जुल्मी होया जेठ- विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’

vinodजुल्मी होया जेठ

विनोद वर्मा ‘दुर्गेश ’

जुल्मी  होया  जेठ,  तपै  सै  धरती  सारी
ताती  लू  के  महां,  जलै  से काया म्हारी।
सूख गे गाम के जोहड़, ना आवै नहरां म्हैं पाणी
बिजली भी आवै कदे-कदे, सब कहवैं मरज्याणी।

बूंदा-बांदी  हो  ज्या  तो,  पड़ै  गात  समाई
पुरवा  चालै  बाल,  क्यूकर  होवै  निस्ताई।
ढाठा  मारे  जावै  धापली, लेण कुएं का पाणी
पनघट  भी  सूना  पड़्या, बिन  लोग  लुगाई।

बखत  काटणा  भारी  होग्या, सब कहवैं नर-नारी
गरमी तैं आच्छी लागै सबनै, जाड्डे की रूखाई।
बलदां  की  जोड़ी  देखै  बाट, कद आवैगा पाणी
दो  घूंट  नै  तरस  गए, रै  जेठ  तेरी  दुहाई।

बखत  पुराणे  म्हं  ना  थी,  इतणी  करड़ाई
काट  लिए  बण  सारे,  कर  दी गलती भारी।
जै  बचे-खुचे  पेड़ां  नै  भी  काटोगे  लोगो
न्यू ए बल-बल उठैगी ‘विनोद’ या धरती म्हारी।

– विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’
वार्ड नं0 1, गुलशन नगर, तोशाम
जिला भिवानी हरियाणा

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।

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