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हरियाणा में सभ्यता का उदय

हरियाणा में सभ्यता का उदय

◊ प्रो. सूरजभान

   

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 भारतीय गणतंत्र के सत्रहवें राज्य के रूप में 1966 में पंजाब के विभाजन के फलस्वरूप अस्तित्व में आया। परन्तु एक साँस्कृतिक इकाई के रूप में इस प्रदेश का इतिहास एक हजार वर्ष पुराना है। 1857 में इस भू-भाग को अंग्रेजी प्रशासन ने पंजाब में शामिल किया था परन्तु इससे पहले मध्यकाल में यह दिल्ली सूबे का अंग रहा है। तेरहवीं-चौदहवीं सदी के अभिलेखों में हरियाणा प्रदेश को ‘हरी-भरी स्वर्ग समान भूमि’ माना गया है जिसकी राजधानी दिल्ली या ‘ढिल्लिका’ थी और तोमरों ने उसे बसाया था। ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के अभिलेखों में चौहान राजा विग्रहराज चतुर्थ के अभिलेखों में इसे राजस्थानी बोली में ‘हरितानक’ या ‘हरियालक’ कहा गया है। सम्भवतः मरुभूमि से (चौहानों के राज्य के अन्तर्गत) एक अलग-थलग हरा-भरा भू-भाग ही इससे स्पष्ट होता है। इस प्रकार तोमर काल में हरियाणा राज्य प्रथम बार दृष्श्टिगोचर होता है। वैसे तो हरियाणा शब्द छठी शताब्दी में वल्लभी के राजा धु्रवसेन के अभिलेख में एक गाँव के अर्थ में प्रयोग किया गया है। सम्भवतः यह बस्ती हरियाणा प्रदेश से गये लोगों की रही होगी और इस समय से हरियाणा एक साँस्कृतिक इकाई के रूप में विद्यमान रहा होगा चाहे सामन्तकाल के अभिलेखों में इस भू-भाग को कुरुदेश के नाम से जाना जाता था।

          सम्भवतः हरियाणा शब्द ‘हरियाला’ या हरा-भरा प्रदेश के रूप में बागड़ निवासी चौहानों ने तो प्रयोग किया परन्तु इस नाम की व्युत्पत्ति आर्यों के प्रदेश के रूप में होना असम्भव नहीं है। संस्कृत साहित्य में यह भू-भाग आर्यावर्त का अंग माना गया है। अफगानिस्तान में ‘अरिया’ अथवा ‘हेरात’ प्रदेश आर्यों के नाम पर ही जाने जाते हैं। ईरान का भी आर्यों का भाषा रूप में नाम पड़ा। ऋग्वेद में सरस्वती और दृषद्वती नदियों का अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है जो इस भू-भाग की ही नदियाँ हैं। ऐसा लगता है कि एक विस्तृत क्षेत्र में जहाँ-जहाँ आर्य संस्कृति फली-फूली उस भू-भाग का नाम आर्य शब्द से जुड़ गया और हरियाणा सम्भवतः इसी प्रकार आर्यों का प्रदेश रूप में जाना गया। परन्तु इस भू-भाग को वैदिक तथा संस्कृत साहित्य में कुरुदेश व कुरु-जांगल नाम दिया गया है। सम्भवतः हरियाणा नाम स्थानीय परम्परा में प्रचलित रहा होगा जो सामन्तकाल में प्रादेशिक इकाइयों के विकास के परिणामस्वरूप प्रचलित हो गया होगा।

