बुद्ध प्रकाश

24 जून, 1206 को कुतबुद्दीन ऐबक दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठा और उत्तरी भारत के तुर्क राज्य की प्रतिष्ठापना की। मध्यवर्ती एशिया के धर्मांध तथा लड़ाकू तुर्क देश के स्वामी बन गए। परन्तु उनका शासन इस्लाम-शासन तो नाममात्र का ही था, वास्तव में यह एक तुर्क अभिजातवर्गीय शासन था। उन्होंने अपने शोषण तथा निरंकुशता द्वारा लोगों का खूब खून चूसा। उनका सिद्धांत यह था कि समृद्धि से उपद्रव एवं विद्रोह फैलते हैं तथा राज्यसत्ता के स्थायित्व एवं शांति के लिए निर्धनता आवश्यक है। अतः गयासुद्दीन तुगलक ने उनकी इस नीति का प्रतिपादन इस प्रकार किया कि ‘हिन्दुओं (यह शब्द कृषकों के लिए प्रयुक्त किया गया है) के पास इतना ही रहने दिया जाए कि जिससे वे अपनी समृद्धि के कारण उद्धत न बन सकें तथा दूसरी ओर वे निराश होकर अपनी भूमि छोड़ कर भी न चले जाएं’ (जियाउद्दीन बर्नी, ‘तारीख-ए-फिरोज़शाही’, पृ. 433)। परन्तु लोगों ने उनकी इस निरंकुशता को चुपचाप स्वीकार नहीं किया। वे शासकों के विरुद्ध बार-बार बगावत करते रहे तथा समय-समय पर उन्हें पराजित भी करते रहे।

ज्यों ही शिहाबुद्दीन ने भारत की ओर अपनी पीठ मोड़ी, चारों ओर विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। रशीदउद्दीन का कहना है कि राज्य में चारों तरफ विद्रोह के समाचार पहुंचे (अज अत्रफ विलायत-ए हिन्दुस्तान शिकायत की रसीद)। इसके पश्चात् शीघ्र ही गौरी साम्राज्य की समाप्ति हो गई तथा कुतुबद्दीन ऐबक ने दिल्ली के राजसिंहासन पर अपना प्रभुत्व जमा लिया। नवम्बर, 1210 में उसकी मृत्यु हो गई। मुलतान तथा उच्च के राज्यपाल उसके दामाद नसीरुद्दीन कुबक ने उसके पुत्र या दत्तक पुत्र आरामशाह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और 1211 में स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। इस पर पंजाब तथा हरियाणा के उद्दंड लोगों ने, जिनमें जाट, अहीर तथा मेवों भी सम्मिलित ने, केंद्रीय सत्ताधारियों को धमकी दी तथा ‘अत्यंत बलिष्ठ मुसलमानों को भयभीत कर दिया’ (कैम्ब्रिज हिस्टरी आफ इंडिया, जिल्द-3, पृ. 51)। आरामशाह के शासन के एक वर्ष के अंदर ही उसे गद्दी से उतार दिया तथा शमसुद्दीन इल्तमश दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। उस समय गजनी के शासक ताजुद्दीन इल्डिज ने उत्तरी भारत को विजय करने की चेष्टा में पंजाब को तहस-नहस कर डाला। इल्तमश उसे रोकने के लिए आगे बढ़ा। 25 जनवरी, 1216 को दोनों सेनाओं की तरावड़ी के स्थान पर मुठभेड़ हुई। इल्तमश ने इल्डिज को पराजित कर दिया। अगले वर्ष उसने मन्सूरा के निकट नसीरुद्दीन पर विजय प्राप्त की। इससे दिल्ली पर उसका स्वामित्व सुरक्षित हो गया। यद्यपि खोखरों ने निरन्तर अशांति का वातावरण बनाए रखा।

