ज्ञान प्रकाश विवेक

ज्ञान प्रकाश विवेक हरियाणा के प्रख्यात कथाकार हैं। उन्होंने नई कथा-भाषा का सृजन करते हुए कहानी को कलात्मक उच्चता प्रदान की है। अपने समय के यथार्थ की जटिलता, व्याकुलता, बेचैनी तथा उपभोक्तावादी समाज में बदल रहे सामाजिक संबंधों व सामाजिक संकट के विभिन्न आयामों को बेबाकी से अभिव्यक्त किया। विवेक के पास कथा कहने का विशिष्ठ कौशल है, किस्सागोई इनकी कहानियों को पठनीय बनाती है। उनका यह लेखक हरियाणा की हिन्दी कहानी को समझने की दृष्टि पैदा करता है।  -सं.

कहानी घटनाओं का मजमा नहीं होती। कहानी भावुकता का उत्पाद और अखबारी खबरों का पुनर्उत्पाद भी नहीं होती। कहानी कुछ और होती है, इस सबके बावजूद। अनुभवों का ताप। संवेदना की लय। दृष्टि का नुकीलापन। सामाजिक यथार्थ के तलघर में झांकने की कुव्वत। मारक एकाग्रता। कथाभाषा का सृजन। भाषा में कहानी उतारने की कला और भाषा से खेलने का साहस। यथार्थ को कल्पनाशीलता से विस्तार देने की सलाहियत। शिल्प, शैली का नयापन। और किस्सागोई। इन सब तत्वों के अलावा कहानी में उपस्थित (कथन) और अनुपस्थित (अकथ) का शऊर!

कहानी की एक ज़रूरी शर्त उसकी पठनीयता होती है। बेशक! लेकिन उससे बड़ी शर्त कहानी की विश्वसनीयता होती है। कहानी इतना विश्वास पैदा करे कि पात्रों का संघर्ष अपना लगे और  उनके दुख, कष्ट, अभाव, उनका टूटना-बिखरना, संवरना, विखण्डन इतनी आत्मीयता पैदा करें कि कहानी के बाहर पाठक उनको भोगता चला जाए। कहानी के पात्रों का आत्मनिर्वासन उसका अपना निर्वासन हो जाए।

फारसी का एक शेर है –

मन तू शुदम तू मन शुदी
मन जां शुदम तू तन शुदी

यानी मैं तू बन गया और तू मैं बन गया। मैं रूह हो गया। तू जिस्म बन गया। कहानी लिखते हुए एकमेक हो जाना।

लेखक जब इस तरह नुकीली एकाग्रता से कहानी को रचता है तो पाठक भी उसे उतनी ही शिद्दत से पढ़ता है।

हरियाणा के कलाकारों ने इस बात को समझा और बड़ी निष्ठा से कहानियां लिखी।

विभाजन के बाद जब हम हरियाणा की हिन्दी कहानी पर बात करते हैं तो वरिष्ठ रचनाकारों का एक बड़ा वर्ग हरियाणा कहानी में सक्रिय दिखाई देता है-स्वदेश दीपक, राकेश वत्स, पृथ्वीराज मोंगा, हेमराज निर्मम, यशपाल वैद्य, सुरेन्द्रनाथ सक्सेना, रूप देवगुण, रत्नचंद्र शर्मा, पुष्पा बंसल, बैजनाथ सिंह। लेकिन स्वदेश दीपक, राकेश वत्स और पृथ्वीराज मोंगा के अतिरिक्त, बाकी किसी लेखक की हरियाणा की कहानी में उपस्थिति, महत्वपूर्ण नहीं है। इन लेखकों ने कहानियां जरूर लिखीं, लेकिन अपने वक्तों की चुनौतियों के प्रति बेसरोकार रहे। इस वरिष्ठ पीढ़ी के बाद भी हरियाणा के अनेक कथाकार हुए जिन्होंने कहानियों को एक खास पेटर्न, खास मेनेरिज्म के तहत लिखा। कहानी का मुहावरा और शिल्प बदलने का इस पीढ़ी के पास शानदार मौका था। लेकिन इस पीढ़ी के लेखक खुद फारमूलाबद्ध हो गए, यथा-मधुकांत, सुभाष रस्तोगी, विकेश निझावन, कमला चमोला, दिबेन इत्यादि।

विडम्बना यह भी रही कि हरियाणा के रचनाकारों का रूझान कहानी के प्रति कम, लघुकथा के प्रति ज्यादा रहा। इन दो-तीन दशकों में लघुकथा संग्रहों की बाढ़ सी आ गई। एक और विधा ने हाहाकार मचा रखा है, वो है दोहा! साहित्य में उपस्थित  रहने के ये आसान रास्ते हैं।

