कविता


आइये देखें

आइये देखें
रोज़-रोज़ गिरावट की नित-नयी किस्में..
नाचती हुई नायिका के थिरकते हुए नितम्ब..
और नायक का निगेटिव शेड, हंसोकड़ी..
अवसर की चौपड़ सजाते लोग..
पसरते हुए रोग ..
आइये देखें।

आइये देखें
कि और कितना गिरा जा सकता है
कि बेशर्मी और ताक़त की दुकान और कितनी चलती है
कि अपना रास्ता बनाता हुआ आदमी खुद को कितना भूल जाता है
कि भीतर का लालच इंसानियत को कितना खारिज करता है
कि बुद्धिजीवी बनने के फार्मूले किस क़दर कामयाब हैं
आइये देखें।

आइये, सहमति और आत्मकेंद्रित युग को लौटा लायें
जहां केंद्र में ‘मैं और सिर्फ मैं’ है
जहां महज़ इस्तेमाल है
जहां तर्क खुद को आईने में ना देखने का ज़रिया है
आइये देखें।

आइये देखें
लाभ का गणित और खांसता हुआ बूढ़ा…
चहकते हुए लोग मगर शब्दों का कूड़ा ..
आइये फिर से एक ‘आइटम नंबर’ कल्पित करें,
जिसमे सिर्फ और सिर्फ नंगई देखें..
आइये देखें बिना कुछ किये-धरे
बस देखते रहैं
देखने का आनंद उठायें ।
आइये देखें?


स्रोत- सं. देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज- 22

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