मई, 1236 में इल्तमश की मृत्यु से विपत्तियों का एक तूफान सा उठ खड़ा हुआ। चौहानों ने रणथम्बोर पर आधिपत्य जमा लिया और खरकपाड़ी या खोखरों के साथ सन्धि कर ली। उनके सरदार जैत्र सिंह ने मालवा, गुजरात तथा मारवाड़ के शासकों के अतिरिक्त तुर्कों के परास्त होने की घोषणा की। जैत्र सिंह के पुत्र हम्मीर ने समस्त राजपूताना पर अपना अधिकार जमा लिया। मेवात के लोगों ने चौहानों का साथ दिया। मेवात के जादों भट्टी राजपूतों ने तुर्कों से लुक-छिप कर युद्ध किया। उनके सरदार मल्का ने हांसी पर एक भीषण हमला किया तथा वहां से पशु ले गया, जो उन्होंने रणथम्बोर तक वितरित कर दिए। (‘तब-कत-ए-नासिरी’, पृ. 313)। अतः यह स्पष्ट है कि मेवात और हरियाणा के  लोग सार्वजनिक उथल-पुथल के संघर्ष में से गुजर रहे थे।

यह सर्वविदित है कि जब रज़िया गद्दी पर बैठी, तो नौकरशाही के विरुद्ध एक सार्वजनिक आंदोलन अपने शिखर पर था। अतः कुछ तुर्क सरदार उसे गद्दी से उतारने के लिए उठ खड़े हुए। आरंभ में थोड़ी सी विजय के पश्चात् वह भटिण्डा के दुर्गपाल तुर्क सरदार इल्तूनिया द्वारा बन्दी बना ली गई और अंततः उसने उसके साथ विवाह कर लिया। इस दौरान विद्रोहियों ने बहराम को गद्दी पर बिठा दिया। इल्तूनिया तथा रजिया ने दिल्ली पर आधिपत्य जमाने के लिए सेना इक्ट्ठी की, परन्तु उन्हें परास्त कर दिया गया। तत्पश्चात् हरियाणा के सक्रिय लोगों ने 12 दिसम्बर, 1240 को कैथल के निकट उन्हें बन्दी बना लिया और कत्ल कर दिया।

बहराम तथा मसूद के शासनकाल में तुर्की विशेषतः ‘चालीस’ सरदारों का प्रभुत्व था और मंगोल बार-बार हमले करते थे। अतः तुर्कों तथा भारतियों का विरोध अपनी चरम सीमा तक पहुंच गया था, जो बल्बन और इमादुद्दीन रेहान के विरोध के रूप में प्रकट हुआ। अन्ततः बल्बन विजयी हुआ और भारतीय प्रभुत्व का दौर समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप लोगों में व्याप्त असंतोष के कारण चारों ओर विद्रोह की आग भड़क उठी। लोगों ने बयाना, हरियाणा तथा शिवालिक प्रदेश में मुखियों तथा सरदारों की सम्पति लूट ली। 20 जनवरी, 1260 को बल्बन ने कोहपाया पर चढ़ाई की और उसने बड़े प्रयत्न से अव्यवस्थ एवं विद्रोह का दमन किया। परन्तु बाद में, जो लोग भाग खड़े हुए थे, उन्होंने उन मुख्य मार्गों पर यात्रियों को लूटना प्रारंभ कर दिया। बल्बन ने उनके अड्डों का पता लगाया तथा अचानक हमला करके उनके 12 हजार स्त्रियों, पुरुषों तथा बच्चों को मौत के घाट उतार दिया। परन्तु इस कठोर दमन के बावजूद वह विद्रोह को शांत करने में असफल रहा। बल्बन के राजगद्दी पर बैठने के समय सम्पूर्ण मेवात में विद्रोहाग्नि की ज्वाला भड़क रही थी और दोआब विद्रोहों का अखाड़ा बना हुआ था। लोगों ने तुर्कों के विशुद्ध छापामार युद्ध करने के लिए जत्थेबंदियां कर लीं। बर्नी ने लिखा है कि वे प्रायः रात्रि के समय राजधानी पर हमला किया करते थे और मकानों तथा अन्य सम्पति को नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे। उन्होंने दिल्ली का समीपवर्ती क्षेत्र इतनी बुरी तरह से नष्ट-भ्रष्ट कर किया कि इसके चारों तरफ बड़े-बड़े जंगल दिखाई देने लगे थे। उनके आतंक के कारण सड़कों पर यातायात समाप्त प्रायः हो गया था तथा बंजारों ने भी आवागमन बंद कर दिया था। उनके आक्रमण के भय से राजधानी के लोग रात्रि को शांतिपूर्वक सो नहीं सकते थे। अपराहन की प्रार्थना के पश्चात् नगर के पश्चिमी द्वार बंद कर दिए जाते थे तथा कोई भी व्यक्ति सायं के समय बाहर निकलने या मनोरंजन के लिए हौज-ए-शमसी जाने का साहस नहीं करता था। बहुत से मेव नगर की चार-दिवारी के अन्दर घुस जाते थे और सांध्य प्रार्थना के समय हौज पहुंच कर पनिहारियों  और दासियों को परेशान करते थे, उन्हें वस्त्र फाड़कर उनहें निर्वस्त्र कर देते थे। अतः बल्बन ने अपने शासन के प्रथम वर्ष में मेवों की समस्या की ओर ध्यान दिया। एक वर्ष के अंदर उसने राजधानी के आसपास के वन को साफ करवाया, देहाती क्षेत्रों में थाने बनाए तथा गोपालगीर के स्थान पर एक दुर्ग बनवाया तथा मेव-प्रदेशों को छान डाला। परन्तु ये कार्य सुल्तान को बहुत महंगे पड़े, क्योंकि इसके लिए उसके एक लाख व्यक्ति मारे गए। इससे विद्रोह की भीषणता का अनुमान लगाया जा सकता है।

