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आवाज़ें और चुप्पी

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मानव प्रदीप वशिष्ठ

27 नवम्बर, 2018 को कुरुक्षेत्र के  सावित्री बाई-जोतिबा फुले पुस्तकालय तथा शोध संस्थान में इंडियन फाउन्डेशन फॉर आर्ट  तथा देस हरियाणा ने एक संयुक्त संगोष्ठी का आयोजन किया। भगवती प्रसाद ने अपनी चित्रकला से एक विशेष शैली में शहर के निर्माण में लगे विभिन्न कारीगरों के औजारों के माध्यम से शहर प्रदर्शित किया तथा अनुराधा ने हरियाणवी रागनी में दलितों तथा महिलाओं की उपस्थिति बारे अपना शोधकार्य प्रस्तुत किया। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो.टी.आर. कुंडू तथा डा.ओमप्रकाश करुणेश ने की। कार्यक्रम का संचालन देस हरियाणा के सम्पादक डॉ. सुभाष चंद्र ने किया।IMG_1575

इंडियन फाउन्डेशन फॉर आर्ट के प्रतिनिधि तनवीर अजशी ने अपने संगठन के बारे में बताया कि इंडियन फाउन्डेशन फॉर आर्ट एक गैर सरकारी संगठन है जो समाज में मौजूद विभिन्न आवाजें जिन्हें दबा दिया गया है उनके उभारने के लिए काम कर रहा है। बिना किसी भाषाई बाध्यता के देश भर में लोक कला, संस्कृति तथा साहित्य के क्षेत्र में शोध करने के लिए आर्थिक तथा बौद्धिक सहयोग प्रदान करता है।

संगोष्ठी में भगवती प्रसाद ने अपने शोधकार्य की प्रस्तुति चित्रकला के माध्यम से प्रस्तुत की। उन्होंने शहर को निर्माण में लगे विभिन्न कारीगरों के औजारों के माध्यम से दर्शाया। उन्होंने निर्माण कार्य में लगे एक मजदूर के तसले के माध्यम से शहर को दर्शाया यह चित्रकारी उस मजदूर द्वारा उस शहर को देखने का नजरिया थी कि किस तरह हर इमारत की तरफ देखते हुए वह तसलों की गिनती के हिसाब से इमारत की भव्यता को आंकता है।

शहर के बीच में बैठे मोची के औजारों के माध्यम से शहर में मोची की भागीदारी और उपस्थिति और बिजली के काम में लगे कारीगर की नजर में शहर तारों, बल्बों के एक जाल के रूप में दर्शाने वाली चित्रकारियां दिखाई। अपने काम के बारे में बात करते हुए भगवती ने कारीगर तथा उसके औजारों के बीच के जीवंत सम्बन्ध के बारे में चर्चा की।

अनुराधा ने अपने शोध के बारे में बातचीत परम्परागत रागनी में महिलाओं तथा दलितों की उपस्थिति से शुरू की । अनुराधा ने कहा कि परम्परागत रागनी तथा सांगों में ये दोनों ही वर्ग एक किरदार के तौर पर तो उपस्थित नजर आते हैं लेकिन यह कहीं भी मुख्य नायक या नेतृत्वकारी भूमिका में नजर नहीं आते। महिलाओं के सौन्दर्य के बारे तो बहुत सी रचनाएं मिल जाती हैं लेकिन महिला की हालात को सम्बोधित करती हुई रागनियाँ कम हैं।  महिला किरदारों को अक्सर या तो नकारात्मक त्रिया चरित्र की भूमिका में दिखाया जाता है या फिर अति आदर्शवादी पतिव्रता के रूप में स्थापित करने वाला।

दलित किरदार हमेशा सहायक, नौकर के रूप में दिखाया गया है या फिर ओच्छे चरित्र के साथ दिखाया गया है। दलितों की पैरवी करने वाली रचनाएं कम नजर आती हैं। अनुराधा ने कहा कि गायन की कला को विकसित करने में दलितों और महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है लेकिन एक वक्त के बाद गायन में सवर्ण जातियों के पुरुषों का आधिपत्य हो गया। दलित जहां वादन तथा सहायक की भूमिका की तरफ धकेल दिए गये और महिलाएं दर्शकदीर्घा से भी गायब।

अनुराधा ने महिलाओं और दलितों की रागनियों में भागीदारी के क्रांतिकारी बदलाव को जनवादी आन्दोलन की बदौलत बताया।  लैंगिक भेदभाव तथा जातीय उत्पीडन को अभिव्यक्त करने वाली प्रतिरोध की रागनियों ने जगह बनाई। महिला और दलित लेखकों ने अपनी जोरदार उपस्थिति  दर्ज करवाई ।

संगोष्ठी में मौजूद विभिन्न बुद्धिजीवी, युवा, साहित्यकारों ने अपने सवालों और सुझावों के साथ चर्चा को नई दिशा देते हुए विभिन्न आयाम खोले। कायक्रम अध्यक्ष प्रोफेसर टी. आर. कुंडू ने अध्यक्षीय टिप्पणी करते हुए कहा कि बेतरतीब ढंग से हो रहे विकास ने इन मेहनतकश आवाजों को अभिव्यक्ति देने का काम किया है। उनकी शैली गजब है और ये एक नया नजरिया पेश कर रहे हैं जो काबिलेगौर है। अनुराधा ने हरियाणवी रागनी के क्षेत्र में उपेक्षित आवाजों को उभारने का काम किया है। आज के कथित सांस्कृतिक उत्सव के दौर में सृजन करने वाले इन तबकों को नजरअंदाज किया जा रहा है । यह शोध इन दबी हुई आवाजों को उभारने की दिशा दिखाने का काम करेगा। डॉ.ओमप्रकाश करुणेश, हरपाल शर्मा, महावीर दहिया, विपुला, अश्वनी, प्रवीन, राजेश, विकास, सुनील आदि इस संगोष्ठी में शामिल रहे ।

           

 

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