          हरियाणा प्रदेश भौगोलिक दृष्टि से राजस्थान का ही अंग प्रतीत होता है। आज इस भू-भाग में कोई बारहमासी नदी नहीं है। घग्घर और उसकी सहायक नदियों में वर्षा ऋतु में ही प्रायः जल प्रवाह होता है। और ये सभी नदियाँ उत्तर में शिवालिक की पहाड़ियों से निकलती हैं। दक्षिण में अरावली की पहाड़ियों को छोड़कर सारा प्रदेश मैदानी है जो नदियों द्वारा लाई गई मिट्टियों से बना है। यमुना जो आज इसकी पूर्व सीमा से गुजरती हुई गंगा में मिल जाती है पहले कभी इस भू-भाग में भी बहती रही थी। ऋग्वेद में इस प्रदेश की कई महत्वपूर्ण नदियों का वर्णन मिलता है जिनमें सरस्वती, दृषद्वती एवं आपया प्रमुख हैं। आज सरस्वती एक मौसमी नदी है जो नारायणगढ़ (अंबाला जिला) तहसील में ‘आदबद्री’ के पास मैदान में उतरकर सोन नदी में मिल जाती है और ताजेवाला के पास यमुना नदी में जा गिरती है। परन्तु इसका प्राचीन रास्ता मुस्तफाबाद, कुरुक्षेत्र, पेहवा के पास से गुजरता था जहाँ आज एक साधारण नाला विद्यमान है जिसे लौकिक भाषा में ‘सुरस्ती’ कहते हैं। खनौरी के पास यह नाला घग्घर में जा मिलता है परन्तु प्राचीन काल में जाखल से आगे सरस्वती का एक अलग भाग दिखाई देता है जिसे आज रंगोई कहते हैं और यह बानावली, अहरबां के पास से गुजर कर सिरसा से आगे फिर घग्घर में जा मिलता है। घग्घर नदी राजस्थान में गंगानगर जिले में हनुमानगढ़-सूरतगढ़ के पास से गुजरती हुई बहावलपुर क्षेत्र में चली जाती है और इसका प्राचीन बहाव पूर्व सिंध से गुजरता हुआ कच्छ के रन से जा मिलता है। यही सरस्वती का पुराना बहाव था और इसी रास्ते से महाभारत काल में सौराष्ट्र से कुरुक्षेत्र आया-जाया जाता था। इस मार्ग पर हरियाणा से सिन्ध तक अनेक प्राचीन बस्तियों के अवशेष देखे जा सकते हैं।

          दृषद्वती नदी सरस्वती के दक्षिण में थी और सम्भवतः इसी बहाव में चित्ताँग नहर खोदी गई। आज चित्तांग जगाधरी के क्षेत्र से निकलकर लाडवा असन्ध-जीन्द-हाँसी-हिसार के पास से गुजरती हुई राजस्थान में नोहर-भादरा से गुजर कर सूरतगढ़ के पास घग्घर में जा मिलती है। इस बहाव के साथ-साथ अनेक प्राचीन बस्तियों के अवशेष पाए गए हैं। आपया नदी कुरुक्षेत्र के दक्षिण से किरमिच, कौल, बालू-बाता होती हुई नरवाना के पास से गुजरती हुई सम्भवतः अग्रोहा होकर आदमपुर-मण्डी के पास दृषद्वती में मिल जाती थी। इस बहाव के साथ-साथ भी अनेक प्राचीन बस्तियों के टीले खोदे गये हैं। आज ये सभी नदियाँ सूखी हुई हैं। साहित्य में सरस्वती के विनशन प्रदेश में लुप्त हो जाने का वर्णन मिलता है, और कहा गया है कि उस प्रदेश में शूद्र्र-आभीरों के बसने के कारण सरस्वती लुप्त हो गई। वास्तव में यह जनश्रुति एक भौगोलिक परिवर्तन को ही सूचित करती है। उत्तरी हरियाणा में कुछ भौगोलिक परिवर्तनों के कारण जमीन के ऊँचे उठ जाने के परिणामस्वरूप सरस्वती-दृषद्वती का बहाव पूर्व की ओर बदल गया और ये नदियाँ सोम से मिलकर यमुना में गिरने लगीं। इस पूर्व बहाव के साथ-साथ पाये गये प्राचीन स्थल महाभारत काल से पुराने नहीं जाते। अतः यह परिवर्तन उत्तरवैदिक काल में ही हुआ प्रतीत होता है। इसी कारण सम्भवतः इस जनश्रुति का जन्म हुआ कि सरस्वती लुप्त हो गई और प्रयाग में त्रिवेणी के रूप में गंगा-यमुना के साथ जा प्रकट हुई। सरस्वती का जल-प्रवाह यमुना में मिलकर प्रयाग में गंगा से जा मिला। यही तथ्य इस जनश्रुति का आधार प्रतीत होता है।