1288 में जलालुद्दीन फिरोज़ खलजी ने बलपूर्वक सत्ता हथिया ली और दो वर्ष के बाद स्वयं गद्दी पर बैठ गया। 1291 में एक भीषण अकाल पड़ा, जिसमें असंख्य लोगों की जानें चली गई। इन परिवर्तनों के दौरान लोग पुनः स्वाग्रही बन गए। इसलिए अगले शासक, अलाउद्दीन (1296-1315) को उनके साथ कठोरतापूर्ण व्यवहार करना पड़ा। बर्नी लिखता है कि उसने अपने कर्मचारियों को ऐसे कानून बनाने के आदेश दिए, जिसके द्वारा लोगों की सुख-समृद्धि छीन कर उन्हें नियंत्रित किया जा सके (तारीख-ए-फिरोजशाही, पृ. 289-291)। इस उद्देश्य के लिए उसने चराई तथा अन्य प्रभारों के अतिरिक्त उपज का आधा भाग राजस्व के रूप में लेना प्रारंभ कर दिया, उपज की कीमतें कम कर दीं तथा लोगों पर अनेक व्यापारावरोध लगा दिए। इस अत्याचारपूर्ण कार्यों से लोग भड़क उठे तथा सुल्तान की मृत्यु होते ही उनकी तीव्र प्रतिक्रिया स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगी। अतः कुतबुद्दीन मुबारक शाह ने (1315-1320), जो शिहाबुद्दीन उमर के अल्पकालीन तथा निष्प्रभावी शासन के पश्चात् गद्दी पर बैठा, इन बहुत से कठोर कानूनों को रद्द कर दिया, राजस्व घटा दिया, बकाये माफ कर दिए तथा नियंत्रण हटा दिए (तारीख-ए-फिरोजशाही, पृः383)। परन्तु भारत के लोग खिलजियों से इतने असंतुष्ट थे कि उन्होंने 15 अप्रैल, 1320 को बाह्य तौर पर धर्मान्तिरित खुसरों खां को गद्दी पर बिठा दिया।

