गांवों की जिंदगी से कोई मतलब नहीं रखती। दुनिया के दूसरे हिस्सों में ऐसा नहीं पाया जाता। दुनिया के दूसरे हिस्सों, मैंने देखा है, जिन लोगों के हाथ में वहां की शिक्षा-व्यवस्था रहती है वे उस आम जनता का ध्यान रखते हैं, जिसके बीच ही स्कूलों और कालेजों से निकलने वालों को जाकर रहना और फैल जाना है, जिसके बीच ही उन्हें काम करना है। पर भारत में मैंने देखा है कि विद्यार्थियों की दुनिया आम जनता से बिल्कुल ही कट जाती है। मुझे संदेह नहीं है कि तुममें से कितनी ही लड़कियों के मां-बाप ग़रीब रहे हैं। अगर तुम लोगों ने अभी तक खुद-ब-खुद यह आविष्कार नहीं किया है तो मैं तुम लोगों से कहूंगा कि यह आविष्कार कर देखा औ अपने से पूछो कि यहां तुम लोगों ने जो कुछ सीखा है उसे क्या तुम उन लोगों तक ले जा सकती हो, या यह कि तुम्हारी घरेलू ज़िंदगी और स्कूली ज़िंदगी के बीच क्या वास्तविक तारतम्य है? इस तारतम्य के न होने से ही तो यह दुर्दशा जान पड़ती है। इसीलिए मैंने भारत के सारे विद्यार्थी-समाज के सामने यह सुझाव रखा है कि स्कूलों में वह जो कुछ सीख रहे हैं, उसमे कुछ और जोड़ें, और तभी तुम देखोगी कि आम जनता को, और उन्हें भी, जो जनता के बारे में सोचने की मेहरबानी करेंगे, कुछ लाभ हुआ है।

मुझे यह मालूम था कि ईसाई लड़कियां और लड़के, कम-से-कम कुछ तो ज़रूर ही, यह समझते हैं कि उनके और विशाल जनसमूह के बीच कहीं कोई भी समानता की बात नहीं है। पर यह तो महज़ नादानी है। कोई भी भला ईसाई आज के ज़माने में एसी बात नहीं कहता, और मुझे यकीन है कि तुम्हारी शिक्षा की ज़िम्मेदारी यहां जिन पर है, उनमें से कोई भी तुम्हें न इस तरह की शिक्षा देता है और न यह सिखाता है कि तुम्हारे और आम जनता के बीच कोई भी समानता नहीं है। तुम्हारा धार्मिक संप्रदाय जो भी हो, मैं तुमसे कहता हूं कि भारत में ही तुम्हारा जन्म हुआ है, भारत के ही अन्न से तुम्हारा पालन होता है और भारत में ही तुम्हारी जिंदगी बीतेगी। अगर आम जनता के साथ तुम्हारी एकात्मकता नहीं रहेगी तो तुम्हारी जिंदगी कई तरह से अधूरी रह जाएगी। आम जनता के और तुम्हारे बीच की वह कड़ी क्या है?

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-9

6.  राष्ट्रीयता बनाम अंतर्राष्ट्रीयता

मेरी राय में, किसी के लिए राष्ट्रवादी हुए बिना अंतर्राष्ट्रवादी होना असंभव है। अंतर्राष्ट्रवाद तभी संभव है, जब राष्ट्रवाद पक्का हो जाए, अर्थात्, जब विभिन्न संप्रदायों के लोग संगठित हो जाएं और एक व्यक्ति की नाईं एक होकर काम करना शुरू कर दें। बुरा राष्ट्रवाद नहीं है, बुरा है राष्ट्रों का आधुनिक रूप। हर राष्ट्र दूसरे से फायदा उठाना और दूसरे को खत्म करके आगे बढ़ना चाहता है। भारतीय राष्ट्रीयता ने, मुझे उम्मीद है, एक नया ही रास्ता बनाया है। वह इस सृष्टि से संगठित हो रहा है अथवा अपनी पूर्ण आत्माभिव्यक्ति चाहता है, जिससे कि सारी मानवता का लाभ पहुंच सके और उसकी सेवा हो सके। जो भी हो, मेरी अपनी देशभक्ति या राष्ट्रीयता के संबंध में कुछ भी अस्पष्टता नहीं है। ईश्वर ने जब मुझे भारत की ही जनता के बीच जन्म दिया है, तो मैं उसके प्रति झूठा बनूंगा, अगर मैं उसकी सेवा करने से चूकता हूं। अगर मैं उसकी सेवा करने का रास्ता नहीं जानता तो मानवता की सेवा करने का रास्ता मुझे कभी नहीं मिलेगा। और, अपने देश की सेवा करने के सिलसिले में जब तक मैं दूसरे राष्ट्रों को नुक्सान नहीं पहुंचाता, तब तक मेरे द्वारा कोई गलती होना संभव नहीं।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-10

 

7.   बुराई से घृणा, बुरे से नहीं

क्या यह भी संभव है कि हम अपने देश को तो प्यार करें, पर जो हमारे अपने देश पर शासन कर रहे हैं, जिनका प्रभुत्व हम नहीं चाहते, जिनके अधिकार को हम अपने दिल की गहराइयों से नापसंद करते हैं, उनसे घृणा न करें? इसका जवाब कितने ही नौजवानों के दिलों में मौजूद रहा है और यह कि अपने देश को प्यार करना और अपने देश पर शासन करने वालों से घृणा न करना असंभव है। कुछ ने खुल्लमखुल्ला अपनी यह राय जाहिर की है, कुछ उस राय पर अमल भी कर रहे हैं। पर बहुतेरे ऐसे हैं, जो इस राय को दिल के अंदर ही छिपाए रहते हैं और उसी से अपनी खुराक लेते हैं।

इस प्रश्न का मैं बहुत पहले ही अध्ययन करता आया हूं-1915 में भारत वापस लौटने के वक्त से ही नहीं, बल्कि तभी से जब मेरा सार्वजनिक जीवन शुरू हुआ और मैंने सार्वजनिक सेवा शुरू की। यह बात 1894 की है। पर मैं समझबूझ कर इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि अपने देश को प्यार करने का, अर्थात् राष्ट्रीयता का, इस बात के साथ पूरा मेल है कि जिनका शासन, जिनका प्रभुत्व, जिनके तरीके हमें पसंद नहीं है, उन्हें भी हम प्यार करें। इस समस्या का सीधा मुकाबला मुझे तब करना पड़ा, जब दक्षिण अफ्रीका की, या और भी ठीक-ठीक कहा जाए तो नेटाल की, सरकार के साथ मेरा वास्ता पड़ा, फिर बाद को ट्रांसवाल की भी सरकार के साथ और उसके भी बाद संघ सरकार के साथ। आप में से अधिकांश लोग इस बात से परिचित हैं कि उस महाद्वीप-दक्षिण अफ्रीका-में रहने वाले हमारे देशवासियों को किस प्रकार असमर्थ बना दिया गया है-बुरी तरह से अशक्त। सचमुच ही वे असमर्थताएं ऐसी हैं कि अगर कोई अपना दिमाग दुरुस्त न रखे तो वह अपने ही मानव-भाइयों से घृणा करने लगे। अन्याय का यह अनियंत्रित रूप वहां सिर्फ इसलिए है कि आपके चमड़े का रंग दूसरा है। भारत  आने पर भी आपको अगर ठीक वही बात नहीं, तो बहुत कुछ ऐसी ही बात देखने को मिलती है और कितनी ही बार इन दोनों के साथ-साथ ले चलना बेहद मुश्किल हो जाता है-अपने देश को भी प्यार करें और उसे भी जिसे हम बाघ समझते हैं। यह सवाल तो बिल्कुल दूसरा है कि आपने जो राय कायम की है वह उचित और सही है या नहीं, पर आपके दिल और दिमाग पर जो छाप पड़ती है वह तो यही कि आपके ऊपर भयंकर-से-भयंकर अत्याचार, घोर से घोर अन्याय का बर्ताव किया जा रहा है। तो फिर ऐसी हालत में भी क्या आप बाघ को प्यार करें?

यह बात मैं जरा दूसरे ढंग से रखूं-यह जरूरी नहीं कि आप बाघ को प्यार ही करें, पर प्रेम एक क्रियाशील शक्ति है और आज की संध्या का हमारा विषय यह है-क्या बाघ से नफरत करना जरूरी है? क्या घृणा राष्ट्रीयता के लिए जरूरी है? इसका जवाब जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं, बहुतों के दिमाग में निश्चय ही यह है कि नफरत करना जरूरी है। मैं जानता हूं कि कुछ लोग तो बाघ से नफरत करना अपना कर्तव्य समझते हैं और आधुनिक संविधानों की दुहाई देते हैं, यूरोप के पिछले महायुद्ध की दुहाई देते हैं, उन लड़ाइयों की दुहाई देते हैं जिनके बारे में उन्होंने इतिहास में पढ़ा है और कानून की भी दुहाई देकर वह बताते हैं कि हत्या के अपराधियों को फांसी दी जाती है। क्या यह घृणा का ही लक्षण नहीं है? कम-से-कम प्रेम यह नहीं ही है। क्या कोई अपने पिता को, अपनी मां को, अपने प्यारे-से-प्यारे को प्यार करना छोड़ देगा, अगर उसका गुनाह फांसी की सजा के लायक होगा? उनके सुधार के लिए प्रार्थना की जा सकती है, पर सजा दिलाने के लिए नहीं और फिर भी, शायद काफी औचित्य के साथ ही, यह कहा जाता है कि दंड के नियम को अगर वापस ले लिया जाए, या रद्द अथवा स्थगित कर दिया जाए तो समाज नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा। इन सारी नजीरों के रहते हुए ये नौजवान बड़ी आसानी से यह फैसला कर बैठते हैं कि जो लोग घृणा को राष्ट्रीयता के लिए अनिवार्य नहीं मानते वे गलती पर हैं। मैं इन्हें दोष नहीं देता। ये तो करुणा के पात्र हैं, इनके प्रति मेरी हमदर्दी है। पर मेरे दिमाग में रंच मात्र भी संदेह नहीं है कि वे भारी-से-भारी भ्रम में हैं और जब तक उनका रुख ऐसा ही बना रहता है, तब तक देश की उन्नति, सारी दुनिया की ही उन्नति रुकी रहेगी। इनके बरताव के समर्थन में पेश की जाने वाली इन नज़ीरों से जो मैंने आपके सामने रखी हैं, मेरे लिए कोई भी फर्क नहीं पड़ता।

दुनिया इससे ऊब उठी है। पश्चिमी राष्ट्रों में थकान आती जा रही है। हम देख रहे हैं कि घृणा की इस स्तुति से दुनिया कोई लाभ नहीं पहुंचा है। भारत को ही इस मामले में नई दिशा और संसार को एक नई सीख, देने का सौभाग्य क्यों न प्राप्त हो? (बहुत खूब, बहुत खूब की ध्वनि)। क्या यह जरूरी है कि तीस करोड़ लोगों की, एक करोड़ से नफरत रहे? यही वह ठोस सवाल है कि जिसे आज की शाम के इस विषय के निचोड़ के तौर पर मैं आपके सामने रख सकता हूं। मेरी नम्र सम्मति में यह मानवता की प्रतिष्ठा के खिलाफ है, भारत की प्रतिष्ठा के खिलाफ है कि हम अंग्रेजों के लिए एक पल के लिए अपने दिल में नफरत आने दें। इसका मतलब यह नहीं कि अंग्रेज शासकों ने भारत में जो ज्यादतियां की हैं उनकी तरफ से हम अपनी आंखें मूंद लें। मैंने तो बुराई और बुरे के बीच यह खास फर्क किया है। बुराई से नफरत कीजिए। बुरे आदमी से नहीं। हम खुद भी, हम में से हर-एक बुराइयों से भरा पड़ा है। और हम सभी चाहते हैं कि हमारे ऊपर मेहरबान रहे। मैं चाहूंगा कि अंग्रेजों की ओर भी हमारा यही रुख रहे। अंग्रेज शासकों ने जो अनेक दुष्कर्म किए हैं, उनके बारे में, और जिस शासन-व्यवस्था का बोझ हमारे ऊपर है, उसके भ्रष्ट स्वरूप के खिलाफ, भगवान जानता है, जितनी प्रचंडता और निर्भीकता के साथ मैं बोलता रहा हूं और उससे ज्यादा का दावा शायद ही कोई दूसरा कर सके। मेरे अंदर घृणा का अभाव, बल्कि अपने खुद के बारे में तो मैं यहां तक भी कहने को तैयार हूं कि जो अपने को मेरा दुश्मन मानते हैं, उनके लिए मेरा प्रेम, उनके दोषों के प्रति मुझे अंधा नहीं बना पाता। प्रेम-पात्र के अंदर, कल्पित या सही, कुछ भलाइयों को देखकर हमारे अंदर जो प्रशंसा भाव पैदा होता है, उसी के विस्तार का नाम प्रेम नहीं है। अगर मैं अपने प्रति सच्चा हूं, मनुष्य मात्र या मानवता के प्रति सच्चा हूं तो मुझे उन दोषों को समझना ही होगा जो मनुष्य के लिए सहज स्वाभाविक हैं। मुझे अपने विरोधियों की कमजोरियों को समझना ही होगा, अपने विरोधियों के दुर्गुणों को समझना ही होगा और फिर भी इन दुर्गुणों के बावजूद, उन्हें घृणा नहीं, उल्टे प्यार करना होगा। यह खुद भी एक शक्ति बन जाती है। पाशविक शक्ति तो हमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलती ही चली आई है। हमने उसका इस्तेमाल किया है और हम देख चुके हैं कि उसने यूरोप का क्या हाल कर दिया, दुनिया का क्या हाल कर डाला। यूरोपीय सभ्यता की मोहकता हमें नहीं लुभाती। उसकी सतह को जरा खुरचिए, उसके अंदर आपको शायद ही कोई चीज काम की मिले।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-11

8.    मानव-भ्रातृत्व

मेरा जीवन-लक्ष्य सिर्फ भारत की आजादी नहीं है, हालांकि इसमें संदेह नहीं कि आज तो मेरी सारी जिंदगी और सारा वक्त उसी को न्यौछावर है। लेकिन भारत की आजादी के मार्फत मैं मानव-भ्रातृत्व की भावना पैदा करने की और उसी दिशा में काम करने की उम्मीद लिए हुए हूं। मेरी देशभक्ति में संकीर्णता के लिए जगह नहीं है। उसमें सब कुछ समाविष्ट है और मैं उस देशभकित को तिलांजलि दे दूंगा, जो दूसरे राष्ट्रों की मुसीबतों या शोषण पर अपना महल खड़ा करना चाहती है। देशभक्ति की मेरी परिकल्पना बेमानी है, अगर मानव मात्र की ज्यादा से ज्यादा भलाई के साथ, हर हालत में और हमेशा, उसका पूरा मेल नहीं। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि मेरे धर्म में और धर्म से ही उत्पन्न मेरी देशभक्ति में, संपूर्ण जीव-जगत का समावेश है। मैं सिर्फ मानव कहलाने वाले प्राणियों के साथ ही भ्रातृत्व या आत्मीयता का संबंध स्थापित नहीं करना चाहता, बल्कि समस्त जीवों के साथ, यहां तक कि जमीन पर रेंगने वाले कीड़े-मकोड़े के भी साथ। आपके दिल को कोई चोट पहुंचाने का तो मेरा इरादा नहीं है, पर मैं सचमुच ही धरती पर रेंगने वाले कीड़े-मकोड़ों के साथ आत्मीयता प्राप्त करना चाहता हूं, क्योंकि हमारे साथ-साथ वे भ एक ही परमात्मा की संतान हैं और इस प्रकार, सभी प्राणी तत्वतः एक हैं, चाहे उनके रूपों में कैसी भी भिन्नता हो। इसलिए मैं आसानी से वह सारा श्रेय लेने को तैयार हूं, जो आप मुझे इस बात के लिए देना चाहें कि मानव-भ्रातृत्व को मैं अपने जीवन का लक्ष्य मानता हूं।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-14

9.  पूर्ण स्वराज्य

पूर्ण स्वराज्य-‘पूर्ण’ इसलिए कि वह जितना राजे-महाराजाओं के लिए है, उनता किसानों के लिए, जितना किसी अमीर ज़मींदार के लिए उतना ही किसी भूमिहीन खेतिहर के लिए, जितना हिंदुओं के लिए उतना ही मुसलमानों के लिए, जितना पारसियासें और ईसाइयों के लिए, उतना ही जैनों, यहूदियों और सिखों के लिए-बिना जाति, धर्म और सामाजिक ओहदे के भेदभाव के। ‘स्वराज्य’ शब्द का तो मतलब  ही यह है, और सत्य तथा अहिंसा के जिन साधनों से उसे प्राप्त करने की हमारी प्रतिज्ञा है, उसके कारण भी, इस संभावना की तो गुंजाइश ही नहीं रह जाती  कि वह एक के लिए होगा, दूसरे के लिए नहीं, एक का पक्षपात करेगा और दूसरे के खिलाफ होगा। सत्य और अहिंसा में धोखा-धड़ी या झूठ का कोई स्थान नहीं है। कांग्रेस ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर जिस सीधी सादी वजह से खींचा है, वह यही है कि वह उन साधनों से आजादी हासिल करने के लिए वचनबद्ध है, जिनका राष्ट्रों ने पहले कभी भी इस्तेमाल नहीं किया था। आजादी हासिल करने का अब तक एक ही तरीका दुनिया जानती है और वह थी शारीरिक शक्ति का इस्तेमाल। पर भारत ही नहीं, सारी दुनिया के लिए यह सौभाग्य की बात है कि अपनी आजादी हासिल करने के लिए उसने अहिंसा और सत्य का तरीका अख़्तियार किया है। इतिहास में यह एक अनोखी घटना है और जिस दुनिया ने इसे अविश्वास भरी आंखों से देखना शुरू किया था वह आज भारत के इस महान अहिंसात्मक प्रयोग की ओर दम साधे देख रही है। शारीरिक युद्ध में धूर्तता और धोखेधड़ी के लिए भी जगह है, पर अहिंसा में सत्य और न्याय को छोड़ दूसरे किसी भी हथियार के इस्तेमाल की गुंजाइश नहीं है। इसलिए, इस तरीके से तो स्वराज्य मिल ही नहीं सकता, अगर बड़े या छोटे किसी भी तबके के  अधिकारों को हम हड़प लेना चाहें, वह तभी मिल सकता है, जब सभी के साथ-देश के गरीब से गरीब और कमजोर से कमजोर तबकों के साथ भी-एक सामान्य न्याय और भला बरताव किया जाए। जब ऐसी बात है, तब कांग्रेस क्या किसी बच्चे को भी उसके अधिकार से वंचित रखना चाहेगी?

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-15

10.  भारत और विश्व

….हम सब एक ही रंग में रंगे हुए हैं, एक ही विशाल मानव-परिवार के हम सदस्य हैं। मैं कोई भी भेदभाव मानने को तैयार नहीं हूं। मैं यह दावा करने को तैयार नहीं कि भारतवासी किसी से भी ऊंचे हैं। हमारे अंदर भी वही भलाइयां और बुराइयां हैं। मानवता को अलग-अलग बंद कमरों में इस तरह विभाजित करके नहीं रख दिया गया है कि हम एक से दूसरे में जा ही नहीं सकें। हम हजारों अलग-अलग कमरों में भले ही रह रहे हों, पर उन सबके बीच दरवाजे हैं। मैं यह नहीं कहना पसंद करूंगा कि ‘मेरे लिए तो भारत ही सब कुछ है, भले ही बाकी दुनिया कुल-की-कुल बरबाद हो जाए।’ यह मेरा संदेश नहीं है। भारत मेरा सब कुछ जरूर रहे, पर संसार के दूसरे राष्ट्र की भलाई को कायम रखकर। मैं भारत को और उसक स्वाधीनता को तभी कायम रख सकता हूं जब मेरा सद्भाव सारे जगत के मानव-परिवार के प्रति रहे न कि सिर्फ उस मानव-पविार के प्रति जो पृथ्वी के उस छोटे से टुकड़े में बसा हुआ है जिसे हम भारत कहते हैं। दूसरे छोटे-छोटे राष्ट्रों से जरूर यह काफी ज्यादा बड़ा है, पर सारी दुनिया में या सारे ब्रह्मांड में भारत है ही कितना-सा?

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-16.

