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वैचारिक एवं वैज्ञानिक संघर्ष के पुरोधा क्रांति पुरुष महामना रामस्वरूप वर्मा

एडवोकेट रवीन्द्र कुमार कटियार

निष्कलंक, निष्पक्ष, स्वयं चेता मानवतावादी!
लोभ नहीं धन, पद का चिंतक, त्यागी, समतावादी!
जिसके तर्क अकाट्य विरोधी भी सुनते हों आतुर!
किया असंभव को भी संभव चाहे जितना भी हो दुष्कर!!

     उत्तर भारत में सर्वाधिक बौद्धिक वैज्ञानिक एवं वैचारिक संघर्ष के पुरोधा, क्रांति सृष्टा महामना राम स्वरूप वर्मा का जन्म 22 अगस्त सन् 1923 ई0 को कानपुर जनपद की राजपुर विधान सभा के अंतर्गत ग्राम गौरीकरन में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके बाबा का नाम रामगुलाम व पिता का नाम वंश गोपाल तथा माता का नाम सुखिया था। वर्मा जी चार भाई क्रमशः काशी प्रसाद, मोहन लाल, मिजाजीलाल व स्वयं वर्मा जी थे। वर्मा जी के पूर्वज कुर्मी जाति के थे, जिनकी उपजाति कटियार थी। वर्मा जी के पारदर्शी जीवन में तथागत बुद्ध की बौद्धिकता (वैज्ञानिकता), कबीर का अक्खड़पन, महात्मा फूले की सामाजिक क्रांति, शासन प्रशासन में राजर्षि शाहू जी जैसी भागीदारी की सोच, बाबा साहेब डा. अम्बेडकर जैसे शोषण के प्रति विद्रोही तेवर, लौह पुरुष सरदार पटेल जैसी कृषक हितों की भावना के अतिरिक्त उनकी वाणी से विषमतावादी संस्कृति की जगह मानवतावादी संस्कृति की स्थापना हेतु आचार-विचार, संस्कार एवं त्यौहार में आमूल चूल परिवर्तन करने की अंतहीन  विचारधारा प्रवाहित होती हुई दिखायी देती है, उनका नाम और विचार सुनकर यथास्थिति वादियों का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता और पैरों के नीचे जमीन खिसकती प्रतीत होने लगती। मानवीय वर्मा जी छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता आंदोलनों में रूचि लेने लगे थे। मानवीय वर्मा जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सन् 1948 में हिन्दी से एमए करके आगरा विश्वविद्यालय से 1951 में विधि की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान लेकर प्राप्त की। वे कुशाग्र बुद्धि थे, जिससे हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, विज्ञान, भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, दर्शन शास्त्र आदि विषयों में भी गहन अध्ययन प्राप्त करके विशेषज्ञता प्राप्त की थी। वर्मा जी ने आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण की थी, परंतु सरकारी सेवा में जाने के बजाए सामाजिक संघर्ष का रास्ता चुना। इसलिए साक्षात्कार नहीं दिया। विदेशी आर्यों द्वारा देश के मूल निवासी उत्पादकों का पीढ़ी दर पीढ़ी गुलाम व लाचार रखकर  स्वयं को श्रम कार्यों से पूर्णतया मुक्त कर श्रेष्ठ एवं शासक बनाए रखने के लिए बनाई गई वर्ण एवं जाति व्यवस्था को मिटाने के लिए दिन रात मेहनत करने वाले किसानों, मजदूरों का धर्म एवं जाति के नाम पर हो रहे शोषण उत्पीड़न से उद्वेलित होकर वर्मा जी समाजवादी आंदोलन से जुड़े और डा. राममनोहर लोहिया के सम्पर्क में आकर अपनी चिंतन क्षमता से शीघ्र ही उनके राजनीतिक सलाहकार हो गए। डा. लोहिया की सोच थी कि समाजवादियों को आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र में संभव समता (समाज के विभिन्न वर्गों की भावनाओं अर्थात् सामाजिक आर्थिक क्षेत्र में उनके द्वारा समता के व्यवहार की संभावना) का व्यवहार करना चाहिए। वर्मा जी का मानना था कि सदियों से अपमानित व निरादरित लोगों के साथ समता का व्यवहार करने की आवश्यकता है। संभव समता के आधार पर सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में विषमता का लाभ उठा रहे लोग स्वेच्छा से कोई त्याग करने वाले नहीं हैं। इस नाते संभव समता के स्थान पर सचेत समता स्थापित करने का काम वर्मा जी ने किया। जहां लोहिया जी राजसत्ता प्राप्ति को सामाजिक उत्थान का आधार मानते थे, वहीं वर्मा जी समानता का मूल राजसत्ता को मानने से इन्कार करते थे। डा. लोहिया पुरुषों तक सीमित रखकर समाजवादी आंदोलन के पक्षधर थे। वहीं वर्मा जी स्त्री-पुरुष, बच्चे, बूढ़े अर्थात सामाजिक संरचना की समस्त इकाइयों को बराबरी का हक दिए जाने के पक्षधर थे। उन्होंने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। इन मुद्दों पर डा. लोहिया से उनका तर्क-वितर्क लगातार तीन दिनों तक चला और अंततः लोहिया जी ने वर्मा जी की सोच से सहमत होकर इसकी जिम्मेदारी भी वर्मा जी को सौंप दी। सोशलिस्ट पार्टी वर्गविहीन और वर्ण विहीन समाज स्थापित करना चाहती थी, किंतु उसके अधिकांश राजनैतिक मठाधीश जो अभिजात्य वर्ग से थे। इसका व्यवहारिक स्वरूप नहीं देना चाहते थे। गया बिहार में आयोजित सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में वर्मा जी ने अपनी (अर्जक संघ की) वैज्ञानिक एवं मानववादी विचारधारा को अपनाने का प्रस्ताव रखा, जिसमें सवर्ण समाजवादियों ने एकजुट होकर इस प्रस्ताव का विरोध किया। सोशलिस्ट पार्टी की कथनी करनी का अंतर देखकर वर्मा जी ने कहा कि पार्टी केवल सत्ता पाना चाहती है। वास्तव में सामाजिक परिवर्तन नहीं चाहती है, तब वर्मा जी ने दुखी होकर सोशलिस्ट पार्टी छोड़ दी और अर्जक संघ की विचारधारा को आधार बनाकर समाज दल नामक राजनैतिक पार्टी का गठन किया तथा उसी समय बिहार के लेनिन महान क्रांतिकारी बाबू जगदेव प्रसाद ने भी सोशलिस्ट पार्टी के कथनी करनी के अंतर से दुखी होकर सोशलिस्ट पार्टी छोड़कर शोषित दल का गठन किया। वर्मा जी एवं बाबू जगदेव प्रसाद की वैचारिक समता ने आगे चलकर दोनों दलों का विलय कर शोषित  समाज दल का नाम दिया। वर्मा जी ने कानपुर जिले के राजपुर विधान सभा का प्रतिनिधित्व वर्ष 1957, 1967, 1969, 1980, 1986 व 1991 में किया।