इस पर तुर्क सरदारों ने दिपालपुर तथा लाहौर से गाज़ी मलिक तुगलक को आमंत्रित किया। खुसरो खां को परास्त करके वह गयासुद्दीन तुगलक के नाम से गद्दी पर बैठा। उसने अलाउद्दीन की नीतियों तथा विधानों को पुनः लागू कर दिया और उन लोगों का कठोर दमन आरंभ कर दिया, जो भारतीय सरदार खुसरो खां के शासन के दौरान कुछ प्रतिष्ठित हो गए थे। उसके पश्चात् उसके पुत्र, मुहम्मद-बिन-तुगलक (1325-1351) ने नान विलक्षण योजनाएं बनाईं, जिनका लोगों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। उनसे लोगों को विद्रोह की प्रेरणा मिली। बर्नी का कहना है कि सभी वर्गों के लोग सुल्तान से घृणा करने लगे और उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। (पूर्वाक्त, पृ. 478)। बदौनी का कथन है कि उसने निर्णय लिया कि ‘चूंकि दोआब के लोग विद्रोही हैं, अतः उस प्रांत का राजस्व बढ़ा कर दस से बीस कर दिया जाए’ (‘मुखताब-उत-तवारीख’, पृ. 228)। बर्नी लिखता है कि ‘राजस्व एक से दस तथा बीस तक बढ़ा दिया गया था’ इसके अतिरिक्त, गृह-कर जैसे कुछ अन्य कुचल देने वाले कर लगा दिए गए। कर लगाने के लिए पशुओं को चिन्हित किया गया। इन करों से लोग दुःखी होकर पुनः विद्रोह करने पर विवश हो गए। बर्नी का कथन है कि ‘हिन्दुओं (इस शब्द से इसका अभिप्राय कृषकों से है) ने अपने खलिहानों को जला दिया और अपने पशुओं को भगा दिया। उन्होंने दस-दस या बीस-बीस की टोलियों में तालाबों के निकट वनों में शरण ली, अधिकतर लोग भाग गए, जिनका कुछ पता नहीं चला, अतः कलक्टरों तथा लेखपालों को खाली हाथ लौटना पड़ा’ (‘तारीख-ए-फिरोजशाही’, रायपुर हस्तलेख, पृ. 288)। विद्रोह फैलता-फैलता सम्पूर्ण हरियाणा में फैल गया। कुहराम, सुनाम, कैथल, समाना तथा अन्य स्थानों के कृषकों ने कर देने से इन्कार कर दिया, खेतीबाड़ी करना छोड़ दिया, गांवों को छोड़ कर भाग गए तथा मुख्य मार्गों पर लूट-खसोट करने लगे। उन्होंने मंडल बना लिए और प्रशासन से टक्कर ली। कांगड़ा में भी विद्रोह फैल चुका था। सुलतान ने विद्रोहियों पर स्वयं आक्रमण करके उन्हें क्रूरतापूर्वक कुचल दिया, परन्तु सिन्ध में थाट्टा के स्थान पर उसकी मृत्यु के पश्चात्, लोगों ने पुनः विद्रोह, दंगे तथा लूट-खसोट प्रारंभ कर दी।

23 मार्च, 1351 को फिरोज तुगलक गद्दी पर बैठा तथा उसने अनेक अन्यायपूर्ण करों को हटा कर, नहरें खुदवा कर कृषि को प्रोत्साहन देकर, वृक्ष लगवा कर तथा उपज के अनुरूप राजस्व लगाकर लोगों को शांत करने का प्रयत्न किया। उसने व्यापार को भी प्रोत्साहन दिया, कारखानों की स्थापना की तथा बेरोजगार की समस्या पर भी ध्यान दिया। उस पर खुदवाई गई नहरों से हरियाणा को विशेष रूप से लाभ पहुंचा। यमुना से हिसारफिरोजा तक बहने वाली नहर ‘रजीवाहा’ तथा सतलुज से उस नगर तक बहने वाली नहर उल्घखानी, दोनों करनाल से गुजरती थीं। तत्कालीन अभिलेखों में उसे शासनकाल में खुदवाई गई पांच नहरों का उल्लेख मिलता है पहली सतलुज से झज्जर तक, दूसरी सिरमौर पहाड़ियों से हांसी, अरसन तथा हिसार फिरोजा तक, तीसरी, घग्गर बरास्ता सरस्वती किला से हरनी खेड़ा, चैथी बुड्ढी से यमुना तथा वहां से फिरोजाबाद तक और पांचवीं सरस्वती तथा सलीमा को जोड़ने वाली (आर.सी. जौहरी फिरोज तुगलक पृ. 105)। कुछ समय के लिए लोगों ने सुलतान के धर्मान्ध कार्यों को भूल कर सुख का सांस लिया।

