हरभगवान चावला की कविताएं

ये किया हमने

हमने स्त्रियों की पूजा की
और लहूलुहान कर दिया
हमने नदियों की पूजा की
और ज़हर घोल दिया
हमने गायों की पूजा की
और पेट में कचरा उड़ेल दिया
हमने ईश्वर की पूजा की
उसके क़त्ल के लिए हमने
नायाब तरीका चुना
हमने एक ईश्वर के
कई ईश्वर बनाए
और सब को आपस में लड़ा दिया ।

मौत

दुनिया के किसी भी पिता की मौत
इतनी स्वाभाविक नहीं रही होगी
जितनी स्वाभाविक मौत मेरे पिता की थी
मैं जब ऐसा कहूँ तो सिर्फ़ सुनो
न देखो मेरी तरफ़, न सवाल करो
न मेरी आवाज़ की बर्फ़ को महसूस करो
बस सुनो और मुझ पर रहम करो
और हाँ, एक प्रार्थना उन तक पहुंचा दो
मुझे पिता की मौत की जाँच नहीं चाहिए ।

तुम बिन

मैं चाकू से पहाड़ काटता रहा
मैं अंजुरियों से समुद्र नापता रहा
मैं हथेलियों से ठेलता रहा रेगिस्तान
मैं कंधों पर ढोता रहा आसमान
यूं बीते ये दिन
तुम बिन!

चुनरी

माई री माई!
बोल मेरी बिटिया
आंधी आ गयी
आने दे
बादल छा गये
छाने दे
मेघा बरसे
बरसन दे
छप्पर टपका
टपकन दे
खटिया भीगी
भीगन दे
गैया खीझी
खीझन दे
माई री माई
मेरी चुनरी उड़ गयी
संभाल मेरी बिटिया
अकास चढ़ी चुनरी
जुलम हुआ बिटिया।

भेड़ें

भेड़ें
मस्ती में देशभक्ति के गीत गाएँ
और भेडिय़ों को
शांति से अपना काम करने दें।

2

दुनिया में
कहीं नहीं बची तानाशाही
अब सर्वत्र लोकतंत्र है
और इस लोकतंत्र में
भेड़ें
किसी भी पहिए को
अपना शासक चुनने के लिए आजाद हैं

3

हर भेड़ तक पहुँच जाते हैं
कानून के लंबे हाथ
इन हाथों की पहुंच
हर भेडि़ए तक भी होती है
पर लाख सर पटकने पर भी
भेड़ें कभी नहीं समझ पाई कि
भेडि़ए का हाथ कानून के हाथ में है
या कानून का हाथ भेडि़ए के हाथ में।

राजा

राजा का काम खाईयाँ खोदना नहीं
खाईयां पाटना होता है
राजा होना हथौड़ा होना नहीं होता
राजा सूई की तरह
बेतरतीब कपड़े को लिबास बनाता है
राजा बरसाती नदी की बाढ़ सा नहीं होता
राजा बाँध होता है
हर खेत तक पहुंचता है पानी होकर
राजा प्रजा को युद्ध के उन्माद में नहीं
शांति और प्रेम के साथ जिंदा रहना सिखाता है
कटीली झाड़ी नहीं होता राजा
राजा मुलायम पत्तों वाला पेड़ होता है
जिसकी छाँव में प्रजा सुकून की साँस लेती है
राजा होना बेशक ईश्वर होना नहीं है
पर इंसान होना राजा होने की अनिवार्य शर्त है

महानायक

लाख आड़ा-टेढ़ा होकर भी
सूरज उन घरों में
कभी नहीं झाँक पाता-
महानायक
जिन घरों के चिराग बुझा देते हैं

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज – 30

 

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।

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