हरियाणवी कविता

 

आया फागण लागे नाचण,
भरकै मस्ती का घूट होळी म्ह।
नार गजबण चढ्या जोबण,
सबनै करै शूट होळी म्ह।।

बणाकै डान्डा बीच बगड़ म्ह,
रोप्या कैर का खूंट होळी म्ह।।
पूजै,मंगलावै,भून्द के लावै,
जौ के बूंट होळी म्ह।

नाचै, कूदै, होळी गावै,
होवै हांस्सी की छूट होळी म्ह।
छोरी छापरी हुई रंग रंगीली,
संग सखी सहेली लगे क्यूट होळी म्ह।

सच्चाई का दामन थामो,
छोडो छल कपट अर झूठ होळी म्ह।
इक दूजे ने गळे लगाओ,
आपस की मेटो फूट होळी म्ह।

हिन्दू ,मुस्लिम, सिख, इसाई ,
बणाओ भाईचारा अटूट होळी म्ह।
कहै भारती प्यार बांटो,
पी कै घृणा का घूंट होळी म्ह।


स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा( मई-जून 2016) पेज- 75

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