20 सितम्बर, 1388 को फिरोज की मृत्यु के पश्चात् उसका पौत्र गियासुद्दीन तुगलक-2 के नाम से गद्दी पर बैठा, परन्तु उसके चाचा नसीरुद्दीन मुहम्मद ने विद्रोह कर दिया। पानीपत के स्थान पर दोनों के बीच युद्ध हुआ, जिसमें नसीरुद्दीन की पराजय हुई। तथापि मुलतान, लाहौर, हिसार, हांसी तथा हरियाणा के अन्य जिलो में उसकी सत्ता स्वीकार कर ली गई। इस विपत्ति के समय लोगों ने व्यक्ति-कर देने से इन्कार कर दिया और जमींदारों ने करों की अदायगी रोक ली। समस्त देहाती क्षेत्रों में मकान जला दिए गए, सड़कें बंद हो गईं तथा व्यवस्था भंग हो गई।

                31 अगस्त, 1390 को नसीरुद्दीन दिल्ली के सिंहासन पर बैठा, परन्तु खोखरे उसे परेशान करते रहे। जनवरी, 1394 में उसकी मृत्यु के पश्चात् कलह एवं अराजकता का दौर शुरू हो गया। उस समय तैमूर द्वारा आक्रमण किया गया। उसका इतिहासकार शर्फुद्दीन यजदी लिखता है कि दिल्ली के आसपास के क्षेत्र में हिन्दुओं (यह शब्द सामान्य कृषकों के लिए प्रयुक्त किया गया है) का प्रभुत्व था तथा हरियाणा में लूटमार जोरों पर थी और काफिलों का आना-जाना भी कठिन था। सभी स्थानों पर जाट लोग बड़े स्वाग्रही थे तथा समाना, कैथल और असंध के लोगों ने अपने घर जला दिए और दिल्ली की ओर कूच किया (‘जफर-नामा’, जिल्द-2, पृ. 79, 92)।

तैमूर ने राजस्थान की ओर से हरियाणा में प्रवेश किया तथा फिरोजाबाद, सिरसा, फतेहाबाद, अहरूनी, टोहाना, कैथल, असंध, सालवन, पानीपत होते हुए दिल्ली की ओर बढ़ा। रास्ते में अहीरों तथा जाटों ने उसका विरोध किया और उसे बहुत परेशान किया, परन्तु दिल्ली सरकार ने उसकी कोई सहायता नहीं की।

तैमूर की वापिसी के पश्चात् सल्तनत के प्रति लोगों का विश्वास उखड़ गया तथा वे प्रायः विद्रोह ही करते रहे। उन्हें कुचलने के लिए बार-बार सेनाएं भेजी गईं, परन्तु वे उन्हें पूर्णतः दबाने में असफल रहीं। उदाहरणार्थ, 1424 में मेवातियों ने स्वभूमिध्वंस नीति द्वारा मुबारकशाह के अभियान को असफल बना दिया था। उनके सरदार जल्लू तथा कड्डू ने देश को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। उनके द्वारा आत्मसमर्पण कर दिए जाने के पश्चात् भी उनके हठी सरदार मुहम्मद खां ने आंदोलन कर दिया। मुहम्मद शाह के शासनकाल के दौरान मेवाती खानजादे बहुत उद्दण्ड हो गए तथा दिल्ली तक खलबली मचा दी। उन्होंने दिल्ली की राजगद्दी पर बिठाने के लिए मालवा के महमूद खिलजी को आमंत्रित किया। वह वस्तुतः मालवा से चल पड़ा और नागौर, हांसी तथा हिसार फिरोजा से होता हुआ 1440 में दिल्ली के निकट पहुंच गया, परन्तु बहलोल लोधी की सहायता से सुलतान उसे परे धकेलने में सफल हो गया। तथापि, अपने शासक अलाउद्दीन आलमशाह के अधीन, मेवाती सरदार अहमद खां का मथुरा के निकट माहोती से लेकर दिल्ली के निकट सराय लाडो तक के क्षेत्र पर आधिपत्य था। सल्तनत का विघटन पूरे ज़ोर पर था।

लोधियों के अधीन एक प्रकार के वंशीय अल्पतंत्र की स्थापना की गई। भारी संख्या में अफ़गानों तथा अन्य लोगों को देश में बसने के लिए आमंत्रित किया गया तथा उन्हें पर्याप्त ज़मीदारियां दी गईं। परन्तु वे उपद्रवी सिद्ध हुए और परिणामस्वरूप अंत में सल्तनत का पतन हुआ और इस प्रकार मुगलों के लिए आधिपत्य जमाना सुलभ हो गया।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृ- 37

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