लघु-कथा


धर्म-धंधा

            मोहल्ले का मंदिर एक अर्से से अर्द्धनिर्माण पड़ा हुआ था। दीवारें बन चुकी थीं, छत की दरकार थी। मूर्तियां प्राण-प्रतिष्ठित थीं, अतः श्रद्धालुओं की आवाजाही अनवरत जारी थी। सर्दी-गर्मी-बरसात, आंधी-बबूल्या, ओला-कांकरा झेलते संगमरमर की उन मूर्तियों की कांति फीकी पड़ती गई थी।

            मंदिर निर्माण को लेकर मोहल्ले भर की एक बड़ी मीटिंग मंदिर परिसर में हुई। मसला धर्म परायणता से सन्नद्ध था, सो चूची-बच्चा तक अर्थात् आबाल वृद्ध सबके सब मीटिंग में मौजूद थे। जिसकी जैसी श्रद्धा रही, उसने हाथों हाथ दान दिया।

            धर्मदीन सभा मण्डल के बीचोंबीच बैठा हुआ था। वह स्वयं को भगवान का परम भक्त कहता नहीं अघाता। रात सोते, दिन उठते, राम-नाम सुमरन करता। भगवई पहनता। मस्तक चंदन तिलक शोभता। कानों की लवों और गले के टेटुआ हल्दी की छिटकें होतीं। वह उठ खड़ा हुआ था। उसने माइक हाथ में लिया और श्रद्धालुओं से रू-ब-रू कहने लगा- “ मंदिर की गिरतीं-किरतीं दीवारें, बिन छत बदरंग होतीं मूर्तियाँ हमारी आस्था पर दाग है। हमें भूखो रह कर भी मंदिर निर्माण करवाना होगा। मैं भगवान के समक्ष प्रण लेता हूं कि देश-प्रदेश के धन्ना-सेठों, साहूकारों-भामाशाहों और भक्तों के घर-घर जाऊंगा। झोली फैलाऊंगा और चंदा एकत्रित कर पाँच लाख रूपये की व्यवस्था करूंगा।“ श्रद्धासिक्त हाथों तालियां बज उठी थीं। कण्ठ-कण्ठ वाहवाही हुई।

            उन बातों को चौथा महीना बीत रहा था। सूर्यास्त की लालिमा विलुप्त हो रही थी। पिताम्बर पुजारी मूर्तियांे के सामने अर्घ्य थाल फेरता सांध्य आरती में लीन था। धर्मदीन वहाँ आ खड़ा हुआ था और आरती संपन्न होने तक हाथ जोड़े होंठ बुदबुदाता मंत्रोचारण करता रहा। पुजारी के आसन पर विराजने के बाद धर्मदीन उसके सम्मुख बैठ गया था। उसने रुपए और रसीद पुजारी को संभला दिये थे। पुजारी ने रसीद का पन्ना-पन्ना हिसाब जोड़ा और रुपए गिन लिये। सांस ऊपर-नीचे हुई। पुतलियां घूमीं- ‘रसीद पाँच लाख रुपए की कटी है और संभलाए मात्रा सवा लाख हैं। आटा में नमक तो सुना, यहाँ तो नमक में आटा! ठगई! अंधेर।’

            धर्मदीन ने समीकरणी नजरों के पुजारी की ओर लखा। पुजारी ने रूपये जेब में रख लिये और बैग में से दूसरी रसीद निकालकर धर्मदीन को पकड़ा दी थी।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पृ.- 7

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