          वैसे तो हरियाणा प्रदेश के उत्तरी भूभाग में शिवालिक की पहाड़ियों से व घग्घर के तट से और दिल्ली के निकट अरावली के पहाड़ से पाषाण कालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं। ये उपकरण पूर्व-पाषाण काल के मध्यम चरण से सम्बन्धित हैं और लगभग पचास हजार वर्ष पुराने प्रतीत होते हैं जो उस काल के घुमक्कड़ मानव-कबीलों के एकमात्र अवशेष हैं। पिंजौर के निकट नव-पाषाण काल के पत्थर की कुल्हाडिय़ाँ भी मिली हैं जो इस पहाड़ी प्रदेश में मानव की प्रथम आर्थिक एवं सामाजिक क्रान्ति की सूचक हैं। अब मानव ने पशुपालन एवं कृषि शुरू कर दी थी और घुमक्कड़ जीवन छोड़कर स्थायी आत्मनिर्भर बस्तियों में रहने लगा था। ये अवशेष कितने पुराने जाते हैं यह कहना कठिन है, सम्भवतः आज से चार-पाँच हजार वर्ष पुराने रहे होंगे।

          हरियाणा में पहली स्थाई आबादी आज से साढ़े चार हजार वर्ष पहले शुरू हुई थी। हाल में की गई पुरातात्विक खोजों से पता चला है कि सरस्वती और दृषद्वती नदियों के साथ-साथ हिसार और जींद जिलों में कांस्य युग की प्रथम बस्तियाँ बसीं। ये लोग प्रायः छोटे-छोटे गाँवों में रहते थे और इनके केन्द्रीय स्थल किलेबन्द थे। शिशवाल, बानावली, राखीगढ़ी आदि स्थानों से इस संस्कृति अवशेष ��ाये गये हैं। ये लोग कच्ची ईंटों के मकान बनाकर रहते थे। कृषि और पशुपालन के अतिरिक्त तांबे, काँसे एवं सोने की धातु-कला से परिचित थे। काले और सफेद रंग से चित्रित चाक पर बने बर्तनों का उपयोग करते थे। पत्थर की पतली-पतली छुरियाँ, मनके, मिट्टी के हाथ से फेंकने के गोले प्रयोग में लाते थे। हल, बैलगाड़ी का प्रयोग प्रचलित था। गाय, भैंस, भेड़, बकरियाँ ही इनके प्रमुख पशु थे। किलेबन्द बस्तियाँ सम्भवतः प्रश्षासनिक केन्द्र थे और कस्बे के रूप में विद्यमान रहे होंगे। तांबा, सोना, पत्थर, शंख आदि का प्रयोग उनके दूसरे प्रदेशों से व्यापार के प्रतीक हैं। इस प्रकार यह पूर्व कांस्य युग का समाज अन्य भू-भागों के समाजों से आर्थिक एवं साँस्कृतिक रूप में जुड़ा हुआ था। इनसे मिलते-जुलते साँस्कृतिक अवशेष राजस्थान में कालीबंगा और अन्य स्थलों से तथा पंजाब में मलेरकोटला के निकट ‘भूदन’ नामक स्थलों से पाये गए हैं। पश्चिम की ओर इससे मिलती-जुलती संस्कृतियों के अवशेष प. पंजाब, सिन्ध, बलूचिस्तान तथा अफगानिस्तान में भी पाए गए हैं। यह समाज अपनी नवपाषाण कालीन आत्मनिर्भरता से वंचित होता जा रहा था। कई प्रकार के उद्योग धंधे प्रचलित हो चले थे जो श्रम विभाजन के विकास का प्रतीक है। व्यापार इन सभी पूर्व कांस्यकालीन संस्कृतियों को सम्बन्धित करता जा रहा था। निस्सन्देह  इस युग में तकनीकी विकास के परिणामस्वरूप अतिरिक्त अन्न आदि उत्पन्न हो रहा था और उसका संचय प्रशासनिक बस्तियों में अथवा कस्बों में संग्रहीत हो रहा था। ऐसी अवस्था में ही नागरिक जीवन का उदय, समाज में वर्ग-भेद का जन्म और राजनीतिक सत्ता का प्रादुर्भाव होना स्वाभाविक था।

