गुरू रविदास की महानता चमत्कारों में नहीं विचारों में है

रिपोर्ट


                गांव नन्हेड़ा स्थित राजकीय प्राथमिक पाठशाला के सुंदर प्रांगण में 31जनवरी को गुरू रविदास जयंती के उपलक्ष्य में देस हरियाणा सृजनशाला में ‘गुरू रविदास के सपनों का समाज’ विषय पर सेमिनार हुआ।

सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी आर.आर. फुलिया ने शिरकत की और मुख्य वक्ता के तौर पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर एवं देस हरियाणा के सम्पादक डा. सुभाष चन्द्र तथा वरिष्ठ सृजनकर्मी डा. ओम प्रकाश करुणेश ने अपने विचार व्यक्त किए। मंच संचालन पाठशाला प्रभारी महिन्द्र खेड़ा व देस हरियाणा से जुड़े अरुण कुमार कैहरबा ने किया।

कार्यक्रम का संयोजन अध्यापक उधम सिंह, दयाल चंद, नरेश मीत, मान सिंह व नरेश सैनी ने किया। कार्यक्रम की शुरूआत राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय इन्द्री की छात्राओं शीला, प्रीत कौर, प्रीति के बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के गीत के साथ हुई। हिन्दी प्राध्यापक दयाल चंद जास्ट ने गुरू रविदास की रचना – ‘बेगमपुरा शहर को नाउं’ को सुरीले अंदाज में गाकर सुनाया।

आर.आर. फुलिया ने कहा कि गुरू रविदास के विचारों को समझना सबसे महत्वपूर्ण है। वंचित समुदायों के आगे बढऩे में शिक्षा क्रांतिकारी औजार है। गुरू रविदास जी ने समाज के वंचित समुदायों को स्वाभिमान बख्शा है। उनकी रचनाओं को गुरू ग्रंथ साहिब में स्थान मिला है, जोकि उनकी प्रतिभा का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि गुरू रविदास और डा. भीम राव आंबेडकर के विचारों को जन-जन तक पहुंचाना भी हमारा कत्र्तव्य है। अपने जीवन संघर्षों और प्रशासनिक अनुभवों के माध्यम से वंचित समाज के लोगों को अपने बच्चों को पढ़ाने का आह्वान किया।

 डा. सुभाष चन्द्र ने कहा कि महान समाज सुधारकों के साथ अनेक प्रकार की किवदंतियां और चमत्कार जुड़ जाते हैं। जिन पाखंडों व बुराईयों का उन महापुरूषों ने विरोध किया था, उन्हीं पाखंडों से उनका संबंध जोड़ दिया जाता है। रविदास जी के चित्रों में भी उन्हीं के हाथ में माला पकड़ा दी गई है, उनके माथे पर तिलक भी लगा दिया। वे बनारस में पैदा हुए। कबीर और रविदास का एक ही समय है। वे हाथ से काम करते थे और बिना किए खाने वाले मुफ्तखोर लोगों द्वारा फैलाई जा रही बुराईयों का विरोध करते थे। उन्होंने पूर्व जन्म, पुनर्जन्म और आने वाले जन्म की दकियानूसी सोच और कुतर्कों का खंडन किया। उन्होंने जातपात, ऊंच-नीच और सामाजिक भेदभाव को समाप्त करके समानता, न्याय और आजादी के मूल्यों पर आधारित बेगमपुर का सपना देखा था। लेकिन आज उनको मानने वाले लोग उनके मंदिर बनाने और मूर्तियां स्थापित करने के काम में लगे हैं। जिस विचारधारा का रविदास जी ने आजीवन विरोध किया, आज उसी को पोषित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि गुरू रविदास की महानता उनके चमत्कारों में नहीं है, उनके विचारों में है। रविदास जी की रचनाओं में सच्चाई प्राप्त करने और न्याय स्थापित करने का संघर्ष है।

सेवानिवृत्त कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. ओमप्रकाश करुणेश ने गुरू रविदास के सपनों पर आधारित जातिमुक्त समाज बनाने के लिए लोगों से एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आज कर्मकांडों की बजाय हमारे समाज को सृजनशालाओं व अच्छी किताबों की जरूरत है। इस मौके पर सामाजिक कार्यकर्ता बलिन्द्र कांबोज, अध्यापक जसविन्द्र पटहेड़ा, करनाल कोर्ट में लिपिक बंसी लाल, सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष पिंगली, अध्यापक सुनील अलाहर, बाबू राम, देवीशरण, देव कश्यप, समय सिंह जैनपुर, अशोक रंगा, राजेश रंगा, अर्जुन खुखनी, हरियाली युवा संगठन के प्रदेशाध्यक्ष सूरजभान, रवि समौरा, दीपमाला, रजनी राजेपुर, नेहा, नीरू, कमलेश, विनोद कांबोज, सरजू, जगदीश, नंबरदार रोशनदीन, रज़ा अब्बास, शंटी, नरेन्द्र बंटी, कैलाश, अभिषेक व सुरेन्द्र उपस्थित रहे।

 

 

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।