कविता
पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री

वसीयत

मेरी मौत पर न रोना मेरी सोच को बचाना
मेरे लहू का केसर मिटटी में न मिलाना

मेरी भी जिंदगी क्या बस बूर सरकंडे का
आहों की आंच काफी तीली भी न जलाना

एकबारगी ही जलकर मैं न चाहूं राख़ होना
जब -जब ढलेगा सूरज कण -कण मेरा जलाना.

घेरे में कैद होना  मुझको नहीं मुआफिक
यारों की तरह अर्थी सड़कों पे ही जलाना

जीवन से मौत तक  हैं आते बहुत चौराहे
मुश्किल हो जिस पे चलना उसी राह पर ले जाना

 

पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री

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