कविता

क्यों मढ़ देते हो
तुम दोष बार-बार
उस अन्जान पर
जिसने नहीं सुनी
कभी ज्ञान की बात
जिसने नहीं पढ़ी
कभी ज्ञानवर्धक किताब
जो नहीं बैठी कभी
ज्ञानी पुरुषों के साथ
जिसने नहीं देखी कभी
चार दिवारी के बाहर की दुनिया।
जिसने नहीं सीखा भरना
अकेले उड़ान नभ में
सोची-समझी साजिश के तहत
रखा गया हमेशा उसे ज्ञान से महरूम
सिखाया गया उसे सिर्फ दास बनना
चुप रहना सब कुछ सहन करना

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016) पेज-28

 

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