बुद्ध प्रकाश

पंजाब के दुर्गपाल, दौलत खां लोदी ने मुगल सरदार, ज़हीरुद्दीन बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए उकसाया। परन्तु बाबर ने सर्वप्रथम 1525 में अपने आमंत्रक के प्रदेश पंजाब पर ही अपना आधिपत्य जमाया। अगले वर्ष वह दिल्ली की ओर बढ़ा तथा 12 अप्रैल 1526 को पानीपत के युद्धक्षेत्र में सुलतान शासक की सेना से उसका सामना हुआ।  आठ दिनें के पश्चात् निर्णायक युद्ध हुआ, जिसके परिणामस्वरूप हिन्दुस्तान के साम्राज्य पर मुगलों का आधिपत्य हो गया।

बाबर ने अपनी सेना को पानीपत नगर के पूर्व की ओर पंक्तिबद्ध किया और उसका रुख दक्षिण की ओर था। उसके आगे 700 सामान ढोने वाली गाड़ियां थी, जिनके पहिये परस्पर अपरिष्कृत चर्म के रस्सों से बंधे हुए थे। प्रति दो गाड़ियों के मध्य (लगभग 16 गज) लकड़ी की तिपाइयों पर पांच-छह परिरक्षी आड़ें बनाई गई थीं। जिनके पीछे बंदूकधारी खड़े होकर गोली चलाते थे। उसकी सेना का दायां भाग पानीपत नगर द्वारा तथा बायां भाग खाइयों और सूखे नालों द्वारा सुरक्षित था। 12 हजार घुड़सवारों तथा असंख्य अफगानों और तुर्की यौद्धाओं की उसकी सेना अग्रभाग, बायां भाग, दायां भाग तथा मध्य भाग में विभक्त थी। शत्रु को कुमार्ग पर डाल कर तुलगम नामक चाल से उस पर पीछे से आक्रमण करने के लिए उसने अपनी सेना के दायें तथा बायें भागों के बाह्य छोरों पर सवार तुर्की घुड़सवारों के दो सैन्यदल तैनात किए हुए थे। संकटग्रस्त सेना की शीघ्र रक्षा व मदद के लिए मध्य भाग की सेना के दोनों ओर इल्तमिश या आरक्षित दल के दो छोटे सैन्य दल तैनात थे।

लोदी की सेना बाबर की सेना के दायें भाग की ओर बढ़ी, परन्तु उसकी सेना के अग्र भाग की प्रतिरक्षा के कारण उसको अपनी गति धीमी करनी पड़ी। यह देखते हुए बाबर ने आक्रमण कर दिया। उसकी सेना की कुछ टुकड़ियों ने लोदी सेना को दाईं तथा बाईं तरफ से घेर कर उसके पिछले भाग पर धावा बोल दिया, जबकि बाएं तथा दाएं भाग की सेनाओं ने उसकी बढ़ती हुई सेना को उलझाए रखा। लोदियों ने शहर से बाबर का सम्पर्क काट देने तथा उसके मध्य भाग में प्रवेश पाने के उद्देश्य से बाबर की दाएं भाग की सेना पर भीषण आक्रमण करने में ही अपनी सारी शक्ति केंद्रित कर ली, परन्तु बाबर उस भाग में बार-बार सेना की नई टुकड़ियां भेजता रहा और लोदी आक्रमणों को निष्फल कर दिया। साथ-साथ उसकी सेना के मध्य भाग ने लोदी सेना के मध्य भाग को उलझाए रखा और उसे सेना के अन्य भागों में सहायता भेजने से रोके रखा। इस दौरान उस्ताद अली कुली के बन्दूकचियों तथा मुस्तफा खां रूमी की तोपों ने अफगानों के अपार जनसमूह का खूब विध्वंस किया। अफगानों के हाथी भी बेकार, यहां तक के हानिकर सिद्ध हुए। अंत में अफगानों की पराजय हुई। इब्राहीम लोदी अपने 6 हजार मुख्य सेनानियों सहित मारा गया। अब दिल्ली तक पहुंचने के लिए बाबर का मार्ग निष्कंटक हो गया।