लेकिन स्वदेश दीपक ने कहानी लेखन में मुश्किल रास्ते चुने। उन्होंने कहानियां लिखीं, उपन्यास लिखे, स्मृति आख्यान (खंडित जीवन का कोलाज) तथा मैंने मांडू नहीं देखा (आत्मवृतांत) लिखे। अपने कथा लेखन में उन्होंने जो भाषा अर्जित की, वो नायाब है। उन जैसा नस्रनिगार (गद्यकार) शायद ही कोई दूसरा हो। सिर्फ नाटक लिखे और ‘कोर्ट मार्शल’ अब तक ढाई हजार बार मंचित किया जा चुका है। उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं शहर की मौत, आहेरी, महामारी, क्योंकि हवा पढ़ नहीं सकती, मसखरे कभी नहीं रोते तथा किसी एक पेड़ का नाम लो।

स्वदेश दीपक की बहुत सारी कहानियों का वातावरण ‘केंटोनमैंट’ है यानी मिल्टरी परिसर! अम्बाला छावनी के मॉलरोड में उनका घर था। बिल्कुल पास सरहिन्द क्लब। मॉल रोड और स्टाफ रोड पर बहुत बड़ी कोठियां बंगले-मिल्टरी अफसरों, ब्रिगेडियर, मेजर के रिहायशी घर। पूरा इलाका फौजी अनुशासन से लबरेज। स्वदेश दीपक की कहानियों में वही फौजी तमतराक। वातावरण। वही पात्र। कथानक। संवाद। उल्लास। जवांमर्दी। बेबाकी। खुशरंगी। उदासी। अकेलापन। ड्रिंक्स और निर्वासन!

स्वदेश दीपक सही मायने में फनकार थे। उनकी कहानियों में उनका फनकार होता है, जो कहानी के केनवस में  जिंदगी की विचित्र, अनोखी, अबूझ छवियों के रंग भर रहा होता है।

कहानी के भीतर कहानीपन को किस कलात्मक ढंग से व्यक्त किया जाता है-उन्हें इसका शऊर था। कहानी के भीतर वो भाषा के साथ खेलते भी थे। यथार्थ के भीतर फंतासी का इस्तेमाल – इसकी उन्हें महारत हासिल थी। क्योंंकि ‘हवा पढ़ नहीं सकती’ तथा ‘किसी एक पेड़ का नाम लो’-इसी पेचीदा शिल्प ($फंतासी मैं यथार्थ और यथार्थ में $फंतासी) की कहानियां हैं। क्योंकि  ‘हवा पढ़ नहीं सकती’ का अंत! रेलवे प्लेटफार्म। नई दिल्ली का स्टेशन। डा. राधा प्लेटफार्म पर अपने पति कैप्टन रंजीत का इंतजार करती हुई। एनाउंसमेंट हो रहा है। युद्धबंदियों की गाड़ी के आने का। डा. राधा जानती है कि कै. रंजीत उसका पति युद्ध भूमि में मारा जा चुका है। वो फिर भी खड़ी है। यहां जो अनुपस्थिति है वह सबसे बड़े उदासी के राग की तरह है। कहानी का आरंभ बेहद दिलचस्प और कल्पनाशील है और अंत! विडम्बनाओं को रचने की ताकत स्वदेश दीपक में हद दर्जे की है।

वो कहानियों में कौतुहल की रचना करते हैं। फ्रेम-दर-फ्रेम जिज्ञासा पैदा करते जाना उनकी शैली है। ‘किसी एक पेड़ का नाम लो’-कहानी में जिस कलात्मक ढंग से फंतासी का इस्तेमाल हुआ है, वो बेमिसाल है। स्वदेश की यह अमर कहानी है। एक ताकतवर खूबसूरत मेजर विदेश से आ रही बेहद खूबसूरत जवान लड़की (अपने उच्च अधिकारी की बेटी) को  एयरपोर्ट से लेने आया है। दिल्ली एयरपोर्ट से वापिस पंजाब और साथ में सुंदर माया बख्शी।

सफर और कहानी का विस्तार पाना। मेजर अजय इतना ताकतवर है कि गाड़ी पंकचर हो जाने और पान्ना न मिलने के बाद वो अपनी उंगलियों से नट बोल्ट खोल देता है। लेकिन अंत! कहानी का अंत हाहाकार पैदा करने वाला। यथार्थ का बीहड़ और फंतासी का टूटना!