धार्मिक सामंजस्य-गांधी का भारत

11.     धर्म और देश

जब मैं यह कहता हूं कि मैं अपने धर्म को अपने देश से ज्यादा प्यार करता हूं और इसलिए मैं पहले हिंदू हूं और बाद में राष्ट्रवादी- तब एक मानी में निश्चय ही मेरी यह बात सही है। इसकी वजह से मैं अच्छे से अच्छे किसी भी राष्ट्रवादी के मुकाबले कम राष्ट्रवादी नहीं हो जाता। इससे मेरा आशय सिर्फ इतना है कि मेरे देश के हित और मेरे धर्म के हित एक ही हैं।

इसी प्रकार, जब मैं कहता हूं कि अपनी मुक्ति को मैं सर्वोपरि मानता हूं, भारत की मुक्ति से भी ऊपर, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि मेरी अपनी मुक्ति, भारत की राजनैतिक या अन्य किसी प्रकार की मुक्ति का बलिदान चाहती है। पर इसका मतलब यह ज़रूर है कि दोनों के बीच कोई झगड़ा नहीं है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-17

 

12.     मेरा लक्ष्य

मैं अपने को इस लायक नहीं समझता कि पैगंबरों के नामों की परंपरा में मेरा नाम भी गिना जाए। मैं तो सत्य का एक विनम्र खोजी हूं। मैं आत्मदर्शन के लिए व्याकुल हूं, इसी जीवन में मोक्ष पाने के लिए। मेरी राष्ट्र-सेवा देह के बंधन से अपनी आत्मा को मुक्त करने की मेरी साधना का ही एक अंग है। इस तरह देखने पर, मेरी सेवा विशुद्ध स्वार्थपरता समझी जा सकती है। मुझे पृथ्वी पर नश्वर राज्य नहीं चाहिए। मुझे तो पारलौकिक राज्य की कामना है जो मोक्ष है। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मुझे किसी गुफा में जाकर बैठने की जरूरत नहीं है। अगर मैं ठीक-ठीक समझ सकूं, तो मेरी गुफा तो मेरे साथ-साथ है। गुफा में रहते हुए भी आकाश के महल बनाए जा सकते हैं, और जनक की तरह महल में रहने वाला भी ऐसा हो सकता है जिसे महलों की जरूरत ही न हो। गुफा में रहते हुए भी जो विचारों के पंख लगाकर सारी दुनिया में उड़ता-फिरता है, उसे शांति नहीं मिलती। किसी जनक को, शान-शौकत के बीच रहते हुए भी, अनिवर्चनीय शांति मिल सकती है। मेरे लिए मुक्ति अपने देश की, और उसके जरिए सारी मानवता की, सेवा के रास्ते हैं। मैं प्रत्येक प्राणी के साथ आत्मीय होना चाहता हूं। गीता की भाषा में, मैं मित्र और शत्रु दोनों के साथ सद्भाव के साथ रहना चाहता हूं। इसलिए मैं तो किसी मुसलमान को, या ईसाई को, या हिंदू को, उनके घृणा करने पर भी प्यार ही करना चाहूंगा औ उनकी सेवा ही करूंगा-ठीक जिस तरह अपनी स्त्री या पुत्र को, उनकी घृणा करने पर भी, प्यार ही करूंगा। इस प्रकार, मेरी देशभक्ति मेरे लिए तो शाश्वत स्वाधीनता और शांति के लोक की यात्रा का एक पड़ाव भर है। इस तरह, यह बात साफ हो जाती है कि मेरे लिए धर्म को छोड़कर राजनीति है ही नहीं। वह धर्म की ही खातिर है। धर्म-विमुख राजनीति तो मौत का फंदा है, जो आत्मा का हनन करता है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-17

13.     धर्मांधता मूर्तिपूजा ही है

मैं मूर्तिपूजक और मूर्तिभंजक दोनों ही हूं-इन अपने शब्दों के अर्थ के हिसाब से मूर्तिपूजा के पीछे जो भावना है, उसकी मैं कद्र करता हूं। मानव जाति को ऊपर उठाने में इसका एक बहुत  ही महत्वपूर्ण स्थान है। और मैं चाहूंगा कि मेरे अंदर यह सामर्थ्य आ जाए कि अपने प्राण देकर भी मैं उन हजारों पवित्र मंदिरों की रक्षा कर सकूं जो हमारे इस देश को पावन बनाए हुए हैं। मुसलमानों के साथ मेरा जो मेल हुआ है, उसके पीछे यह बात मानी हुई है कि मेरी मूर्तियों और मंदिरों के प्रति उनका भाव पूर्ण सहिष्णुता का रहेगा। मूर्तिभंजक में इस मानी में हूं कि उस सूक्ष्म प्रकार की मूर्तिपूजा को खत्म कर रहा हूं जो धर्मांधता की शक्ल में मौजूद है और जो अपने देवता की पूजा के सिवा किसी भी दूसरे रूप की देवा पूजा में कोई पुण्य नहीं मानती। इस तरह की मूर्तिपूजा कहीं ज्यादा घातक है, क्योंकि वह कहीं ज्यादा सूक्ष्म और अप्रत्यक्ष है, बनिस्बत उस साकार और स्थूल पूजा के जो देवता को किसी छोटे से पत्थर या सोने की मूर्ति में देखती है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-18

14.     ईश्वर एक है

…वक्त की जरूरत यह नहीं है कि धर्म एक हो, बल्कि अलग-अलग धर्म वालों के बीच आपसी सद्भाव और सहिष्णुता हो। हम मृत्यु के स्तर पर आकर नहीं एक होना चाहते, बल्कि भिन्नता में एकता चाहते हैं। रूढ़ियों को और वंश परंपरा, जलवायु और अन्य परिस्थितियों के परिणामों को, उखाड़ फैंकने की कोशिश न सिर्फ नाकामयाब होकर रहेगी, बल्कि वह अधर्म है। सभी धर्मों की आत्मा एक है, पर अनेकानेक आवरणों में ढके रहने के कारण उनके रूप अलग-अलग हैं। ये रूप प्रलय-काल तक कायम रहेंगे। ज्ञानी लोग इस बाहरी आवरण को न देख विभिन्न आवरणों के नीचे छिपी एक ही आत्मा को देखेंगे। हिंदुओं का यह सपना कि इस्लाम, ईसाई मजहब या ज़रथुस्त्र धर्म भारत से निकाल बाहर किए जाएंगे, उतना ही बेकार है, जितना कि मुसलमानों का यह सपना कि उनकी कल्पना का इस्लाम ही सारी दुनिया पर राज करेगा। पर अगर इस्लाम के लिए सिर्फ एक परमात्मा के प्रति और उसके पैगम्बरों की एक अनन्त श्रृंखला के प्रति विश्वास-भावना ही काफी हो, तब तो हम सभी मुसलमान हैं, पर साथ ही साथ हम सभी हिंदू और ईसाई भी हैं। सत्य पर किसी के भी धर्म-शास्त्र का एकाधिकार नहीं है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-19

15.     सहिष्णुता

सहिष्णुता हमारा लक्ष्य होना चाहिए। अगर हम सभी एकमत हो जाएं तो फिर सहिष्णुता के इस उदार गुण के लिए गुंजाइश ही कहां रह जाए? फिर भी, सब को एकमत बना सकने का प्रयास आकाश-पुष्प को पा सकने के ही समान व्यर्थ है। इस प्रकार, एक ही उपाय बचा रहता है कि हम एक-दूसरे के मत सहन करें। मैं जन्म से ही मूर्तिपूजक हूं और अवतारों तथा पुनर्जन्म में मेरा विश्वास है, फिर भी, अपने मुसलमान दोस्तों के हिसाब से, मुझे हर हालत में अपने अंदर मुसलमानों के प्रति सहिष्णुता का भाव पैदा करना चाहिए, हालांकि मूर्तिपूजा, अवतारों और शायद पुनर्जन्म में भी उनका विश्वास नहीं है।

अवतारों में मेरी आस्था रहने के कारण मैं यह नहीं समझता कि अकेले ईसामसीह ही ईश्वर या ईश्वर-पुत्र थे। फिर भी मुझे इस बात को सहन करना ही चाहिए कि मेरे ईसाई दोस्त उन्हें परमात्मा समझते हैं और उसी तरह मुसलमानों और ईसाइयों को यह सहन करना ही चाहिए कि मैं कन्याकुमारी और जगन्नाथ के सामने अपना सिर नवाता हूं। मैं देख पा रहा हूं कि मेरे जीवन-काल में ही सहिष्णुता के युग का अरुणोदय हो रहा है, क्योंकि अहिंसा धर्म के मूल में सहिष्णुता है। ठीक यही सहिष्णुता सत्य धर्म के मूल में भी है। ईश्वर की ही भांति सत्य के भी हजारों और विविध रूप हैं। इसलिए मैं जोर देकर यह कैसे कह सकता है कि सत्य के रूप की मेरी धारणा ही सही है और दूसरों की गलत?

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-19

16.     कन्याकुमारी में

…मूर्तिपूजा का आविष्कार करके उसने (हिंदू ने) एक ईश्वर को अनेक नहीं कर दिया है, बल्कि इस सच्चाई का पता लगाकर दुनिया के सामने रखा है कि मनुष्य परमात्मा को उसके ईश्वरीय स्वरूपों में पूज सकता है और पूजता चला जाएगा। ईसाई और मुसलमान अपने को मूर्तिपूजक भले ही न मानें, पर जो उनके आदर्शों को पूजते हैं, वे भी प्रतिमा-पूजक ही हैं। मसजिद या गिरजा भी एक तरह से प्रतिमा-पूजन के ही रूप हैं। यह मानना भी एक ढंग की मूर्ति पूजा ही है कि इन स्थानों पर जाने भी से किसी की पवित्रता में वृद्धि हो सकती है और इस मान्यता में कोई हर्ज भी नहीं है। यह विश्वास कि ईश्वर सिर्फ कुरान या बाइबिल में ही प्रकट हुआ है, मूर्ति पूजा ही है, और बिल्कुल निरीह प्रकार की है। हिंदू इससे आगे जाता है और कहता है कि हर व्यक्ति को अपने मन-पसंद रूप में ईश्वर की पूजा करनी चाहिए।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-20

17.     हिंदू धर्म

मुझे जितने धर्मों का पता है उनमें मुझे यही (हिंदू धर्म) सबसे अधिक सहिष्णु दिखाई दिया है। सिद्धांतवादिता की जकड़बंदी से इसका दूर रहना मुझे ज़ोर से अपनी और खींचता है, क्योंकि इसके अनुयायी के लिए इसमें आत्मभिव्यक्ति की सबसे ज्यादा गुंजाइश है। इस धर्म में संकीर्णता की कमी रहने की वजह से इसके अनुयायियों के लिए दूसरे धर्मों का न सिर्फ आदर कर सकना, बल्कि उनमें जो कुछ अच्छा है, उसे पसंद कर सकना और अपना लेना भी आसान हो जाता है। अहिंसा तो सभी धर्मों में मौजूद है, पर हिंदू धर्म में इसका प्रकाश और प्रयोग सबसे अधिक हुआ है (जैन और बौद्ध धर्मों को मैं हिंदू धर्म से अलग नहीं मानता)। हिंदू धर्म की आस्था न केवल संपूर्ण मानव जाति की, बल्कि प्राणिमात्र की, एकात्मता में है। उसकी गो-भक्ति, मेरी राय में, लोकोपकारवाद के विकास में उसकी अद्वितीय देन है। प्राणीमात्र की एकात्मता और इसलिए उसकी पवित्रता के प्रति हमारी आस्था इसी आस्था का प्रत्यक्ष परिणाम है। और अंत में, वर्णाश्रम धर्म का आविष्कार तो सत्य की अनवरत खोज का बड़ा ही शानदार नतीजा है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-20

18.     परम व्यापक सहिष्णुता

मैं तो यह चाहता हूं कि विभिन्न धर्मों को मानने वाले सभी मनुष्य-न सिर्फ भारत में, बल्कि सारी दुनिया में-एक-दूसरे के संपर्क से ज्यादा अच्छे मनुष्य बनें और अगर ऐसा हो जाए तो दुनिया आज के मुकाबले कहीं ज्यादा अच्छी रहने की जगह हो जाए। अधिक से अधिक व्यापक सहिष्णुता के लिए मेरी विनती है और इसी दिशा में मैं काम किए जा रहा हूं। मेरा अनुरोध है कि लोग हर धर्म की परीक्षा करें और उन धर्मावलंबियों के ही दृष्टिकोण से करें। अपने स्वप्न के भारत में मैं उसे एक धर्मावलंबी नहीं बनते देखना चाहता, अर्थात्, पूरा हिंदू या पूरा ईसाई या पूरा मुसलमान, बल्कि मैं उसे पूरा सहिष्णु बनते देखना चाहता हूं, जहां उसके सभी धर्म कंधे से कंधा मिलाकर एक साथ चल रहे हों।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-21

19.     धर्मों की समानता

सहिष्णुता शब्द मुझे यों पसंद तो नहीं है, पर इससे अच्छा शब्द मुझे कोई नहीं सूझा। सहिष्णुता से दूसरे मतों की हीनता का निराधार भाव तो ध्वनित हो ही सकता है, जबकि अहिंसा हमें यह सिखाती है कि दूसरों के धार्मिक मतों के प्रति हमारे मन में वही आदर-भाव रहना चाहिए जो अपने मत के प्रति है और इस प्रका अपने मत की अपूर्णता का भाव इसमें निहित है। प्रेम-धर्म का अनुसरण करने वाला सत्य का खोजी यह आसानी से स्वीकार कर लेगा। हमने सत्य का पूर्ण दर्शन कर लिया होता तो हम उसके सिर्फ खोजी न कहलाते, बल्कि ईश्वर में मिलकर एक हो जाते, क्योंकि सत्य ही ईश्वर है। किंतु खोजी मात्र होने के नाते हमारी खोज बनी हुई है और अपनी अपूर्णता का हमें पता है। और अगर हम खुद ही अपूर्ण हैं तो हमारी धारणा का धर्म भी तो अपूर्ण ही होगा। हमें पूर्ण धर्म का बोध नहीं हुआ है, जिस प्रकार हमें ईश्वर भी नहीं मिला है। इस प्रकार, हमारी धारणा का धर्म जब अपूर्ण ही है, तो उसके विकास की प्रक्रिया और उसकी नई-नई व्याख्या की तो गुंजाइश रह ही जाती है। इस प्रकार के विकास के फलस्वरूप ही सत्य की दिशा में, ईश्वर की दिशा में, प्रगति संभव है और यदि मनुष्य द्वारा कल्पित सभी धर्म अपूर्ण हैं तो तुलनात्मक अच्छाई का प्रश्न तो उठता ही नहीं है। सभी धर्मों में सत्य का रहस्योद्घाटन है, पर सभी अपूर्ण हैं और सभी में भूलों की संभावनाएं हैं। दूसरे धर्मों के प्रति हमारे आदर-भाव का मतलब यह नहीं है कि हमें उनके दोष दिखाई ही नहीं पड़ने चाहिएं। हमें तो अपने धर्म के दोषों के प्रति भी पूरी तरह सजग रहना चाहिए, पर उनके कारण हम उसका परित्याग न कर उन दोषों को ही दूर करने में लग जाएं। सभी धर्मों को एक दृष्टि से देखते हुए हमें दूसरे धर्मों की सभी अपनाने योग्य बातों को अपने धर्म में मिला लेने में रंच मात्र भी झिझक नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे अपना धर्म मानना चाहिए।

तब सवाल यह पैदा होता है: तो फिर अलग-अलग इतने धर्मों की जरूरत ही क्या? आत्मा तो एक ही है, पर जिन देहों में वह प्राणों का स्पंदन करती है, वे अनेक हैं। देहों की संख्या तो हम घटा नहीं सकते, फिर भी आत्मा की एकता को हम जानते हैं जिस तरह वृक्ष का तना एक ही होता है, पर शाखाएं और पत्तियां अनेक, उसी तरह सच्चा और पूर्ण धर्म एक ही है, पर मनुष्य के माध्यम से वह अनेक हो जाता है। जो धर्म एक ही है, वह वर्णनातीत है। अपूर्ण मनुष्य अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी भाषा में उसका प्रकाश करते हैं और फिर उनके शब्दों की व्याख्या भी उन्हीं के जैसे अपूर्ण मनुष्यों द्वारा की जाती है। तब किसकी व्याख्या को बिल्कुल सही माना जाए? अपने-अपने दृष्टिकोण से हर मनुष्य सही है, पर यह भी तो असंभव नहीं कि सब-के-सब गलती पर हों। इसीलिए सहिष्णुता की आवश्यकता होती है, जिसका मतलब अपने धर्म के प्रति उदासीनता नहीं, बल्कि ऐसा प्यार है, जिसमें समझदारी भी ज्यादा है और निर्मलता भी। सहिष्णुता हमें आध्यात्मिक दृष्टि देती है जो धर्मांधता से उतनी ही दूर है, जितनी दक्षिणी धु्रव से उत्तरी ध्रुव। धर्म के सच्चे ज्ञान से एक धर्म और दूसरे धर्म के बीच की दीवारें ढह जाती हैं। दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णुता का अभ्यास करने से हमारे अंदर अपने धर्म के प्रति और भी अधिक सच्ची समझदारी आएगी।

सहिष्णुता से, स्पष्ट ही, सही और गलत या अच्छाई और बुराई के बीच का भेद नहीं खत्म हो जाता। धर्मों के प्रसंग में यहां स्वभावतः संसार के प्रमुख धर्मों की ही बात सामने रखी गई है। उन सभी का मूल आधार एक है। उन सभी ने बड़े-बड़े महात्माओं को जन्म दिया है।…

…अपने संतोष के लिए जब मैं विभिन्न धर्मों के धर्म ग्रंथों के पन्ने उलटा करता था, तभी मैंने ईसाई, इस्लाम, ज़रथुस्त्र, यहुदी और हिंदू धर्मों का अपने काम लायक परिचय प्राप्त कर लिया था। मैं यह कह सकता हूं कि इन्हें पढ़कर सभी धर्मों के प्रति मेरे अंदर सम-दृष्टि पैदा हो गई थी, भले ही उस समय मुझे इसका ठीक-ठीक पता न चला हो। उन दिनों की याद ताजा करने पर मैंने देखा है कि सिर्फ इस बिना पर कि कोई धर्म मेरा अपना नहीं है, उसकी आलोचना करने की मेरे अंदर कभी रंचमात्र भी इच्छा नहीं हुई थी और ऐसे प्रत्येक धर्मग्रंथ को मैंने श्रद्धा के साथ पढ़ा था और उनमें सभी के अंदर मुझे वही, एक, मूलभूत नैतिकता दिखाई दी थी। कुछ बातें तब मेरी समझ में नहीं आई थीं और अब भी नहीं आती हैं, पर अनुभव ने मुझे सिखाया है कि जल्दबाजी में यह मान बैठना कि जो हमारी समझ में नहीं आता वह जरूर गलत ही होगा, भूल है। जो बातें मैं पहले नहीं समझ पाया था, उनमें से कुछ दिन बाद दिन के प्रकाश की भांति स्पष्ट हो गईं। सम-दृष्टि रहने पर हमें कितनी ही कठिनाइयों का हल करने में आसानी हो जाती है और जब हम किसी बात की आलोचना भी करते हैं, तब भी नम्रता और शिष्टता के साथ अपनी बात कहते हैं, जिससे पीछे के लिए कोई डंक नहीं छूटता।

सभी धर्मों की समानता का सिद्धांत स्वीकार कर लेने से धर्म और अधर्म के बीच का भेद नहीं मिटता। अधर्म के प्रति भी सहिष्णुता पैदा करने की बात हम नहीं कह रहे हैं। पर कुछ लोग आपत्ति कर सकते हैं कि ऐसी स्थिति में, अगर हर आदमी धर्म और अधर्म का निर्णय खुद ही करने लग जाए, तो सम-दृष्टि के लिए तो कोई गुंजाइश ही नहीं छूटेगी। यदि हम प्रेम के धर्म पर चलेंगे तो अपने अधार्मिक भाई के लिए हमारे अंदर कोई घृणा नहीं होगी। उलटे हम उसे प्यार करेंगे, जिसका नतीजा यह होगा कि या तो हम उसे उसके रास्ते की गलियों के कायल कर देंगे, या वह हमें हमारी गलतियां दिखा देगा और या फिर दोनों ही एक-दूसरे के बीच के मतभेद के प्रति सहिष्णुता बरतेंगे। दूसरा पक्ष अगर प्रेम-धर्म का अनुयायी नहीं है, तो वह हमारे प्रति हिंसा का मार्ग ग्रहण कर सकता है। किंतु हमारे दिल में अगर उसके लिए सच्चा प्रेम है, तो अंत में उसकी कटुता को वह खत्म करके ही रहेगा। हमारे रास्ते की सारी बाधाएं नष्ट हो जाएं अगर हम सिर्फ इस स्वर्ण-नियम का पालन करें कि जो, हमारी राय में, भूल कर रहे हैं, उनके प्रति अधीर न हों, बल्कि जरूरत पड़ने पर स्वयं कष्ट उठाने को तैयार रहें।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-21

20.     धर्म: एक व्यक्तिगत मामला

हिंदुस्तान उन सभी का है, जो यहां पैदा हुए हैं, यहीं पले हैं और जो किसी दूसरे देश को अपना नहीं मानते। इसलिए यह जितना हिंदुओं का है, उतना ही पारसियों का, या यहुदियों का, या भारतीय ईसाइयों का, या मुसलमानों और अन्य अ-हिंदुओं का है। स्वतंत्र भारत में हिंदू-राज नहीं, भारतीय राज होगा जिसका आधार, किसी भी धार्मिक मत या संप्रदाय का बहुसंख्यक होना नहीं, बल्कि धर्म-निरपेक्ष रूप में संपूर्ण जनता का प्रतिनिधित्व होगा। मेरी कल्पना के अनुसार कई संप्रदाय वाले मिल-जुलकर हिंदुओं को अल्पसंख्यक बना दे सकते हैं। वे अपनी सेवाओं के हिसाब से और अपनी योग्यता के आधार पर चुने जाएंगे। धर्म एक व्यक्तिगत मामला है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। विदेशी प्रभुत्व की अप्राकृतिक स्थिति के बदौलत ही तो हमारे यहां धर्म के आधार पर अप्राकृतिक टुकड़े कर डाले गए हैं। विदेशी प्रभुता के न रहने पर हमें इस मूर्खता पर हंसी आएगी कि झूठे आदर्शों और नारों से हम किस तरह चिपटे रहे थे।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-24.

 

सामाजिक बंधन और बाधाएं-गांधी का भारत

21.     एक अभिशाप

हिंदू धर्म पर आज एक ऐसा धब्बा लगा हुआ है, जो कभी धुल नहीं सकता। मैंने यह मानने से इंकार कर दिया है कि सनातन काल से यह हमारे बीच चला आ रहा है। मैं तो समझता हूं कि ‘अस्पृश्यता’ की यह घृणित और निकृष्ट प्रवृत्ति, जिसने हमें जकड़ रखा है, निश्चय ही हमारे अंदर तब घुस गई होगी, जब हम अपने जीवन-चक्र में सबसे ज्यादा उतार पर थे और फिर यह पाप हमसे चिपक गया और अभी तक चिपका रह गया है। मुझे तो यह लगता है कि हमें कोई शाप मिला है और जब तक यह शाप कायम है, मैं समझता हूं, हमें यही मानकर चलना होगा कि हमारी इस पावन-भूमि में हमारे ऊपर जो-जो मुसीबतें आती हैं, वह हमारे द्वारा किए जाने वाले इसी प्रचंड और कभी भी प्रक्षालित न हो सकने वाले, पाप की बिल्कुल उचित और सही सजा के तौर पर हैं। अपने पेशे की वजह से किसी आदमी को अछूत समझा जाए, यह एक ऐसी बात है जो किसी की समझ में नहीं आ सकती।…

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-25

22.     अनिवार्य सुधार

मैं देखता हूं कि ऐसे मसलों पर भी अभी तक सवाल पूछे जाते हैं, जिन्हें, मैं समझता था, काफी साफ किया जा चुका है। कांग्रेस के प्रस्ताव के अनुसार, और मेरी निजी राय के भी मुताबिक, अस्पृश्यता-निवारण का एक ही अर्थ हो सकता है। वह यह कि हम हिंदू लोग अस्पृश्यता का पाप अपने सिर से उतार फैंकें। चारों वर्णों के लोगों के बीच एक-दूसरे का स्पर्श, अपवित्र करने वाला या पाप नहीं समझा जाता। अन्त्यजों के साथ भी हमारा वैसा ही बरताव होना चाहिए। बार-बार इस बात पर जोर दिया गया है कि इस प्रस्ताव का और कोई मतलब नहीं है। जिस तरह दूसरे वर्णों के बीच अंतर्जातीय खान-पान या विवाह चालू नहीं है। उसी तरह अन्त्यजों के साथ भी इस प्रस्ताव में उस तरह के संबंध की बात कहीं नहीं हैं। इन मामलों में जोर-जबरदस्ती नहीं चल सकती। लेकिन अगर किसी को सिर्फ इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति के साथ संपर्क रखने में आपत्ति है कि वह किसी जाति-विशेष में पैदा हुआ है और इसलिए वह उसे अस्पृश्य मानता है तो उसका यह बरताव प्राकृतिक धर्म के, अनुकंपा की भावना के, और जिसे हम सच्चे अर्थ में शास्त्र कहते हैं, उसके भी प्रतिकूल है। इस पापमय प्रथा का अंत करने के लिए जो प्रयत्न किए जा रहे हैं उन्हें अंतर्जातीय खान-पान और विवाह के मामले के साथ जोड़ देना उस प्रायश्चित की प्रगति में बाधा डालना है, जिसमें से होकर हमें अनिवार्य रूप से गुजरना है। अस्पृश्यता की बुराई ने हमारे अंदर इतनी गहरी जड़ें जमा ली हैं कि हम उसे बुराई के रूप में देख ही नहीं पाते। सचमुच ही ऐसा जान पड़ता है मानो हिंदू समाज के एक कीमती आभूषण के रूप में उसे हिफाजत के साथ संभाल कर रखा जा रहा है। इस धर्म के शुभंचितकों को जब इस बुराई को खत्म करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, तब व्यवहार-कुशल लोगों को नई-नई कठिनाइयां खड़ी करके इस सुधार की प्रगति में बाधा नहीं डालनी चाहिए।

अंतर्जातीय खान-पान और विवाह के मसलों का संबंध जाति-प्रथा के सुधार के साथ है। जो लोग यह मानते हैं कि जाति-प्रथा का अंत किया जाना चाहिए वह इन सुधारों को लाने की कोशिष में लगे हुए हैं। पर यह साफ-साफ समझ लिया जाना चाहिए कि उनकी कोशिशें अस्पृश्यता-निवारण से बिल्कुल अलग हैं और उनका इसके साथ किसी प्रकार का भी संबंध नहीं है। जो जाति-प्रथा का अंत करना चाहते हैं वह अस्पृश्यता-निवारण में भी मदद करते हैं और यह ठीक ही है। पर अगर वह यह भी समझते रहें कि अंतर्जातीय खान-पान और विवाह का मसला अस्पृश्यता-निवारण से बिल्कुल अलग है तो दोनों ही क्षेत्रों में मिलने वाली सफलताओं के आधार पर वे उनके बारे में ठीक-ठीक राय कायम कर सकेंगे।

