कविता


बस!
मजूरी मांगने की हिमाकत की थी
उसने।
एक एक कर सामान फैंका गया बाहर!
नन्हें हाथों के खिलौने,
टूटा हुआ चुल्हा, तवा-परात,
लोहे का चिमटा, तांसला
मैले कुचैले वस्त्र
सब बिखरा था गली में।

कुछ डूबा था नाली में
वही नाली,
जिसमें बहता था
पूरे गांव का मल मूत्र
उल्टी पड़ी थी
आम्बेडकर की तस्वीर,
उसके दायें-बांयें
रैदास और कबीर

उनकी भाषा में से उत्तम न्याय था,
सदियों से तयशुदा

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 45

 

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