‘मसखरे कभी नहीं रोते’ कहानी में अधूरे पात्रों का यथार्थ और इस यथार्थ में कल्पनाशीलता। कहानी का शिल्प इतना नया कि कहानी के सभी आज़मूदा मुहावरे पिछड़ गए। कहानी में नाटक है। दर्शक दो विक्षिप्त भाई एक गुंगी बहन। सीधे सरल सहज। लेकिन यही तीनों पात्र तब आक्रामक  हो उठते हैं जब इनकी रोटियां चुरा ली जाती हैं। भूख सबसे बड़ा यथार्थ है। यहां भूख किसी बिम्ब की तरह दिखाई देती है।

जीवन का यथार्थ, प्रेम, स्मृतियांं, कौतुहल, आवेग और भाषा की उंगलियों  से स्पंदन पैदा करना-स्वदेश दीपक की कहानी का कला कौशल है। वो हरियाणा के सम्पूर्ण कथाकार हैं। वो कथाकार हैं या कथाकार थे यह कशमकश हलाक करके रख देती है। एक सुबह वो घर से निकले और फिर कभी लौटकर नहीं आए। कहानियों में कथन के पस:मंजर, अकथ की रचना करने वाला कथाकार स्वदेश दीपक, खुद किसी अकथ कथा की तरह हो गया।

अम्बाला छावनी के दो अन्य कथाकार जिन्होंने हरियाणा कहानी परिदृश्य में न सिर्फ पहचान बनाई, बल्कि धमक  भी पैदा की, वो थे – राकेश वत्स और पृथ्वीराज मोंगा। पृथ्वीराज मोंगा सातवें-आठवें दशक में ऐसे कथाकार के रूप में उभरे, जिन्होंने राष्ट्रीय परिदृश्य में अपनी शिनाख्त दर्ज कराई। धर्मयुग  और सारिका में उनकी कहानियां छपीं और चर्चित भी हुई। उन्होंने मध्यमवर्गीय यथार्थबोध की कहानियां लिखीं। यह वो समय था जब पुराने मूल्य टूट रहे थे। समाज अपने भीतर कशमकश-सी महसूस कर रहा था। आत्मनिर्वासन, अकेलापन, तंगहाली,  ईगो जैसे मुद्दे पृथ्वीराज मोंंगा ने अपनी कहानियों  उठाए और सशक्त कहानियां लिखीं। उनके दो कहानी संग्रह ‘वह कोई एक’ तथा ‘उसकी पहचान’ प्रकाशित हुए।

हरियाणा की हिन्दी कहानी में राकेश वत्स की अहम् भूमिका है। उन्होंने हमेशा कहानी के क्षेत्र में हलचल पैदा की। कहानी को जीवंत माहौल दिया। कहानी की गोष्ठियों में उनकी आक्रामक उपस्थिति भी उनका मजबूत पक्ष बनती थी। उनकी जनवादी मिजाज की कहानियों के पात्र  अक्सर ‘लाउड’ होते हैं। उनकी कहानियों में अकथ के विपरीत, सब कुछ खोल कर सपाट लहजे में बयान कर देने की तकनीक है। अंत नाटकीय जैसे कि बिरजू तो मारा जाएगा या फिर सावित्री और अंतिम प्रजापति कहानियां। उन्होंने उपन्यास, नाटक, कविताएं और कहानियां लिखीं। उनके कुछ प्रमुख कहानी संग्रह-पहर एक रोज का, अंतिम प्रजापति, अतिरिक्त  तथा अन्य कहानियां, इन हालात में, महाकवि के वारिस हैं।

इस बात को कहने में कोई गुरेज नहीं कि उन्होंने शोषित, दमित, जीवन में संघर्षरत, गरीबी से जूझते पात्रों को केंद्र में  रखकर कहानियां लिखीं। लेकिन कुछ कहानियां उन्होंने इन विषयों के विपरीत भी लिखीं कफ्र्यू और बंटवारा, इस सिलसिले में उनकी संवेदन लय पैदा करती कहानियां हैं। अकेलेपन से त्रस्त वृद्ध दम्पति की कहानी ‘बंटवारा’ भावनात्मक और मर्मस्पर्शी कहानी  है। घर का बंटवारा हो चुका है। घर में रह गए हैं बूढ़े माता-पिता। और रह गई हैं स्मृतियां। और रह गया है अवसाद!  यह कहानी नायाब प्रतीकों तथा प्रबल भावना के साथ लिखी गई जनवाद के सारे मुल्लम्मे उतारती, सशक्त कहानी है। इसी प्रकार उनकी एक कहानी हि$फाज़त है – जीव जंतुओं  के प्रति सहानुभूति पैदा करती कहानी। यह कहानी समाज में छीज चुकी संवेदना के बीच अपनी जगह बनाती है।

तारा पांचाल हरियाणा कथा जगत के सही मायने में प्रेमचंद की परम्परा को विस्तार देने वाले कथाकार हैं। बेहद फक्कड़। जमीनी लेखक। यारबाश। बीड़ी के सुट्टे मारता, किसी चिंतक जैसा, किसी फकीर जैसा तारा पांचाल हरियाणा की हिन्दी कहानी परिदृश्य का बेहद सशक्त कथाकार। कमजोर और वंचितों  के पक्ष में खड़ा यह कहानीकार, कहानी को खून-पसीने से सींचने वाला नायब किस्सागो था।

