सामंती व्यवस्था से टकराता साहित्यकार

  बी. मदन मोहन,    प्रस्तुति—विकास साल्याण

तीसरे हरियाणा सृजन उत्सव के दौरान 9 फरवरी 2019 को ‘लेखक से संवाद’ सत्र का आयोजन किया गया। जिसमें हिमाचल के प्रख्यात साहित्यकार एस.आर. हरनोट के साथ श्रोताओं ने संवाद करना था, लेकिन स्वास्थ्य के चलते वे पहुंच नहीं पाए। एम एल एन कालेज, यमुनानगर में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर बी.मदनमोहन ने उनकी रचनाओं से परिचित करवाया और उनकी रचनाओं के सामाजिक सरोकारों व सौंदर्य-शिल्प पर चर्चा की। प्रस्तुत है विकास साल्याण की रिपोर्ट –

बी मदन मोहन

एस.आर. हरनोट वर्तमान समय के हिमाचल व हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार व साहित्यकर्मी हैं। हिमाचल व देशभर में होने वाली साहित्यिक गतिविधियों से लगातार जुड़े रहते हैं। अब तक उनका एक उपन्यास और छः कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जो निरन्तर चर्चा में रहे हैं। हाल ही में ‘कीलें’ और  ‘लिटन ब्लॉक गिर रहा है’ नामक दो कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। ‘लिटन ब्लॉक गिर रहा है’ कहानी संग्रह की चर्चा पूरे हिन्दुस्तान में बड़ी ही गंभीरता के साथ हुई है। उनके रचना-संसार में दो-तीन पक्षों को गहराई से देखने और रेखांकित करने की आवश्यकत्ता है। एक पक्ष तो यह है कि एस.आर. हरनोट बहुत लम्बे समय से साहित्य रचना कर रहे हैं, परन्तु आज से दस वर्ष पहले तक भी हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय उन्हें एक लेखक के रूप में स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं था। दूसरा पक्ष यह है कि आज से दस वर्ष पहले हिन्दी के आलोचकों ने भी उनके रचना-संसार का अच्छे से नोटिस में नहीं लिया था, जबकि उनकी रचनाएँ ‘जीन काठी और अन्य कहानियां’, ‘दारोश’ और खासतौर से उनका उपन्यास ‘हिडिम्ब’ महत्वपूर्ण कृतियां हैं।

हिमाचल एक देवभूमि है, वहां के साहित्य में प्रेम-प्रसंग और थोड़ा बहुत संघर्ष दिखाया जाता था हिमाचल प्रदेश की संस्कृति में जो सामंती व्यवस्था के अवशेष बचे हैं और जो शोषण का शिकार वहां का आम-आदमी होता है। हरनोट जी ने अपनी पहली ही कहानी से इस सामंती व्यवस्था से टकराने और उसे तोड़ने की कोशिश की है।

हिमाचली व्यवस्था में बहुत सारी विविधताएं देखने को मिलती हैं। दो तरह की व्यवस्था है एक तरफ तो शोषणकर्ता हैं और दूसरी तरफ शोषित हैं। एस.आर. हरनोट दूसरे वर्ग के साथ खड़े हैं। अपनी पक्षधरता के साथ सामंती ढ़ांचे को तोड़ने का काम किया है।

हिमाचल प्रदेश में परम्पराओं के नाम पर भी बहुत सारा दोहन होता है। कुछ परम्पराएं तो ऐसी हैं जिनके बारे में ज्यादातर लोग परिचित नहीं हैं। मसलन बहुपति प्रथा। किन्नौर के इलाके में यह प्रथा प्रचलित है। एस.आर. हरनोट की कहानी ‘दारोश’ इसी प्रथा पर केन्द्रित है। दारोश का अर्थ है – जबरदस्ती विवाह। ‘दारोश’ कहानी में चार-पांच युवक एक लड़की को जबरदस्ती उठाकर ले जाते हैं। उस लड़की की छोटी बहन इसके खिलाफ लड़ाई लड़ती है और कोर्ट का सहारा लेती है। कोर्ट का फैसला लड़की के हक में आता है। लड़की उस गांव में अकेली जाती है और इस पूरी व्यवस्था से टकराती है और अंततः लोगों को एकजुट करके इस मुहिम में कामयाब होती है।

ये परम्पाएं भीतरी हिमालय के लेह-लद्दाख से चलकर, हिमाचल के किन्नौर जिले में और आगे उत्तराखंड से सिक्किम तक फैली हुई है। इसके अलावा हिमाचल में बहुपति प्रथा भी प्रचलित है। इसमें लड़की परिवार के किसी एक लड़के से विवाह करती है, उसके पश्चात परिवार में सब भाइयों की पत्नी बन जाती है। उसकी संतान का पिता कौन है इसके निर्णय का अधिकार उस महिला का होगा।

हरनोट की विशेषता है कि एक ओर तो वो नागार्जुन की परम्परा को जीते हैं। इनकी कहानियों और उपन्यास में कहीं तो ‘वरूण के बेटे’ उपन्यास की पात्र मदुरई दिखाई देती है, कहीं ‘बलचनमा’ का बलचनमा दिखाई देता है। उनकी कहानी में ‘मिट्टी के लोग’ में उसका मुख्य पात्र मोती तो सरपंच और प्रधान के आगे हथियार डाल देता है और बैंक से जो कर्ज लिया हुआ है उसको न चुकाने की वजह से अपनी गाय प्रधान को सौंप देता है। लेकिन उसकी महिला पात्र दरांती उठा लेती है और कहती है – “कि उसकी क्या हिम्मत जो हमारी गाय को अपने वहां ले गया” वह उसके घर जाती है और दरांती दिखाती हुई गाय को वापिस अपने घर ले आती है। सरपंच और प्रधान इस सारी घटना को खड़े-खड़े देखते रह जाते हैं। गोदान की कथा इसके विपरित है उसमें होरी व धनिया सारे जीवन संघर्ष करते रह जाते है और अंत में धनिया की स्थिति ऐसी नहीं होती कि वह गाय को अपने घर में रख पाए लेकिन हरनोट की कहानी की मंगली गाय को लेकर आती है।

हरनोट अपनी कहानियों में हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों का अति सुन्दर चित्रण करते हैं । उसके साथ वहां के खासकर दलित तबके के लोगों के अभावों और उनके जीवन संघर्ष का गहराई से चित्रण करते हैं। उनके साहित्य में हमें एक नए हिमाचल की तस्वीर दिखाई देती है। एक इंसान के रूप में हरनोट जी जितने विनम्र है, एक साहित्यकार के रूप में वे उतने ही कठोर वे परिस्थितियों से समझौता नहीं करते। अंत में हरनोट जी के व्यक्तित्व के लिए शेर है।

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सज़दे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।

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