          मध्य कांस्य-काल में जो, पच्चीस सौ ई.पू. से सत्रह सौ ई.पू. के बीच रखा जाता है, हरियाणा में भी अन्य पड़ोसी प्रदेशों की भाँति सभ्यता का उदय है। इस काल की अनेक बस्तियाँ हिसार, जींद, कुरुक्षेत्र, रोहतक तथा भिवानी जिलों में खोज निकाली गई हैं। इनमें मित्ताथल, राखीगढ़ी, बानावली और बालू इनके प्रमुख केंद्र थे। राखीगढ़ी, में आज भी एक विशाल टीले के अवशेष विद्यमान हैं। बानावली, बालू और सम्भवतः मित्ताथल और राखीगढ़ी में किले और बस्तियों का विन्यास सिन्धु-सभ्यता के नगर-विन्यास से मेल खाता है। इनके मकान कच्ची एवं पक्की ईंटों के बने थे। सड़कें एवं गलियाँ बस्ती के आर-पार विद्यमान थीं। घरों में चौक, स्नानघर, रसोई आदि की सुविधाएँ विद्यमान थीं।

इस काल में दूर विदेशों तक के व्यापारिक सम्बन्ध, लिपि और मुद्रांकों का प्रयोग तथा निश्चित माप-तौल के साधन इस सभ्यता की विशेषता थे। इनके मजबूत लाल रंग के मिट्टी के बर्तन, अनेक मिट्टी के खिलौने चकमक की छुरियाँ, तांबे एवं काँसे के उपकरण और पत्थर के सिलबट्टे, मनके आदि उस सभ्यता की समृद्धि के सूचक हैं। ये बड़े केन्द्र निस्संदेह उनके नगर या उपनगर थे जिनके चारों ओर नदियों के साथ-साथ गाँव की बस्तियाँ बसी थीं। ग्रामीण संस्कृति वास्तव में पूर्व कांस्य संस्कृति का ही विकसित रूप प्रदर्शित करती है। परन्तु नागरिक जीवन एक उन्नत एवं विकसित सभ्यता का परिचय देता है। यह नागरिक सभ्यता इस क्षेत्र में नवागन्तुक ही दिखाई पड़ती है जो राजस्थान और पंजाब की ओर से आई। इस नागरिक सभ्यता को पुरातत्ववेत्ता सिन्धु सभ्यता अथवा हड़प्पा संस्कृति नाम से पुकारते हैं। सम्भवतः यह उनके राजनीतिक आधिपत्य और व्यापारिक सम्बन्धों के परिणाम थे।

          सत्रह सौ ई. पूर्व के आसपास सारे पश्चिम भारत में नगरों का हृास और अन्त हो रहा था। हरियाणा में भी इन परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा और यहाँ क्षेत्रीय संस्कृति जिसमें पूर्व कांस्य कालीन संस्कृति तथा सिन्धु संस्कृति के तत्वों का विलय दिख पड़ता है, का विकास हुआ। इस संस्कृति को उत्तर हड़प्पा संस्कृति नाम दिया जाता है। इस काल में राखीगढ़ी जैसे बड़े नगर तो नहीं दीख पड़ते परन्तु मित्ताथल, अगोध आदि स्थलों पर नगर-विन्यास अथवा किले की विद्यमानता अवश्य दीख पड़ती है। लिपि का प्रचलन अभी लुप्त नहीं हुआ था और सांस्कृतिक समृद्धि भी हृास के बावजूद नष्ट नहीं हो पाई थी परन्तु जहां केन्द्रीय स्थानों में कुछ हृास प्रतीत होता है,  वहां ग्रामीण बस्तियां विकास की ओर जाती दिखाई पड़ती हैं। अब विशेषकर उत्तरी हरियाणा में प्रथम बार बस्तियां बसीं। ये बस्तियां सरस्वती, दृषद्वती आदि नदियों के साथ-साथ कहीं यमुना के साथ-साथ भी बस चलीं। तांबे और कांसे का प्रयोग काफी था। कांचली मिट्टी के आभूषण विशेष आकर्षण बनने लगे। पत्थर की छुरियों का प्रयोग समाप्त हो गया और ग्रामीण बस्तियां बड़ी और अधिक चिरस्थायी बनीं। ऐसा लगता है कि इस युग में उत्तरकांस्य समाज लगभग सारे हरियाणा में फैल गया था। दक्षिण हरियाणे में साबी नदी के साथ-साथ भी इनकी बस्तियां पाई गई हैं। इसी काल में यमुना नदी को पार कर पश्चिमी यूपी में प्रथम आबादी फैली जिसके अवशेष मेरठ, सहारनपुर, बुलंदशहर एटा और इटावा आदि जिलों में पाये गये हैं। यह उत्तर कांस्य युग आज से तीन हजार वर्ष से कुछ पूर्व तक प्रचलित रहा है।