बिल्कुल अभी टीवी चैनलों पर बार-बार दिखाया जाने वाला ‘दृश्य’। एक पति अपनी पत्नी की लाश को सिर पर ढोकर जा रहा है।

लगभग इसी विषय की कहानी तारा पांचाल बहुत पहले लिख चुके थे। ग्रामीण, अशिक्षित, उपेक्षित, बेहद गरीब पति-पत्नी। बस के भीतर। कंधे पर बेटे का शव। उसे इस तरह रखते-पुचकारते हुए कि वो मरा नहीं जीवित है। वो डरे हुए भयभीत। डाक्टर की हिदायत कि बेटे को मरा हुआ घोषित किया तो  पुलिस बंद कर देगी दोनों को। यह कहानी जिसका यथार्थ इतना कडिय़ल है और कथाकार की कल्पनाशीलता इतनी मारक कि हर पल हौलनाक मंजर उपस्थित होता है। कहानी ‘खाली लौटते हुए’ , लेकिन दिल है कि दुख से भरा। आंखे हैं कि आंसुओं से लथपथ। दिमाग है कि ख़ौफज़़दा!

तारा पांचाल के पास अनुभवों को पकाने और उनकी पुनर्रचना तथा उन्हें  संश्लिष्टता से तहरीर करने की शक्ति थी। प्रत्येक  कहानी के लिए वो एक नई भाषा ईजाद करते और नई कथा शैली भी। उनकी कहानियों के पात्र देहाती, किसान, मजदूर, औघड़, दलित, शोषित, ग़र्दआलूद, अपने समय से पिछड़े  हुए, तंगहाल जीवन जीते हुए, भद्रजनों के समाज से बहिष्कृत – तारा की कहानियां ऐसे पात्रों के पक्ष में खड़ी न्याय मांगती, प्रतिवाद की सशक्त आवाज़ पैदा करती कहानियां हैं।

उनकी कहानियों के पात्र अति साधारण। लेकिन इन्हीं साधारण पात्रों  के बीच वो असाधारण कहानियां रचते चले जाते – खाली लौटते हुए, निक्कल, टिक्स, झूठे, निर्माता, फोटो में बच्चा, गिरा हुआ वोट तथा मुनादियों के पीछे! उनका एकमात्र कहानी संग्रह ‘गिरा हुआ वोट’ प्रकाशित हुआ। उनकी एक कहानी है दीक्षा। मठ के प्रपंच पर तीखे कटाक्ष करती इतनी जीवंत कहानी। मोह से मुक्ति का पाठ पढ़ाने वाला  महंत, स्वयं मोह के जंजाल में फंसा है। कहानी दृश्यात्मक है। औघड़पन, धूनी आंच, अंधेरा-उजाला, महंत का रोग, स्मृति, विभ्रम, चिलम भरना, बुड़बुड़ाना-कहानी को पाठक पढ़ते हुए ‘देखता’ भी है। यह  ‘देखना’ कहानी की शक्ति है और विशेषता। यह हुनर तारा पांचाल में था। लेकिन विडम्बना यह है कि तारा पांचाल जैसा ग्रामीण परिवेश की कहानियां लिखने वाला। प्रेमचंद की परम्परा को जिंदा रखने वाला कथाकार इस दुनिया से विदा हो गया।

ललित कार्तिकेय किसी नक्षत्र की तरह उभरे। उनमें प्रतिभा का विस्फोटक था। कहानी के भीतर चुनौतियां पैदा करना और फिर उनसे टकराना, उनका मकसद था और यही उनकी शैली भी थी। प्रयोग के स्तर पर वो एक दुस्साहसी कथाकार थे। उनके भीतर एक बेचैन कथाकार हर वक्त, बदलती दुनिया के तौर-तरीकों से सचेत रहता था। उन्होंने न सिर्फ अपनी कथाभाषा को विकसित किया, बल्कि कहानी के शिल्प और शैली में जमकर तोडफ़ोड़ की। उन्होंने सामाजिक विडम्बनाओं, मध्यवर्गीय पाखण्ड,  धर्मभीरूता, मक्कारी, यांत्रिकता और कायरता पर तीखी भाषा में प्रहार किया। उनकी कहानियों में वो समाज दिखाई देता है। जो नए मूल्यों की गर्दिश में, टूट-बिखर रहा है। वो बदहवास होते समाज की विकलांग नैतिकता और गणित की किताब जैसे रोजऩामचे को रेशा-रेशा खोलते चले जाते हैं। कसा हुआ शिल्प, गूढं अर्थ देती भाषा और इन्हीें तत्वों से छनकर आती शैली। हीलियम, त्रिशंकु का प्रेत, हौवा, एक कलावादी की फुसफुसी ट्रेजेडी तथा तलछट का कोरस!