तो फिर अस्पृश्यता-निवारण का मतलब है क्या? मेरा ख्याल था कि यह बिल्कुल साफ हो चुका है। इसका मतलब यह है कि तथाकथित अछूत लोग दूसरी जातियों के लोगों की ही भांति स्वच्छंदतापूर्वक जहां चाहेंगे आ-जा सकेंगे, दूसरों के लिए जिन स्कूलों और मंदिरों के दरवाजे खुले हैं वहां प्रवेश पा सकेंगे और जिन कुंओं से बाकी लोग पानी खींचते हैं वहां से पानी खींच सकेंगे।

यह दलील कि अछूत लोग गंदे ढंग से रहते हैं और कुछ गंदे पेशों में लगे हुए हैं, मुझे तो अज्ञान का ही परिणाम मालूम होता है। अछूतों से भी ज्यादा गंदे लोग मौजूद हैं, जिन्हें सार्वजनिक कुंओं से पानी खींचने दिया जाता है। छोटे शिशुओं का लालन-पालन करने वाली मां गंदा काम करती है और उसी प्रकार डाक्टर लोग भी, पर हम दोनों का ही सम्मान करते हैं। अगर यह कहा जाए कि अपना काम करने के बाद वे नहा-धोकर स्वच्छ हो जाते हैं, तो कुंओं से पानी लाने के पहले कितने ही अछूत भी ऐसा करते हैं। लेकिन फिर भी अगर वह अपने को साफ नहीं रखते, तो इसके लिए दोषी हम है। उनको नफरत की निगाह से देखना, उन्हें गांव से दूर रहने के लिए मजबूर करना, सफाई से रहने के साधनों तक उनकी पहुंच को असंभव या मुश्किल बना देना और फिर गंदे रहने के लिए उनकी भर्त्सना करना तो अन्याय की पराकाष्ठा है। हमारा यह पवित्र कर्तव्य है कि हमारी उपेक्षा और अत्याचार के कारण उनके अंदर जो दोष आ गए हैं, उन्हें दूर करने में हम उनकी मदद करें। ऐसा करने से इंकार करना और फिर भी यह आशा रखना कि भारत स्वाधीन हो सकेगा ठीक ऐसा ही है जैसे हम सूर्य की ओर पीठ करके उसका दर्शन करने की आशा करें।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-25

23.     कई सिरों वाला दैत्य

अस्पृश्यता कई सिरों वाला दैत्य है। इसलिए यह जरूरी है कि जब-जब वह अपना कोई सिर उठाए उसे तभी कुचल दिया जाए। पुराणों में जो कथाएं दी हुई हैं, उनमें से कुछ तो बड़ी ही खतरनाक साबित हो सकती हैं अगर आज की परिस्थितियों पर उनके तात्पर्य को लागू करना हम न जानते हों। शास्त्रों में लिखी हुई एक-एक बात को मनकर अगर हम चलने लगेंगे या उनमें लाए गए पात्रों को अपना आदर्श मान बैठेंगे, तब तो ये शास्त्र हमारे लिए मौत के फंदे बन जाएंगे। वे तो मौलिक सिद्धांतों का स्पष्टीकरण और प्रतिपादन करने में ही हमारी मदद करने के लिए तैयार हैं। धर्मशास्त्रों में लाए गए किसी सुपरिचित पात्र ने यदि ईश्वर-विरोधी या मनुष्य-विरोधी कोई पाप किया है तो क्या इससे हमें भी वैसा पाप करने की आजादी मिल जाती है? सदा के लिए जब एक बार हमें बता दिया गया कि संसार में सत्य ही सब कुछ है, सत्य ही परमेश्वर है, तो बस हमें काफी मान लेना चाहिए। फिर यह कहना असंगत हो जाता है कि युधिष्ठर को धोखा देकर मिथ्यावादी बना दिया गया। हां, यह जानना हमारे लिए अधिक संगत है कि जब वह एक बार झूठ बोल गए तो उसी क्षण उन्हें दुःख भोगना पड़ा और उनका इतना बड़ा नाम भी उन्हें दंड भोगने से बचा नहीं सका। इसी प्रकार जब हमें यह बताया जाता है कि आदि-शंकर अपने सामने किसी चांडाल के आ जाने पर उससे बचना चाहते थे, बेतुकी बात है। हमारे लिए इतना ही जानना काफी है कि जो धर्म हमें यह सिखाता है कि सभी जीवों के प्रति हम अपने जैसा ही बरताव करें, यह सर्वथा निर्दोष लोगों की एक पूरी जाति के साथ तो क्या, एक भी जीव के साथ किए जाने वाले अमानुषिक बरताव को किसी प्रकार भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। जो भी हो, आदि-शंकर ने क्या किया था और क्या नहीं किया था, इस पर निर्णय देने लायक तो पूरे तथ्य भी हमारे सामने नहीं हैं। और उनसे भी कम मात्रा में हमें ‘चांडाल’ शब्द का अर्थ मालूम है-जिस संदर्भ में उसका प्रयोग किया गया है। उसके कई अर्थ माने गए हैं, जिनमें से एक है पापी। पर सभी पापियों को अछूत माना जाने लगे, तब तो इस बात का बहुत बड़ा डर है कि हम सभी अछूत माने जाएंगे और वह पंडित जी खुद भी नहीं बच सकेंगे।

अस्पृश्यता की प्रथा काफी पुरानी है, इससे कोई इंकार नहीं करता। पर अगर यह बुरी प्रथा है तो प्राचीनता के आधार पर इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। अगर अस्पृश्य लोग आर्यों के समाज से बहिष्कृत लोग हैं तो इससे उस समाज का नाम उज्जवल नहीं हुआ है। और अगर आर्यों ने अपनी प्रगति के किसी काल में किसी वर्ग के लोगों को सजा के तौर पर बहिष्कृत किया था तो कोई वजह नहीं कि जिन कारणों से पुरखों को सजा मिली थी, उनके न रह जाने पर उनकी संतति को भी वह सजा मिलती चली जाए। अस्पृश्यों के समाज में भी अस्पृश्यता का मौजूद रहना यही दिखाता है कि यह बुराई एक सीमा के अंदर नहीं रखी जा सकती और उसका घातक प्रभाव दूर-दूर तक फैलता चला जाता है। अश्पृश्यों के अंदर भी अस्पृश्यता का रहना एक और भी कारण है कि सुसंस्कृत हिंदू समाज इस अभिशाप से जल्द से जल्द छुटकारा पाए। अस्पृश्यों को यदि हम इसलिए अछूत मानते हैं कि वह जानवरों को मारते हैं और मांस, रक्त, हड्डी और विष्टा से उन्हें काम करना पड़ता है तो हर नर्स और हर डाक्टर को अछूत मानना चाहिए और उन सभी ईसाइयों, मुसलमानों और तथाकथित उच्च जाति वाले हिंदुओं को भी, जो खाने के लिए या बलि चढ़ाने के लिए पशुओं की हत्या करते हैं। यह दलील कि बूचड़खानों, ताड़ी की दुकानों और भाटियारखानों (वेश्यागृहों) को चूंकि अलग रखा जाता है या रखा जाना चाहिए। इसलिए अस्पृश्यों को भी उसी तरह अलग रखा जाए, घोर द्वेष-भाव का सूचक है। और फिर बूचड़ों और भटियारों को तो हम समाज से बहिष्कृत करते नहीं हैं।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-27

24.     अस्पृश्यता-निवारण

अस्पृश्यता उसे कहा जाता है जब किसी ख़ास प्रकार के घर में जन्म लेने वाले कुछ ख़ास लोगों द्वारा छू लिए जाने से कोई अपिवत्र हो जाए। अखा के शब्दों में, यह एक फोड़ा है। धर्म का ढोंग रचकर हमेशा ही यह रास्ते में अड़ंगे लगाता है और धर्म को विकृत कर देता है।

अश्पृश्य होकर कोई भी पैदा नहीं हो सकता, क्योंकि सभी उस एक ही आग की चिंगारियां हैं। कुछ लोगों को जन्म से ही अस्पृश्य मानकर चलना गलत है। किसी के मृत देह को छूने के बारे में भी झूठी झिझक रखना गलत है, क्योंकि वह तो करुणा और सम्मान की वस्तु होनी चाहिए। स्वास्थ्य की दृष्टि से ही हम किसी मृत देह को छूने के बाद, या तेल की मालिश करने के बाद, या हजामत बनवाने पर, स्नान करते हैं। इन अवस्थाओं में भी जो स्नान नहीं करता, उसे गंदा भले ही समझा जाए, पर पापी तो किसी हालात में नहीं माना जा सकता। अपने बच्चे के मल-मूत्र को साफ करने के बाद कोई मां जब तक स्नान नहीं करती या अपने हाथ-पांव नहीं धो लेती, तब तक वह ‘अस्पृश्य’ भले ही बनी रहे, पर अगर उस वक्त कोई बच्चा उसे छू लेगा, तो वह अपवित्र नहीं हो पाएगा।

किंतु भंगियों, ढेढ़ों, चमारों वगैरा को उनके जन्म से ही नफरत के साथ देखा जाता है और अछूत समझा जाता है। कितना भी साबुन मल-मल कर वह बरसों तक नहाते चले जाएं, कितने भी अच्छे कपड़े पहनें, कितना भी वैष्णवों जैसे तिलक आदि लगाएं, नित्य गीता-पाठ करें और पढ़ाई-लिखाई वाला पेशा भी अख्तियार कर लें, फिर भी वे अछूत-के-अछूत ही बने रहेंगे। यह तो घोर अधर्म ही माना जा सकता है और यह नाश कर देने योग्य ही है। अस्पृश्यता-निवारण को आश्रम का एक व्रत मानकर हम अपने इस विश्वास को दावे के साथ घोषित करते हैं कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का अंग तो नहीं ही है, उल्टे एक महामारी है, जिससे लड़ना हर हिंदू का परम धर्म है। इसलिए हर हिंदू को, जो इसे पाप मानता हो, इसका प्रायश्चित करने के लिए अछूतों के साथ मेल-मिलाप का संबंध बनाना चाहिए, प्रेम और सेवा की भावना लेकर उनके साथ उठना-बैठना चाहिए और ऐसे कार्यों को पुण्य-कार्य समझना चाहिए। उन्हें यह भी करना चाहिए कि अछूतों की जो शिकायतें और परेशानियां हों, उन्हें दूर करें, युगों की दासता  के कारण उनमें पैदा हुई बुराइयों और अज्ञान को दूर करने में धीरे-धीरे धैर्यपूर्वक उनकी मदद करें और दूसरे हिंदुओं को भी वैसा करने की प्रेरणा दें।

अस्पृश्यता-निवारण को इस आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने से, इससे भौतिक और राजनतिक परिणाम तो बिल्कुल ही तुच्छ हो जाते हैं और इन परिणामों का विचार किए बिना भी हम तथाकथित अछूतों को अपना मित्र बना लेते हैं। सत्य के अन्वेषक अपनी खोज के भौतिक यह खोज किसी नीति या साधन के रूप् में नहीं होती, बल्कि इसलिए कि यह उनके जीवन के ही ताने-बाने से बुनी हुई है।

इस व्रत का चरम महत्व जब हमारी समझ में आ जाएगा, तब हम देखेंगे कि जिस बुराई को यह दूर करना चाहता है, उसका प्रचलन दलित जातियों तक ही सीमित नहीं है। राई के दाने जैसा नन्हा दिखाई देने वाला भी अधर्म शीघ्र ही विकराल रूप धारण कर लेता है और बाद को जाकर जिस पर चढ़ बैठता है, उसी को निगल जाता है। इस प्रकार, अब तो यह अधर्म हमारे जीवन के सभी अंगों पर छा गया है। बार-बार स्नान करने और छूआछूत की भ्रांत धारणाओं में पड़कर अलग-अलग रसोई पकाने से ही हमें छुट्टी नहीं मिलती मि हम अपनी ओर भी आंखें उठाकर देख सकें। ईश्वर की उपासना करने का तो हम ढोंग ही करते हैं, दरअसल हम उसकी नहीं अपनी ही उपासना करने में लगे हैं।

इसलिए, अछूतों के साथ मित्रता करने भर से यह व्रत नहीं निभाया जा सकता, सभी प्राणियों को अपनी ही तरह प्यार करने से यह निभाया जा सकता है। अस्पृश्यता-निवारण का मतलब है सारे संसार के प्रति प्रेम और सारे जगत की सेवा और इस प्रकार यह अहिंसा में ही जाकर समा जाता है। अस्पृश्यता-निवारण का अर्थ है, मनुष्य-मनुष्य के बीच के, और विभिन्न प्राणियों के वर्गों के बीच के, अंतर कर अंत करना। हम देखते हैं कि इस तरह के व्यवधान सारे संसार में खड़े किए हुए हैं पर यहां तो हम मुख्य तौर पर उसी अस्पृश्यता पर विचार कर रहे हैं, जिसे भारत में धर्म की स्वीकृति मिली हुई है और जिसने कई करोड़ मनुष्यों को गुलामी की सीमा पर पहुंचा रखा है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-29

25.     पृथक निर्वाचन

जब वे (राष्ट्रवादी मुसलमान) मुझसे कहते हैं कि पृथक निर्वाचण-पद्धति मुसलमानों के लिए बुरी है, तब मुझे उनकी बात सुननी ही पड़ती है। जो भी हो, किसी भी ऐसे हल के साथ मैं अपना नाम नहीं जोड़ सकता, जो बिल्कुल साफ-साफ सांप्रदायिकता की बुनियाद पर कायम है, और फिर भी जिसे, उस संप्रदाय का सर्वसम्मत समर्थन प्राप्त नहीं है। किसी भी हल को, जो साफ तौर पर दोषपूर्ण है और साथ ही राष्ट्रीयता-विरोधी भी, स्वीकार करने की बात अगर उठ सकती है तो तभी जब उससे प्रभावित होने वाले लोगों का करीब-करीब सर्वसम्मत समर्थन तो उसे अवश्य ही प्राप्त हो।

उन लोगों के प्रति, जो तुरंत ही पृथक-निर्वाचन की बात मानने को तैयार नहीं है, जो गुस्सा दिखाया जा रहा है, उसे मैं नहीं समझ पा रहा हूं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह बड़ी जमात चाहेतो उसकी राय से स्वराज्य की ओर देश का बढ़ना रोका जा सकता है। अहिंसा के बल मिलने वाला स्वराज्य आ ही नहीं सकता, अगर एक अच्छा खासा अल्पसंख्यक दल उसका विरोध करता है। यह कहना या सुझाना गलत होगा कि स्वराज्य में बहुमत का शासन होगा। सच्चे स्वराज्य में तो सिर्फ न्याय का ही शासन हो सकता है। इतनी बड़ी जागृति हो जाने के बावजूद, जहां तक मेरा अपना सवाल है, अगर मुसलमानों या सिखों के माने हुए नेता स्वराज्य के विधान की स्वीकृति का विरोध करते हैं, तो मुझे इंतजार करते हुए बैठे रहने में भी संतोष रहेगा। स्वराज्य की लड़ाई एक बार छिड़ जाने पर खत्म तो तभी हो सकती है। जब उसके प्रत्यक्ष प्रतीक के रूप में उसका संविधान बन जाए और स्वीकार कर लिया जाए।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-31

26.     वर्ण

मैंने बार-बार कहा है कि आधुनिक अर्थ में जाति को मैं नहीं मानता। यह एक अनावश्यक अपवृद्धि है और प्रगति के मार्ग की बाधा और न मनुष्य-मनुष्य के बीच की विषमताओं में ही मेरा विश्वास है। हम सब पूर्ण रूप से समान हैं। किंतु समानता आत्माओं की है, शरीरों की नहीं। इस प्रकार, यह एक मानसिक अवस्था है। समानता की बात हमें इसलिए सोचनी पड़ती है और उस पर इतना जोर दिया जाता है कि भौतिक जगत में हम अपनी असमानताएं पाते हैं। बाहर दिखाई देने वाली इस असमानता के बीच ही हमें समानता लानी है। किसी भी दूसरे व्यक्ति पर अपना बड़पप्पन लादना ईश्वर और मनुष्य दोनों के प्रति द्रोह है। इस प्रकार, जाति-प्रथा, जहां तक कि बड़े-छोटे का भेदभाव बरतती है, पाप ही है। किंतु वर्ण में मेरा विश्वास है, जिसका आधार है बाप-दादों का पेशा। वर्ण चार हैं-चार सार्वभौम पेशों के द्योतक-विद्या दान, असहायों की रक्षा, कृषि और वाणिज्य और शारीरिक श्रम-द्वारा सेवा। ये पेशे सारी मनुष्य जाति में चले आ रहे हैं पर हिंदू धर्म ने उन्हें हमारे जीवन के धर्म के रूप में स्वीकार करके सामाजिक संबंधों और आचरण को नियमित करने के लिए इनका उपयोग किया है। आकर्षण शक्ति हम सभी को प्रभावित करती है, चाहे हम उसके अस्तित्व से परिचित हों या न हों। किंतु नियम को जानने वाले वैज्ञानिकों ने उसका उपयोग कर उससे ऐसे-ऐसे परिणाम निकाले हैं, जिससे दुनिया चकित रह गई है। उसी प्रकार हिंदू धर्म ने भी वर्ण-धर्म के अपने आविष्कार और प्रयोग द्वारा संसार को चकित कर दिया है। जब हिंदुओं में प्रमाद आ गया, तब वर्ण ने असंख्य जातियों का रूप ले लिया और अंतर्जातीय विवाह और खान-पान के अनावश्यक और हानिकर प्रतिबंध लगा दिए। वर्ण-धर्म का इन प्रतिबंधों से कोई संबंध नहीं है। अलग-अलग वर्णों के लोगों के बीच विवाह-संबंध और खान-पान चल सकता है। शुचिता और आरोग्य की दृष्टि से ये प्रतिबंध आवश्यक भी हो सकते हैं। पर किसी शुद्र लड़की से शादी करने वाला ब्राह्मण, या ब्राह्मण लड़की से विवाह करने वाला शुद्र, वर्ण-धर्म का उल्लंघन कदापि नहीं करता।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-32

 

27.     पृथक निर्वाचन नहीं

पहले भी जो कह चुका हूं उसे मैं फिर से दुहराना चाहता हूं कि हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों द्वारा मंजूर किए जाने वाले किसी भी हल को जहां कांग्रेस हमेशा स्वीकार करने को तैयार रहेगी, वहां दूसरी ओर अन्य किसी भी अल्पसंख्यक तबके के लिए विशेष आरक्षणों या विशेष निर्वाचण की बात वह नहीं मान सकती। मूल अधिकारों और नागरिक स्वाधीनता संबंधी धाराओं या आरक्षणों का कांग्र्रेस हमेशा समर्थन करेगी। हर एक के लिए इस बात की छूट रहेगी कि निर्वाचन सूची में वह अपना नाम चढ़वाए और इसकी भी कि समग्र निर्वाचकों के सम्मुख अपनी अपील ले जाए। मेरी नम्र सम्मति में तो सर हयूबर्ट कार जो प्रस्ताव लाए हैं, वह उत्तरदायित्वपूर्ण शासन का संपूर्ण खंडन है, बल्कि राष्ट्रीयता के विरुद्ध है। अगर उनके कहने का मतलब यह है कि विधान मंडल में आपको सच्चा प्रतिनिधित्व यूरोपियनों द्वारा निर्वाचित होने से ही मिल सकता है, तब तो खूब हुआ। टुकड़े-टुकड़े करके बनाए गए इन कितने ही विशिष्ट वर्गों को भी अपने चुने हुए प्रतिनिधि भेजने का आविष्कार अगर भारत में रहे तब तो ईश्वर ही इसे बचाए। वही यूरोपियन और एकमात्र वही यूरोपियन, संपूर्ण भारत की सेवा कर सकता है। जिसने सिर्फ यूरोपियनों को नहीं, समूचे निर्वाचकों की स्वीकृति प्राप्त की हो। यह विचार मात्र यह दिखलाता है कि जनता के प्रति उत्तरदायी सरकार को ब  राबर ही उन हितों के विरुद्ध संघर्ष करते रहना होगा जो राष्ट्रीय भावना के विपरीत होंगे, जो 85 प्रतिशत कृषि-आबादी वाली इस आम निर्वाचक-समष्टि के हितों के विपरीत होंगे। मेरे लिए तो यह अकल्पनीय है। अगर हमें जनता के प्रति उत्तरदायी शासन की स्थापना करनी है और अगर हमें सच्ची आजादी मिलने जा रही है तो में यह सुझाव रखने का साहस करता हूं कि इन तथाकथित विशिष्ट वर्गों में से प्रत्येक को इस बात में गौरव बोध करना चाहिए और अपना यह कर्तव्य मानना चाहिए कि विधान मंडल में वे इस खुले दरवाजे से प्रवेश करने की कोशिश करें, चुनावों द्वारा, निर्वाचक समष्टि की ही स्वीकृति से वहां आएं। आप जानते हैं कि कांग्रेस बालिग मताधिकार की पक्की समर्थक है और बालिग मताधिकार के अंतर्गत सभी लोग निर्वाचक सूची में स्थान पा सकेंगे। इससे ज्यादा तो और कुछ भी कोई नहीं चाह सकता।

अन्य अल्पसंख्यकों द्वारा किए गए दावों को तो मैं समझ सकता हूं। पर अस्पृश्यों की ओर से जो दावे पेश किए गए हैं वह मेरे लिए ’सबसे अधिक निर्मम प्रहार’ के रूप में हैं। इसका अर्थ है, कलंक के इस दाग को स्थायी रूप से ढोना। मैं तो भारत की स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए भी अश्पृश्यों के उन हितों को बेचने के लिए तैयार नहीं हूंगा, जिन पर उनका अस्तित्व निर्भर करता है। मेरा तो यह दावा है कि व्यक्तिगत रूप में मैं खुद अस्पृश्यों की विशाल जनसंख्या का प्रतिनिधि हूं। यह बात मैं सिर्फ कांग्रेस की ओर से नहीं, अपनी ओर से भी कह रहा हूं और मेरा दावा है कि मुझे उनका वोट मिलेगा और इतनी ज्यादा संख्या में मिलेगा कि उनकी ओर से मैं ही जीतकर आऊंगा और अगर अस्पृश्यों के बीच मत-संग्रह की व्यवस्था की जाए तो भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक घूम-घूम कर मैं अस्पृश्यों को बताऊंगा कि इस कलंक को, जोकि उनके लिए नहीं रूढ़िवादी हिन्दुत्व के लिए लज्जाजनक है, दूर कने का रास्ता पृथक निर्वाचन और पृथक आरक्षण नहीं है। इस समिति को ही नहीं, सारी दुनिया को यह समझ लेना चाहिए कि आज हिंदू सुधारकों की एक जमात तैयार है जो अस्पृश्यता के इस कलंक को मिटा देने के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ है। अपनी पूंजी ओर जनगणना सूची में में हम एक अलग वर्ग के रूप में अस्पृश्यों की गणना नहीं कराना चाहते। सिख चाहें तो वह सदा के लिए अलग वर्ग के रूप में रहे आएं और इसी तरह मुसलमान और यूरोपियन भी। क्या अस्पृश्यों को सदा के लिए अछूत बने रहना है? इससे तो कहीं ज्यादा मैं यह पसंद करूंगा कि अस्पृश्यता के जिंदा रहने की जगह हिंदू धर्म ही मिट जाए। इसलिए, डाक्टर अम्बेडकर के प्रति मेरी सारी श्रद्धा के बावजूद, उनकी इस इच्छा के बावजूद कि अस्पृश्यों को ऊंचा उठाया जाए, उनकी योग्यता के प्रति भी मेरी श्रद्धा के बावजूद, अत्यंत नम्रता के साथ मुझे कहना ही होगा कि इसका कारण वह घोर अन्याय ही है, जो उन्हें सहना पड़ा है और उन्हें जो कड़वे अनुभव हो चुके हैं शायद उन्होंने ही फिलहाल उनकी विवेक-बुद्धि को विकृत कर दिया है। मुझे यह कहते हुए कष्ट हो रहा है, पर अगर मैं यह न कहूं तो मैं अस्पृश्यों के हितों के प्रति, जो मुझे अपने प्राणों की ही तरह प्रिय हैं, विश्वासघात करूंगा। सारे संसार का राज पाने के लिए भी मैं उनके अधिकारों का सौदा करने नहीं जाऊंगा। मैं अपनी जिम्मेदारी को समझकर ही बात करना चाहता हूं कि डाक्टर अंबेडकर जो यह दावा पेश करते हैं किवह भारत के सारे अस्पृश्यों के प्रतिनिधि हैं, वह सही नहीं है। इससे हिंदुओं के बीच एक ऐसी दरार पड़ जाएगी, जिसका स्वागत कर सकना मेरे लिए संभव नहीं हो सकता। अछूत लोग अगर इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लें तो मुझे चिंता नहीं, मैं उसे सह लूंगा। पर गांवों के अंगर हिंदुओं के बीच भी दो हिस्से हो जाएं, तो इससे हिंदू धर्म का जो भविष्य बनेगा, उसे मैं कदापि सहन नहीं कर सकता। जो लोग अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों की बात करते हैं, वह अपने भारत को नहीं जानते, वे नहीं जानते कि आज की भारतीय समाज की रचना कैसी है और इसलिए अपनी पूरी ताकत के साथ मैं कहना चाहता हूं कि अगर इस चीज की मुखालफ़त करने वाला मैं अकेला ही आदमी रह गया, तब भी मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर इसका विरोध करूंगा।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-33

