रामकिशन राठी

(रामकिशन राठी रोहतक में रहते हैं। कहानी लेखक हैं । हरियाणवी भाषा में भी निरतंर लेखन करते हैं और समाज के भूले-बिसरे व अनचिह्ने नायकों पर लेख लिखकर प्रकाश में लाने का महती कार्य करते हैं -सं.)

रागनी

उल्टे खूंटे मतना गाडै मै त्यरै ब्याही आ रही सूं
लोक-लाज तैं डर लागै सै दुनियां तैं सरमा रही सूं

लख-चौरासी जून भोग कै या माणस जूनी थ्यावै सै
बिना पढ़े हों पसु बराबर, वेद सास्तर गावै सै
अकल बिना माणस दुख पावै अक्कल नैं सुख पावै सै
सही जाण ले बात मान ले या सावित्री समझावै सै
लोक-लाज तैं डर लागै सै दुनियां तैं सरमा रही सूं

राम कै सीता जनकदुलारी, घणी विदूषी ब्याही थी
लव-कुश जैसे बेटे जन्मे, जिनकी अजब पढ़ाई थी
शकुंतला नै भरत जन्या था, जो कणव ऋषि की जाई थी
दरिया में गूठी खो दी, जो मछुआरै नै पाई थी
भारतवर्ष बसाया था, मैं ज्यातैं ध्यान लगा रही सूं
लोक-लाज तैं डर लागै सै दुनियां तैं सरमा रही सूं

इज्जत बणती हो तै उसमें, उल्टा हाटणा ठीक नहीं
भले काम में नीत बणै तै, उड़ै नाटणा ठीक नहीं
आच्छी शिक्षा मिलती हो तै, बात काटणा ठीक नहीं
सुधरै जड़ै समाज बावले, नुकस छांटणा ठीक नहीं
कुछ पढ़-लिख कै आ रही सूं तै घर नै ठीक बसा रही सूं
लोक लाज तैं डर लागै सै दुनियां तैं सरमा रही सूं

फेर कहूं सूं पति मेरे, तू बात मान ले मेरी हो
कालेज में जै नहीं पढ़ी तै, मेरे गात की ढेरी हो
हाथ जोड़ कै पां पकडूं सूं इतनी ए बात भतेरी हो
पढ़ लिख कै विद्वान बणूं तै इज्जत बढ़ ज्या तेरी हो
घणी सिफारिश करवावण नै, मैं रामकिशन नै ल्या रही सूं
लोक लाज तैं डर लागै से दुनियां तैं सरमा रही सूं।

संपर्क – 94162-87787

 

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