ललित की कहानियों के पात्र बेहद जमीनी टूटते-जूझते, समाज की अमानवीयता से त्रस्त। व्यर्थता का बोझ ढोते। बाजारवादी सोच से अभिशप्त। ‘तलछट का कोरस’ ललित कार्तिकेय का एकमात्र कहानी संग्रह है जो अपनी तरह का अनूठा संग्रह है। तलछट का कोरस कहानी ने न केवल नई बहस को जन्म दिया। यह अहसास भी कराया कि कथाकार में साहसिक इच्छा शक्ति हो तो नए प्रयोग भी किए जा सकते हैं।

भगवान दास मोरवाल काला पहाड़ जैसे उपन्यास से राष्ट्रीय फलक पर उभरकर आए। फिर उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने कहानियां भी लिखी। एक कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ।

इस दौरान हरियाणा के कुछ और कहानीकारों के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। अमृतलाल मदान जो नाटक और उपन्यास में यश अर्जित कर रहे थे, वहीं कहानी के क्षेत्र में भी सुक्खू जैसी वंचित के पक्ष में यादगार कहानी लिखीं। ओमसिंह अशफाक ट्रेड यूनियन से जुड़े रहे। आलोचना और अन्य साहित्यिक गतिविधियों में शरीक रहे। कहानियां भी लिखी। ‘अथ नव दैत्य कथा’ बाजारवादी छद्म और कार्पोरेट जगत के विसंगत पर प्रहार करती बेमिसाल कहानी है। राम कुमार आत्रेय  लघुकथाएं लिखते रहे। एक कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुआ। ‘पिलूरे’ उनकी सशक्त कहानी है। सरबजीत के पास कहानी का नया संज्ञान था। टूटते मूल्यों और मन के अन्तद्र्वन्द्व को केंद्र में रखकर कुछेक ताजादम कहानियां लिखी। इसी दौर में मधुकांत, विकेश निझावन, सुभाष रस्तोगी जैसे कहानीकारों ने एक विषय को बार-बार दोहराया। उनकी ‘टाइप्ड’ और ‘कटपीस’ कहानियां, हरियाणा के कथा लेखन में कोई हलचल पैदा नहीं कर सकीं।

माधव कौशिक मूलत: गज़लकार हैं। लेकिन उन्होंने समय-समय पर जितनी कहानियां लिखीं, उनमें अपने समय का  यथार्थ, तीव्रता और तीक्ष्णता से मिलता है। वो इस नकार का भी प्रतिवाद करते हैं जो सामाजिक रूढिय़ों और जड़ हो चुकी रीतियों के रास्ते से होकर आता है। उनके पास स्मृतियों को कलात्मकरूप से व्यक्त करने की तौफ़ीक हासिल है। मसलन रोशनीवाली खिड़की। इस कहानी में स्मृतियों की अपनी जगह है। इसके साथ दो संस्कृतियों (चंडीगढ़ और भिवानी) जैसे शहरों का द्वंद्व भी सशक्त रूप से व्यक्त हुआ है। उनकी कहानी आफिसर्ज क्लब नए समाज और उसके द्वारा गढ़े गए नए मूल्यों की कहानी है। यहां जो संस्कृति है। दरहक़ीक़त वो अपसंस्कृति ही है। यहां उच्चाधिकारियों का रूमानियत, ठाठ बाट, रंगीनी, रस रंजन और भ्रष्टाचार से कमाए पैसे का बंटवारा। तथा सौंदर्य प्रतियोगिता। यह सौंदर्य प्रतियोगिता, स्त्री देह तक पहुंचने की वाली सुरंग है। माधव कौशिक की यह बेहद सशक्त कहानी है, जिसे उन्होंने नई कथाभाषा में व्यक्त किया है।

हरियाणा कथा लेखन में महिला लेखिकाएं भी सक्रिय रही हैं, लेकिन उनका कोई महत्वपूर्ण योगदान दिखाई नहीं देता।

हरियाणा के युवा कथाकारों की ताज़ादम उपस्थिति आश्वस्त करती है। हरियाणा ही नहीं राष्ट्रीय $फलक पर भी उन्होंने कहानियों के जरिए दस्तक दी है। इन युवा कथाकारों ने बदलते समाज के बिगड़ैल मूल्यों और विखंडित विश्वासों के तलघर में झांकने की जरूरी कोशिश की है। यहां नए प्रयोग का साहस तथा कहानी के प्रति गहरा लगाव भी दिखाई देता है। हरभगवान चावला, नवरत्न पाण्डेय, ब्रह्मदत्त शर्मा, अमित मनोज,  विपिन चौधरी, अमित ओहलाण तथा सुरेश घनघस अपने समय का संज्ञान ले रहे हैं।