मानवीय वर्मा जी 1967 मे उत्तर प्रदेश की चौधरी चरण सिंह की संविद सरकार के वित्त मंत्री बने वर्मा जी ने वित्त मंत्री के रूप मे जनता पर लागू तीन करों को समाप्त करके कर्मचारियों के महंगाई भत्ते बढ़ाकर बिना कोई नवीन कर लगाए ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित करते हुए बीस करोड़ के लाभ का बजट हिन्दी में प्रस्तुत करके आर्थिक जगत में हलचल पैदा कर दी। सारे विभागों से अंग्रेजी टाइपराइटरों को हटाकर हिन्दी टाइपराइटरों को रखवाकर राष्ट्र भाषा के प्रति अपने लगाव को स्पष्ट किया। हिन्दी के देशव्यापी आंदोलन में वर्मा जी ने सरकार में रहते हुए कई बार जेल यात्रा की। वर्तमान में जहां कुर्सी के लिए महामना फूले, शाहू, अम्बेडकर आदि के विचारों एवं शोषितों, पिछड़ों के हितों की बलि देने में राजनैतिक दल व राजनेता नहीं हिचकते, वहीं सिद्धांतों व आदर्शों की व्यवहारिक राजनीति करने वाले महामना वर्मा जी ने इंदिरा जी व वी.पी. सिंह द्वारा दिए गए मुख्यमंत्री पद के लाभ को नकार कर अपने वैचारिक व्यवहार पर धब्बा नहीं लगने दिया। वर्मा जी का चरित्र निष्कलंक व पूरी तरह से निष्पक्ष रहा है।

