ओम प्रकाश करुणेश

हमें लिखो

स्याह न हो
आने वाले दिन
कवि ! इन दिनों के बारे में जरूर लिखो

सबको मिले न्याय
और सब हो अलहादकारी
भेदभाव मिटे, कवि कुछ ऐसा लिखो

कुछ इस तरह गुनगुनाओ
कि होठों में ही दबी न रह जाए
मजलूमों की आवाज

गाओ अब इनके झमेले
कवि अब ऐसे गीत सुनाओ
तुफां उठे दिलों में हमारे
आंखों से खूं के आसूं बरसाओ
ये जुल्म करने वाले बदलें
न रहे इस धरा पर
मनुष्यता का ऐसा गीत सुनाओ

कवि कुछ ऐसा लिखो
कि आंख हमारी खुल जाएं।

गाम के पान्ने

गांव-मुहल्ले, कस्बे-शहर
अगड़-बगड़ में बसी मरोड़
पड़ोस के तान्ने, पास के पान्ने
बसे सरिक्के-कुणबे होड़
जलण में फुकते, राख फांकते
धूल उड़ाते, गोहर टेढ़े
घास-फूंस न्यार ने जारी
घर की रोणक नारी
सब कुछ सहती
यह घर का गहना
गम आए तो दुखों में बहना
दोष मढ़ें हम उस पे भारी
कस्बे शहर, गाम-मुहल्ले
उजले होते इनसे सारे।

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।