हरभगवान चावला के पास आंचलिकता के गाढ़े अनुभव हैं तो लोक  जीवन की अनेक छवियां भी उनके कथा लेखन में मौजूद हैं। कहानी लेखन में जिस धैर्य, ताप और संयम की जरूरत होती है, वो हरभगवान के पास मौजूद है। वो महज कहानियां नहीं लिखते, कहानियों में लोक जीवन की आख्यान रचना भी करते चलते है। मसलन उनकी कहानी रोज़रूखाला (रखवाली करने वाला) यह शब्द संभवत: उन्होंने खुद ईजाद किया है। यहां रोज़रूखाला का मेहनतकश जीवन, कठिनाइयां हैं वो तो हैं लेकिन कहानी को जिस शिल्प में व्यक्त किया गया है, वो अद्भुत है। रोज़रूखाला का गाढ़ा दुख, इस निस्संग समय में अपना एक प्रतिसंसार रचता है। बिल्कुल इसी तरह की कहानी बीरबहूटी और पता-ठिकाना कहानियां हैं। इन कहानियों का वातावरण हैरान करता है तो कथा शैली विस्मित करके रख देती है।

हरभगवान चावला की कहानियों के पात्र ठेठ देहाती, लोकजीवन से जुड़े, दीन हीन दलित, उपेक्षित, वंचित, संघर्षशील, टूटकर भी हार न मानने वाले होते हैं। हरभगवान चावला शहरी मिज़ाज की कहानियों के बरअक्स अपनी जमीनी लोक रंग तथा लोक हकीकतों की कहानियां  लिखते चले आ रहे हैं। इसीसे उन्होंने हरियाणा के कहानी परिदृश्य को समृद्ध किया  है। बेशक अप्रैल-2016 में  कथा देश में प्रकाशित एक तन्हा शजर उनकी साधारण कहानी है। पिता द्वारा बेटी का बलात्कार – इसे कहानी का विषय बनाना इतना सरल नहीं था कि अखबार की खबर को एक विस्तृत खबर में बदल दिया जाए। कहानी का अंत पहले से तय था।

इसके बावजूद हरभगवान चावला हरियाणा के सचेत, अनुभव सम्पन्न तथा ग्रामीण अनुभूतियों के विरल कथाकार हैं।

बिल्कुल नए समय के युवा कवि, सम्पादक और कथाकार अमित मनोज ने हरियाणा के कथा परिदृश्य में जरूरी हस्तक्षेप पैदा किया है। वो ग्रामीण परिवेश से आते हैं। वो एक बेचैन युवा कवि और कथाकार हैं ग्रामीण जीवन उनकी कहानियों (और कविताओं) में कथ्य का रूप अख़्तियार करता है।  अमित  मनोज ने पिछले वर्ष ‘रेतपथ’ पत्रिका का कविता विशेषांक छापकर यह अहसास कराया कि हरियाणा में सृजन शक्तियां, प्रबल भावना के साथ काम कर रही हैं।

वो कहानी के लिए कोई कृत्रिम शिल्प नहीं गढ़ते। सहजभाव से कहानी लिखते हैं जो विश्वास पैदा करती है जैसे कि सपने, चूडिय़ां, सूखे पर फोटो तथा नकचूटी कहानियां हैं। ‘घास, भैंस और कलावती’ कहानी में एक सादगी से भरपूर, संघर्षशील, निर्धन ग्रामीण महिला की मार्मिक कहानी है। एक तरह से यह संघर्ष, निर्धनता और स्त्री के दुख की आख्यान रचना भी है। वंचित की पीड़ा, उम्मीद का टूटना क्या होता है वो इस कहानी में तहेदिल से तहरीर हुआ है।

विपिन चौधरी सशक्त कवयित्री, अनुवादक और कथा लेखिका है। उनमें बेचैन कर देने वाली जिज्ञासाएं हैं। ये जिज्ञासाएं, नए बनते समाज की कंद्राओं तक ले जाती हैं। अनुभवों की पुनर्रचना करना और पात्रों के मनोविज्ञान को कथानक में तबदील करने का हुनर उनमें है। आक्टोपस की मुख्य पात्र ‘दीदी’ का कम्पलैक्स और जटिल चरित्र की संरचना! यह महानगरीय नई तहज़ीब की विडम्बनामूलक कहानी है, जिसमें मैं पात्र की दीदी, किसी उलझे हुए धागे का गुच्छा प्रतीत होती है। विपिन ने थोड़े समय में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। हिन्दी काव्य जगत में उनकी संवेदन लय को सुना जाने लगा है। तो कहानियों में उन्होंने अपनी एक युवा कथा लेखिका के रूप में शिनाख्त अर्जित की है। उनकी कहानियां हंस, कथादेश, पाखी परिकथा पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चित हुई हैं।

