मंगतराम शास्त्री की ग़ज़ल

मंगतराम शास्त्री

औरां कै सिर लाणा सीख, अपणा खोट छुपाणा सीख।
खोट कर्या पछतावै ना, मंद-मंद मुस्काणा सीख।

हाथ काम कै ला ना ला, बस फोए से लाणा सीख।
बाबा बण कै मौज उड़ा, बस थोड़ा बहकाणा सीख।

खूब दवाई बिक ज्यांगी, थोड़ा पेट घुमाणा सीख।
राजनीति के झगड़े नै, जात धरम पै ल्याणा सीख।

हवा भतेरी चाल्लै सै, आग पूळे म्हं लाणा सीख।
दिन म्हं सुथरे भाषण दे, रात नै पाड़ लगाणा सीख।

किसका कौण बिगाड़ै के, शरम तार गिरकाणां सीख।
दे कै गाळ पड़ौसी नै, देशभगत कहलाणा सीख।

कत्ल कर दिया के होग्या? करकै कत्ल दिखाणा सीख।
खोजबीन कौण करै इब, पीळी कलम चलाणा सीख।

बड़ा नामवर बण ज्यागा, गीत राज के गाणा सीख।
सब बैंकां का धन तेरा, करजा ले पां ठाणा सीख।

ज्यादा मगज खपावै क्यूं, फरजी ठप्पा लाणा सीख।
गोर्की मुंशी कुछ कोनी, नाम बदल छपवाणा सीख।

आयोजक की कर तारीफ, आच्छी गोज भराणा सीख।
शाल इनाम सभी तेरे, बस ताड़ी बजवाणा सीख।
भेष बदल कै आणा सीख, हंगामा करवाणा सीख।

संपर्क—94165-13872

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।