अशोक भाटिया की लघु कथाएं

लघु कथा


जकड़न

            अगले दिन उन्होंने शापिंग मॉल का रुख किया। वहां वे  हबड़-तबड में सामान देखते रहे। इस बार वे काफी पैसे लेकर गए थे। पत्नी की निगाहें एक क्रीम कार्नर पर पड़ीं। देशी-विदेशी दुनिया भर की क्रीमें वहां मौजूद थीं – वे दोनों थोड़ी देर मन्त्रा-मुग्ध होकर देखते रहे – तभी एक युवती आ गई।

            – आपको किस तरह की क्रीम चाहिए?

            – अभी डिसाइड नहीं किया, पहले देख लें।

            युवती ने एक-एक क्रीम का पैक उठाकर दिखाना शुरू किया – यह चेहरे को गोरा बनाने की है, यह झुरियाँ मिटाने की है, यह कील-मुहांसों को हटाने की है, यह वाली क्रीम आपको धूप से बचाएगी बताइये – कहकर युवती उनकी तरफ देखकर रुकी।

            – अभी देखते हैं।

            – यह सर्दियों से खुश्की से बचाने वाली क्रीम भी है।

इनके अलावा आल-पर्पस क्रीम भी है, इसकी खुशबू देखिए।‘ कहकर युवती ने उसके साथ की एक खुली डिबिया का ढक्कन खोला और उनके मुंह के पास कर दिया।

            दबाव बढ़ता देखकर पत्नी ने कह दिया – यह एक दे दीजिये। ‘युवती ने उत्साह में फिर कहना शुरू किया – हमारे पास हर तरह की क्रीम है। यह देखिए फटी बिवाइयां हटाने की है, और यह प्रेगनेंसी के बाद पेट की झुरियों के निशान हटाने की है…..

पति ने ‘न’ का महीन इशारा कर दिया था

            जब वे घर लौटे तो उनके साथ बिस्कुटों की तीन-चार किस्में, कपों के दो सेट, दर्जन – भर सुंदर हैंगर, नई किस्म की सुंदर महंगी दो झाड़ू वगैरा थे।

            वे थक चुके थे। लेकिन पत्नी चाय बनाकर ले आई और कहने लगी- ‘शॉपिंग अच्छी रही न…लेकिन अभी ‘हेयर केयर’ वाला कोना तो देख ही नहीं पाए, वह कल देखेंगे।  ‘कहकर वह हंसी’

                                    -2-

            उसका बेटा बड़ा हो चला था। एक दिन कहने लगा – पापा, अब मैं ये खटारा स्कूटर नहीं चला सकता। सब लड़के मोटर साइकिल पर पढ़ने आते हैं। वे मुझे चिढ़ाते हैं। मुझे तब बड़ी शर्म महसूस होती है।

            – बेटे, नई मोटर साइकिल ले सकने की हमारी हैसियत नहीं है।

            – पापा, इतनी आसान किश्तों पर पूरा का पूरा लोन मिल जाता है।

            मेरा दोस्त राघव एक घंटे मे ही फाइनेंस कराके मोटर साइकिल ले आया था। साथ में रिस्ट वाच भी मिलती है।

            – पर किश्तें तो हमें ही चुकानी होंगी?

            – पापा, बड़ी आसान किश्तों पर लोन मिलता है। मैं अब मोटर साइकिल नहीं चलाऊंगा तो फिर कब चलाऊंगा?

            पापा को चुप देखकर वह उमंग से भर गया – बाजार जाकर नए ब्रांड की मोटर साइकिल का बड़ा-सा पोस्टर ले आया और उसे गांधी की तस्वीर के ऊपर ही चिपका दिया।

                                    -3-

            ‘सुनो, हमारी गली के चावला औरों ने एक प्लाट बुक कराया है। डेढ़ सौ गज का है।’पति ने कहा।

            – पर हम कहां से लेंगे प्लाट? इस मकान का किराया ही मुश्किल से निकाल पा रहे हैं।

            – ओ हो, भई ‘दिल मांगे मोर’ प्रापर्टी डीलर पूरा लोन कराके देता है। हल्का-सा खर्चा लेता है।

            – लोन की किश्तें कहां से भरेंगे? पल्ले नहीं धेला, करेंदी मेला मेला।

            – ‘आसान किश्तों पर करा लेंगे। सब हो जाता है।’ पति बजिद था।

            – पर भरनी तो हमें ही पड़ेंगी। और फिर किश्तें ही नहीं, उनका ब्याज भी तो भरना होगा, कहां से भरेंगे?

            – ‘अगर दिक्कत हुई तो ब्याज भरने के लिए और लोन ले लेंगे।’ पति ने कहा।

            पत्नी को लगा जैसे कि कोई हाथ उन्हें अपनी जकड़न में लिए जा रहा है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पृ.-21

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।

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