          कांस्य-काल के अन्तिम चरण में एक हजार ई.पू. से कुछ पहले ही हरियाणा में एक नई संस्कृति का आगमन हुआ जिसे वैदिक संस्कृति अथवा आर्य संस्कृति नाम दिया जाता है। इस संस्कृति की अनेक बस्तियां उत्तरी हरियाणा और कुरुक्षेत्र में पाई गई हैं। इनका सरस्वती, दृषद्वती तथा यमुना व साबी के साथ-साथ प्रसार इस संस्कृति के कालान्तर में हुए विकास को सूचित करता है।

          पुरातात्विक दृष्टि से इस संस्कृति को तीन उपकालों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम चरण में तांबे व कांसे का प्रयोग ही प्रचलित था। यही ऋग्वेदकालीन अवस्था थी। परन्तु उत्तर वैदिक काल में लोहे का प्रयोग प्रथम बार शुरू हुआ और और तृतीय चरण में नगरों का उत्थान होने लगा। पुरातात्विक और साहित्यिक स्रोतों के आधार पर इस संस्कृति की सही जानकारी हो सकती है। ऋग्वेद आर्यों का प्राचीनतम ग्रन्थ है और उसके पूर्ववत भागों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि आर्य लोग कई जन अथवा कबीलों में विभक्त थे जिनका स्थान कालान्तर में गणों ने ले लिया था। ऋग्वेद का भौगोलिक ज्ञान प्रायः सप्तसिन्धु अथवा काबुल से लेकर सरस्वती तक सीमित था परन्तु गंगा और यमुना भी उनकी जानकारी के अंग प्रतीत होते हैं। इस प्रदेश में अनेक जन विद्यमान थे जिनमें हरियाणा के प्रधान जन भरत, पुरु आदि का उल्लेख किया गया है। इन जनों को सरस्वती, दृषद्वती तथा आपया नदियों के किनारे बसे हुए बताया गया है। इनके पूर्व में यमुना पर भेद, अज, शगिरु आदि जनों का उल्लेख मिलता है और इनके पश्चिम में अनु, यदु, दुह्यु और तुखसु आदि जनों का उल्लेख है। ऋग्वेद में दिवोदास के पुत्र सुदास नामक भरत राजा के रावी पर संगाप्ति दस राजाओं को हराने और यमुना पर भेद के नेतृत्व में कई जनों को हराने का उल्लेख मिलता है। निस्सन्देह यह राजनीतिक परिस्थिति कबीलाई समाज का धु्रवीकरण प्रदर्शित करती है। कबीले का समाज ‘विश्श’ कहलाता था और गांवों में बसा हुआ था। कबीले के नेता को ‘गणपति’ अथवा ‘ज्येष्ठ’ कहते थे। राजा जन द्वारा निर्वाचित होता था। प्रत्येक कबीलाई राज्य की दो राजनीतिक संस्थाएं होती थीं, जिन्हें सभा और समिति कहा जाता था सम्भवत सभा समूचे कबीले अथवा गांव की संस्था थी और समिति सम्मानित व्यक्तियों की संस्था। राजा पर ‘सभा’ और ‘समिति’ का सतत अंकुश होता था, जो उसे अपदस्थ भी कर सकती थी। राजा को उसकी वीरता व योग्यता के गुणों के आधार पर ही चुना जाता था। उसकी सहायता के लिए ‘रत्न’ हुआ करते थे और धार्मिक क्रियाकलापों को सुचारु रूप से चलाने के लिए पुरोहित भी होता था।

 