प्रतिपक्ष के विधायक के रूप में उनके द्वारा प्रस्तुत रेलवे टिकट (कूपन) संदर्भित विधेयक का विधान सभा में पास होना उनकी महान योग्यता का एक अध्याय है। वे महान समाज शास्त्री विधिवेत्ता,  महान दार्शनिक,  असाधारण क्षमता के राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री थे। उनका मत था कि भारतीय सामाजिक विषमता में उच्च वर्गीय एवं उच्च वर्णीय नेतृत्व के कारण राजनीति में अधिकांश पिछड़े, दलित, अल्प संख्यक परंपरागत मानसिकता के नेतृत्व के अनुगामी होकर मात्र उनका झोला उठाने वाले पिछलग्गू बने रहते थे। पिछड़ों, दलितों व अल्पसंख्यकों का वही हित कर सकता है, जो स्वयं चेता और आत्मविश्वासी हो। वर्मा जी ने शोषित समाज दल का लिखित सिद्धांत, वक्तव्य, विधान और कार्यक्रम देकर मूल्यों और सिद्धांतों पर आधारित राजनीति का रास्ता  दिया। अपने समय के वे एक मात्र ऐसे विधायक थे, जिन्होंने विधान सभा द्वारा बढ़ाया गया विधायकों का भत्ता जनता पर बोझ कहकर लेने  से इन्कार कर दिया। इसके बावजूद भत्ते की बढ़ी हुई धनराशि को वर्मा जी के नाम से उनको भेजा गया, किंतु उन्होंने उसे न लेकर अपनी दृढ़ता का परिचय दिया। उन्हें कभी भी धन व पद का मोह नहीं रहा।

उत्तर प्रदेश की संविद सरकार के मंत्री के रूप में उन्होंने बाबा साहब डा. अम्बेडकर का साहित्य प्रदेश के सभी सरकारी पुस्तकालयों में रखवा दिया, किंतु मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह को यह स्वीकार नहीं हुआ, जिससे चौधरी चरण सिंह ने अपने स्तर से सारा साहित्य वापस करवा लिया। डा. आम्बेडकर की पुस्तक ‘जाति भेद का उच्छेद और सम्मान के लिए धर्मान्तरण करें’ को असामाजिक कहकर जब्त कर लिया गया। वर्मा जी ने अर्जक संघ के क्रांतिकारी नेता पैरियार ललई सिंह यादव के माध्यम से साहित्य जब्ती को मानवीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसमें तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ ने प्रतिबंध समाप्त कर दिया। विपक्षी विधायक की हैसियत से वर्मा जी ने पुनः साहित्य को सरकारी पुस्तकालयों में रखवाने का प्रस्ताव विधान सभा में रखा, जो बहस के बाद विषमता वादियों की बहुलता के कारण अपने वैचारिक व्यवहार पर धब्बा नहीं लगने दिया। वर्मा जी का चरित्र निष्कलंक व पूरी तरह से निष्पक्ष रहा है।

वर्मा जी सिद्धांतों के प्रति कठोर किंतु व्यवहारिक रूप से अत्यंत करूणावान थे। वर्मा जी ने राजपुर क्षेत्र के किसानों की खेती की  सिंचाई समस्याओं के समाधान हेतु वर्ष 1974 में यमुना नदी से लिफ्ट करके नहर बनाए जाने के लिए अमराहट पम्प कैनाल योजना नामक जेलभरो  आंदोलन चलाया और क्षेत्र के किसानों के लिए नहर मंजूर करवायी, परंतु अभी तक स्वीकृति के अनुरूप सरकार द्वारा नहर का कार्य पूरा नहीं कराया है, जिससे किसानों को नहर का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

वर्मा जी का विवाह मात्र 11 वर्ष की आयु में हुआ था, किंतु पत्नी का विदाई से पहले ही देहांत हो गया। माननीय वर्मा जी ने अपना पूरा जीवन विधुर के रूप में बिताया और अपने निष्कलंक चरित्र पर तनिक भी आंच नहीं आने दी। सामाजिक समता एवं मानवीय सम्मान की लड़ाई लड़ते हुए वर्मा जी ने कभी अपने खाने-पीने को महत्व नहीं दिया, जिससे वे कई बीमारियों के शिकार हो गए। अल्सर व पार्किसन्स जैसी बीमारियां भोजन के अभाव में हुयी। अपनी बीमारियों व स्वास्थ्य की चिंता किए बगैर वह अपना संघर्ष निरंतर चलाते रहे। मानवीय वर्मा जी ने समाज के मार्गदर्शन के लिए दर्जनों पुस्तकें लिखीं जो पठनीय हैं। अंततः 19 अगस्त 1998 को दिन में ढाई बजे त्याग पुरुष, प्रखर वक्ता, कुशल लेखक व पत्रकार, महान चिंतक एवं उत्तर भारत के कार्लमार्क्स कहे जाने वाले महामानव राम स्वरूप वर्मा यशाकायी हो गए। वर्मा जी का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ विद्युत शवदाह ग्रह भैंसाकुण्ड लखनऊ में हुआ, उनका संघर्ष सदैव अमर एवं हम सबके  लिए मार्गदर्शक रहेगा।

लेखक, अर्जक संघ उत्तर प्रदेश के प्रांतीय उपाध्यक्ष हैं।

साभार – तर्कशील पथ

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