कविता


सभ्यता के गुमान में

सदियों पहले जब आदिमानव बिना कपड़ों के जीता था तब भी उसे एक मादा ने पैदा किया था।
अपने शरीर में धारण किया था उसका शरीर
उसे जन्मा और अपनी छाती का दूध पिलाया।
ये वो एहसान है जिसे इंसानी नस्लें कभी नहीं चुका सकतीं।
फिर एक दिन यूँ हुआ-
मादा के शरीर पर हमला हुआ
और सभ्यता के गुप्तांग में लोहे की छड़ गाड़ दी गई..
आज जब डिजीटल हो रहा है समूचा जगत।
तब चवन्नी छाप गालियों में अपनी ही मां और बहनों के गुप्तांग बन रहे हैं चुनौतियां
मानो समूचा जगत उन्हें ध्वस्त कर देना चाहता हो
पर क्या कभी कुचला जा सकता है एक औरत की छातियों के उभार को?
उस दूध को जिससे पिता-समाज का पौरुष बना?
जिसने कितनी ही सभ्यताओं को अपना दूध पिलाया, पाला-पोसा।
एक औरत का गुप्तांग जो भरतवाक्य बन गूंजता है हमारे गाली-गलौच में।
एक स्त्री का गुप्तांग जिसे हमारी गालियों के इतिहास से निकाल दिया जाये तो कुछ भी नहीं बचता।
एक बार फिर दोहराता हूं उपदेश की तरह-
एक औरत का गुप्तांग नहीं है मज़ेदारी और गाली-गलौच के लिए।
उसने जन्म दिया है समूची मानव जाति को, तुमको।


स्रोत- सं. देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज- 21

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