          समाज में श्रम-विभाजन साधारण रूप से विद्यमान था और उसमें प्रजा को स्वतन्त्राता थी। चारों ऋग्वेद के पूर्ववर्ती भागों में तीन वर्णों का ही उल्लेख मिलता है जिनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य शामिल थे परन्तु कालान्तर में चौथा वर्ण शूद्र भी उत्पन्न हो गया। वर्ण व्यवस्था वास्तव में जन्म पर आधारित सामाजिक वर्गीकरण था और यह सामाजिक सम्बन्धों में असमानता का द्योतक था। वर्ण की उत्पत्ति सम्भवत श्रम विभाजन से ही हुई थी। परन्तु सम्पत्ति और सत्ता के आधार पर कालान्तर में यह अपने विकसित रूप को प्राप्त हुआ परन्तु अभी जाति प्रथा ने जन्म नहीं लिया था। ऋग्वेद में सामूहिक परिवार विद्यमान थे और ये पितृप्रधान थे। समाज में स्त्रिायों की स्थिति आदरणीय थी चाहे ऋग्वेद में प्रायः पुत्र की कामना और प्रार्थना दिख पड़ती है परन्तु स्त्रियों को काफी स्वतन्त्रता थी। न इस युग में पर्दा था और न सती प्रथा। उन्हें उत्सवों एवं पर्वों में शामिल होने की स्वतन्त्राता थी।

          ऋग्वेद में कई विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। घोशा, अपाला एवं विशधरा आदि शामिल हैं जो दार्शनिक थीं। विवाह से सम्बन्धित मंत्रों में पति और पत्नी द्वारा ली गई शपथ उनके सामाजिक जीवन में आदर, सहयोग एवं समानता का परिचय देते हैं। आध्यात्मिक जीवन में भी स्त्रियां पुरुष की अर्धांगिनी समझी जाती थीं और प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान में सहयोग प्राप्त करना आवश्यक था। अतिथि सत्कार एक महत्वपूर्ण जीवन का मूल्य था और अतिथि सेवा में सबसे अधिक मूल्यवान एवं प्रिय पशु के वध से ही नहीं हिचकिचाते थे। सत्य तथा नैतिकता, व्रत-पालन को महत्वपूर्ण माना जाता था। समाज में स्वतन्त्रता, समानता और वीरता के मूल्यों को प्रधानता दी जाती थी। यही कबीलाई मूल्य थे जो ऋग्वैदिक समाज को एक आदर्श समाज बनाते हैं। समाज में जीवन का चाव था। वे सौ वर्ष तक जीने की कामना करते थे। स्वस्थ शरीर, वीर पुत्र और पशुपालन की वृद्धि उनके जीवन की प्रमुख अभिलाषा थी। वहां भौतिक जीवन को स्वीकार करना न कि उसका तिरस्कार अैर उसका परित्याग उनके उद्देश्य थे। सांसारिक जीवन उनके लिए सत्य था और उससे भागने की उन्हें कोई इच्छा न थी। न स्वर्ग कल्पना और न मोक्ष की धारणा ऋग्वेद के समाज को उसके यथार्थवादी जीवन से भटका पाई थी।

ऋग्वेद समाज की दृष्टि में इस संसार के रचयिता और पालनकर्ता अनेक देवता हैं। प्राकृतिक शक्तियों को ही देवता मानते थे और उन्हें सर्वशक्तिमान, ज्ञानवान और सर्वव्यापी मानते थे। उनके सहयोग और तुष्टि के लिए यज्ञ करना और मंत्रों द्वारा स्तुति करना इनके प्रमुख साधन थे। कर्म और पुनर्जन्म के भावादि दार्शनिक सिद्धान्त अभी जन्म नहीं ले पाये थे। पुरोहित अभी धर्म के ठेकेदार, देवलोक और पृथ्वीलोक के बिचौलिया नहीं बन पाये थे। सरल स्वभाव से देवताओं की स्तुति और साधारण द्रव्यों से यज्ञ का अनुष्ठान साधारण समाज के जीवन का अंग था, परन्तु राजाओं में बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान और पुरोहित का सहयोग प्रचलित था। अश्वमेधादि यज्ञ बड़े ठाठ-बाट से किए जाते थे।

          ऋग्वेद की आर्थिक व्यवस्था पशुपालन एवं कृषि पर आधारित थी। गाय, घोड़ा, भेड़-बकरी इनके प्रमुख पशु थे जिनकी सामूहिक व्यवस्था के आधार पर ही गोत्रों का जन्म हुआ। जौ इनका प्रधान अन्न था। भोजन में मांस का प्रयोग प्रचलित था। हल और बैलगाड़ी कृषि के साधन थे। घोड़ों वाले रथ राजाओं आदि के वाहन के रूप में प्रयोग होते थे। समाज में कुम्भकार, तक्षक, धातुकर्म, चर्मकर्म आदि अनेक धन्धे आत्मनिर्भर ही था। व्यापार-विनिमय द्वारा होता था, और प्रायः पशुओं, धातुओं आदि तक सीमित था। ऋग्वेद के काल में लोहे का ज्ञान प्रतीत नहीं होता। अयस् शब्द सम्भवतः तांबे का ही परिचायक है।

