बखत पुराणा – विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’

बखत पुराणा

बखत पुराणा ए चोखा था,
बेशक चीजा का टोटा था ।
धी-बेटी थी सबकी बराबर,
नेग पुगाणा भी सोखा था।।

दूध-दही का खान-पान था,
सबका देसी बाणा होता था।
सखी-सहेली गीत गावती,
जब तीज-त्योहार का मौका था।।

बङे-बुजर्गा का रौब था न्यारा,
कुणबे म्है रूतबा मोटा था।
खिचङी-दलिया घर-घर बणते,
सबका दूध भर्या एक लोटा था।।

पीसा-धेला बेशक ना था,
ना नीयत का कोए खोटा था।
भाई-भाई न चाह्या करदा,
ना सिर किसे का फोङ्या था।।

सुख-दुख की बतलावण खातर,
चौपाला पै धर्या होक्का था।।
गाम-गुहाण्ड मैं आणा जाणा
ना कदे किसे नै टोक्या था।

दस-दस कोस सफर काटते
मोटर ठेल्या का टोटा था।
रेहङू पै खेता म्है जाणा,
राबड़ी का ठंडा कलेवा था।।

इब ना दिक्खै कुएँ-बावङी,
पनघट भी आया गया होग्या।
काठ की हान्डी घर-घर चढगी,
‘विनोद’ धोखेबाज जणा-जणा होग्या।।

विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।

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