धर्मेन्द्र कंवारी

हरियाणवी  कविताएं

धर्मेन्द्र कंवारी

मोल की लुगाईImage may contain: 1 person, glasses and close-up

रामफळ गेल या कै मुसीबत आई

किल्ले तीन अर घरां चार भाई

मां खाट म्ह पड़ी रोज सिसकै

मन्नै बहू ल्यादौ, मन्नै आग्गा दिक्खै

 

हरियाणा म्हं रिश्तां की साध ना बैठै

किल्लां आग्गै जमां तार ना बैट्ठै

एक दिन फूफा घरां आर्या था

गेल एक माणस नै ल्यार्या था

 

ईब और कोए चारा कोनी भाई

ताम्म ले आओ मोल की लुगाई

लाख रप्पियां का इंतजाम कर लिया

झारखंड जाण का दिन बी धर लिया

 

रामफळ बिचौलिए गेल औड़े डिगरग्या

गरीब का गरीब के गैल मेल मिलग्या

रप्पिए भी छोरी के बाप नै नहीं पकड़ै

बिचौलिया अर गाम्म आळ्या नै रगड़े

बहू आग्गी, मां भी होगी कसूती राज्जी

 

पहली रात नै वा बैठी थी घणी मुरझाई

रामफळ नै बेचारी पै कसूती दया आई

हाथ जोड़ कै बोली, तेरी रजा मै खुश रहूंगी

दारू ना पीए, तेरै त पाच्छै नहीं हटूंगी

 

आग्लै दिन वा खेत म्ह रामफळ गेल डिगर्गी

काम इतणा करै, दूसरां की चूंद सी टूटगी

थोड़े एक दिनां म्हं वा सबकै मन भा गी

मोल की लुगाई तो कसूता घर बसागी

 

रामफळ का घर तो न्याहल होग्या

बुढ़िया का भी सूत सा तणग्या

एक दिन रामफळ नहाण लाग्या

एक सांप लिकड़ के उसनै खाग्या

समझ नहीं आया रामफळ कै के होग्या

मुश्किल तै घर मिल्या, घरबारी कित्त खोग्या

रामफळ उस दिन पड्या तो फेर नहीं उठ्या

मोल की लुगाई का तो भगवान भी रूठ्या

 

रामफळ का घर माणस लुगाइयां का भर र्या था

मोल की लुगाई का मन कित्ते और रम र्या था

तीसरी मंजिल तै डांक मारी, माणसां का रूक्का पड़ग्या

अस्पताल ले चाल्लै, कोए गाड्डी लेण बी डिगरग्या

 

वा बोली, कोए फायदा नहीं सुण ल्यो गाम्म के सारै ताऊ-ताई

बस आग्गै तै किस्से की बेटी नै ना कहियो मोल की लुगाई

दूर परदेश तै आकै वा सबकै दिल म्ह जगां बणागी

बेटियां की कदर करण का गाम्म कै जिम्मा लाग्गी

 

 

दादी सुरती

दादी सुरती कै जीवणकाज की तैयारी थी

101 साल की दादी गाम्म म्ह सबतै न्यारी थी

दांत न्यू निपोरा करदी जणू नए चढ़वारी थी

दादा तो डिगरग्या, दादी ईब बी भारी थी

आठ पोते-पोती देख लिए, नौंवें की तैयारी थी

सारै गाम्म म्हं दादी सुरती सबकी दुलारी थी

 

कानां तै थोड़ा ऊंचा सुण्या करदी

लाठी की धमक कसूती पड़्या करदी

बहुआं पै आज बी राज कर्या करदी

सुरती की बात नीची नहीं पड़्या करदी

दादी गैल पूरा कुणबा जुड़र्या था

माणसां तै घर खचाखच भरर्या था

 

काज की बात दादी तै पूछै कौण

70 साल का बेटा रळदू भी मौण

छोटळा पोता दादी का घणा दुलारा था

आज काज की पूछण वोए आर्या था

दादी बात सुणकै चुप रहगी, बोली कोनी

रै दादी चुप रह्गी, किसे कै जची कोनी

उस दिन तै दादी नै खाणा-पीणा छोड़ दिया

सुरती नै जींदे जी जणू बाणा छोड़ दिया

 

गाम्म म्हं फैलगी दादी की चुप्पी आळी खबर

दादी सुरती दुनिया तै जणू होरी थी बेखबर

बडळा बेटा रळदू तो घणाए बेचैन होग्या

हे राम, मेरी मां के चेहरे का रंग कित्त खोग्या

 

बेटा, आपणे घरां एक बड़ का पेड़ होया करदा

दादे ने तो पसंद कोनी था, मेरे मन म्हं बसा करदा

खेत म्हं तै आकै, बाळक ओडै़ए खिलाया करदी

जी की बताऊं सूं, उसनै मैं घणा चाया करदी

 

मेरी नजर वो पेड़ आपणै घर खात्तर सुब था

पत्तै उड़कै चले जांदे ज्यांतै पड़ोसी तंग था

मैं पीहर गई तो तेरे दादे नै वो बड़ कटवाया

मन्नै इसा लाग्गा जणूं उसका काज करवाया

 

मेरी उम्र कोए घणी बड्याई की बात कोनी

जो जग मैं आया सै जावैगा, रवै साथ कोनी

जीवण काज तै आच्छा तो मेरी बात मान जाओ

गाम्म म्ह छोरियां का बढ़िया सा स्कूल बणाओ

 

दादी की बात का घर अर गाम्म म्हं मान होया

काज आळै पिस्सा तैं स्कूल का काम होया

गाम्म आळ्यां नै अपणी तरफ तै दिया चंदा

हर कोए चावै था, दादी का मन रवै चंगा

छोरियां कै तो कसूता चा सा चडर्या था

रै म्हारै गाम्म म्हं, म्हारा स्कूल बणर्या था!

 

एक रात दादी सुरती चाणचक डिगरगी

गाम्म आळ्यां पै तो जणू बिजळी सी पड़गी

दादी कै हाथ तै स्कूल का फीत्ता कटणा था

गाम्म गुवाण्ड म्हं उद्घाटन का कार्ड बंटणा था

 

दादी सुरती आज भी गाम्म म्हं जिंदा रह्ं सै

छोरियां कै स्कूल म्ह बेटियां खूब पढ़ैं सैं

स्कूल का जिलेभर म्हं रूक्का पडर्या सै

दादी सुरती का नाम स्कूल पै चढ़र्या सै

 

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पृ.-56

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।

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