 

28.     सर सैमुअल होर को लिखे पत्र से उद्धरण

यरवदा सेंट्रल जेल

11 मार्च, 1932

प्रिय सर सैमुअल,

                आपको शायद याद होगा कि गोलमेज परिषद में हुए अपने भाषण के अंत में मैंने अल्पसंख्यकों का दावा पेश होने पर कहा था कि दलित वर्गों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दिए जाने पर, मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी उसका विरोध करूंगा। यह बात उस वक्त जोश में आकर नहीं कही गई थी और न लफ्फाजी के ही तौर पर। यह बात पूरी गंभीरता के साथ कही गई थी।

अपने उस कथन का अनुसरण करते हुए मैंने भारत लौटने पर आशा की थी कि मैं कम-से-कम दलित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन के विरुद्ध तो जनमत को संगठित करूंगा ही। पर वह नहीं होने को था।

मुझे जो अख़बार पढ़ने की इजाज़त मिली है, उनसे यह पता चलता है कि ब्रिटिश सरकार किसी वक्त भी अपना निर्णय घोषित कर दे सकती है। पहले तो मैंने यह सोचा था कि दलित जातियों के पृथक निर्वाचन के पक्ष में निर्णय दे दिए जाने की स्थिति में ही मैं, जो कदम अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए जरूरी समझूं, उठाऊं। पर मुझे लगता है कि ब्रिटिश सरकार के प्रति में अन्याय करूंगा, अगर उसे पहले से सूचित करके नहीं रखूंगा। स्वभावतः वह मेरे उस कथन को वह महत्व नहीं दे सकती थी, जो मैं देता हूं।

दलित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था के खिलाफ मेरी जो आपत्तियां हैं उन सबको दुहराने की शायद ही जरूरत हो। मुझे तो लगता है मानो मैं भी उन्हीं में से एक हूं। उनका मामला दूसरों के मामलों से बिल्कुल ही अलग किस्म का है। मैं विधान-मंडलों में उनके प्रतिनिधित्व के खिलाफ नहीं हूं। मैं तो इस पक्ष में हूं कि उन लोगों के हर बालिग को-वह स्त्री हो या पुरुष-शिक्षा और संपत्ति की किसी भी शर्त के बगैर, निर्वाचक सूची में दर्ज किया जाए, भले ही उनके मुकाबले औरों के लिए निर्वाचक बनने की शर्तें, कुछ और कड़ी ही क्यों न हों। पर मैं मानता हूं कि पृथक निर्वाचन उनके और हिंदुओं के, दोनों के ही लिए हानिकर हैं, विशुद्ध राजनैतिक दृष्टि से भले ही बात इससे भिन्न हो। पृथक निर्वाचन से उन्हें कितनी क्षति पहुंचेगी, इसको ठीक-ठीक समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि तथाकथित ऊंची जातियों वाले हिंदुओं के बीच वह किस तरह बंटे हुए हैं और उन पर किस हद तक निर्भर करते हैं। जहां तक हिंदू धर्म का सवाल है, पृथक निर्वाचन उसका तो अंग-भंग ही कर डालेगा और उसे तहस-नहस करके छोड़ेगा। मेरे लिए उन जातियों का प्रश्न मुख्यतः नैतिक और धार्मिक प्रश्न है। इसका राजनीतिक पहलू, महत्वपूर्ण होते हुए भी, इसके नैतिक और धार्मिक परिणाम के सामने बिल्कुल ही तुच्छ पड़ जाता है। इस मामले में मेरी भावनाओं का आप सही अंदाज कर सकेंगे, अगर आप यह याद कर सकें कि इन जातियों की दुरावस्था के बारे में मेरी दिलचस्पी अपने लड़कपन से ही रही है और मैंने उसकी खातिर एक बार नहीं, कई बार, अपना सर्वस्व दांव पर चढ़ा दिया है। यह मैं अपने को किसी प्रकार का गौरव देने के लिए नहीं कह रहा हूं, क्योंकि मैं मानता हूं कि तथाकथित ऊंची जातियों वाले हिंदू कितना भी बड़ा प्रायश्चित क्यों न करें, वे किसी प्रकार भी दलित जातियों की उस क्षति को पूरा नहीं कर सकते, जो वह सदियों से व्यवस्थित रूप में उन्हें नीचा दिखाकर करते आए हैं। पर मैं जानता हूं कि पृथक निर्वाचन उनकी उस पददलित स्थिति का, जिसके नीचे पड़े वह कराहते रहे हैं, न तो प्रायश्चित ही और न इलाज ही।

इसलिए मैं महामहिम ब्रिटिश सम्राट की सरकार को सादर सूचित करता हूं कि यदि उनके द्वारा दलित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई, तो मुझे आमरण अनशन करना ही पड़ेगा।

मैं जानता हूं और मुझे इसका दुख भी है कि बंदी अवस्था में मेरे द्वारा उठाए गए इस कदम से ब्रिटिश सरकार भारी असमंजस में पड़ जाएगी और मैं यह भी समझता हूं कि बहुतों की दृष्टि में यह बहुत ही अनुचित बात होगी कि मेरे जैसी हैसियत का आदमी राजनीतिक क्षेत्र में ऐसे तरीकों से काम ले, जिसे वे, मुझे बख्शना चाहें तो कम-से-कम मेरा वातोन्माद तो जरूरी ही करेंगे। अपने पक्ष में मैं इससे ज्यादा और क्या कह सकता हूं कि मैं जो कदम उठाने की बात कह रहा हूं उसे मैं किसी तरकीब के तौर पर इस्तेमाल करने नहीं जा रहा हूं, बल्कि वह मेरे अस्तित्व का ही अंग है। यह अंतरात्मा का आह्वान है जिसकी अवज्ञा करने की हिम्मत मैं नहीं कर सकता, भले ही इसकी वजह से, समझदार आदमी माने जाने की मेरी जो कुछ भी प्रतिष्ठा हो वह धूल में मिल जाए।

जहां तक मैं फिलहाल देख सकता हूं, जेल से मुझे रिहा कर देने से अनशन करने के मेरे कर्तव्य की अनिवार्यता घट नहीं जाएगी।

                फिर भी मैं उम्मीद लगाए हुए हूं कि मेरे तमाम डर बिल्कुल ही बेबुनियाद निकलेंगे और दलित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था लागू करने का ब्रिटिश सरकार का बिल्कुल ही इरादा नहीं होगा।

कहने की जरूरत नहीं कि आपके साथ होते आने वाले कुल पत्र-व्यवहार के बारे में मेरी ओर से पूरी गोपनीयता बरती गई है। हां, सरदार वल्लभ भाई, और अभी-अभी हमारे बीच आ जाने वाले महादेव देसाई, सब कुछ जानते हैं। पर आप बेशक इस पत्र का जो भी इस्तेमाल करना चाहें, करें।

(ह.) एम.के. गांधी

सर सैमुअल होर

वहाईट हाल,

लंडन

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-35

29.     जरूरत है: एक पक्के समझौते की

लोग अगर मुझ पर हंसे तो मैं धीरे से अपना एक दावा पेश करना चाहूंगा, एक ऐसा दावा जो मैं हमेशा पेश करता रहा हूं कि जन्म से तो मैं ‘स्पृश्य’ हूं पर अपनी पसंद से ‘अस्पृश्य’ और मैंने यदि किसी का प्रतिनिधि कहला सकने की तैयारी की है, तो अस्पृश्यों के भी शीर्ष स्थानीय दस आदमियों की नहीं-हां, शर्म की बात जरूर है, पर यह कहना जरूरी है कि उनके अंदर भी जाति और वर्ग मौजूद हैं-बल्कि मेरी उच्चाकांक्षा यही है कि जहां तक संभव हो, मैं ‘अस्पृश्यों’ के निम्नतम स्तर के साथ एक हो जाऊं, अर्थात उन ‘अलक्ष्य’ और ‘दूर-ही-दूर रखे जाने वालों’ के साथ जो हमेशा जहां भी मैं जाता हूं मेरी आंखों के सामने रहते हैं, क्योंकि सचमुच ही वह ज़हर का पूरा-का-पूरा प्याला पी चुके हैं। मैं उनसे मालाबार में मिला हूं और उड़ीसा में, और मैं इसका कायल हो चुका हूं कि अगर उन्हें कभी भी ऊपर उठना होगा तो यह उनके लिए स्थानों के आरक्षण द्वारा नहीं होगा, बल्कि उनके बीच हिंदू सुधारकों द्वारा की जाने वाली कड़ी मेहनत से होगा, और चूंकि मैं जानता हूं कि इस पृथकता से सुधार की सारी संभावना ही खत्म हो जाती, इसलिए मेरे सारे अंतःकरण ने इसके खिलाफ विद्रोह कर दिया। और मैं यह भी साफ कर दूं कि पृथक निर्वाचन के वापस ले लिए जाने से मेरी प्रतिज्ञा केवल शाब्दिक रूप में पूरी होगी, किंतु उसके पीछे जो भावना है, वह शांत नहीं हो पाएगी और चूंकि मैंने अपने को स्वयं ही अछूत मानना पसंद किया है, इसलिए अपनी उस हैसियत से मैं ‘स्पृश्यों’ और ‘अस्पृश्यों’ के बीच किसी पैबंदबाजी वाले समझौते को लेकर शांत बैठने वाला नहीं हूं।

मैं जो चाहता हूं और जिस चीज के लिए मैं जी रहा हूं और जिसके लिए मरने में खुशी होगी, वह है अस्पृश्यता का जड़मूल से विनाश। इसलिए मैं तो एक जीता-जागता समझौता चाहता हूं जिसकी संजीवनी के प्रभाव को देखने के लिए किसी दूर के ‘कल’ की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी, बल्कि आज ही वह दिखाई दे जाएगा और इसलिए उस समझौते पर मुहर लगाने के लिए एक प्रदर्शन की जरूरत है, जिसमें ‘स्पृश्य’ और अस्पृश्य’ सभी एक जगह इक्ट्ठे हों-कोई नाटकीय तमाशा करने के लिए नहीं, बल्कि भ्रातृत्वपूर्ण सच्चे आलिंगन के लिए। पिछले पचास वर्ष से यही मेरा स्वप्न रहा है और इसी को ज्वलंत रूप देने के लिए मैं इस अग्नि-परीक्षा के द्वार पर आ खड़ा हुआ हूं। अब ब्रिटिश सरकार का यह फैसला आखिरी तिनका साबित हुआ। यह एक सुनिश्चित लक्षण था और चूंकि इन मामलों में में डाक्टर होने का दावा रखता हूं इसलिए मेरी अचूक डाक्टरी आंखों ने उसे पकड़ लिया। इस प्रकार पृथक निर्वाचन का रद्द किया जाना मेरी दृष्टि में तो अंत का आरंभ ही होगा और बंबई में एकत्र हुए सभी नेताओं और अन्य लोगों को मैं चेतावनी देना चाहता हूं कि वे जल्दबाजी में कोई फैसला न कर बैठें।

अपने प्राणों का मैं कुछ भी मूल्य नहीं मानता। इस ऊंचे ध्येय के लिए तो मेरी राय में सौ जानें भी अगर दे दी जाएं तो भी इस नृशंस अत्याचारों के लिए, जो हिंदुओं ने अपने ही धर्म के असहाय नर-नारियों पर किए हैं, वह मामूली-सा ही प्रायश्चित होगा। मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि वे विशुद्धतम न्याय के मार्ग से एक इंच भी इधर-उधर न जाएं। अपने अनशन को मैं न्याय के तराजू पर चढ़ा देना चाहता हूं और अगर यह तथाकथित उच्च जाति वाले हिंदुओं की आंखें खोल दे सके और अगर उनके अंदर कर्तव्य की भावना जाग उठे तो इसका काम पूरा हो जाएगा। पर अगर मेरे प्रति अपने अंध मोह के कारण वे लोग जैसे-तैसे करके इसे रद्द कराने की नीयत से जल्दी से कोई कच्चा समझौता कर बैठेंगे और मेरी जिंदगी को दूभर बना डालेंगे, क्योंकि पृथक निर्वाचन के रद्द हो जाने से मेरा अनशन तो जरूर टूट जाएगा, पर मैं जिस पक्के समझौते के लिए कोशिश कर रहा हूं, वह अग नहीं हो पाता तो जीना भी मेरी मौत ही होगा। उसका सीधा-सादा मतलब तो यह होगा कि यह अनशन तोड़ते-तोड़ते ही मुझे अपनी प्रतिज्ञा की सच्ची भावना को पूरी तरह से निभाने के लिए, एक दूसरे ही अनशन की नोटिस दे देनी पड़ेगी।

दूर से देखने वालों को यह बात मूर्खतापूर्ण लग सकती है, पर मुझे नहीं। मेरे पास और भी कुछ रहता तो में इस अभिशाप को दूर करने के लिए वह भी न्यौछावर कर देता, पर अपने प्राणों को छोड़कर मेरे पास और तो कुछ है नहीं।

मेरा विश्वास है कि अगर अस्पृश्यता का अंत हो जाता है तो इससे हिंदू धर्म का एक जबरदस्त कलंक ही मिट जाएगा, बल्कि इसका एक विश्वव्यापी प्रभाव होगा। अस्पृश्यता के विरुद्ध चलने वाला मेरा युद्ध मानव जाति के अंदर जो भी गंदगी है, उस सबके विरुद्ध है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-38

30.     सभी का पतन

हिंदू समाज में आज जिस रूप में अस्पृश्यता की प्रथा कायम है, वह मेरी राय में ईश्वर-द्रोह भी है और मनुष्य-द्रोह भी और इसीलिए वह एक विष की तरह है जो धीरे-धीरे हिंदू धर्म की नसों में फैलता चला जा रहा है। हिंदू धर्मशास्त्रों को अगर कुल मिलाकर देखा जाए तो उनमें, मेरे ख्याल से, इसके लिए कोई स्वीकृति नहीं है। एक स्वस्थ प्रकार की अस्पृश्यता की बात अवश्य शास्त्रों में मिलती है और यह तो सभी धर्मों में मौजूद है। यह स्वास्थ्य-विज्ञान के आचार-नियमों वाली अस्पृश्यता है। यह तो प्रलय काल तक बनी रहेगी, पर अस्पृश्यता की वह प्रथा जो आज भारत में मौजूद है बड़ी वीभत्स चीज है और अलग-अलग प्रदेशों में तो क्या, अलग-अलग जिलों में भी इसके अलग-अलग रूप हैं। इसने अस्पृश्य और स्पृश्य दोनों का ही पतन किया है। इसने लगभग चार करोड़ मनुष्यों की बाढ़ रोक दी है। उन्हें जिंदगी की मामूली से मामूली सहूलियतों से वंचित करके रखा गया है। इसलिए जितनी जल्द इसका खात्मा हो सके, उतना ही अच्छा-हिंदू धर्म के लिए भी, भारत के लिए भी और शायद सारी मानव जाति के लिए भी।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-40

31.     विरोध नहीं

अस्पृश्यता हिंदू समाज का कलंक है। यह उसके मर्मस्थल में होने वाला नासूर है। मैं आंखों से देख और नाक से सूंघ रहा हूं कि हिंदू धर्म की देह सड़ती जा रही है। अगर आपकी भी यही राय हो तो इस ध्येय की पूर्ति में आपको भी हाथ बंटाना चाहिए। हिंदू धर्म की आध्यात्मिक शकित को जहां एक बार गंवा बैठे कि फिर पता नहीं हम कहां होंगे। अपना धर्म गंवा बैठने पर मनुष्य की वही हालत होती है जो पतवार के बिना जहाज की।…

….मैं बड़ी ही नम्रता से, पर पूरे विश्वास के साथ कहना चाहूंगा कि मैंने यह आंदोलन किसी दूसरे धर्म या संप्रदाय का विरोध करने की दृष्टि से नहीं शुरू किया है। पिछले 50 वर्ष के मेरे जीवन के किसी भी कार्य की ओर उंगली उठाकर, किसी के लिए भी, यह सिद्ध करना असंभव होगा कि वह किसी भी व्यक्ति या धर्म के विरुद्ध था। मैंने कभी किसी को भी अपना शत्रु नहीं माना। मेरे धर्म का यह तकाजा है कि मैं किसी के प्रति शत्रुता का भाव नहीं रखूं। मैं तो किसी भी जीव का बुरा नहीं चाह सकता। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि हिंदुओं के दिल से अगर अस्पृश्यता का दाग पूरी तरह से धुल जाए तो इस घटना का अनिवार्य प्रभाव भारत के ही नहीं, संसार भर के सारे संप्रदायों पर पड़ेगा। यह विश्वास दिन-पर-दिन और भी दृढ़ होता जा रहा है। यह थोड़े ही संभव है कि कुछ करोड़ मनुष्यों के प्रति मेरे दिल में आज अस्पृश्यता का जो भाव है, वह वहां से हटने पर कुछ दूसरे करोड़ लोगों के ऊपर जाकर आरोपित हो जाए? हिंदुओं के हृदय से अगर ऊंच-नीच का भाव निकल जाए तो हमारे इस कार्य मात्र से आपस के भी और अन्य संप्रदायों के लिए भी, हमारे अंदर ईर्ष्या-द्वेष के जो भाव हैं, वह भी निश्चय ही नष्ट हो जाएंगे। यही कारण है कि मैंने इस बात के लिए अपना जीवन दांव पर चढ़ा दिया है। हिंदू स्पृश्यों और अस्पृश्यों के बीच ही एका लाने के लिए मैं नहीं लड़ रहा हूं, बल्कि हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों और सभी दूसरे धार्मिक संप्रदायों के बीच भी।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-40

32.     सुदूरव्यापी परिणाम

मैंने एक बार नहीं, कई बार कहा है कि हिंदुओं के दिल से अस्पृश्यता पूरी तरह दूर हो जाए, तो इससे सुदूरव्यापी परिणाम होंगे, क्योंकि इसका संबंध कई करोड़ मनुष्यों के साथ है। जैसा कि मैंने पिछली रात नागपुर की विराट सभा में कहा था, हिंदुओं के दिल से अगर सचमुच ही अस्पृश्यता दूर हो जाए अर्थात, ऊंची जाति वाले हिंदू इस भीषण कलंक को यदि धो डालें, तो शीघ्र ही हमें यह दिखाई देने लगेगा कि हम सभी एक हैं, अलग-अलग नहीं। हमारे बीच की अस्पृश्यता की दीवार अगर एक बार गिरा दी गई तो हम सभी देख सकेंगे-चाहे हम अपने को हिंदू कहते हों या मुसलमान या ईसाई अथवा पारसी-कि हम एक हैं। जैसा कि मैंने अकसर कहा है, अस्पृश्यता कई सिर वाला एक दैत्य है, जो कई रूपों में दिखाई देता है और उनमें से कुछ तो बड़े ही सूक्ष्म हैं। मेरे अंदर किसी मनुष्य के लिए ईर्ष्या का भाव है तो यह भी एक प्रकार की अस्पृश्यता ही है। मैं नहीं जानता कि मेरे जीवन-काल में ही अस्पृश्यता-निवारण का मेरा सपना पूर हो पाएगा या नहीं। जिन लोगों के अंदर धार्मिक प्रवृत्ति मौजूद है, जिन लोगों की आस्था धर्म के बाह्य रूप में नहीं, बल्कि उसके तत्व में है, उनके लिए, इतनी विशाल संख्या की ज़िंदगी को बरबाद करने वाली सूक्ष्म प्रकार की अस्पृश्यता को दूर करने में विश्वास न रखना असंभव है। हिंदुओं के दिल से इस बुराई को अगर मिटा दिया जा सके तो हमारे ज्ञान-चक्षु अधिकाधिक खुलते जाएंगे। अस्पृश्यता का यदि सचमुच ही अंत हो सके तो उससे होने वाले मानवता के उपकार का तो अंदाजा ही नहीं किया जा सकता। अब आपको यह समझने में जरा भी कठिनाई नहीं हो सकती कि क्यों मैंने इस बात के लिए अपना जीवन ही दांव पर रख दिया है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-41

33.     घोषणा के बाद

महाराजा ने आप लोगों को एक स्मृति दी है, पर यह काम अब आपका है कि उस पर चलकर दिखाएं और उसमें प्राण फूंक दें और ऐसा करने में आप कभी सफल नहीं हो सकते। अगर आप यह ठान नहीं लेते कि यह धार्मिक भावना सारे त्रावणकोर में व्याप्त हो जाए-अवर्णों और सवर्णों दोनों में ही। मैं आपको बताए देता हूं कि इस कदम के बारे में अगर आप लोग अपने मन के अंदर अलग-अलग भाव रखकर चलेंगे और पूरे दिल से इस पर अमल नहीं करेंगे तो यह घोषणा महज एक तमाशा बनकर रह जाएगी। इसलिए मैं आपको अभी से एक चेतावनी दे देना चाहता हूं। आप लोग इस घोषणा पर खुशियां मना रहे हैं और आपके चेहरे आनंद और उत्साह से दमक रहे हैं। आपके उत्सव समारोह के बीच ही मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि जिस पूरी-की-पूरी जमात को अब तक आपने अपने से अलग कर रखा है। उसके प्रति अगर अपनी ज़िम्मेदारी नहीं महसूस करेंगे तो आप अपने कर्तव्य से च्युत हो जाएंगे। यह कहते वक्त मेरा दिल भरा हुआ है और जब दिल दिल से बात करता है तो यह उम्मीद करता है कि दूसरों के दिलों में भी उसे जगह मिलेगी।

