सिनेमा माध्यम भारत में अपने सौ साल पूरे कर चुका है। सिनेमा ने भारतीय समाज को गहरे से प्रभावित किया है। बदलते हुए समाज को भी सिनेमा में देखा जा सकता है। भारत की अधिकांश आबादी खेती-किसानी से जुड़ी है।  पिछले कुछ समय से खेती-किसानी पर गहरा संकट है, लेकिन सिनेमा जगत में किसानी के संकट को व्यापकता और गंभीरता से प्रस्तुत करने वाली कोई  फिल्म सामने नहीं आई।  यह विडम्बना ही है कि जिस राज्य में मायानगरी है, सिनेमा उद्योग स्थापित है, उसी राज्य के किसान रोजाना आत्महत्या कर रहे हैं और किसी फिल्म निर्देशक का इस समस्या पर कोई ध्यान नहीं कि वह किसान संबंधी समस्याओं को परदे पर उकेरे।

आरंभिक सिनेमा में कुछ सराहनीय प्रयास हुए। कुछ संवेदनशील निर्देशकों ने किसान जीवन की समस्याओं से संबंधित अच्छी फिल्मों का निर्माण किया। किसानों के जीवन से प्रेरित सबसे पहले सआदत हसन मंटो द्वारा लिखी ‘किसान कन्या’ फिल्म आई, जिसमें किसान जीवन का थोड़ा-बहुत वर्णन मिलता है परन्तु इस फिल्म का व्यापक प्रदर्शन भी नहीं हो पाया।

                1951 में बिमल रॉय की बलराज साहनी अभिनीत ‘दो बीघा जमीन’ फिल्म आई। लगभग सतासठ साल पहले इस फिल्म में किसान जीवन की जिस सच्चाई को प्रस्तुत किया गया, आज भी वैसी की वैसी ही है। कर्ज के भार में दबे होने के बाद भी अपनी जमीन से प्रेम। यही है – दो बीघा जमीन। इस फिल्म का मुख्य पात्र शंभू है। उसके लिए उसकी जमीन मां  है, इज्जत है, सब कुछ है। गांव का जमींदार  हरनाम उसकी जमीन को हड़पकर फैक्टरी लगाना चाहता है। शंभू अनपढ़ है। वह जमींदार के षड्यंत्र में फंसकर अपनी जमीन गंवा बैठता है। कर्ज मुक्त होने के लिए शहर जाता है और वहां रिक्शा चलाता है। उसका सारा परिवार बिखर जाता है और वह तय सीमा तक साहूकार का पैसा नहीं चुका पाता। जमींदार उसकी जमीन में फैक्टरी लगा देता है। शंभू जब गांव आता है तो वह अपनी जमीन  से मु_ी भर मिट्टी लेना चाहता है लेकिन सुरक्षा कर्मी उसे ऐसा करने नहीं देता और उसे वहां से भगा देता है। इस फिल्म की तीखी आलोचना हुई थी। इसे नव-यथार्थवाद के नाम पर कूड़ा तक कह दिया गया था, क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था इसे हजम नहीं कर पाई थी।

1957 में आई महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ किसान जीवन का महाकाव्य मानी जा सकती है। इस फिल्म में भी किसान कर्ज के भार से दबा हुआ है। बर्बर जमींदार भारी ब्याज पर किसान को कर्ज देता है। कर्ज न चुकाने पर वह उसकी इज्जत से भी खेलने की कोशिश करता है। 1961 में मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की जोड़ी’ पर आधारित ‘हीरा मोती’ नामक फिल्म आई। इस फिल्म में भी किसान जीवन का चित्रण मिलता है। 1967 में मनोज कुमार रचित ‘उपकार’ फिल्म में भी राष्ट्रवाद के साथ किसान जीवन देखने पर मिलता है। 1988 में आई रवीन्द्र पीपल निर्देशित  स्मिता पाटिल अभिनीत ‘वारिस’ फिल्म में भी पति की हत्या के बाद पारो अपनी भूमि को बचाने के लिए चरम-त्याग की राह अपनाती है।

                कुछ साल पहले श्याम बेनेगल निर्देशित ‘वेल्डन अब्बा’ नामक फिल्म आई थी। इस फिल्म में शहर में नौकरी करने वाला ड्राइवर अपने खेत में कर्ज लेकर कुआं खुदवाने आता है, पर उसे नहीं पता कि व्यवस्था इतनी भ्रष्ट है और वह कुआं खुदवाने के लिए इतनी रिश्वत दे देता है जो उसकी जमीन से बड़ी है।

ग्रामीण पृष्ठभूमि से  संबंधित ‘पीपली लाइव’ आमिर खान और किरण राव की एक महान रचना है। इस फिल्म में भी होरी नाम का एक चरित्र है और वो हमेशा गड्ढा खोदता रहता है, पर विडंबना यह है कि उसका खोदा हुआ गड्ढा कभी नहीं भरता और एक दिन न्यूज पेपर की खबर बन जाता है कि गड्ढा खोदने वाला किसान उसी गड्ढे में दबकर मर गया। अभी कुछ समय पहले ‘किसान’ नामक फिल्म भी आई थी  सुहेल खान की, पर वह पूरा निर्वाह नहीं कर पाई।

1991 के बाद स्थिति बदल गई।  आम आदमी सबसे बड़ी दयनीय स्थिति में है, उसके प्रति संवेदनशीलता कम हो रही है। समस्त माध्यम पूंजी के सामने नतमस्तक है।

आज कस्बों से सिनेमा हाल गायब हैं। उनकी जगह मल्टीपलैक्स, पीवीआर आदि ने ले ली है। इसके दर्शकों की रुचि ग्रामीण और किसान के साथ मेल नहीं खातीं। इसीलिए शायद ग्रामीण और किसान जीवन सिनेमा से गायब हो रहा है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज- 26

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