किरेळिया

किरळियाImage result for anton chekoh

लेखकः अंटोन चेखव,    अनुवाद: राजेंद्र सिंह

विश्व प्रसिद्ध रुसी कहानीकार अंटोन चेखव ने अपनी प्रसिद्ध कहानी गिरगिट में शासन-प्रशासन  में फैला भ्रष्टाचार, जनता के प्रति बेरुखी और अफसरशाही की चापलूसी को उकेरा है। भारतीय संदर्भों में भी प्रासंगिक है। प्रस्तुत है इस कहानी का हरियाणवी अनुवाद। सं.

रोगा ओचुमिलोफ बजार आळे चौंक पै को जाण लागर्या था। उसनै पिंडियां तक का लाम्बा कोट पहर राख्या था अर एक सरकारी फाईल काख म्हं दाब राखी थी। उसके पाछै-पाछै एक लाल बाळां आळा सिपाह्ई था। सिपाह्ई नै दोनूँ हाथां म्हं बोह्इया पकड़ राख्या था। जिसमैं खोस्से होए अँगूरां का ठाड्डा भर्या था। चौंक पूरा सुनसान पड्या था। देखण नै बी आदमी कोनी था …दुकानां अर धर्मसाळा के खुल्ले बारणे न्यू दिक्खैं थे ज्युकर कोए कई दिनां का भुक्खा मुहँ बा कै रोटी आळै नै देख्या करै। और तो छोड्डो, कोई भिखारी बी कोनी था।

“हाए, खा लिया रै! … ओ तेरी कै, तू तो पाड़ै रै … सत्यानासी !” किसे  माणस  की चीख-पुकार दरौगा ओचुमिलोफ के कान्नां मैं पड़ी। “रै पकड़ियो इसनै ! पाड़ना तो इब ऊँ बी गैर कानूनी है! पकड़ियो रै पकड़ियो रै ! देख कै … देख कै !”

फेर एक कत्तुरिये के किकाणें की अवाज आई। ओचुमिलोफ नै देख्या तो स्याम्मी पिचूगिन का लाकड़ियाँ का टाल था जिसमैं तै एक लँगड़ा कुत्ता भाज्दा जाण लागर्या था अर उसकै पाच्छै-पाच्छै एक आदमी भाजर्या था जिसने धौळा कुरता पहर राख्या था अर उसकी गरखी के बटण खुल्ले पड़े थे। भाज्दे-भाज्दे उस आदमी नै कुत्तै पै छाळ मारी अर ड्ह पड़कै कुत्ते की पाछली दोनु टांग पकड़ ली। कुत्ते नै फेर कूँ-कूँ करया। फेर एक अवाज आई, “जाण  ना दियो रै !” सरू-सरू म्हं तो एक-आध दुकानदार नै ऊँघदै-ऊँघदै नै मुँह बाहर काढ़ कै देख्या। थोड़ी सी हाण म्हंए लाकड़ियाँ कै टाल पै आच्छी भीड़ लाग गी। चाणचक इतने आदमी हो गे, जणूं धरती पाड़ कै लिकड़े  हों।

सिपाई ने कह्या न्यू लागै कोए रोळा होर्या जनाब,। दरोगा खब्बे कहनी घूम कै लम्बी-लम्बी डींघ भरकै भीड़ धोरै पोहंच्या। खुल्ली गरखी आळा आदमी लाकड़ियाँ कै टाळ कै गेट पै खड्या था। उसने आपणा सज्जा हाथ उप्पर ठा राख्या था अर भीड़ नै वा आंगळी दिखाण लागर्या था जिसमैं तै लहू लिकड़ै था। देखदें बेरा पटै था के उसनै दिन म्हंए थोड़ी बोहत दारू की घूँट ला राखी थी।  अर कुत्ता कानी न्यू देखै था जणूं कहण लागर्या हो, “तन्ने मैं  न्यू ए थोड़ी छोड़ दयूंगा !” आंगळी ऊपरनै न्यू ठा राखी थी ज्युकर लड़ाई जीतें पाच्छै फौज झंडा ठायै करे। दरोगा नै पिछाण लिया के यु तो हरायुकिन सर्राफ है। अर ओ अपराधी जिसनै यु सारा रोळा करवा राख्या था, पैन्ने से मुंह आळा शिकारी नसल का डब्बा कतुरिया था जो अपणे दोनू आगले पैर बाहर काढ़े भीड़ कै बीच मैं पसर्या पड्या था। उसकी हालत देखण जोगी थी, आंख्यां मैं पाणी था अर उप्पर तै तळै तक काम्बण लागर्या था।

” रै के बिजळी पड़गी!” धक्के मार कै भीड़ मैं बड़दी हाण दरोगा नै पुच्छ्या। “क्यूँ खड़े हो उरै? अर या आंगळी क्यूँ कास मैं ठा राखी है ?… कुणसा है जोणसा रुक्के मारै था ?”