विपिन, कहानी के आसान रास्ते नहीं चुनतीं। वो अपनी कहानियों में पात्रों के जटिल व्यवहार को कहानी का कथ्य बनाती हैं। इसके लिए वो नया शिल्प और शैली ईजाद करती है। वो आधुनिक कथाबोध की कहानी लेखिका हैं। हंस में प्रकाशित उनकी कहानी – प्रेम की इबारत पर परकाया प्रवेश और चमकीला $फरेब – नए समय के प्रेम और उसके अहसास, द्वंद्व और $खलिश की ‘स्टाइलिश’ कहानी है। बिल्कुल इसी तरह उनकी पाखी अगस्त अंक में प्रकाशित वॉकआऊट कहानी की रेणु जो प्रेम और अकेलेपन के बीहड़ में आत्मनिर्वासित जैसी। ऐसी कहानियां लिखने के लिए जिस हांट करती शैली और भाषा की ज़रूरत होती है, विपिन चौधरी के पास वो सब है।

ब्रह्मदत्त शर्मा हरियाणा कथा साहित्य में तेजी से उभर कर आए हैं। उनके कहानी संग्रह-‘चालीस पार’ और ‘मिस्टर देवदास’ प्रकाशित हो चुके हैं। उत्तराखंड त्रासदी पर उन्होंने उपन्यास भी लिखा है। उनकी कहानियों के पात्र मध्य वर्ग से आते हैं। ब्रह्मदत्त मध्यमवर्गीय समाज की जीवन शैली और साइकी को खूब समझते हैं। उसी मिजाज को कहानी के शिल्प में गढ़ते हैं। मसलन फैसला कहानी (देस हरियाणा अंक एक) यहां धन का वर्चस्व, बाजारवादी संस्कृति, संबंधों में जड़ता और यांत्रिकता का प्रवेश! मीशेल फूको ने कहा है-पदार्थीकरण और यांत्रिकता संबंधों को विखंडित कर देगी। वो हो भी रहा है। बड़ा भाई अपनी जमीन बेचकर शहर में घर बनाने चला जाता है। यहां द्वंद्ध भी है। कशमकश, स्मृतियां – कहानी के भीतर पात्र के मनोविज्ञान को प्रखर रूप से व्यक्त करती हैं।

ब्रह्मदत्त कथातनाव को बरकरार रखते हैं। उसे अंत तक टूटने नहीं देते जैसे कि आ अब लौट चलें और प्लॉट कहानियां। कारपोरेट जगत का चातुर्य और उसके बरअक्स सीधे सरल लोग! ताकतवर लोगों का समाज साधारण की उपेक्षा करता है। मिस्टर देवदास – यह नए समय के नए प्रेम प्रसंगों की कहानी है। नए समय अैर बदलते मूल्य। खारिज होती संवेदना। व्यर्थ होती भावना। मन की बेचैनी। उथल पुथल। द्वंद्ध और क्षोभ। यह कहानी हमारे नए समाज का चेहरा रिफ्लैक्ट करती है। चेहरे जो  टाइमटेबल के बोर्ड ैसे होकर रह गए हैं।

कहानी लिखते हुए कथाकार उस लोक को उद्घाटित करता है, जिसे संसार नहीं जानता। ऐसा भी हो सकता है संसार उन अनुभवों को जानता हो जिस पर कथाकार अपनी कहानी का निर्माण  करना चाहता हो। ऐसे में वो बिल्कुल नए शिल्प से अनुभवों को तहरीर करता है।

अमित ओहलाण ने यही किया है। यह उनकी पहली कहानी है – बूंदें गिरती रहेगी लेकिन….पाखी-जून 2016 में प्रकाशित। यहां जो इमेजिज की रचना है, वो चकित करती है। यह एक प्रेम कहानी है। यह कहानी किसी पाठ की तरह है कि प्रेम कहानी इस तरह भी लिखी जा सकती है। प्रेमी ‘मैं पात्र’ शिद्दत की गर्मी में, जामुन के पेड़ के बीच बैठी प्रेमिका तक पहुंचता है। उसका वहां तक पहुंचना, कल्पनालोक की रचना है। ठेठ देहाती यथार्थ लेकिन कल्पना की शक्ति से तिलिस्म की रचना। गांव के भीतर युवा प्रेमी प्रेमिका का एक निजी, भावनाओं से लबरेज गांव। जलती दोपहर, गांव के कुत्ते, गायेंं, देसी कीकरों की बणी, खेत, ट्रैक्टर, चप्पल! प्रेमिका तक पहुंचना। संवादों की अनोखी जमीन का तैयार होना। प्रेम कहानी जैसे कोई स्मृति आख्यान हो और इस बीच चिड़ी चिड़े की लोककथा – प्रेम के व्याकुल प्रश्न। और गाढ़े होते हुए।