मुझे यह भी बता देना चाहिए कि पद्यनाम के गौरवमंडित मंदिर में मैंने क्या देखा? इस निर्मल और आध्यात्मिक नव-जागरण के बारे में मैं तो कुछ कह रहा हूं उसे शायद यह बात सबसे अच्छे ढंग से स्पष्ट कर देगी। किसी समय मैं अपने माता-पिता द्वारा हृदय में पैदा की गई श्रद्धा-भक्ति के साथ ही अनेक मंदिरों में गया हूं। पर इधर कुछ वर्षों से मैं मंदिरों में नहीं जाता रहा हूं और जबसे अस्पृश्यता-विरोधी कार्य में लग गया हूं तब से तो यही निश्चय कर लिया है कि जब तक अस्पृश्य कहलाने वाले हर व्यक्ति के लिए किसी मंदिर के दरवाजे नहीं खुल जाते, तब तक मैं उसमें नहीं जाऊंगा। इसलिए उस मंदिर में आज सवेरे का दृश्य देखने पर मेरे दिल में जो बात बिल्कुल ही नए ढंग से आई, वह उन अवर्ण हिंदुओं के मन में भी, जो इस घोषणा के बाद निश्चय ही मंदिर में दर्शन करने के लिए गए होंगे, उतनी ही नवीनता के साथ आई होगी। अपनी कल्पना की आंखों से मैं उन प्रागैतिहासिक शताब्दियों की दूरी में जा पहुंचा, जब लोगों ने पत्थर और धातु द्वारा परमात्मा का संदेश देना शुरू किया होगा। मैंने बिल्कुल स्पष्ट रूप से देखा कि जो पुजारी अपनी मंजी हुई हिंदी में प्रत्येक मूर्ति की व्याख्या करता जा रहा था, वह मुझे यह नहीं बताना चाहता था कि इनमें से प्रत्येक ही भगवान है। किंतु यह स्पष्ट व्याख्या किए बिना ही उसने मुझे दिखा दिया कि ये मंदिर अक्षय, निराकार और अनिवर्चनीय परमात्मा को और हमको, जो उस असीम सागर की सूक्ष्मातिसूक्ष्म बूंदों की ही भांति हैं, जोड़ने वाले पुलों के ही रूप में हैं। मानव-जाति के हम सभी प्राणी दार्शनिक नहीं हैं। हम स्थूल पृथ्वी के निवासी हैं, बहुत ही स्थूल और निराकार ब्रह्म का ध्यान करके ही हमें संतोष नहीं मिलता। किसी-न-किसी रूप में हम ऐसा कुछ भी चाहते हैं, जिसका हम स्पर्श कर सकें, ऐसा कुछ जिसके सामने हम अपना मस्तक नवा सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कोई ग्रंथ है या पत्थर का कोई शून्य भवन या फिर पत्थर का ही कोई ऐसा भवन सिमें अनेक मूर्तियां हैं। कुछ लोगों को ग्रंथ से संतोष हो जाएगा, कुछ दूसरों को पत्थर के बिल्कुल खाली पड़े भवन से, और बहुतों को तब तक संतोष नहीं होगा, जब तक कि उन शून्य भवनों में बसा हुआ भी कोई दिखाई दे। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप उन मंदिरों को अंध-विश्वासों का एक गढ़ समझकर उनमें न जाएं। इन मंदिरों में यदि आप श्रद्धा के साथ जाएंगे तो आप जब-जब वहां जाएंगे, उन्हें जानते और समझते चलेंगे और वहां से जब लौटेंगे, तब आप देखेंगे कि आपका चित्त शुद्ध हो गया और जीवित-जागृत परमात्मा में आपकी श्रद्धा और भी बढ़ गई है।

जो भी हो, इस घोषणा को मैंने एक शुद्ध धार्मिक कृत्य के रूप में माना है। त्रावणकोर की अपनी इस यात्रा को मैंने तीर्थयात्रा के रूप में देखा है और इन मंदिरों में मैं एक ऐसे अस्पृश्य के रूप में जा रहा हं जो अचानक ही स्पृश्य मान लिया गया हो। अगर आप सभी इस घोषणा को इसी भाव से लें तो अवर्णों और सवर्णों के बीच का सारा भेदभाव ही आप दूर कर देंगे और आखिरी बात यह कि अपने उन भाई-बहनों को, जो तुच्छ और अधम से अधम माने जाते हैं, जब तक आप उन ऊंचाइयों तक नहीं ले जाते, जहां आप खुद पहुंच चुके हैं, तब तक आपको संतोष नहीं होगा। सच्चे आध्यात्मिक नव-जागरण में आर्थिक उन्नति की ओर बढ़ने के साथ-साथ अज्ञान आदि उन सभी चीजों से छुटकारा मिलना भी शामिल है, जो मनुष्य की उन्नति में बाधक हैं।

ईश्वर करे कि महाराजा की इस घोषणा में जो महान संभावनाएं निहित हैं, उन्हें आप पूर्ण रूप में उपलब्ध करें।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-42

34.     स्वराज्य का रास्ता

दिन का यह वक्त ऐसा नहीं है जब हिंदू समाज के इस कलंक और अभिशाप को दूर करने की आवश्यकता पर विस्तार के साथ कुछ कहने की जरूरत हो। कांग्रेसजनों ने इस मामले में निश्चय ही बहुत कुछ किया है। पर मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि कितने ही कांग्रेसजनों ने इसे एक राजनीतिक आवश्यकता की ही दृष्टि से देखा है न कि इस दृष्टि से कि जहां तक हिंदुओं का संबंध है, उनके हिंदू धर्म का तो अस्तित्व ही इस पर निर्भर करता है। अगर हिंदू कांग्रेसजन इस काम को महज इसी की खातिर मान लें और इस काम में जुट जाएं तो वे तथाकथित सनातनी हिंदुओं को अब तक के मुकाबले कहीं ज्यादा व्यापक रूप से प्रभावित कर सकेंगे। ख़म ठोकर कर मैदान में उतरने की प्रवृत्ति से नहीं, बल्कि मैत्री भाव से, वे उनके पास जाएं, जैसा कि किसी अहिंसक को सोहता है और जहां तक हरिजनों का प्रश्न है, हर हिंदू को उनके सुख-दुख में हाथ बंटाना चाहिए और उनके अकेलेपन की भयंकरता को दूर करने के लिए उनके बंधु बनकर उन्हें सहारा देना चाहिए। इस तरह का अकेलापन-इस विकराल भीमाकार रूप में-जैसा कि हम भारत में पाते हैं, क्या संसार में और कहीं भी कभी देखने को मिला होगा? अपने अनुभव से मैं जानता हूं कि यह काम कितना कठिन है। पर स्वराज्य की इमारत खड़ी करने के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं उसी का यह भी एक हिस्सा है और स्वराज्य का रास्ता एकदम खड़ी चढ़ाई वाला है और बड़ा ही तंग। इसमें कितनी ही ही चढ़ाइयां तो बड़ी ही फिसलन वाली हैं और राह में कितनी ही खाइयां पड़ती हैं। चोटी तक पहुंचने के, और आज़ादी की ताजी हवा को अपने फेफड़ों में भरने के पहले हमें उन सभी को पार करते हुए अविचलित रहकर एक-एक कदम आगे बढ़ना होगा।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-44

35.     आदिवासियों की सेवा

आदिवासियों की सेवा भी रचनात्मक कार्यक्रम का एक हिस्सा है। इस कार्यक्रम में उनका स्थान सोलहवें नंबर पर जरूर आता है, पर महत्व की दृष्टि से वह किसी से भी कम नहीं है। हमारा देश इतना विशाल है और यहां बसने वाली जातियां इतने प्रकार की हैं कि हममें से श्रेष्ठतम व्यक्ति भी, उन लोगों और इनकी हालत के बारे में, जो कुछ जानना जरूरी है, वह सब नहीं जान सकता। जब हमें इस बात का पता चलता है तब हम यह महसूस करने लगते हैं कि एक राष्ट्र होने के अपने दावे को पूरा करना हमारे लिए कितना कठिन है, जब तक हममें से प्रत्येक व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति के साथ एक होने की सच्ची भावना अपने अंदर न पाए, तब तक क्या यह संभव है?

सारे भारत में आदिवासियों की संख्या दो करोड़ से ऊपर है। बापा ने गुजरात के भीलों के बीच बरसों पहले काम करना शुरू किया था। 1940 के करीब श्री बालासाहब खेर खाना जिले में, जहां इस सेवा की बड़ी जरूरत थी, अपने सदा-जैसे उत्साह के साथ वह इस काम में पिल पड़े। अब वह आदिवासी सेवा मंडल के अध्यक्ष हैं।

भारत के अन्य भागों में भी कुछ दूसरे ऐसे ही लोग काम कर रहे हैं, फिर भी उनकी संख्या बहुत थोड़ी है। सच ही, ‘फसल भारी, मजदूरों का टोटा’ वाली बात है। कौन इस बात से इंकार कर सकता है कि इस प्रकार के सारे ही सेवा-कार्य न केवल परोपकार के बल्कि ठोस राष्ट्रीय सेवा के काम हैं और हमें सच्ची स्वाधीनता के और भी नज़दीक लाने वाले हैं?

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-45

36.     स्वेच्छापूर्वक अति-शूद्र

जाति-भेद ने हमारे अंदर इतनी गहरी जड़ जमा ली है कि उसकी छूत मुसलमानों, ईसाइयों और भारत के दूसरे धर्मावलंबियों को भी लग गई है। यह सही है कि वर्गभेद न्यूनाधिक मात्रा में संसार के अन्य भागों में भी पाया जाता है। मतलब यह है कि यह एक ऐसा रोग है जो मानव जाति मात्र में व्याप्त है। इसका निराकरण सच्चे अर्थ में धर्मात्मा बनने से ही हो सकता है। इस प्रकार के व्यवधानों और भेदभाव के लिए मुझे तो किसी भी धर्म के शास्त्रों में कोई स्वीकृति नहीं दिखाई दी है।

धर्म की आंखों में सभी मनुष्य बराबर हैं। विद्या, बुद्धि या धन के बल पर कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि वह उनसे बड़ा है। जिनके पास यह नहीं है। सच्चे धर्म के पुनीत परिमल से जिस मनुष्य का जीवन सुरभित है और जिसे उसकी साधना ने निर्मल बना दिया है वह तो अपने लाभ में उन सबके साथ हिस्सा बंटाने में ही अपना धर्म समझता है जो उस लाभ से किसी अंश में भी वंचित हैं और जब यह बात है तब तो हमारे इस पतन की आज की दशा में सच्चे धर्म की मांग यही है कि हम सब स्वेच्छापूर्वक ‘अतिशूद्र’ बन जाएं।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-46.

हिन्दू-मुस्लिम एकता

37.     एकता ही शक्ति है

 

एकता में ही शक्ति है-यह बात स्कूलों में सिखाया जाने वाला कोरा नीति-वचन ही नहीं है, बल्कि जीवन का एक ऐसा सिद्धांत है, जो हिंदू-मुस्लिम एकता के संदर्भ में जितनी स्पष्टता के साथ लागू हुआ है, उतना और किसी संदर्भ में नहीं। अलग-अलग रहने पर हमारा नाश सुनिश्चित है। जब तक हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे का गला काटने को तैयार हैं तब तक किसी भी तीसरी ताकत के लिए हिंदुस्तान को गुलाम बनाए रखना आसान है। हिंदू-मुस्लिम एकता का मतलब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच ही एका पैदा करना नहीं है, बल्कि उन सभी के बीच जो, किसी भी धर्म के अनुयायी रहते हुए भी, भारत को अपना देश मानते हैं।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-47

38.     मैत्री धर्म

किसी झगड़े के लिए दो पक्ष जरूरी होते हैं। जब एक पक्ष झगड़ा करे तब दूसरे पक्ष के लिए शांत रहना आवश्यक है। तभी हिंदू-मुस्लिम एकता कायम रह सकती है। दूसरा पक्ष भला रहे तो हम भी भले रहें-यह न मैत्री का धर्म है, न युद्ध का। यह तो सौदेबाजी है। दोस्ती में सौदेबाजी की कोई गुंजाइश नहीं होती। दोस्ती तो बहादुर पक्षों के बीच ही हो सकती है और सौदेबाजी कमजोरों के बीच। हम एक साथ ही कमजोर भी हैं और मजबूत भी। यही वजह है कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच का रिश्ता दोस्ती और सौदेबाजी दोनों का ही है। हमें उम्मीद करनी है कि सौदेबाजी वाला हिस्सा दिन-पर-दिन घटता जाएगा और दोस्ती वाला बढ़ता जाएगा। एक पक्ष भी यदि अपने को निरंतर शुद्ध और शक्तिशाली बनाता चले तो यह मित्रता चिरस्थायी हो जाए।

दूसरों पर धौंस जमाना बहादुरी नहीं कहलाता। बहादुर वह नहीं है, जो दूसरों को डराने-धमकाने में अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है। बहादुर वह आदमी है, जो ताकत रहते हुए भी उसका इस्तेमाल दूसरों को डराने के लिए नहीं, बल्कि कमजोरों की मदद के लिए करता है। बहादुर आदमी कभी कभी डर सकता है? मुसलमान लोग शरीर से ताकतवर होते हैं। उनके पीछे सारी दुनिया की भी ताकत है, तब भी हिंदुओं को उनसे डरना नहीं चाहिए, बल्कि परमात्मा पर भरोसा रखते हुए यही चाहिए कि न्याय के रास्ते से बाल भर भी न हटें। मुसलमानों को भी बाहर से मदद लेने में शर्म मालूम होनी चाहिए और हिंदुओं का विश्वास करना चाहिए, भले ही संख्या में वे ज्यादा हों। लेकिन अगर दोनों ही पक्ष इस सभ्य तरीके से नहीं चलते और सिर्फ एक पक्ष ही यह रास्ता अपनाता है, तो भी हिंदू-मुस्लिक एकता भंग नहीं होनी चाहिए। मतलब यह कि एक पक्ष भी अपने धर्म पर दृढ़ है तो दोनों पक्षों के बीच शत्रुता नहीं रहेगी। अपने धर्म के पालन में दृढ़ उसी को माना जा सकता है जो अपनी रक्षा का भार ईश्वर को सौंप कर निर्भय हो, सन्मार्ग पर चलता रहे। हिंदू अगर मोपला-कांड में इसी सिद्धांत का पालन करें तो मोपला लोगों की गलती समझते हुए भी वह मुसलमानों को अपराधी नहीं कहेंगे। वे तो क्षतिग्रस्त हिंदुओं की मदद करने और उन्हें उनके पांवों पर खड़ा करने के काम में जुट जाएंगे।

स्वराज्य का मतलब तो यह है कि अगर कोई आदमी अपनी जमात में बिल्कुल ही अकेला पड़ जाए तब भी वह निर्भय होकर बाकी सबका विरोध कर सके। हिंदुओं को मुसलमानों की सद्भावना पर ही पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहिएं और न मुसलमाों को ही कुछ हिंदुओं की नीचता से डर जाना चाहिए। हर संप्रदाय को अपनी शक्ति पर निर्भर रहते हुए दूसरे संप्रदाय की मदद करनी चाहिए। मोपला लोगों के अत्याचारों के सामने एक भी हिंदू को भाग खड़े होने की जरूरत क्यों पड़ी? क्यों एक भी हिंदू को इस बात की जरूरत पड़ी कि अंग्र्रेजी फौज से डरकर वह उन्हें मोपला लोगों का ठिकाना बता दे? किसी हिंदू का यह जरूरी फर्ज नहीं था कि मोपला लोग कहां छिपे हैं इसकी खबर दे। किसी एक भी हिंदू के लिए यह क्यों जरूरी हो गया कि मोपला लोगों के डर से वह इस्लाम की मज़हबी रस्मों को अपना लेने का दिखावा करे? अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लड़ी जाने वाली अपनी लड़ाई में हम जिस सिद्धांत पर चल रहे हें कि अपने प्राणों की ही आहूति दे दें, उसका पालन हर तरह के अत्याचार के सामने किया जाना चाहिए। अत्याचारी के सामने झुकने की जगह अगर हम उसके हाथों मरना ज्यादा पसंद करें तो हम सिंह से ज्यादा ताकतवर हो जाएंगे। किसी अत्याचारी को मारकर जो उसे पराजित करता है, वह किसी दिन खुद ही अत्याचारी बनने के लोभ का शिकार हो जाएगा, क्योंकि अपनी रक्षा के लिए परमात्म पर भरोसा न कर वह तो अपनी पाशविक शक्ति पर भरोसा करना सीख चुका होगा। जो आदमी अपने को परमात्मा समझ बैठा है, वह नष्ट होकर ही रहेगा। वह कभी भी बंधन-मुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि उसने परमात्मा का ही स्थान हड़प लेना चाहा है और फलस्वरूप, अपना सही स्थान गंवा बैठा है। उसे अभी भी कठोर साधना करनी है और यह जानना है कि वह है क्या?

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-47

39.     21 दिन के उपवास की घोषणा वाला वक्तव्य

हाल की घटनाएं मेरे लिए असहय सिद्ध हुई हैं। मेरी असहायता तो और भी असहय है। मेरा धर्म मुझे सिखाता है कि जब भी ऐसी विपत्ति आ पड़े जिसे दूर किया ही न जा सके, तब हमें उपवास और प्रार्थना करनी चाहिए। अपने परमप्रिय लोगों के संबंध में मैंने ऐसा किया ही है। मैं कुछ भी कहूं या लिखूं, यह साफ है कि दोनों संप्रदायों को मिलाने की दिशा में उसका कोई असर नहीं हो सकता। इसलिए मैंने आज से लेकर बुधवार, 8 अक्तूबर तक के लिए, 21 दिन का उपवास करने का निश्चय किया है। नमक डालकर, या बिना नमक के ही, पानी पीने की छूट मैंने रख ली है। यह उपवास एक प्रायश्चित भी है और एक प्रार्थना भी।

कोरे प्रायश्चित के रूप में ही अगर यह उपवास होता तो मुझे सार्वजनिक रूप से इसकी विज्ञप्ति करने की जरूरत थी, पर मैं इसी आशा से ऐसा कर रहा हूं कि हिंदुओं और मुसलमानों दोनों प्रति, जो अब तक एक साथ करम करते आए हैं, यह मेरी एक कारगर प्रार्थना का रूप ले लेगी-कि वे आत्महत्या न करें। सभी संप्रदायों के नेताओं को, जिनमें अंग्रेज भी शामिल हैं, मैं आमंत्रित करता हूं कि वे इक्ट्ठे हों और धर्म तथा मानवता के कलंक स्वरूप इस झगड़े को सुलझा डालें। जान पड़ता है कि ईश्वर को ही इसकी गद्दी से उतार दिया गया है। आइए, हम उसे अपने हृदयों के सिंहासन पर बिठा लें।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-49

40.       उपवास के ही बारे में

मैं पाठकों को यह विश्वास दिलाना चाहता हूं कि बिना सोचे-विचारे मैंने यह उपवास नहीं शुरू किया है। दरअसल मेरा जीवन तो असहयोग के जन्म से ही दांव पर चढ़ा रहा है। मैंने आंख मूंदकर यह कदम नहीं उठाया था। इसके खतरों की मुझे खासी चेतावनी मिल गई थी। बिना प्रार्थना के मेरा कोई भी काम नहीं हुआ करता। मनुष्य मात्र से भूल हो सकती है। अपने कदमों के सही होने के बारे में पक्का भरोसा तो हो ही नहीं सकता। जिसे वह अपनी प्रार्थना का उत्तर समझता है, संभव है वह उसके अहंकार की ही प्रतिध्वनि हों सच्चा उत्तर पाने के लिए तो हृदय का सर्वथा निष्पाप और निर्मल होना जरूरी है। मैं ऐसा कोई दावा नहीं कर सकता। में तो संघर्ष करते हुए चलने वाला एक अपूर्ण प्राणी हूं। परमात्मा की संपूर्ण एकता में मेरी आस्थ है और इसलिए मानव जाति की एकता में भी। देहों की अनेकता से क्या? आत्मा तो हम सब की एक ही है। अपवर्त के कारण सूर्य की किरणें अनेक हो जाती हैं, पर उनका स्रोत तो एक ही है। इसलिए मैं किसी बड़े-से-बड़े पापी मनुष्य से भी अपने को अलग नहीं कर ले सकता (और न अधिक-से-अधिक पुण्यात्मा के साथ मेरे एकत्व से मुझे वंचित किया जा सकता है। इसलिए मैं चाहूं या चाहूं, अपने प्रयोग में पूरी मानव जाति को समेटे बिना मैं नहीं रह सकता और न मैं प्रयोग किए बिना ही रह सकता हूं। जीवन प्रयोगों की एक अनंत श्रृंखला के सिवा और है ही क्या?

अमेठी, शंभर और गुलबर्गा ने तो मुझे बुरी तरह झकझोर दिया है। अमेठी और शंभर के बारे में हिंदू और मुसलमान दोस्तों ने जो रिपोर्ट तैयार की हैं उन्हें मैंने पढ़ा था। जो हिंदू और मुसलमान मित्र गुलबर्गा गए थे उनके संयुक्त निष्कर्षों का मुझे पता चला है। गहरी व्यथा से में छटपटाता रहा, पर मेरे पास कोई इलाज नहीं था। यह आग सुलग ही रही थी कि कोहाट ने उसे पूरी तरह से भड़का दिया। कुछ किए बिना तो चैन था नहीं। दो रातें मैंने छटपटाहट और दर्द के बीच गुजारीं। बुधवार को मुझे इलाज मिल गया। मुझे प्रायश्चित करना ही होगा। सत्याग्रह आश्रम में प्रातःकाल की प्रार्थना के समय हम करुणानिधान भगवान शिव की प्रार्थना करते हैं कि जाने या अनजाने में किए गए पापों के लिए वह में क्षमा कर दें। मेरा प्रायश्चित, अनजाने ही हो गए पापों के लिए, एक रुधिर-प्लावित हृदय की क्षमायाचना है।

यह एक चेतावनी है उन हिंदुओं और मुसलमानों को जो मुझे स्नेह करने का दावा करते आए हैं। उन्होंने अगर सचमुच ही मुझ पर स्नेह रखा है और अगर उनके स्नेह का मैं अधिकारी रहा हूं तो वे भी मेरे साथ-साथ इस बात का प्रायश्चित करेंगे कि उन्होंने अपने हृदय से ईश्वर को निकाल बाहर करने का घोर पाप किया। एक-दूसरे के धर्म की निंदा करना, निर्दोष लोगों के सिर फोड़ डालना, मंदिरों या मसजिदों को अपवित्र करना, ईश्वर की सत्ता को ही अस्वीकार करना है। हम शैतान की बात मानकर चले हैं। धर्म-या इसे आप जो भी कहते हों-कहीं ज्यादा कड़ी धातु का बना है। हिंदुओं और मुसलमानों को प्रायश्चित उपवास करना नहीं, अपने कदमों को वापस लेना होगा। किसी मुसलमान के लिए सच्चा प्रायश्चित यही है कि अपने हिंदू भाई के प्रति अपने मन में कोई बुरा भाव न रखे और किसी हिंदू के लिए भी ठीक उसी तरह सच्चा प्रायश्चित यह है कि अपने मुसलमान भाई के प्रति वह कोई बुरा भाव मन में न रखे।

मैं किसी भी हिंदू या मुसलमान से यह नहीं कहूंगा कि वह अपने धार्मिक सिद्धांत का रंचमात्र भी त्याग करे। हां, यह वह जरूर परख ले कि सचमुच ही धर्म तो है न! पर हर हिंदू और मुसलमान से में यह जरूर कहूंगा कि किस सांसारिक लाभ के लिए वह झगड़ा न करे। मेरे उपवास की वजह से अगर दोनों में से किसी भी संप्रदाय को सिद्धांत के किसी प्रश्न पर कुछ भी झुकना पड़ा तो इससे मुझे गहरी वेदना होगी। मेरा उपवास परमात्मा के  और मेरे ही बीच की चीज है।

इस बात को लेकर लोगों में कानाफूसी हुई है कि मुसलमान दोस्तों के बीच ही इतना ज्यादा वक्त बिताने की वजह से मैं हिंदुओं के मन की बात समझने योग्य नहीं रह गया हूं। पर हिंदू का म नही तो मैं हूं। हिंदुओं के दिल को समझने के लिए मुझे क्या उनके बीच रहने की जरूरत है, जबकि मेरी रग-रग हिंदू है? मेरा हिंदुत्व बिल्कुल ही गया-बीता होगा, अगर वह अधिकाधिक विपरीत प्रकार के प्रभाव के बीच भी कायम नहीं रह सकता। हिंदू-धर्म के लिए क्या जरूरी है, यह तो मैं बिना बताए, सहज रूप में ही जानता हूं। पर मुसलमान के दिल को समझने के लिए तो मुझे मेहनत करनी पड़ेगी। अच्छे से अच्छे मुसलमान के जितने नजदीक मैं आता जाऊंगा, उतनी ही इस बात की संभावना बढ़ेगी कि मुसलमानों और उनके कामों के बारे में मैं अधिकाधिक संतुलित राय कायम कर सकूं। दोनों संप्रदायों के बीच का अच्छे से अच्छा सीमेंट बनने के प्रयत्न में मैं लगा हुआ हूं। मेरे दिल की कामना तो यह है कि जरूरत पड़े तो मैं अपने खून के सीमेंट से उन्हें जोड़ दूं। पर वैसा करने के पहले मुझे मुसलमानों को यह यकीन दिला देना होगा कि मैं उन्हें उतना ही प्यार करता हूं जितना हिंदुओं को। मेरा धर्म मुझे सभी को एक समान प्यार करना सिखाता है। परमात्मा मुझे ऐसा करने की शक्ति दे। मेरे उपवास का उद्देश्य, अन्य बातों के अलावा, वह क्षमता प्राप्त करना भी है, जिससे मेरा प्रेम दोनों के लिए ही एक-समान और निःस्वार्थ हो।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-50.