खांसदा-खांसदा हरायुकिन बोल्या – जनाब मैं तो चुपचाप अपणै राह जाण लागर्या था। मैं अर मित्रिच लाकड़ियाँ बारे म्हं बात करण लाग रे थे के जिबे इस मरियल से कतुरिए नै मेरी आंगळी पै बुड़का भर लिया… इब देखो जी, मैं ठहर्या काम-धंधे आळा माणस  … मेरा तो काम बी आंगळियां का है, बड़े ध्यान तै करणा पड़ै। मन्नै तो हर्जाना चाहिए, इब एक हफ्ता तो मैं कुछ नीं कर सकदा, अर हो सकै  है  … जनाब या बात तो कानूनन बी गल्त है  … न्यू आंदे-जान्देयाँ नै कुत्ते पाड़न लाग गे  … जीणा हराम  हो जैगा ।”

“हूँ … आच्छया ठीक,” ओचुमिलोफ नै करड़ा हो कै कह्या, अर फेर खंगारिया करकै बोल्या, “या बात सै ! यू कुत्ता है किसका ? मैं इस बात नै न्यू ए नीं छोड़ण आळा ! मैं बताऊंगा कुत्त्यां नै क्यूकर खुल्ले छोड्या करैं! बणे फिरैं है चौधरी ! क़ानून की तो कोए परवाह नहीं रही। यें तो इब सिद्धे करणे पड़ैंगे। जिब जुरमाना लागैगा ना, आप्पो बेरा लाग जैगा, यें कुत्ते-पुत्ते सुन्ने छोड्डण का के नतीजा सै ! … येलदरिन,” दरोगा चीख्या, अर गैल जो सिपाह्ई था उसतै बोल्या, “बेरा पाड़ यु कुत्ता है किसका, अर एक रिपोट तैयार कर ! यु कुत्ता तो तुरत मरवाणा पड़ैगा!  सर्तियाँ तौर पै पागल है यू कुत्ता … पर यू है किसका ?”

भीड़ मैं तै किसे नै कह्या।  “जनाब हो सकै है यू कुत्ता डीसी साब का हो।,” “डीसी  … झिंगालोफ साब का, हूँ  …  येलदरिन, ले एक बार मेरा यू कोट पकड़… आज तो घोट होरी सै! हो सकै है मींह बी आजे… लेकिन मेरै एक बात समझ मैं कोनी आई, इसनै तेरै बुड़का भर्या क्यूकर ?” दरोगा नै हरायुकिन कानी देखदे होए कह्या। “यू तेरी आंगळी तक पोहंचया क्यूकर? यू तो नन्हा सा कतुरिया है, अर तूं इतना बडा सांड बरगा! जरूर तनै कोए आंगळी लाई होगी। अर फेर तन्ने मुआवजा के लालच म्हं या कुत्ते आळी सरारत करी।  तेरी रग-रग जाणूं सुं मैं, बोह्त फिरैं सैं तेरै बरगे, मुआवजा मांगण आळे!”

भीड़ मैं तै कोए बोल्या। “दरोगा जी, इसनै मजाक-मजाक मैं  कुत्तै के मुहं पै बीड़ी लाइ थी, अर इसनै बुड़का भर लिया … यू बिना दिमाक का आदमी है जी,”

“आरे काणें, क्यूँ जूठ बोल्लै है! तन्ने कुच्छ देख्या बी है ? लागर्या बकवास करण ! दरोगा साब बड़ा स्याणा अफसर है, आप्पो देख ले गा कूण जूठ बोल्लै है अर कूण साच बोल्लै। जे मेरी बात जूठी लाग्गै है, तो चालो कचेहड़ियां म्हं। आजकल तो सब बराबर हैं। मेरा अपणा भाई बी पुलिस म्हं है  … मैं बता दयूं त्हामनै !”

“घणे क़ानून न काट्टै। “

“ना जी, यू डीसी साब का कुत्ता नीं हो सकदा,” पुलिसिया जमा गंभीर हो कै बोल्या, “उन धोरै तो इस तरहां का मरियल सा कुत्ता सै ए कोनी। उनके तो सारे कुत्ते झबरु सैं, बडे-बडे कान्नां आळे।”

“पक्की बात? “

“सोळह आन्ने जनाब, मन्नै बेरा है। “

“मन्नै बी बेरा है, डीसी साब धोरै तो सारे महंगे-महंगे, बढिया नसल के कुत्ते सैं। अर इसकी नसल का तो भगवान नै ए बेरा ! इसके बाळ देखिओ, इसका खलड़ा देखिओ … जणूं खाज लाग री हो। इस तरहां की कुत्तैड़ नै कूण पाळै था! …  किसे का दिमाक खराब है!  इस तरियां का जै कोए कुत्ता मास्को या पिट्सबर्ग म्हं मिल बी जै नी, त्हामनै बेरा उसकै गैल के बणेगी ? एक मिन्ट मैं काम तमाम, फडक दे सी। हरायुकिन, देख तेरै चोट लाग री सै, नुक्स्यान होया सै, ह्आम इस मामले नै न्यू नीं छोड़ सकदे … इसकै मालक तै सबक तो सिखाणा पडैगा, जमा हद चक राखी सै  … !”

