निजी स्कूल शिक्षा के प्रति बढ़ रहा असंतोष

दीपक राविश

किसी भी जागरूक एवं विकासशील समाज को शिक्षा-व्यवस्था पर लगातार विचार-विमर्श करते हुए से धारदार बनाने के प्रयास करते रहने चाहिएं। किसी समाज की शिक्षा-व्यवस्था जितनी चुस्त-दुरुस्त तथा समाजपयोगी होगी, वह समाज उतना ही सुखी तथा समृद्ध होगा। हरियाणा के स्कूलों में वर्तमान-सत्र का आरंभ पिछले सत्रों की अपेक्षा हलचल भरा रहा। समाचार-पत्रों में भी लगभग प्रतिदिन इस संबंध में कुछ समाचार पढऩे को मिले। हरियाणवी समाज के लिए ये शुभ संकेत माने जा सकते हैं। स्कूली शिक्षा पर विचार-विमर्श की कम से कम एक शुरुआत तो हुई। समाज की सोच में आ रहे इस परिवर्तन के कारणों की पड़ताल करने तथा शिक्षा पर चल रहे इस विमर्श के महत्व को रेखांकित करने की आवश्यकता है।

हरियाणा में सन् 1990 के आसपास  उदारीकरण की नीतियों तथा कुछ अन्य कारणों से निजी स्कूलों की तरफ लोगों का रूझान बढऩा आरंभ हुआ। शिक्षा के प्रति सरकारों के उदासीन रवैये तथा सरकारी स्कूलों में कार्यरत अध्यापकों के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने निजी स्कूलों को फलने-फूलने में काफी मदद की। एक तरफ सरकारों ने जहां शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को हाशिए पर रखा, वहीं दूसरी तरफ सरकारी अध्यापकों ने भी वेतन को सुरक्षित आय का साधन समझ कर आमदनी के अन्य साधनों की ओर रूझान करना आरंभ कर दिया। ये कटु सत्य है कि सरकारी स्कूलों में कार्यरत अध्यापक भैंसों के व्यापार, प्रोपर्टी डीलिंग, ठेके पर जमीनें लेकर खेती तथा छोटी-मोटी दुकानदारी जैसे व्यवसायों में लिप्त रहे। इन कामों को करने के लिए वे  स्कूल मुखियाओं से सांठगांठ करके स्कूलों से नदारद रहने लगे। अपने राजनीतिक रुतबे को बढ़ाने के लिए नेताओं की हाजिरी लगाने हेतु सरकारी स्कूलों से अध्यापकों का नदारद रहना भी आम बात थी।

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के समाप्त होते-होते सरकारी स्कूल खाली होने लगे तथा निजी स्कूल छात्रों से भर गए। सरकारी स्कूलों में सिर्फ समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के छात्र रह गए। सरकारी शिक्षा के विकल्प के तौर पर उभरी निजी शिक्षा की सीमाएं भी कालांतर में स्पष्ट होने लगी हैं। आधे-अधूरे मूलभंत ढांचे  के होते हुए भी राजनीतिक पहुंच या भ्रष्टाचार के सहारे निजी स्कूल मान्यता लेने में सफल हो गए। कोई भी पूंजीवादी व्यवस्था, अधिक काम तथा कम वेतन को अपना ब्रह्म वाक्य मानती है। अधिकतर निजी स्कूल गैर शैक्षिक पृष्ठभूमि के लोगों द्वारा संचालित हैं। इनमें अधिकतर ठेकेदार, व्यापारी या राजनीतिक पृष्ठभूमि से हैं।

वस्तुओं के उत्पादन के मुकाबले शिक्षा एक संवेदनशील मामला है जो गहरी समझ की मांग करता है। गैर शैक्षिक पृष्ठभूमि से होने के कारण निजी स्कूलों के संचालक शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र की नाजुकता को समझने में असमर्थ रहे। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकतर निजी स्कूलों में शिक्षकों को बेहद मामूली वेतन मिलता है, जबकि उनको लगभग सभी पीरियड लेने पड़ते हैं। ऐसे में शिक्षक न तो वेतन के मामले में संतुष्ट होते हैं और न ही उन्हें उचित आराम मिल पाता है। काम की अधिकता के कारण वे मानसिक रूप से परेशान भी रहते हैं। निजी स्कूलों के संचालकों से उन्हें वैसा मान-सम्मान भी नहीं मिल पाता, जैसा कि किसी शिक्षक को मिलना चाहिए। विद्यार्थियों के सामने ही संचालकों द्वारा उन्हें अपमानित कर देना भी आम बात है। सब मिलाकर निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली किसी भी प्रकार से ज्ञान के हस्तांतरण के लिए पोषक नहीं बन पायी।

निजी स्कूल समय-समय पर की जाने वाली वृद्धि से अभिभावकों की जेबें तो ढीली करते रहे, परन्तु शिक्षा के स्तर में समुचित सुधार करने में असफल रहे। समय-समय पर सरकार द्वारा की जाने वाली भर्तियों के कारण योग्य तथा मेधावी शिक्षकों के सरकारी क्षेत्र में चले जाने से निजी स्कूलों को योग्य शिक्षक भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाए। ऐसे युवा जिनका चयन सरकारी अध्यापक के तौर पर नहीं हुआ। उन्होंने बेहद मामूली वेतन होने के कारण निजी स्कूलों में पढ़ाने की रोजगार के अन्य विकल्पों जैसे बीमा, कृषि या दुकानदारी को अपनाना बेहतर समझा। आज हरियाणा में मजदूर को दिहाड़ी के चार सौ रुपए आसानी से मिल जाते हैं। वहीं अधिकांश निजी स्कूलों में शिक्षकों को पांच हजार रुपए महीने से अधिक नहीं मिल पाते।

वर्तमान समय में निजी स्कूल शिक्षा के प्रति बढ़ रहे असंतोष के दो मुख्य तात्कालिक कारण हैं। पहला समय-समय पर की जाने वाली फीस वृद्धियों से अभिभावकों पर आर्थिक बोझ निरंतर बढ़ रहा है। दूसरा निजी स्कूलों को सरकारी स्कूलों के विकल्प के तौर पर हाथों-हाथ लेने वाले अभिभावकों में शिक्षा के प्रति समझ बढ़ी है। इन अभिभावकों ने निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा परोसी जा रही शिक्षा का विश्लेषण करना आरंभ किया तो उन्हें निराशा हाथ लगी। यहां यह बात स्पष्ट कर देनी आवश्यक है कि निजी स्कूलों के स्वरूप में भी पर्याप्त भिन्नताएं हैं। परन्तु इनमें प्रमुखता गांवों तथा कस्बोंं में चल रहे स्कूलों की है। इन स्कूलों में ही निजी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों की संख्या 80 प्रतिशत के आसपास है।

किसी राष्ट्र के नौनिहालों के लिए बेहतर शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। चाहे वो निजी हो या सरकारी। सन् 1966  में अस्तित्व में आया हरियाणा अपनी स्वर्ण जयंती मना रहा है। परन्तु बड़े खेद का विषय है कि निजी तथा सरकारी दोनों तरह की शिक्षा प्रणालियां प्रांत के नौनिहालों के लिए बेहतर शिक्षा की व्यवस्था करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं हैं। देश के अन्य प्रांतों की स्थिति भी हरियाणा से भिन्न नहीं है। निजी स्कूली शिक्षा में अन्य खामियों के अलावा सबसे बड़ी दिक्कत ये है वो सर्वसुलभ नहीं हो सकती। निजी शिक्षा प्रणाली में समाज में हाशिए पर रह रहे लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है।

सम्पर्क-9802583881

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।

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