41.     उपवास का अंत करने के पहले का वक्तव्य

हिंदू-मुस्लिम एकता में मेरी दिलचस्पी कुछ नई नहीं हूं। तीन साल से मेरा प्रमुख कार्यक्षेत्र यही रहा है। पर इसे प्राप्त करने में मैं सफल नहीं हो पाया हूं। मैं नहीं जानता, परमात्मा की इच्छा क्या है। आप जानते हैं कि मूल रूप में मेरी प्रतिज्ञा के दो हिस्से थे। उनमें से एक की पूर्ति हो चुकी है। दूसरे हिस्से को मैंने उस रात श्री मुहम्मदअली के घर पर उपस्थित लोगों की इच्छा देख रोक लिया था। पर अगर मैंने इस दूसरे हिस्से को कायम भी रखा होता तो भी, एकता सम्मेलन की सफलता को देखते हुए, मेरा उपवास समाप्त होता ही।

आज आप सबसे यह प्रतिज्ञा करने की मेरी विनती है कि हिंदू-मुसलमान एकता की खातिर जरूरत पड़ने पर आप अपनी जान दे देंगे। मेरे लिए तो हिंदू-धर्म बेमतलब हो जाएगा, अगर यह एकता नहीं आती और हिम्मत करके यही बात में इस्लाम मजहब के बारे में भी कहता हूं। हमें एक साथ मिलकर रहने का रास्ता निकालना ही होगा। हिंदुओं को अपने मंदिरों में पूजा करने की आजादी मिलनी ही चाहिए और उसी तरह मुसलमानों को भी मसजिद में अजान की और नमाज पढ़ने की उतनी ही आजादी भी अगर हम नहीं दिला सकते, तो फिर न तो हिंदू धर्म का कोई अर्थ रह जाता है और न इस्लाम का। इसके लिए मैं आपका वचन चाहता हूं और मैं जानता हूं कि वह मुझे मिल चुका है, इसलिए जिम्मेदारी के बोझ से इतना ज्यादा दब गया हूं कि मैं चाहता हूं कि अपनी प्रतिज्ञा को आप लोग एक बार फिर दुहरा दें।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-52.

42.     सांप्रदायिक समस्या का हल

भावी अनिष्ट का संकेत स्पष्ट है। मैं अनुरोध करता हूं कि आप उसकी उपेक्षा न करें। मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि जो लोग सदा से संतोष-वृत्ति के लिए मशहूर हैं उनके धीरज की और ज्यादा उपेक्षा न करें। हिंदुओं को हम लोग नरम बताते हैं और उनके संग-साथ की वजह से, जो भले के लिए हुआ हो या बुरे के लिए, खुद मुसलमानों के अंदर भी नरमी आ गई है। मुसलमानों के जिक्र से अल्पसंख्यकों की जटिल समस्या का अब मुझे ख़्याल आ रहा है। विश्वास कीजिए, वह समस्यास यहीं मौजूद है और जो बात मैं भारत से कहता रहता हूं उसे फिर दुहराता हूं-उन शब्दों को मैं भूला नहीं हूं-कि अल्पसंख्यकों की समस्या का हल हुए बिना भारत को स्वराज्य नहीं मिल सकता, उसके बिना भारत की आजादी कोई मानी नहीं रखती। मैं यह जानता हूं, मैं यह महसूस करता हूं और फिर भी मैं  इस उम्मीद में यहां आया हूं कि शायद यहां मैं किसी हल पर आ सकूं। पर मैंने यह आशा गंवाई नहीं है कि किसी-न-किसी दिन अल्पसंख्यकों की समस्या का कोई असली और पक्का हल मिलेगा ही। जो मैं अन्यंत्र कहता रहा हूं उसे मैं फिर दुहराता हूं कि जब तक विदेशी शासन के रूप में एक संप्रदाय को दूसरे संप्रदाय से और एक वर्ग को दूसरे वर्ग से दूर करने वाला, यह लकड़ी का पच्चड़ ठुका हुआ है, तब तक कोई भी असली और पक्का हल नहीं निकल सकता, इन संप्रदायों के बीच तब तक पक्की दोस्ती नहीं हो सकती।

आखिर तो ज्यादा से ज्यादा यह एक कागजी हल ही होगा न! पर ज्यों ही आप इस पच्चड़ को खींच कर निकाल बाहर करते हैं, त्यों ही घरेलू बंधनों, घरेलू प्यार-मोहब्बत, एक ही जगह जन्म होने के बोध-क्या आप समझते हैं कि इन सबकी कोई कीमत ही नहीं है?

जब अंग्रेजी शासन नहीं था, जब भारत में एक भी अंग्रेज की सूरत नहीं दिखाई दी थी, तब हिंदू और मुसलमान और सिख क्या आपस में बराबर लड़ते ही रहा करते थे? हिंदू इतिहासकारों ने और मुसलमान इतिहासकारों ने पक्के-से-पक्के प्रमाण देकर हमें बताया है कि तब भी हम आज के मुकाबले ज्यादा मेल-मुहब्बत के साथ रह रहे थे और गांवों में तो आज भी हिंदू और मुसलमान आपस में नहीं झगड़ते। उन दिनों तो उनके बीच लड़ाई-झगड़े की बात कभी सुनी ही नहीं गई थी। परलोकवासी मौलाना मुहम्मद अली अकसर मुझे बताया करते थे-और वह खुद भी थोडे़-बहुत इतिहासकार तो थे ही-कि ‘अगर अल्लाह ने मेरी जिंदगी कायम रखी तो हिंदुस्तान पर मुसलमानों के राज का एक इतिहास लिखने का मेरा इरादा है और तब मैं ऐसे कागजात के जरिए, जिन्हें खुद अंग्रेजों ने हिफाज़त के साथ रख छोड़ा है, यह दिखाऊंगा कि औरंगजेब उतना कमीन नहीं था, जितना अंग्रेजों की कूची से वह रंगा गया है कि मुगलों का राज उतना ख़राब नहीं था जैसा हमें अंग्रेजों के लिखे इतिहासों में देखने को मिलता है,’ वगैरा वगैरा। और यही बात हिंदू इतिहासकारों ने भी लिखी है। यह झगड़ा पुराना नहीं है। इस झगड़े की शुरूआत अंग्रेजों के आने के साथ हुई और जिस क्षण यह संबंध टूटेगा, जिस क्षण ब्रिटेन और भारत के बीच का यह दुर्भाग्यपूर्ण कृत्रिम, अस्वाभाविक संबंध एक स्वाभाविक संबंध बन जाएगा, ज्यों ही यह संबंध एक स्वैच्छिक सांझेदारी का रूप लेगा-अगर ऐसा रूप उसे लेना हो और इस शर्त पर ही कि दोनों में से किसी भी पक्ष के चाहने पर उसका अंत हो जाएगा और वह रद्द हो जाएगी-जिस क्षण ऐसा होगा उसी क्षण आप देखेंगे कि हिंदू, मुसलमान, सिख, यूरोपियन, एंग्लो इंडियन, ईसाई और अछूत, सभी एक देह एक प्राण की तरह एक साथ रहने लग जाएंगे।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-53.

43.     ‘मेरे लिए प्रार्थना करें’

एक बार नहीं, कई बार मैंने लोगों को यह शिकायत करते सुना है कि हिंदू-मुसलमान एकता में देर होने का कारण यह है कि मैं उसके लिए काफी प्रयत्न नहीं कर रहा हूं कि अगर मैं और सब कुछ छोड़ उसी के काम में अपनी सारी शक्ति लगा दूं तो वह आज ही स्थापित हो जाए। क्या मैं आपको यह विश्वास दिला सकता हूं कि अगर आज मेरी ओर से कुछ ढील दिखाई देती है तो इसका कारण यह नहीं है कि हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए मेरे उत्साह में कुछ भी कमी आई है? किंतु मैंने इस महान ध्येय के एक उपकरण के रूप में अपनी खुद की अपूर्णता को पहले से कहीं ज्यादा अच्छी तरह देख लिया है और यह भी समझ लिया है कि महान ध्येयों की प्राप्ति के लिए सिर्फ बाहरी साधनों पर निर्भर करने से काम नहीं चल सकता। उसी की कृपा पर अपने को पूरी हर छोड़ देना अब मैं अधिकाधिक सीखता जा रहा हूं।

अगर मेरा दिल चीरकर आप देख सकते, तो आप पाते कि हिंदू-मुस्लिम एकता की प्राप्ति के लिए मेरी प्रार्थना और आध्यात्मिक साधना तो मेरे अंतस्तल में चौबीसों घंटे अविराम गति से चलती ही रहती है, मैं सोता रहूं या जागता, वह एक क्षण के लिए नहीं रुकती। अन्य कोई कारण न हो तो भी, हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना मेरा काम इसलिए नहीं चल सकता कि उसके बिना स्वराज्य की प्राप्ति संभव ही नहीं। यह कोई न समझे बैठा रहे कि हिंदू चूंकि बहुसंख्यक संप्रदाय के हैं, इसलिए बिना दूसरे संप्रदायों के समर्थन या सहायता के ही वह सत्याग्रह द्वारा भारत के लिए या अपने ही लिए, स्वराज्य प्राप्त करने में समर्थ हैं। जैसा कि मैंने अकसर दुहराया है, सत्याग्रह का रूप् यदि पूर्णतया निर्मल हो तो कुछ व्यक्तियों तक सीमित रहने पर भी वह सफल हो सकता है। किंतु उस अवस्था में ये कुछ व्यक्ति ऐसे होने चाहिएं जो समूचे राष्ट्र के संयुक्त संकल्प और शक्ति के प्रतीक हों। हथियारों से लड़े जाने वाले यु़द्धों पर भी क्या यही बआत लागू नहीं होती? मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की समूची नागरिक जनता के समर्थन और सहयोग की जरूरत रहती है। उसके बिना तो वह अपंग ही हो जाएंगे। अगर मैं स्वराज्य पाने के लिए अधीर हूं तो हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अधीर कैसे हूंगा? और मुझे पूरा विश्वास है कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच, कोई पैबंदबाजी वाला राजनीतिक समझौता नहीं, बल्कि सच्ची और स्थाई हार्दिक एकता देर या सवेर से आकर ही रहेगी-शायद देर से नहीं सबेर से ही। यह सपना मेरी आंखों से मेरे बचपन से ही समाया हुआ है। अपने पिता का जमाना मेरी आंखों में मेरे बचपन से ही समाया हुआ है। अपने पिता का जमाना मेरी आंखों के आगे जैसा-का-तैसा मौजूद है। जब राजकोट के हिंदू और मुसलमान किस तरह एक-दूसरे के साथ घुले-मिले रहते हैं और सगे भाइयों की तरह एक-दूसरे के घरेलू कामगाज और उत्सव-समारोहों में शामिल होते थे। मुझे भरोसा है कि वे दिन एक बार फिर इस देश में लौट कर आएंगे। संप्रदायों के बीच की यह आपसी तू-तू मैं-मैं और एक-दूसरे पर किए जाने वाले दोषारोपण हमारे लिए अप्राकृतिक हैं और हमारे पथभ्रष्ट हो जाने की निशानी है। यह बात हमेशा नहीं बनी रह सकती।

इस संसार में जो बड़े से बड़े काम किए जाते हैं, वे कोरे मानव-प्रयत्नों के आधार पर नहीं होते। वे अपने निश्चित समय ही होते हैं। परमात्मा अपने ढंग से अपने उपकरण चुनता है। कौन जानता है, अपने हृदय की अनवरत प्रार्थना के बावजूद मैं इस महान कार्य के उपयुक्त न समझा जाऊं। हमें अपनी-अपनी कमर कसे तैयार रहना चाहिए और अपनी-अपनी मशालें जलाए रखनी चाहिएं। कौन जानता है कब या किसकी और उसका इशारा हो जाए, किसे वह इस काम का दायित्व सौंप दे? मेरे ही ऊपर इशारा हो जाए, किसे वह इस काम का दायित्व सौंप दे? मेरे लिए ऊपर सारी जिम्मेदारी मढ़कर आप सब अपने दायित्व से बच नहीं सकतें मेरे लिए प्रार्थना करें कि मेरा सपना मेरे जीवन काल में ही पूरा हो जाए। हतोत्साह और निराश होकर बैठ जाने से काम नहीं चलेगा। परमात्मा कब क्या करेगा, यह मनुष्य की गणित से नहीं जाना जा सकता।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-54.

44.     उनका स्वप्न

अपनी किशोरावस्था में जब मैं राजनीति के बारे में कुछ भी नहीं जानता था, तब भी मैं उस सांप्रदायिक एकता का स्वप्न देखा करता था, जो दिल से पैदा हो। अपने जीवन के इस संध्याकाल में भी मैं उस स्वप्न को अपने जीते-जी चरितार्थ हुआ देख, बच्चे की तरह नाच उठूंगा। तब मेरी यह इच्छा कि मैं अपनी पूर्णायु पूरी करूं-जिसका निरूपण करके प्राचीन ऋषियों ने सवा सौ वर्ष की इसकी अवधि मानने की स्वीकृति दी है-फिर से जग उठेगीं इस तरह के स्वप्न की सिद्धि के लिए भला कौन अपने जीवन की आहूति देने को तैयार नहीं हो जाएगा? तब हमें सच्चा स्वराज्य मिल जाएगा। तब हम कानूनी और भौगोलिक दृष्टि से भले ही दो राज्यों के रूप में बने रहें, किंतु अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कोई भी यह नहीं समझेगा कि हमारे अलग-अलग दो राज्य हैं। मेरी आंखों के सामने का नजारा और यह बात आपके लिए भी जरूर वैसी ही होगी, इतना शानदार है कि वह शायद ही यथार्थ बबन सके। फिर भी, एक मशहूर चित्रकार के किसी मशहूर चित्र के एक बच्चे की भांति मैं तब तक खुश नहीं हो पाऊंगा, जब तक मुझे वह मिल न जाए। उस ऊंचे लक्ष्य से नीचे की किसी चीज के लिए न मैं जी रहा हूं और न जीना चाहता हूं। इस लक्ष्य के जितने भी नजदीक पहुंचना मनुष्य के लिए संभव हो, उस तक पहुंचने में अगर पाकिस्तान के अन्वेषक भी मेरी मदद के लिए आगे बढ़ जाएं, तो कितना अच्छा हो। लक्ष्य तक पहुंच जाने से वह लक्ष्य नहीं रह जाता। एसके अधिक से अधिक निकट पहुंचना सदा ही संभव है। मैंने जो कहा है उसमें, दूसरे लोगों के करने-न-करने से कोई फर्क नहीं पड़ता। उस स्वर्ण भूमि तक पहुंचने के योग्य बनने के लिए हर किसी को आजादी है कि वह अपना हृदय निर्मल बनाए। मुझे याद है कि मैंने दिल्ली या आगरे के किले में, ठीक याद नहीं किसमें, जब मैं 1896 में वहां गया था, दरवाजों पर लिखा एक शेर पढ़ा था, जिसका मतलब यह होता है: ‘पृथ्वी पर अगर स्वर्ग है तो वह यहां है, यहां है।’ वह किला, अपनी शान में बेमिसाल होते हुए भी, मेरी नजर में तो स्वर्ग जैसा कतई नहीं था। पर मुझे खुशी होगी अगर मैं देखूं कि वह शेर, पाकिस्तान के सभी प्रवेश-द्वारों पर लिख दिया गया है और सचमुच पाकिस्तान स्वर्ग बन गया है। इस तरह के स्वर्ग में, चाहे वह भारत में हो या पाकिस्तान में, न कंगाल होंगे न भिखारी, न ऊंचे और न नीचे, न करोड़पति मालिक और न आधा पेट खाने वाले कर्मचारी और न ही मादक पेय या नशे की दूसरी चीजें होंगी। उसमें नारियों का भी वैसा ही सम्मान किया जाएगा, जैसा पुरुषों का और पुरुषों और स्त्रियों के चरित्र और निर्मलता की प्राणपण से रक्षा की जाएगी। वहां अपनी पत्नी को छोड़ हर स्त्री के साथ उसकी उम्र के हिसाब से हर धर्म के लोगों का बरताव मां, बहन या बेटी की तरह होगा। वहां अस्पृश्यता नहीं होगी अैर सभी धर्मों के प्रति समान आदर होगा। वहां के सभी लोगों को स्वेच्छापूर्वक अपनी रोटी के लिए श्रम करने में गर्व और आनंद का बोध होगा। मैं आशा करता हूं कि मेरी इन बातों को सुनने या पढ़ने वाला हर व्यक्ति मुझे माफ करेगा कि मीठी-मीठी धूप में अपने बिस्तर पर लेटा-लेटा और सूरज की जीवनदायिनी किरणों को अपनी सांसों से पीता हुआ मैं इस तरह भाव-विभोर होकर आकाश में उड़ा चला जा रहा हूं। पर संदेहशील और अविश्वासी लोगों को कम-से-कम यह तो इससे पता चल ही जाएगा कि जल्द से जल्द इस उपवास को खत्म कर देने की मुझे ज़रा भी इच्छा नहीं है। तो फिर मेरे जैसे शेखचिल्ली की आकाष के फूल तोड़ने जैसी इच्छाएं अगर कभी पूरी हों ही नहीं और यह उपवास भी कभी खत्म ही न हो, तो इसकी चिंता ही क्या? मैं इंतजार करने के लिए तैयार हूं, चाहे कितना भी वक्त लगे, पर यह जानने पर कि लोगों ने सिर्फ मुझे बचाने की नीयत से कुछ किया, मुझे तकलीफ होगी। मेरा यह दावा है कि यह उपवास मैंने परमात्मा की प्रेरणा से ही शुरू किया है और इसका अंत तभी और उसी स्थिति में होगा, जब वह चाहेगा। ईश्वरीय इच्छा के रास्ते में कब कौन बाधक बन सका है? अब भी वैसा नहीं होगा।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-56.

भाषा-गांधी का भारत

45.     हमारा कर्तव्य

भाषा का मामला एक भारी, और सचमुच ही बहुत बड़ी, समस्या के रूप में हमारे सामने है। कुल-के-कुल नेता भी अगर, बाकी सारे काम छोड़, इसी को सुलझाने में लग जाएं तो यह भी शायद गलत न हो। पर अगर इससे विपरीत हम इसका महत्व ही घटना देना चाहें और इसकी तरफ ध्या नही न दें, तब तो इस मामले में लोगों ने जो उत्साह दिखलाया है और जितनी गहरी दिलचस्पी ली है, उस सब पर पानी पड़ जाएगा।

भाषा हमारी मां की तरह है। पर हमारे अंदर मां के लिए जितना प्यार है, उतना इसके लिए नहीं। दरअसल, इस तरह के सम्मेलनों में मुझे कुछ ख़ास दिलचस्पी नहीं है। तीन दिन का यह तमाशा कर लेने के बाद हम अपनी-अपनी जगह वापस चले जाएंगे और यहां जो कुछ कहा और सुना गया है सब भूल जाएंगे। जरूरत तो काम करने की लगन और निश्चय की है। अध्यक्ष का भाषण आपके अंदर लगन नहीं जगा दे सकता। यह तो आपको अपने ही अंदर से जगानी पड़ेगी। हमारे विरुद्ध एक आरोप यह भी है कि हमारी भाषा प्राणहीन है। जहां ज्ञान नहीं है, वहां प्राण कहां से आएगा? हमारे अंदर न तो ज्ञान की प्यास है और न काम करने की लगन। जब हम अपने अंदर प्राण फूंक सकेंगे, तभी हमारी जनता और हमारी भाषा प्राणवान बनेगी। विदेशी भाषा के जरिए हमें वह आजादी नहीं मिल सकती, जिसे हम चाहते हैं और इसका सीधा-सादा कारण यही है कि हम उसका सही तौर पर इस्तेमाल ही नहीं कर सकते। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि इंदौर में आप लोगों का सारा कामकाज हिंदी के ही जरिए होता है। पर-मुझे माफ कीजिएगा-आपके बड़े दीवान साहब की जो चिट्ठी मुझे मिली है, वह अंग्रेजी में है। इंदौर के लोग तो शायद न जानते हों, पर मैं उन्हें बताऊंगा, कि यहां की अदालतों में हिंदी में लिखी अर्जियां ले तो ली जाती हैं, पर मजे की बात यह है कि वकीलों की जिरह और न्यायाधीशों के फैसले अंग्रेजी में होते हैं। मैं पूछता हूं कि इंदौर में ऐसा क्यों हो? मैं स्वीकार करता हूं कि यह आंदोलन-हिंदी में काम करने का आंदोलन-ब्रिटिश भारत में अभी सफल नहीं हो सकता, पर कोई कारण नहीं है कि देशी रियासतों में उसे सफलता न मिले। शिक्षित वर्गों पर, जैसा कि पंडित मालवीय जी ने अपनी चिट्ठी में दिखलाया है, दुर्भाग्यवश अंग्रेजी का जादू सवार हो गया है और अपनी ही मातृभाषा के लिए उनके अंदर अरुचि पैदा हो गई है। अंग्रेजी का जो दूध उन्हें पीने को मिलता है, उसमें पानी मिला हुआ है और ज़हर घुला हुआ है, जबकि मातृ भाषा वाला दूध बिल्कुल शु़द्ध है। इस शुद्ध दूध के बिना हमारे लिए कुछ भी प्रगति करना संभव नहीं। पर अंधे को सूझता नहीं और गुलाम अपनी बेड़ियों को तोड़ना नहीं जानता। अंग्रेजी का जादू हम पर पिछले पचास साल से सवार है। नतीजा यह है कि हमारे देशवासी अज्ञान में ही डूबे पड़े हैं। समस्या के इस अंश की ओर इस सम्मेलन का ध्यान विशेष रूप से जाना चाहिए। हमें एक वर्ष के अंदर यह स्थिति ले आनी चाहिए कि हमारे किसी भी राजनीतिक या सामाजिक सम्मेलन में, या कांग्रेस में, या प्रांतीय विधान सभा आदि में अंग्रेजी का एक शब्द भी न सुना जा सके। अंग्रेजी ने आज तक सार्वभौम भाषा का स्थान पा लिया है। पर उसका कारण यही है कि अंग्र्रेज सारी दुनिया में फैल गए हैं और जमे बैठे हैं। जैसे ही उनकी यह स्थिति कमजोर पड़ जाएगी, अंग्रेजी भी उसी हद तक सिकुड़ जाएगी। अपनी निजी भाषा की हमें अब और अधिक उपेक्षा नहीं करनी है, ऐसा नहीं करना है कि वह बिल्कुल खत्म ही हो जाए। अंग्रेज लोग अपनी मातृभाषा में ही अपनी बातचीत और अपने सभी कामकाज चलाते हैं, दूसरी भाषा उन्हें स्वीकार नहीं। हमें भी तो यही करना है और इस प्रकार हिंदी को राष्ट्रभाषा की ऊंची प्रतिष्ठा देनी है। इतना करके ही हम उसके प्रति अपना कर्तव्य निभा पाएंगे।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-59.

