ओम प्रकाश ग्रेवाल व दिनेश दधीचि

आबिद आलमी के ग़ज़ल-संग्रह ‘नये ज़ाविए’ का मुख्य स्वर सीधी टकराहट का, जोखिम उठाने का है। आबिद आलमी के लिए सृजनात्मकता की यह एक अनिवार्य शर्त है कि जाने-पहचाने तौर-तरीकों की हदों से बाहर निकला जाए-

‘नज़र से आगे नये फ़ासले तलाश करें।
वो जो खयाल में हैं रास्ते तलाश करें।।’

चूंकि जीवन के अंतर्विरोध विस्फोटक बिंदु तक पहुंच गए हैं, इसलिए खतरे उठने और साहस दिखाने की अनिवार्यता से बचकर नहीं रहा जा सकता – यह अहसास आबिद आलमी में ज्यादा स्पष्ट और शिद्दत के साथ उभर कर आया है।
आबिद आलमी पाठक का ध्यान यथार्थ के उन पहलुओं की ओर खींचते हैं, जिन्हें वे आमतौर पर देख नहीं पाते। आबिद आलमी पाठक के लिए चीजों को आसान नहीं बनाते, बल्कि उसे झकझोरते और बेचैन करते हैं-

‘यूं चुभ रहा है आंख में मंजर ज़रा-ज़रा।
तिनका हो जैसे ज़ख्म के अंदर ज़रा-ज़रा।।
पाया कदम-कदम पे दरिंदों को खेमाज़न
डाली नज़र जो शहर के अंदर ज़रा-ज़रा।
बस्ती में बैठ जाती है टोलों के रूप में,
आती है रेत दर्द की उड़कर ज़रा-ज़रा।।’

हस्तक्षेप की पहली शर्त यही है कि पाठक को यथार्थ के वे पहलू दिखाए जाएं, जिन्हें भुला देना अब खतरे से खाली नहीं रहा। मात्र ‘सुबह के ऐलान’ से भ्रमित होकर झूठा उत्साह दिखाना आबिद आलमी को हास्यास्पद लगता है और ‘ठंडा सूरज’ भी उनके किसी काम का नहीं है। आम आदमी जिस हिंसा और आतंक के माहौल में आज ‘गूंगी छांव’ की तरह जी रहा है, उसमें यह सवाल पैदा होता है-‘कौन सी बस्ती है यारो! ये नगर किसका है?’ शायर जानना चाहता है-

‘घर के आंगन में खिली धूप को भी छू न सकें
काश, समझाए कोई मुझको, ये डर किसका है?’

इस शहर में ‘सदा पे बर्छियां टूट के पड़ती हैं’ लेकिन साथ ही यह स्पष्ट है कि अब फैसले की घड़ी आ गई है। इस अहसास के चलते आबिद आलमी की ग़ज़लों का तेवर राजनीतिक हो जाता है। स्थिति जैसी हमारे सामने है, उसे वैसा किसी ने बनाया है। उस दुश्मन की उपस्थिति को दार्शनिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर पहचाना गया है। यहां शालीनता की अपेक्षा बौद्धिक साहस और कल्पना की उदात्त तीव्रता मौजूद हैं, खिलवाड़ करने का सहज विश्वास है, चुनौतियों के सामने डट कर खड़े होने का इरादा है-

‘जब तलातुम से हमें मौजें पुकारें आगे।
क्यों न हम खुद को ज़रा खुद से उभारें आगे?’

‘छुपती फिरती है यूंही राह धुंधलकों में क्यों?
हम नहीं बीच में यूं लौट के जाने वाले।’

आबिद आलमी के कलाम के राजनीतिक तेवर का एक अनिवार्य पक्ष यह भी है कि यहां टकराहट की कल्पना व्यक्ति और दुनियां के बीच नहीं, बल्कि समूहों के बीच की जाती है तथा यह मानकर चला जाता है कि इस टकराहट का अंजाम क्या होना है-बाकी सब बातें इसी सवाल के आधार पर तय होंगी-