 “लेकिन जनाब, यू कुत्ता डीसी साब का हो बी सकै सै,”  ठोडी पै खाज करदा होया सिपाह्ई बोल्या। “इब देखो मुँह पै तो इसके किम्मैं लिख नीं राख्या  … पर इस ढाळ का कुत्ता पाच्छै सी मन्ने उन धोरै देख्या जरूर सै।”

“हाँ हाँ दरोगा साब, यु कुत्ता डीसी का ए है !” भीड़ मैं तै एक जणै नै रुक्का  मार्या।

“हूँ  … रै येल्दरिन, मेरा कोट दे … हवा कुच्छ तेज सी नीं हो गी? … ठण्ड सी बी हो गी। न्यू कर तू इसनै डीसी साब की कोठी पै ले ज्या, अर बेरा पाड़। न्यू कहिये के मन्नै टोहया है। अर न्यू बी कहि��े के खुल्ला ना छोड्या करो… के बेरा कितना महंगा कुत्ता हो ! …  अर  जै न्यू कोए बी बसुरा इसकै मुँह पै बीड़ी लावैगा, यू तो तोळा ए हो जा ले गा। कुत्ता तो बड़ा नरम जीव होवै… अर तू इस हाथ नै तळैनै कर ले, दुस्ट ! इसने जिबका कास मैं टांगर्यै खड़्या है। कोए फैदा नीं, सारा कसूर तेराए है  … !”

“ल्यो डीसी साब का रसोइया ए आग्या, उस्से तै पूच्छल्यो  … रै प्रोअर भाई ! देखिए इस कुत्तै नै एक बार  … त्हारा ए सै के ?”

“क्यूँ मजाक करो सो ! डीसी साब नै इस तरियां का कदै कोए कुत्ता पाळ्या ए कोनी।”

” मन्नै तो पहल्यां ए बेरा था, के पुच्छण की बी जरूरत कोनी,” ओचुमिलोफ बोल्या, “यु कुत्ता आवारा है। देखदें बेरा लाग्गै सै। न्यू ए टेम बरबाद करण लाग रे हाँ। ईब तो डाऊट आळी कोए बात ए कोनी रह्इ  … इसका काम तमाम करो।  और कोए बात नी होवैगी इस बारे मैं। “

“यू कुत्ता म्हारा नी सै,” प्रोअर बोल्या। “यू तो डीसी साब के भाई का कुत्ता सै जो कालै ए आया सै। साब नै तो सिकारी कुत्ते पसन्द ए कोनी, अर उनका भाई इनपै मर्या-जावै  … “

“तेरा मतबल, डीसी साब के भाई आपणै सहर म्हं है? व्लादिमीर इवानिच ?” या बात पुच्छदी हाण ओचुमाइलॉफ़ खुसी तै पाटण नै होग्या। “कमाल है  … उन्ती तो मैं जाणू हूं ! मन्नै … मन्नै बेरा ए कोनी लाग्या ! मिलण-फेट्टण आग्या होगा ?”

“हाँ।”

“चाळा पाटग्या भाई, मन्नै… ओ अपणै भाई तै घणे दिन दूर रह बी कोनी सकदा। अर मन्नै बेरा बी नीं ! ठीक  … तो यू साब का कुत्ता सै ! आनन्द  हो गे  भाई  … ले पकड़ इसनै। कूण कहदे इसमें कोए चूक सै  … कितना प्यारा कतुरिया!  … इसकी आंगळी थोड़ा सा दांद सा मार दिया ! हा-हा-हा  … रै चल सेरु खड्या हो, क्यूँ  काम्बण लागर्या सै ? ओ – हो -हो  … लाग्गै छोह् म्हं है … है बड़ा प्यारा !”

प्रोअर नै कुत्ते को अवाज मारी अर उसनै ले कै साब की कोठी कानी चल दिया। जितने माणस खड़े थे, सबनै हरायुकिन का मजाक उड़ाना सुरु कर दिया।”तू घणा स्याणा बणै सै, मैं करूंगा तन्ने सिद्धा !” ओचुमिलोफ नै उसे धमकाया, अर अपणा कोट पहरदें-पहरदें, चौंक के बिच्चो-बीच  होंदा होया अपणी राह्ई चल्या गया। 

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज – 12 से 13

 

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।

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