46.     हिंदी सीखें

मैंने एक और सुझाव दिया है। आपको और मुझको, और हममें से किसी को भी, सच्ची शिक्षा नहीं मिलने पाई, जो हमें अपने राष्ट्रीय विद्यालयों में मिलनी चाहिए थी। बंगाल के नौजवानों के लिए, गुजरात के नौजवानों के लिए, दक्षिण के नौजवानों के लिए यह संभव ही नहीं है कि वह मध्य प्रदेश में जा सकें, संयुक्त प्रांत में जा सकें, पंजाब में और भारत के उन बड़े-बड़े इलाकों में जा सकें जो सिर्फ हिंदुस्तानी ही बोलते हैं और इसलिए मैं आपसे कहता हूं कि अपने फुरसत के घंटों में-फुरसत के उन घंटों में जो कताई के बाद आप बचा सकें-आप हिंदूस्तानी सीखा करें और अगर आप इन्हें सीखना शुरू कर दें, तो आप कताई और हिंदुस्तानी दोनों को ही दो महीने में सीख लेंगे। मैं आपको विश्वास हूं कि कोई भी बुद्धिमान सुशील लड़का, देशभक्त और कड़ी मेहनत करने वाला, इन दोनों को ही दो महीने में सीख सकता है और उसके बाद आपको पूरी छूट है अपने गांवों में जाने की, पूरी छूट है सिर्फ एक मद्रास को छोड़ बाकी सारे भारत में खुलकर विचरने की, और हर जगह के आम लोगों से अपनी बात कह सकने की। यह तो एक क्षण के लिए भी आप न समझ बैठें कि आम जनता तक अपनी बात पहुंचाने की आम भाषा के रूप में आप अंग्रेजी का इस्तेमाल कर पाएंगे। बाईस करोड़ भारतवासी हिंदुस्तानी जानते हैं-और कोई भाषा वह नहीं जानते और अगर आप बाईस करोड़ भारतियों के दिलों में घुस बैठना चाहते हों तो हिंदुस्तानी छोड़ और किसी भाषा से यह संभव नहीं। अगर आप इन नौ महीनों के बीच सिर्फ इन दो कामों में जुट जाएं तो मुझ पर विश्वास कीजिए, यह समय बीतते-बीतते आप अपने अंदर वह साहस और वह शक्ति पा चुके रहें जो आज आपके अंदर नहीं है। मैं तो हजारों विद्यार्थियों को जानता हूं-अगर उन्हें यह बताया जाता है कि उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती तो उनके चेहरे मायूसी से स्याह पड़ जाते हैं। इस सरकार का अंत करने या सुधार करने के लिए अगर आप तुल गए हैं तो फिर सरकारी नौकरी पाने की बात आप कैसे सोच सकते हैं? अगर आपको इस सरकार की शरण नहीं लेनी है तो फिर आपकी अंग्रेजी की लियाकत की कीमत ही क्या? मैं न तो अंग्रेजी भाषा के साहित्य की कीमत घटना चाहता हूं और न उसकी किताबों के अंदर दबे पड़े खजाने की। मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि अंग्रेजी भाषा को आप लोगों ने जरूरत से ज्यादा महत्व दे रखा है, पर आपसे यह कहने का साहस मैं जरूर करना चाहता हूं कि स्वराज्य की व्यवस्था में अंग्र्रेजी के लिए बहुत ही कम गुंजाइश है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-60.

47.     संस्कृत

मेरी राय में तो हिंदुओं के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में संस्कृत का प्रयोग होना चाहिए। अनुवाद कितना भी अच्छा क्यों न हो, जो आशय कुछ मूल शब्दों की ध्वनि में अंतर्निहित रहता है, वह अनुवाद में नहीं मिल सकता। फिर, प्रादेशिक भाषाओं में अनुवाद करके और उनसे ही अपना काम चला लेने की प्रवृत्ति से, होता यह है कि हजारों वर्षों के बीच परिष्कृत होती आने वाली किसी भाषा के जिन छंदों का बराबर ही पाठ होता आया है, उनकी उस पवित्रता को, उनके उस वातावरण को, हम हलका कर डालते हैं। पर इसमें मुझे जरा भी संदेह नहीं है कि हर श्लोक का, और धार्मिक अनुष्ठानों की हर प्रक्रिया का, अर्थ उन लोगों के हितार्थ जिनके लिए वे श्लोक पढ़े जा रहे हैं अथवा वे धार्मिक अनुष्ठान हो रहे हैं, उनकी अपनी ही भाषा में अवश्य उन्हें समझाया जाए। मैं यह भी मानता हूं कि संस्कृत के प्रारंभिक ज्ञान के बिना हर हिंदू की शिक्षा अधूरी ही है। मैं तो समझ ही नहीं पाता कि संस्कृत के व्यापक ज्ञान के बिना हिंदू धर्म टिका कैसे रह सकता है। उसकी शिक्षा का जैसा पाठ्य-क्रम प्रचलित है, उससे अवश्य इस भाषा को कठिना बना दिया गया है, पर यों वह बिल्कुल ही मुश्किल नहीं है और अगर वह मुश्किल हो भी, तो क्या? धर्माचरण करना तो और भी मुश्किल है न! जो लोग धार्मिक जीवन बिताना चाहते हैं उन्हें उसके साधन कितने भी कठिन क्यों न हों, आसान ही जान पड़ते हैं।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-62.

48.     हिंदी-हमारी राष्ट्रभाषा

हालांकि मैं इन दक्षिणी भाषाओं को संस्कृृत की ही बेटियां मानता हूं, फिर भी वे हिंदी, उड़िया, बंगला, असमिया, पंजाबी, सिंधी, मराठी और गुजराती से भिन्न है। उनका व्याकरण तो हिंदी से बिल्कुल ही अलग है। उन्हें संस्कृत की बेटियां कहने का मेरा अभिप्राय यही है कि उनके शब्द-भंडार में संस्कृत के शब्द बहुत बड़ी संख्या में हैं और जब-जब उन्हें किसी कठिनाई का सामना करना पड़ता है, वे अपनी मां की भांति संस्कृत की शरण लेती हैं-वे उसी से मदद मांगती है और नए-नए शब्दों के रूप में उससे अपनी जरूरी खुराक पा जाती हैं। प्राचीन काल में भले ही वे स्वतंत्र रही हों, पर आज तो संस्कृत से शब्द ले-लेकर ही वे अपना खजाना भर रही हैं। उन्हें संस्कृत की ही बेटियां मानने के और भी कई कारण हैं, पर यहां उन पर विचार करना आवश्यक नहीं है।

मैंने हमेशा ही यह माना है कि हमें प्रांतीय भाषाओं को किसी प्रकार की भी क्षति नहीं पहुंचानी है-उन्हें कमजोर करने या उनका खात्मा करने की तो बात ही नहीं उठती। हम इतना ही चाहते हैं कि सभी लोग अंतर-प्रांतीय संपर्क के एक सामान्य माध्यम के रूप में हिंदी सीखें। इसका यह मतलब नहीं होता कि हिंदी के प्रति हमारा कोई अनुचित पक्षपात है। हम हिंदी को अपनी राष्ट्रभाषा मानते हैं। वह इस योग्य हैं भी। वही भाषा राष्ट्रभाषा बनने योग्य मानी जा सकती है, जिसे अधिकांश लोग बोलते हों और जिसे सीखना आसान हो। जहां तक हमें पता है, इस राय के खिलाफ कोई ऐसी ख़ास बात नहीं की जा सकी है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत हो।

हिंदी अगर अंग्रेजी का स्थान लेती है, तो कम-से-कम मुझे तो जरूर खुशी होगी। पर अंग्रेजी भाषा के महत्व को भी हम भली-भांति समझते हैं। आधुनिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए,  आधुनिक साहित्य के अध्ययन के लिए, दुनिया की जानकारी के लिए, वर्तमान शासकों के साथ संपर्क रखने के लिए और इसी तरह के दूसरे कामों के लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है। आज जैसी स्थिति है, उसमें तो हमें न चाहने पर भी अंग्रेजी सीखनी ही पड़ेगी। अंग्रेजी एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा है।

पर अंग्रेजी हमारी राष्ट्रभाषा कभी नहीं बन सकती। यह ठीक है कि आज तो उसी का बोलबाला है। उसका हमारे ऊपर जो अधिकार हो गया है, उससे छुटकारा पाने की पूरी कोशिशों के बावजूद, अभी तक हमारा राष्ट्रीय कामकाज ज्यादातर उसी में होता चल र हा है। पर इससे हमें इस भ्रम में नहीं पड़ जाना चाहिए कि वह हमारी राष्ट्रभाषा बनने जा रही है।

हम किसी भी प्रांत में जा पहुंचें, हमारे अपने ही अनुभव से यह बात आसानी से साबित हो जाएगी। उदाहरण के लिए, बंगाल या दक्षिण भारत की बात ही लें, जहां हम अंग्रेजी का प्रभाव सबसे ज्यादा पाते हैं। देश के इन भागों मं वहां की जनता से अगर हम कुछ भी कराना चाहते हैं, तो वह अंग्रेजी के मार्फत नहीं करा सकते, भले ही फिलहाल हम हिंदी के मार्फत भी वह न करा पाएं। फिर भी, हिंदी के कुछ ही शब्दों की मदद से किसी हद तक तो हम अपना मतलब साफ कर ही दे सकते हैं, जबकि अंग्रेजी के मार्फत उतना भी नहीं किया जा सकता।

यह जरूर माना जा सकता है कि अभी तक कोई भी भाषा राष्ट्रभाषा की जगह नहीं ले पाई है। अंग्रेजी सरकारी भाषा है। आज की परिस्थतियों में यह स्वाभाविक ही है। पर मैं यह नामुमकिन मानता हूं कि यह इससे आगे जा सके। भारत को यदि हम एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं, तो कोई माने या न माने एकमात्र हिंदी ही हमारी राष्ट्रभाषा हो सकती है और इसका सीधा-सादा कारण यही है कि हिंदी को जो लाभ मिले हुए हैं, उनकी आशा और कोई भी भाषा नहीं कर सकती। थोड़े-बहुत हेरफेर के साथ, हिंदी-हिंदुस्तानी, लगभग बाइस करोड़ लोगों की बोलचाल की भाषा है-हिंदुओं की भी और मुसलमानों की भी।

इसलिए, इन परिस्थितियों में तो यह सर्वोचित ही नहीं, एकमात्र संभव रास्ता है कि प्रांतों में प्रांतीय भाषा का, अखिल भारतीय कार्यों में हिंदी का और अंतर्राष्ट्रीय कामकाज के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाए। हिंदी भाषा-भाषियों की गिनती जहां करोड़ों में की जा सकती है, अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या कभी भी कुछ लाख से ज्यादा नहीं बढ़ सकती। बल्कि ऐसा करने का प्रयत्न भी आम लोगों के प्रति अन्याय करना होगा।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-62.

49.     अखिल भारतीय राष्ट्रीयता

अगर हमारी इन घोषणाओं में सच्चाई है कि हिंदुस्तानी हमारी राष्ट्रभाष है या होने जा रही है तो फिर हिंदुस्तानी के ज्ञान को अनिवार्य बना देने में कुछ भी दोष नहीं हो सकता। अंग्रेजों के यहां स्कूलों में लैटिन अनिवार्य विषय था और शायद अभी तक है। उसकी पढ़ाई से अंग्रेजी की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं पड़ती थी। उलटे उस श्रेष्ठ भाषा के ज्ञान से अंग्रेजी ही समृद्ध हुई। ‘मातृभाषा खतरे में है-’ की आवाज या तो अज्ञान की द्योतक है या पाखंड की। और जहां तक यह आवाज सच्चाई के साथ उठाई गई है, वहां उन लोगों की देशभक्ति पर ही आंच आती है कि वे अपने बच्चों को एक घंटा प्रति दिन भी हिंदुस्तानी पढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। अखिल भारतीय राष्ट्रीयता की मींग तक पहुंचने के लिए प्रांतीयता के कड़े छिलके को तो तोड़ना ही होगा। भारत एक देश अथवा एक राष्ट्र है, या कई देश और कई राष्ट्र?

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-64.

50.     एक अखिल भारतीय आम बोली

अपनी मातृभाषा के मुकाबले अंग्रेजी भाषा को अपनाकर हमने राजनीति में दिलचस्पी लेने वाले शिक्षित वर्गों और आम जनता के बीच एक बहुत बड़ी खाई खोद दी है। इससे भारतीय भाषाएं कंगाल होती जा रही हैं। अपने गूढ़ भावों को अपनी मातृभाषा में प्रकट करने का व्यर्थ प्रयास करते-करते हम लड़खड़ाने लगते हैं। वैज्ञानिक शब्दों की जगह प्रयोग करने के लिए हमारी भाषाओं में अनुकूल शब्द हैं ही नहीं। इससे भारी अनर्थ हुआ है। आम जनता तक आधुनिक विचारों की पहुंच हो ही नहीं पाती। हम अपने युग को इतने निकट से देख रहे हैं कि अपनी महान भाषाओं की इस उपेक्षा से भारत को जो क्षति हुई है उसका ठीक-ठीक अंदाजा हम लगा ही नहीं पाते। बिल्कुल सीधी-सी बात हे कि जब तक इस दोष को दूर नहीं किया जाता, तब तक आम जनता का दिमाग बंधा ही पड़ा रहेगा।  आम जनता का स्वराज्य के निर्माण में कोई ठोस योगदान नहीं हो सकता। अहिंसा के आधार पर कायम होने वाले स्वराज्य में यह बात अंतर्निहित है कि आजादी की लड़ाई में हर व्यक्ति का अपना सीधा योगदान हो। आम जनता तब तक पूरे तौर पर ऐसा नहीं कर सकती, जब तक कि वह हर कदम को उसके पूरे निहितार्थ के साथ समझती न चले। यह तब तक संभव नहीं, जब तक कि हर कदम के बारे में उसी की भाषा में न समझाया जाए।

और फिर अखिल भारतीय संपर्क के लिए हमें भारतीय वंश की ही एक ऐसी भाषा की जरूरत है जिसे अधिकांश लोग तो पहले से ही जानते और समझते हों और जिसे दूसरे लोग आसानी से सीख ले सकें। यह भाषा, निर्विवाद रूप में, हिंदी ही है। उत्तर में तो हिंदू-मुसलमान दोनों ही उसे बोलते और समझते हैं। उर्दू लिपि में लिखे जाने पर यह उर्दू कहलाती है। कांग्रेस ने 1925 के कानपुर अधिवेशन में पास किए गए अपने सुविख्यात प्रस्ताव में उस अखिल भारतीय बोली को हिंदुस्तानी का नाम दिया था और तब से, हिंदुस्तान, कम से कम सिद्धांत रूप में, राष्ट्रभाषा हो चुकी है। ‘सिद्धांत रूप में’ इसलिए कह रहा हूं कि कांग्रेसजनों ने भी इस पर वैसा अमल करके नहीं दिखाया है जैसा उन्हें करना चाहिए था। आम जनता की राजनीतिक शिक्षा के लिए भारतीय भाषाओं का महत्व स्वीकार करने का एक सुविचारित प्रयत्न 1920 में ही किया गया था और साथ ही एक अखिल भारतीय आम बोली को भी मान्यता देने के लिए, जिसे कि राजनीति में दिलचस्पी लेने वाला भारत आसानी से बोल सके और जिसे विभिन्न प्रांतों के कांग्र्रेसजन कांग्रेस की अखिल भारतीय बैठकों के समय समझ सकें। ऐसी राष्ट्रभषा बन जाने से हम, दोनों ही रूपों में इस बोली को समझ और बोल सकेंगे और दोनों ही लिपियों में इसे लिख सकेंगे।

मुझे अफसोस के साथ यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है कि कितने ही कांग्रेसजनों ने इस प्रस्ताव पर अमल नहीं किया है। और मैं समझता हूं कि इसीलिए हमें यह शर्मनाक नजारा देखने को मिल रहा है कि कांग्रेसजन ही अंग्रेजी बोले जाने के पक्ष में जोर डाल रहे हैं और अपनी सुविधा के लिए दूसरों को भी ऐसा करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। अंग्रेजी ने हम पर अपना जादू डाल रखा है वह अभी भी कायम है। उसी के असर में हम भारत को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने से रोक रहे हैं। अंग्रेजी सीखने के लिए हमने जितने साल खर्च किए हैं, उतने महीने भी अगर हम हिंदी सीखने के लिए देने को तैयार नहीं हैं। उतने महीने भी अगर हम हिंदी सीखने के लिए देने को तैयार नहीं है तो फिर मानना पड़ेगा कि आम जनता के लिए हमारा प्रेम हमारे बदन के चमड़े को छूकर रह गया है, अंदर नहीं घुस पाया है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-65.

51.     राज्यों का भाषावार विभाजन

कांग्रेस तो इस सिद्धांत को (भाषा के आधार पर प्रांतों के पुनर्विभाजन के) पहले ही स्वीकार कर चुकी है और अपना यह इरादा जाहिर कर चुकी है कि सत्ता प्राप्त होते ही वह संवैधानिक तौर पर इसे कार्यान्वित कर देगी। इस प्रकार यह पुनर्विभाजन देश की सांस्कृतिक प्रगति के लिए लाभदायक होगा। पर इस तरह का पुनर्विभाजन भारत की जीवात्मक अविभाज्यता को खंडित करने वाला नहीं होना चाहिए। स्वायत्त शासन का मतलब विघटन नहीं होता और न ही होना चाहिए और न यही कि प्रांतों को इसकी प्राप्ति से एक-दूसरे की, और केंद्रीय सत्ता की, उपेक्षा करके बिल्कुल मनमानी करने की छूट मिल जाएगी। हर प्रांत अगर अपने को बिल्कुल पृथक और प्रभुसत्ता-सम्पन्न इकाई के रूप में मानने लग जाए, तब तो भारत की स्वाधीनता का कुछ मतलब ही नहीं रहेगा और उसके साथ-साथ उन इकाइयों की स्वाधीनता भी हवा में उड़ जाएगी।….बाहर की दुनिया हमें गुजराती, महाराष्ट्रीय, तमिल आदि के रूप में नहीं, बल्कि केवल भारतीय के रूप में ही जानती है।

इसलिए हमें उन सारी प्रवृत्तियों का दृढ़तापूर्वक निवारण करना पड़ेगा, जिनसे हमारे बीच टुकड़े होते हैं और भारतीयों की नाईं ही आचरण करना होगा। इस सर्व-प्रमुख भावना को ध्यान में रखते हुए प्रांतों का पुनर्विभाजन होने से शिक्षा और व्यापक को बढ़ावा ही मिलेगा।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-66.

आर्थिक समानता-गांधी का भारत

52.     जनता के साथ तादाम्य

कांग्रेस को अधिकाधिक आम जनता का प्रतिनिधित्व करने जाना है। आम जनता अभी भी राजनीति से दूर है। उनके अंदर उस ढंग की राजनीतिक चेतना नहीं है, जैसी हमारी राजनीतिज्ञ चाहते हैं। उनकी राजनीति रोटी और नमक तक ही सीमित है-मक्खन की तो बात ही उठाना फिजूल है, क्योंकि करोड़ों को तो घी का, या तेल तक का स्वाद भी नहीं मालूम। उनकी राजनीति जात-बिरादरी के मामलों की ही चौहद्दी के अंदर रह जाती है, लेकिन यह कहना ठीक है कि जहां तक सरकार के विरोध का सवाल है, हम राजनतिज्ञ ही आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, पर अगर हम उन्हें तैयार किए बिना ही उनका इस्तेमाल करना शुरू कर देंगे तो हम उनके प्रतिनिधि नहीं रह जाएंगे। उनके लिए और उनके बीज काम करते हुए हमें पहले उनके सच्चे संपर्क में आना है। हमें उनके दुख-दर्द को समझना है, उनकी कठिनाइयों को जानना है और उनकी जरूरतों का पता लगाना है। भंगियों के साथ हमें भंगी ही हो जाना है और खुद यह अनुभव करके देखना है कि उच्च वर्गों के शौचगृहों को साफ करते वक्त और जब उनकी जूंठन की बची-खुची चीजें हमारे खाने के लिए दूर से हमारी और फैंकी जाती हैं, तब हमें कैसा लगता है। हमें अनुभव करके देखना होगा कि बंबई के मजदूरों के संदूक-जैसे घरों में रहना हमें कैसा लगता है। हमें गांवों के किसानों के साथ एक होना होगा जो तेज चिलचिलाती धूप में हलों पर झुके काम करते ही रहते हैं, उनके साथ-सथ उन्हीं तालाबों का पानी पीकर, उनके ढोर भी न सिर्फ पानी पीते हैं, बल्कि उनमें लोटपोट भी करते रहते हैं, देखना होगा कि यह सब हमें कैसा लगता है। तभी और सिर्फ तभी, आम जनता के सच्चे प्रतिनिधि बन सकेंगे और त बवह भी, मुझे इसमें रत्ती भर शक नहीं है, हमारी आवाज पर उठ खड़ी होगी।

कुछ लोग कहेंगे-‘यह सब हम नहीं कर सकते और अगर हमें यही सब करना है, तब तो स्वराज्य को दूर से नमस्कार है-ईश्वर करे, हजारों साल त कवह हमारे नजदीक भी न फटकने पाए।’ इस एतराज के साथ मेरी हमदर्दी होगी। पर मेरा यह दावा जरूर है कि हममें से कुछ को तो हर हालत में इस यंत्रणा में होकर गुजरना ही होगा और इसी यंत्रणा में से गुजर कर वह राष्ट्र जन्म ले पाएगा जो भरा-पूरा होगा, जोरदार होगा और स्वाधीन होगा। मैं सभी लोगों से कहना चाहता हूं कि वे इसको अपना मानसिक सहयोग दें और मानसिक तौर पर तो आम जनता के साथ तादाम्य महसूस करें ही और इसके प्रत्यक्ष और स्थूल प्रमाण के रूप में, उनके नाम पर और उन्हीं के लिए, कम-से-कम तीस मिनट रोज तो लगन के साथ चरखा चलाएं ही। भारत के हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई और दूसरे लोगों के बीच जो पढ़े-लिखे लोग हैं, उनकी ओर से एक प्रकांड प्रार्थना बनकर यह उनकी या दूसरे शब्दों  में भारत की ही मुक्ति के लिए आकाश की ओर उठकर परमात्मा तक जा पहुंचेगी।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-68.