‘बस्ती के हर कोने से जब लोग उन्हें ललकारेंगे।
आवाज़ों के घेरे में वो कैसा वक्त गुज़ारेंगे?
सब कुछ लुटवा बैठे हैं हम बाक़ी है अब काम यही
यानी अब रहज़न के सर से अपना माल उतारेंगे।’

कारवां के साथ जुडऩे में, व्यक्ति की समस्याओं को समूह के साथ जोडऩे के किसी भी प्रयास में कवि की वैयक्तिक अस्मिता को ठेस पहुंचने का खतरा बना रहता है। आबिद आलमी के रचनाकार को अपनी खुद्दारी से इतना लगाव है कि सामूहिक संघर्ष की ललकार देते हुए वे अपने स्वर की विशिष्टता और अपनी चेतना की स्वतंत्रता बनाये रखते हैं-

खुद को ‘आबिद’ काफ़िले से बांध कर
टूट जाओगे अकेले राह में।

‘उसकी ये शर्त कि हर लफ्ज़ फ़क़त उसका हो।
मुझको ये जि़द्द कि जो मानी हो मेरा अपना हो।।’
वस्तुत: आबिद का संबंध उर्दू शायरी में इ$कबाल और फ़ैज़ की परम्परा से है, जिसमें संगीतात्मक सौंदर्य की अपेक्षा ओज, नाटकीयता और व्यक्ति की उदात्तता पर अधिक बल दिया जाता है। ग़ज़लों को पढ़ते ही यह अहसास होता है कि यह रचनाकार आंतरिक संघर्षों में से गुज़र कर उनकी आग में झुलस कर निकला हुआ जिजीविषा-सम्पन्न शायर है। यह आधुनिकतावाद में निहित मूल्यों के विखण्डन, अनिश्चय, नैराश्य, अस्पष्टता आदि की सी विडंबनाओं को झेल कर उन्हें पीछे छोड़ चुका है। उसके शे’रों में ‘मानी के सिवा भी कुछ है’; नकार, कसाब और बेचैनी के साथ उन तीव्र अंतर्विरोधों का चित्रण है, जिनके बीच में से अपनी राह बनाते हुए शायर नये सिरे से सृजन करता है, सिर्फ पुराने आदर्शों को बचाए रखने की जिम्मेदारी नहीं निभाता।
खतरनाक स्थितियों से आबिद गंभीर तो होते हैं, पर उनसे आतंकित होने की बजाय वे खिलवाड़ या शरारत के लहजे में पाठकों को सचेत करते हैं-

न जाने कौन-से लफ़ज़ों को क्या समझ बैठें
ये $कातिलों का नगर है, मियां! यहां खामोश।

इस आत्मविश्वासपूर्ण खिलवाड़ के लहजे और बौद्धिक साहसिकता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति ऊर्जा से भरी क्रियाओं, पाठक को भौंचक्का कर देने वाली भाषा की वक्रताओं के रूप में होती है। शैली की इसी वक्रता के अंतर्गत आबिद आलमी कई बार दृश्य-स्पर्श-गंध से संबंधित शब्दों को उनके अपेक्षित संदर्भों से हटा देते हैं ताकि पाठक की प्रतिक्रिया में ज्यादा सजगता और जागरूकता आ सके।
रहनुमाओं के हाथों छले जाने का तीखा अहसास मौजूद है। चूंकि वे पथप्रदर्शक ताकतें, जिन पर भरोसा था, असफल हो गई या अपर्याप्त साबित हुई, स्थिति और विकट हो गई है। अब नये सिरे से व्यूह रचना करनी होगी। रहनुमाओं की साख गड़बड़ा गई है। इस बात में निराश होने की बजाए कवि दृढ़ संकल्प का आह्वान करते हुए जनसाधारण की काहिली को तोडऩे की कोशिश करते हैं। उन्हें झूठी सांत्वना नहीं देते, न ही कोई यूटोपियन समाधान सुझाते हैं। उनके लिए ग़ज़लगोई आम लोगों के साथ जुडऩे का एक ताकतवर साधन है। इनके बयान की सादगी भी इसी जुड़ाव की पुख्तगी का सबूत पेश करती है।
साभार-जतन अंक-20-21, वर्ष-6

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-अप्रैल, 2018), पेज 52-53

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