          पुरातात्विक एवं साहित्यिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि ऋग्वेद का समाज वस्तुतः ग्रामीण समाज था जिसका संगठन कबीलाई था। इस समाज में साधारण श्रम-विभाजन था और उत्पादन की तकनीकों तथा श्रम विभाजन के कम विकसित होने के नाते यह समाज एक आत्मनिर्भर ग्रामीण समाज सा था, जिसमें निश्चित स्थाई जीवन, अतिरिक्त उत्पादन नहीं हो पाया था। इसी कारण इनका सामाजिक और राजनीतिक संगठन कबीलाई था। क्षेत्रीय राज्य अभी उत्पन्न नहीं हुए थे। राज्य का स्वरूप भी गणराज्य के रूप में प्रचलित था। वंशानुगत राजतंत्र का विकास नहीं हुआ था और समाज में वर्ण-भेद और शूद्र्र-वर्ण का विधान भी प्रशस्त नहीं था। चाहे आधुनिक दृष्श्टि से यह एक बहुत ही साधारण विकसित समाज था परन्तु इसके जीवन के उदात्त मूल्य आज भी अनुकरणीय हैं। इनका भाईचारा, वीरता, सहयोग, सहानुभूति, जीवन के प्रति सजीव दृष्श्टिकोण, उत्साह और ज्ञान-पिपासा, निस्सन्देह किसी भी समाज के गौरव का विष्शय हैं।

          प्रायः इतिहासकारों ने ऋग्वैदिक समाज को एक आक्रमणकारी विदेशी जाति के रूप में दिखाया है। ये विद्वान आर्यों को सिन्धु-संस्कृति के विध्वंसक के रूप में मानते हैं परन्तु पुरातत्ववेत्ताओं ने प्रमुखतया सिन्धु संस्कृति के विनाश को प्राकृतिक कारणों से घटित हुआ माना है। हाल ही में कुरुक्षेत्र जिले में स्थित भगवानपुरा खुदाई से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि आर्य संस्कृति सिन्धु संस्कृति के अन्तिम चरण में उसके सम्पर्क में आई और आपस में घुल-मिल गई।

          हरियाणा में किए पुरातात्विक सर्वेक्षण से पता चलता है कि आर्यों की बस्तियाँ प्रायः उस क्षेत्र में बसीं जहाँ उत्तर सिन्धु संस्कृति की बस्तियाँ विद्यमान नहीं थीं। कुछ स्थानों पर ही आर्य उत्तर सिन्धु संस्कृति की बस्तियों के ऊपर बसे। ऐसी ही स्थिति पंजाब में भी दिखाई देती है।

इससे प्रतीत होता है कि आर्य लोग आक्रमणकारी के रूप में नहीं आये अपितु वे जीवन के साधन की खोज में भटकते हुए इस क्षेत्र में भी आ पहुँचे। सहअस्तित्व की भावना से ही उन्होंने जंगल साफ करके अपनी बस्तियाँ बसाईं, परन्तु समाज के विकास की प्रक्रिया में राज्य की उत्पत्ति और अभिजात वर्ग की धन-सम्पत्ति और सत्ता की लोलुपता के परिणाम स्वरूप इन दोनों समाजों का टकराव होना स्वाभाविक ही था परन्तु यह टकराव  इन दो समाजों तक ही सीमित नहीं था। इनमें से प्रत्येक समाज में भी यह संघर्ष देखने को मिलता है। दशराज्य युद्ध में आर्य कबीलों का आपस में लडने का उल्लेख इस विचार को स्पष्ट कर देता है। साँस्कृतिक एवं जातीय द्वेष इसी लालसा का परिणाम था जो ऋग्वेद में कहीं-कहीं दिखाई पड़ता है।

लेखक प्रख्यात इतिहासकार व पुरातत्वविद थे। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। हरियाणा में सिंधु-घाटी की सभ्यता से जुड़े स्थलों की खुदाई की। 

स्रोत- सं. डा. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवंबर-दिसंबर 2015) पेज 17 से 20

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