53.     आर्थिक स्वाधीनता

स्वराज्य की मेरी धारणा के बारे में किसी को कोई भ्रम न रहे। वह है बाहरी नियंत्रण से पूर्ण स्वाधीनता और पूर्ण आर्थिक स्वाधीनता। इस प्रकार, एक छोर पर है राजनीतिक स्वाधीनता और दूसरे पर आर्थिक। इसके दो छोर और भी हैं जिनमें से एक छोर नैतिक और सामाजिक है और उसी का दूसरा छोर है धर्म-इस शब्द के उत्कृष्टतम अर्थ में इसमें हिंदुत्व, इस्लाम, ईसाई मजहब आदि सभी का समावेश है, पर यह उन सबसे ऊंचा है। आप इसे सत्य के नाम से भी पहचान सकते हैं-इष्टसिद्धि के लिए अपनाई जाने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि जीवंत सत्य जो सर्वव्यापी, अविनाशी और अपरिवर्तनीय है। नैतिक और सामाजिक उत्थान का आशय व्यक्त करने वाला हमारा शब्द तो अहिंसा है ही। हम इसे स्वराज्य का चतुष्कोण कह सकते हैं, जिसका एक भी कोना ठीक न रहने से वह बिगड़ जाएगा। कांग्रेस की भाषा में कहें तो हम यह राजनीतिक और आर्थिक स्वाधीनता तब तक नहीं पा सकते, जब तक कि सत्य और अहिंसा में या अधिक स्पष्ट भाषा में कहा जाए तो ईश्वर में और फलस्वरूप नैहितक और सामाजिक उत्थान में भी हमारी हार्दिक आस्था न हों

राजनीतिक स्वाधीनता से मेरा आशय यह नहीं है कि हम ब्रिटिश हाउस आव कामंस (अंग्रेजों की लोकसभा) की ही कोरी नकल कर लें या सोवियत रूस के शासन की या इटली के फासिस्टट अथवा जर्मनी के नाजी राज की। उनकी शासन पद्धतियां उनकी अपनी ही विशिष्टता के अनुरूप हैं। हमारी शासन-पद्धति हमारी ही विशिष्टता के अनुरूप् होगी। पर वह क्या होगी यह बता सकना मेरी सामर्थ्य के बाहर है। मैंने इसका वर्णन राम-राज के रूप में किया है अर्थात् आम जनता की प्रभु-सत्ता, जिसका आधार विशुद्ध रूप से नैतिक ही होग। कांग्रेस के नागपुर और बंबई वाले विधान, जिनका मुख्य दायित्व मुझी पर है, इस प्रकार के स्वराज्य को प्राप्त करने के ही प्रयास हैं।

अब आर्थिक स्वाधीनता को लें। यह आधुनिक या पाश्चात्य किस्म के औद्योगिकरण की उपज नहीं है। मेरे लिए तो भारतीय आर्थिक स्वाधीनता का अर्थ हर व्यक्ति का आर्थिक उत्थान है-हर पुरुष और स्त्री का और उनके अपने ही जागरूक प्रयत्नों द्वारा। इस पद्धति के अंतर्गत हर पुरुष और स्त्री के लिए पर्याप्त वस्त्र उपलब्ध रहेंगे-सिर्फ कमर में लपेटने भर के लिए कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि पहनने के जरूरी कपड़ों से जो कुछ समझा जाता है, वह सब-और र्प्याप्त खुराक, जिसमें दूध और मक्खन भी शामिल होंगे, जो आज करोड़ों को नसीब नहीं होते।

इससे समाजवाद की बात आ जाती है। सच्चा समाजवाद तो हमें अपने पुरखों से मिलता आया है, जिन्होंने हमें सीख दी थी: ‘सभी भूमि गोपाल की है, तब फिर सीमा वाली रेखा कहां है? मनुष्य ने ही वह रेखा खींची है और इसलिए वह उसे मिटा भी सकता है।’ गोपाल का शाब्दिक अर्थ है गायों को पालने वाला, उसका अर्थ ईश्वर भी है। आधुनिक भाषा में उसका मतलब  है राज्य, अर्थात जनता। आज भूमि पर जनता का अधिकार नहीं है इसमें संदेह नहीं। पर इसके लिए उस सीख को तो दोष दिया नहीं जा सकता। दोष हमारे अंदर है कि हम उस सीख पर चल नहीं सके।

मुझे  इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस दिशा में हम किसी भी दूसरे देश जैसे बड़े कदम उठा सकते हैं-यहां तक कि सोवियत रूस जैसे भी और सो भी बिना हिंसा का आश्रय लिए ही। अपने संपूर्णा निहितार्थ में, चरखा ही, हिंसात्मक ढंग से सत्ता छीनने के तरीके का सबसे अधिक प्रभावशाली विकल्प है। जमीन और सारी ही संपति उसकी है तो उसका इस्तेमाल करे। दुर्भाग्यवश, श्रमिकों को इस सीधीसादी बात का या तो पता नहीं है और या उन्हें इस संबंध में अंधेरे में ही रखा गया है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-69.

54.     ऊपर छंटाई, नीचे भराई

आर्थिक समानता के लिए काम करने मतलब है पूंजी और श्रम के बीच के शाश्वत संघर्ष का अंत करना। इसका मतलब जहां एक और यह है कि जिन थोडे़ से अमीरों के हाथ में राष्ट्र की संपदा का कहीं बड़ा अंश केंद्रीभूत है। उनके उतने ऊंचे स्तर को घटाकर नंगे रहने वाले करोड़ों का स्तर ऊंचा किया जाए। अमीरों और करोड़ों भूखे लोगों के बीच की यह चौड़ी खाई जब तक कायम रही आती है, तब तक तो इसमें कोई संदेह ही नहीं कि अहिंसात्मक पद्धति वाला शासन कायम हो ही नहीं सकता। स्वतंत्र भारत, जहां कि गरीबों के हाथ में उतनी ही शक्ति होगी, जितनी देश के बड़े-से-बड़े अमीरों के हाथ में, वैसी विषमता तो एक दिन के लिए भी कायम नहीं रह सकती जैसी कि नई दिल्ली के महलों और यहीं नजदीक की उन सड़ी-गली झोंपड़ियों के बीच पाई जाती है, जिनमें मजदूर वर्ग के गरीब लोग रहते हैं। हिंसात्मक और खूनी क्रांति एक दिन होकर ही रहेगी, अगर अमीर लोग अपनी संपति और शक्ति का स्वेच्छापूर्वक त्याग नहीं करते और सबों की भलाई के लिए उसमें हिस्सा नहीं बंटाते।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-71.

55.     अधिकार नहीं, कर्तव्य पर जोर

हमारे समाज में आज जो एक बड़ी बुराई घर कर गई है, उसके बारे में मैं कुछ कहना चाहता हूं। पूंजीपति और जमींदार तो अपने अधिकारों की बात करते हैं, मजदूर अपने अधिकारों को, राजे-महाराजे शासन करने के अपने ईश्वर-दत्त अधिका की और किसान उनका विरोध करने के अधिकार की। अगर सभी का जोर सिर्फ अपने अधिकारों पर रहे, कर्तव्य पर नहीं, तब तो चचारों ओर सिवा अस्तव्यस्तता और अव्यवस्था के और हो ही क्या सकता है?

अपने अधिकारों पर ही जोर न देकर, अगर सभी लोग अपना-अपना कर्तव्य निभाने लग जाएं तो उसी दम मानव समाज के अंदर व्यवस्था का राज कायम हो जाए। यह नहीं हो सकता कि राजों-महाराजों को तो शासन करने का ईश्वर-दत्त अधिकार प्राप्त रहे और किसान नम्रता और अदब के साथ मालिकों का हुक्म बजाते चले जाएं। यह जरूर ठीक है कि से वंशानुगत विषमताएं दूर होनी चाहिए, क्योंकि समाज के कल्याण की दृष्टि से ये हानिकर हैं पर साथ ही उसी कल्याण की दृष्टि से, यह बात भी, अगर और अधिक नहीं तो कम हानिकर नहीं है कि अब तक पददलित रहते आने वाले इन करोड़ों लोगों के अधिकार की आवाज बेशर्मी के साथ बुलंद की जाए। संभव है, इसके पीछे कोई चालाकी की बात हो जिसके फलस्वरूप ज्यादा नुक्सान इन करोड़ों का ही होने वाला हो, न कि उन थोड़े-से लोगों का, जो ईश्वर-दत्त अथवा अन्य प्रकारों के, अधिकारों का दावा करते आ रहे हैं। ये थोड़े-से लोग भले ही बहादुरी की या कायर की ही, मौत मर जाएं, पर इससे थोड़े ही वह व्यवस्था कायम हो सकेगी, जिसमें यह जरूरी है कि अधिकाों और कर्तव्य के बीच के अन्योन्य संबंध को हम ठीक से समझ लें। मैं तो साहस के साथ अपना यह विचार प्रकट करना चाहता हूं कि उन अधिकारों की कोई कीमत ही नहीं है जिनका सीधा स्रोत कर्तव्य नहीं है-निष्ठापूर्वक निभाया जाने वाला कर्तव्य, उन्हें तो अधिकार नहीं अपहरण माना जाएगा और उनका जितनी जल्दी त्याग कर दिया जाए, उतना ही अच्छा। अपने बच्चों के प्रति अपना कर्तव्य निभाए बिना ही जो नीच मां या बाप उनसे आज्ञापालन कराने पर तुल जाता है वह अपनी अवज्ञा के सिवा कुछ नहीं करा सकता। कोई दुराचारी पति अगर धर्म के नाम पर अपनी कर्तव्यपरायण स्त्री को हर मामले में दबाना चाहता है तो वह धर्मशास्त्र के वचनों की तोड़-मरोड़ करता है। पर अपने बच्चों के प्रति अपना धर्म निभाने के लिए हरदम तैयार माता या पिता की जो बच्चे अवज्ञा करते हैं, उन्हें कृतघ्न ही कहा जाएगा और ऐसा करने से जितना नुक्सान माता या पिता का होगा, उससे ज्यादा खुद उन्हीं का। यही बात पति-पत्नी के संबंध में भी कही जा सकती है। इस सीधे-सादे और सार्वभौम सिद्धांत को अगर आप मालिकों और मजदूरों पर, जमींदारों और काश्तकारों पर, राजाओं और उनकी प्रजा पर या हिंदुओं और मुसलमानों पर लागू करें तो आप देखेंगे कि जीवन में और कामकाज में, कोई भी बाधा डालने बिना और उन्हें अव्यवस्थित किए बगैर ही, जैसा कि आप भारत में और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी देा रहे हैं, जिंदगी के हर क्षेत्र में मीठे-से-मीठे संबंध कायम किए जा सकते हैं। मैं जिसे सत्याग्रह धर्म कहता हूं, उसका स्रोत तो कर्तव्य का सम्मान और उनसे उत्पन्न होने वाला अधिकार ही है।

अपने मुस्लिम पड़ोसी के प्रति किसी हिंदू का कर्तव्य क्या है? उसका कर्तव्य उसे मनुष्य के नाते अपना मित्र बनाना, उसके सुख-दुख में हिस्सा बंटाना और उसकी मुसीबतों में उसे सहारा देना है। तब उसे यह अधिकार मिलेगा कि अपने मुस्लिम पड़ोसी से वह वैसे ही सबक की उम्मीद करे और संभवतः उसकी आशा पूरी ही होगी। समझ लीजिए कि किसी गांव में हिंदुओं की संख्या काफी ज्यादा है और उनके बीच जहां-तहां थोडे-बहुत मुसलमान भी बसे हुए हैं। यहां के इन थोड़े से मुसलमान पड़ोसियों के प्रति बहुसंख्यक हिंदुओं का कर्तव्य कई गुना बढ़ जाता है-इस हद तक कि अल्पसंख्यकों को यह महसूस ही न हो कि उनके प्रति हिंदुओं के व्यवहार में धर्म के कारण कुछ भी फर्क पड़ रहा है। हिंदुओं को तब यह आशा करने का अधिकार प्राप्त होगा, पहले नहीं कि मुसलमान उनके प्राकृतिक मित्र बन जाएं और किसी संकट के समय दोनों ही संप्रदाय एक व्यक्ति की तरह एक होकर मुकाबला करें। पर समझ लीजिए कि अल्पसंख्यक मुसलमान बहुसंख्यक हिंदुओं के उचित व्यवहार के बदले वैसा ही व्यवहार न कर बात-बात पर झगड़ा करते हैं तो यह तो उनकी नामर्दी का ही लक्षण होगा। तब बहुसंख्यक हिंदुओं का कर्तव्य क्या होगा? यह कदापि नहीं कि अपनी संख्या के पशु-बल से उन्हें दबा दें, वह तो अनर्जित अधिकार को हड़पने जैसा ही होगा। उनका कर्तव्य यह होगा कि नामर्दी के उनके बरताव का वे उसी तरह मुकाबला करें, जिस तरह अपने सगे भाई का वैसा बरताव होने पर करते। इस सिद्धांत पर और ज्यादा विस्तार से कुछ कहने की जरूरत नहीं है। मैं इसे यहां इतना ही कह कर खत्म करूंगा कि इससे उलटी स्थिति रहने पर भी ठीक यही बात लागू होगी। मैंने जो कुछ कहा है उसे आसानी से आज की स्थिति पर लागू किया जा सकता है, जो इसलिए इतनी परेशानी पैदा कर रही है कि अपने कर्तव्य को ठीक से पूरा करके ही हर अधिकार को अर्जित करने के सिद्धांत पर लोग अमल नहीं कर रहे हैं।

यही सिद्धांत राजों-महाराजों और उनकी प्रजा पर लागू होता है। इनमें से प्रथम का कर्तव्य यह है कि प्रजा के सच्चे सेवकों की तरह काम करें। उन्हें किसी बाहरी ताकत द्वारा दिए गए अधिकार से शासन नहीं करना है और तलवार के बल मिलने वाले अधिकार से तो किसी भी हालत में नहीं। उन्हें सेवा के अधिकार से, ज्यादा समझदार होने के अधिकार से, शासन करना है। तभी उन्हें स्वेच्छापूर्वक दिए गए करों को उगाहने का अधिकार मिलेगा और तभी वह अपनी प्रजा से यह आशा कर सकेंगे कि वह उतनी ही खुशी के साथ, स्वेच्छापूर्वक, उन्हें अपनी भी कुछ सेवाएं अर्पित करें, किंतु इन सेवाओं की भी कामना वे अपने लिए नहीं, बल्कि उन लोगों की खातिर कर सकेंगे जो उनके संरक्षण में है। अगर अपने इस सरलन और प्रारंभिक कर्तव्य का पालन करने से भी वे चूकते हैं तो उनके प्रति किसी प्रकार का कर्तव्य निभाने का दायित्व तो उनकी प्रजा पर नहीं ही रहता, उलटे उन राजों-महाराजों की हड़प-नीति का विरोध करना ही उनका कर्तव्य बन जाता है। इसे दूसरे ढंग से यों कहा जा सकता है कि उस हड़प-नीति और कुशासन का विरोध करने का अधिकार प्रजा अर्जित कर लेती है। पर अगर यह विरोध हत्या, लूटमार और डाकाजनी का रूप ले ले, तब तो, कर्तव्य की दृष्टि से, यह मानव-समाज के विरुद्ध अपराध समझा जाएगा। कर्तव्य पालन से जो शक्ति प्राकृतिक रूप में उत्पन्न होती है, वह सत्याग्रह द्वारा प्राप्त अहिंसात्मक शक्ति है, जो अजेय है।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-71.

कुछ स्मरणीय सूक्तियां-गांधी का भारत-गांधी का भारत

  1. हमें ये सारी बातें भुला देनी हैं कि ‘मैं हिंदू हूं, तुम मुसलमान हो’, या ‘मैं गुजराती हूं, तुम मद्रासी हो।’ ‘मैं’ और ‘मेरा’ को हमें भारतीय राष्ट्रीयता की भावना के अंदर डुबो देना है। हम आजाद तभी होंगे, जब एक ही साथ जीने या मरने का निश्चय करने वालों की काफी बड़ी संख्या तैयार हो जाएगी।
  2. मेरे धर्म की भौगोलिक सीमाएं हैं ही नहीं। उसमें मेरी आस्था सच्ची है तो भारत के लिए जो मेरा प्रेम है, उसे भी वह पार कर पाएगी।
  3. मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के चारों ओर दीवारें खड़ी कर दी जाएं और मेरी खिड़कियों से आने वाली हवा रोक दी जाए। मैं चाहता हूं कि सभी देशों की संस्कृतियों के झोंके मेरे घर के चारों ओर ज्यादा से ज्यादा आजादी के साथ आते रहें। पर उनमें से किसी के भी झोंके के साथ उड़ जाने को मैं खुद कतई तैयार नहीं। घुसपैठिये की तरह या भिखारी की तरह अथवा गुलाम की तरह, किसी दूसरे के घर में रहने को मैं राजी नहीं हूं।
  4. मेरा धर्म कैदखाने का धर्म नहीं है। परमात्मा की सृष्टि के तुच्छातितुच्छ के लिए भी उसमें जगह है। पर उसमें गुस्ताखी की या जातिगत, धर्मगत अथवा वर्णत अभिमान की गुंजाइश नहीं है
  5. ईश्वर का दर्शन हमें कुरान, बाइबल, तालमूद, अवस्थ या गीता के अलग-अलग माध्यमों से होता है-इसलिए क्या हमें एक-दूसरे से झगड़ना चाहिए और ईश्वर की ही निंदा करनी चाहिए? जो सूरज हिमालय पर्वत पर चमकता है, वही मैदानों पर। क्या मैदान के लोगों को बर्फ पर रहने वालों के साथ झगड़ना होगा कि सूरज का ताप एक जगह ज्यादा अैर दूसरी जगह कम क्यों है? विभिन्न ग्रंथों और सिद्धांतों को हम अपने ही को जकड़ देने वाली इतनी सारी बेड़ियों के रूप में क्यों परिणम कर डालें, जबकि उन्हें हम अपनी मुक्ति का और हृदयों के मिलन का साधन बना सकते हैं।
  6. सारी दुनिया का मुकाबला करके भी, पर किसी से शत्रुता करके नहीं, भारत को अपने बुनियादी उद्योगों की रक्षा करनी ही होगी। हिंसात्मक राष्ट्रवाद तो, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, अभिशाप ही है। अहिंसात्मक राष्ट्रवाद सामूहिक या सभ्य जीवन की एक आवश्यक शर्त है।
  7. इस्लाम को मैं उसी रूप में शांति चाहने वाला धर्म मानता हूं, जिस रूप में ईसाई, बौद्ध और हिंदू-धर्म को। निस्संदेह इनके बीच मात्रा-भेद तो है, पर इन सभी धर्मों का लक्ष्य शांति ही है।
  8. राष्ट्रीयता की सबसे खरी परीक्षा तो आखिर यही है न, कि अपने परिवार के ही पांच-छह व्यक्तियों या अपनी जाति अथवा वर्ग के ही सौ-एक आदमियों की चिंता न कर, हम उस समूह का हित, जिसे हम अपना राष्ट्र कहते हैं, बिल्कुल इस तरह देखें, मानो वह हमारा अपना ही व्यक्तिगत हित है।
  9. शास्त्रों की रचना उस उद्देश्य से कदापि नहीं हुई थी कि तर्क का गला ही घोंट दिया जाए, वे उसके पूरक के ही रूप में रहे हैं और अन्याय या असत्य के समर्थन में उनकी दुहाई कदापि नहीं दी जा सकती।
  10. यह बात उठाई गई है कि भारतीय स्वराज्य बहुसंख्यक संप्रदाय का, यानी हिंदुओं का, राज होगा। इससे बड़ी गलती और कुछ हो नहीं सकती। अगर यह बात सच हो तो कम-से-कम मैं तो उसे स्वराज्य मानने से इंकार कर दूंगा और अपनी सारी ताकत लगाकर उसके विरुद्ध संघर्ष करूंगा, क्योंकि मेरी धारणा वाला हिंद-स्वराज समूची जनता का राज है, न्याय का राज है। उस राज के मंत्री चाहे हिंदू हों या मुसलमान या सिख और उसके विधान मंडल चाहे एकमात्र हिंदुओं से, या मुसलमानों से या किसी दूसरे ही संप्रदाय के लोगों से पूरी तरह भर जाएं, फिर भी उन्हें चलना तो निष्पक्ष न्याय के ही मार्ग पर होगा।
  11. मैं भारत का एक विनम्र सेवक हूं और भारत की सेवा करने के प्रयत्न में मैं सारे मानव-समाज की ही सेवा कर रहा हूं। मैंने अपने प्रारंभिक जीवन में ही यह आविष्कार किया था कि भारत की सेवा का मानव-समाज मात्र की सेवा से कोई विरोध नहीं है। जैसे-जैसे मेरी अवस्था बढ़ती गई और मैं तो आशा करता हूं कि मेरी समझदारी भी, वैसे-वैसे मैं यह महसूस करता गया कि मेरा वह आविष्कार सही ही था और लगभग पचास वर्ष के सार्वजनिक जीवन के बाद मैं आज यह कहने की स्थिति में हूं कि इस सिद्धांत में कि अपने राष्ट्र की सेवा का विश्व की सेवा के साथ कोई विरोध नहीं है, मेरी आस्था दृढ़ ही होती गई है। यह एक बढ़िया सिद्धांत है। एकमात्र इसे ही स्वीकार करने से संसार का आज का तनाव ढीला पड़ सकेगा और हमारे इस पृथ्वी मंडल को आबाद करने वाले राष्ट्रों के आपसी ईर्ष्या-द्वेष दूर होंगे।
  12. मेरे हिंदुत्व में सांप्रदायिकता नहीं है। इस्लाम, ईसाई, बौद्ध और ज़रथुस्त्र धर्मों में मैं जो कुछ सर्वोत्तम पाता हूं, उस सबका इसमें समावेश है। इन सभी क्षेत्रों की भांति, राजनीति के प्रति भी, मेरा दृष्टिकोण धार्मिक ही है। सत्य मेरा धर्म है और अहिंसा उसकी प्राप्ति का एकमात्र साधन।
  13. स्वयं गुरुदेव अंतर्राष्ट्रवादी हैं, क्योंकि वह सही मायने में राष्ट्रवादी हैं।
  14. हम अपने को अपनी संपति का स्वामी नहीं ट्रस्टी ही मान सकते हैं और समाज की सेवा के लिए ही उसका इस्तेमाल कर सकते हैं-अपने लिए सिर्फ उतना ही लेते हुए जितना हमारी सेवाओं के बदले उचित रूप में लिया जा सकता है। इस व्यवस्था में न कोई अमीर रह जाएगा, न गरीब। सभी धर्म समान माने जाएंगे। धर्म, जाति या आर्थिक शिकायतों से पैदा होने वाल सभी झगड़े, जो इस पृथ्वी की शांति को भंग कर रहे हैं, बंद हो जाएंगे।
  15. धर्म वह है जो धर्मशास्त्रों में बताया गया है, जिस पर ऋषि-मुनि चलते आए हैं, विद्वान पंडितों ने जिसकी व्याख्या की है और जो दिल को छूता है। यह चौथी शर्त तभी लागू होती है, जब पहली तीन शर्तें पूरी की जा चुकी हों। इस प्रकार, किसी अज्ञानी पुरुष या किसी बदमाश की कही हुई कोई बात हमारे दिल को अगर पसंद भी जाए, तब भी हमें उस पर चलने का अधिकार नहीं है। धर्म की व्यवस्था देने का अधिकार उसी व्यक्ति को प्राप्त हो सकता है, जिसने कम-से-कम, दूसरे की कोई क्षति न पहुंचाने की, शत्रु-भाव न रखने की और वैराग्य की, साधना कर ली हो।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-75.

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