सांपला में रहने वाले युवा कथाकार अमित ओहलाण की यह पहली कहानी है। बेहद सफल कहानी। भाषा से खेल खेलना बहुत बाद में हासिल होता है। लेकिन अमित ओहलाण यह खेल अपनी पहली कहानी में खेलते हैं। बिम्ब रचते हैं। रूपक गढ़ते हैं। हर पल नई कथाभाषा से तआरू$फ। खेत, मुंडेर, पगडंडियां, चीटियां, आकाश, घास, धूप, जोहड़ – केवल शब्द नहीं रहते। प्रतीक बनकर उभरते हैं। ऐसा महसूस होता है जैसे कहानी के भीतर कविता लिखी जा रही हो।

नवरत्न पाण्डेय  प्रयोगधर्मी कहानीकार, कवि, रंगकर्मी हरियाणा की मिट्टी से वाकिफ, हवा का रूख समझने वाले, कहानी के बदलते सरोकारों की संचेतना और शऊर रखनेवाले रचनाकार हैं। उनके पास जदीद सोच है और नया कहने की बेताबी। नए शिल्प के लिए वो उदग्र और नए कथ्य की तलाश में व्याकुल रहते हैं। वो कहानियां, कविताएं लिखते कम हैं। नया क्या लिखा जा रहा है – उसे जानने समझने और पढऩे के लिए वो अधीर रहते हैं। वो नाटक करते रहे हैं। नाटक का वातावरण, जीवंतता, एकाग्रता और संतुलन उनकी कहानियों में भी देखा जा सकता है। मसलन हंस जुलाई-2016 में प्रकाशित उनकी कहानी-एक और दिन  तुम्हारे बिना। इस कहानी में कहानी तो है ही, स्मृतियोंं का आखेट है और नाटक की छाया भी। संवाद। पात्रों की कशमकश। प्रेम की अटूट चाहत। अनुपस्थिति का उदास राग और स्मृतियों की व्याकुल करती, ख़्ाामोश-सी धमनियां-जिन्हें कान लगाकर सुना जा सकता है। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे जिन्दगी एक काठ का मंच हो और उस पर नए वक्त के मुंसिफ अपनी आहटें बिछा रहे हों। उनकी एक कहानी है – कहानियां पेड़ों पर नहीं उगतीं। (इसी शीर्षक से उनका कहानी संग्रह भी है।) कहानी में कहानी नहीं, कहानी की खोज है और इसी में कहानी है। कहानी के स्तर पर यह एक प्रयोग है।

नवरत्न पाण्डेय की खूबी यह भी है कि वो कहानी के लिए नए मुहावरे की तलाश करते हैं। कहानी ऐसे लिखते हैं जैसे कोई किस्सागो, किस्से का बयान कर रहा हो। कई बार तो उनकी कहानियां, बतकही केे  अंदाज में बेहद अनौपचारिक। इसके विपरीत, उनकी कुछ कहानियां, समाज के कडिय़ल यथार्थ से शाना-बन-शाना टकराती हुई, मसलन – एक कतरा सच – जो व्यवस्था की जड़ता की कहानी है। नवरत्न की कहानियों का ‘मैं’ पात्र बाजारवादी संस्कृति से टकराता, टूटता उसका उपहास उड़ाता, विडम्बनाओं को तोड़ता जुझारू पात्र है। कहानियों में नवरत्न पाण्डेय, समाज के निरीह पात्र के लिए, सत्ता के ताकतवर प्रतिष्ठानों से प्रतिवाद रचते हैं।

चीन के दार्शनिक लिन यू टांग की पुस्तक है बिटवीन टीयर्स एंड लाफ्टर! आंसू और हंसी के बीच जो जीवन है – हरियाणा के कथाकार उस जीवन पर, यथार्थवादी कहानियां लिख रहे हैं। यहां प्रेम कहानियां भी लिखी जा रही हैं, लेकिन उसमें भी भय है जो  समाज के अहंकार से छनकर आया है।

फाकनर ने कहा था कि कहानी लिखना अंधेरे जंगल में रोशनी की लकीर ढूंढने जैसा है। लेकिन यह रोशनी की लकीर आखिर है क्या?…मनुष्यता, रोशनी की लकीर ही तो है।

हरियाणा के कथाकार उस मनुष्यता की तलाश में व्याकुल होकर कहानियां लिख रहे हैं। कथा परिदृश्य के लिए यह शुभ संकेत है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 80 से  84

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