लघुकथा


      रमलू किसान ने इस बार उगी धान की फसल मंडी में 12 रूपये किलो बेची थी। पैसे की तुरन्त जरूरत के कारण उसने अपनी जरूरत को घटाते हुए कम से कम धान अपने घर में बचाकर रखा और बाकी बेच दिया था। परिवार बड़ा था इसलिए तमाम कोशिशों के बावजूद पूरे साल के लिए बचाकर रखा गया धान जल्दी ही खतम हो गया। उसे बाजार से चावल खरीदना पड़ा। जब चावल खरीद कर रमलू घर आया तो वह बहुत उदास था।

”क्या हुआ?’’-उसे उदास देखकर उसकी पत्नी ने पूछा।

”चावल पच्चीस रूपये किलो मिला है।’’-वह खाट पर बैठता बोला।

”पर यह तो बहुत अधिक कीमत है। इतने में तो हमारा धान दो किलो आ जाता।’’- वह बोली।

रमलू ने कुछ कहा नहीं पर सारा दिन उदास रहा।

रात को पत्नी पूछ बैठी-”अब क्या सोच रहे हो?’’

रमलू बोला-”हम पूरे परिवार के लोगों ने इतनी मेहनत करके रात-दिन एक किया और आठ रूपया एक किलो पर खर्च करके चावल उगाया। हमें इतनी मेहनत करके चार रूपये एक किलो धान पर मिला। पर यह कौन हैं जिसने बिना मेहनत किए, हमारा चावल खरीदते ही एक किलो पर 13 रूपये कमा लिए। उसनेे तो धान उगाया भी नहीं था। उसने तो धूप, बारिश में अपनी कमर नहीं तोड़ी थी।’’

रमलू की पत्नी इस प्रश्न से आतंकित हो चुपचाप खड़ी रह गई।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज – 41

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