अगले वर्ष, 17 मार्च, 1527 को बाबर ने राणा सांगा के विरुद्ध खानवा के निर्णायक युद्ध में विजय प्राप्त की। परन्तु इसके पश्चात् शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गई। शेरशाह के नेतृत्व में पूर्व के अफगानों ने उसके पुत्र हुमायूं को ललकारा। चैसा (26 जून, 1539) तथा बिलग्राम (17 मई, 1540) की लड़ाइयों में वह बुरी तरह पराजित हुआ और उसे भारत छोड़ कर जाना पड़ा। 1540 से 1545 तक शेरशाह ने पुनरुस्थापित अफगान साम्राज्य पर शासन किया। परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके उत्तराधिकारी पुनः पारिवारिक वैमनस्य में उलझ गए। उस समय रिवाड़ी के ब्राह्मण मंत्री हेमू ने सर्वोच्च सत्ता प्राप्त की।

प्रारंभ में हेमू एक साधारण व्यक्ति था। अपने पिता पूर्णदास द्वारा संसार से वैराग्य लेने के कारण वह उसकी सहायता से वंचित हो गया और उसे नमक बेचकर तथा तोलक (तोलने वाला) का काम करके अपना जीवन निर्वाह करना पड़ा। शीघ्र ही वह सरकारी ठेकेदार और उसके बाद शाही सलाहकार बन गया। उसने सूर राज्य की आर्थिक अवस्था को सुधारने का प्रयत्न किया। अगले शासक, आदिल शाह के अधीन् वह प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया गया और उस स्थिति में हठधर्मी अफगानों के साथ 22 लड़ाइयां लड़ीं। इस प्रकार अपनी स्थिति सुदृढ़ करके, उसने आदिलशाह को बंदी बना लिया तथा स्वयं शासक बन बैठा। परन्तु शीघ्र ही हुमायूं फारस से पुनः आया और 1555 में उसने पंजाब तथा हरियाणा पर अपना आधिपत्य जमा लिया। उस समय हेमू पूर्वी प्रदेशों में आंदोलनों में व्यस्त था। वह मुगलों को परे धकेलने के लिए भारी सेना लेकर वहां से आया। तत्पश्चात् शीघ्र ही 26 जनवरी, 1556 को हुमायूं की दिल्ली में मृत्यु हो गई। एक मुगल गर्वनर का पीछा करता हुआ हेमू तुगलकाबाद पहुंचा और 7 अक्तूबर को उसने तर्दी बेग का मुकाबला किया। कुछ समय तक दोनों सेनाओं की स्थिति समान रही, परन्तु अंत में हेमू की विजय हुई। उसने एकाधिपत्य प्राप्त करके दिल्ली में प्रवेश किया और महाराजा विक्रमादित्य के नाम से स्वयं को वहां का राजा घोषित कर दिया।

तुगलकाबाद में हुए विनाश की सूचना हुमायूं के पुत्र अकबर को जालन्धर भेजी गई। वह दिल्ली पर पुनः अपना आधिपत्य जमाने के लिए अपनी समस्त सैन्यशक्ति सहित तुरंत वहां से चल पड़ा। मुगलों को रोकने के लिए हेमू भी दिल्ली से चल पड़ा। 3 नवम्बर 1556 को बाबर की विजय-स्थली के उत्तर-पश्चिम में चार मील के फासले पर पानीपत के स्थान पर दोनों सेनाओं का मुकाबला हुआ। इसे पानीपत की दूसरी लड़ाई कहते हैं।

सबसे पहले हेमू के विशाल तोपखाने वाले सैन्य दल तथा अकबर के सेनानायक अली कुलीं खां शैबानी के बीच युद्ध हुआ। अली कुली खां शैबानी ने अपने शत्रु को पराजित करने के लिए महान साहसिकता, चालाकी तथा छल से काम लिया। परिणामस्वरूप हेमू की सेना अपनी बंदूकें छोड़ कर भाग गई। परन्तु उस पराजय के पश्चात् दिलेर हेमू अपने 30 हजार राजपूत तथा अफगान घुड़सवारों और बंदूकचियों तथा कलदार धनुषधारियों वाले सशस्त्र हाथियों के साथ आगे बढ़ा। परन्तु प्रथम पराजय में ही उसे तोपखाने से हाथ धोने पड़े, तथापि, उसने अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ अपने शत्रु पर हमला किया। दूसरी ओर से अली कुली खां ने तथा उसके 10]000 घुड़सवारों ने घोर युद्ध किया। प्रथमतः हाथियों के भयानक आक्रमण से मुगलों के दायें तथा बायें सैन्य दल डगमगा गए और उन्होंने उनके मध्य भाग को भी उलझा दिया, परन्तु मुगल घुड़सवारों ने शत्रुओं को चारों ओर से घेर कर हेमू की सेना के बगली दस्तों तथा पिछले भाग पर आक्रमण करके हाथियों को जख्मी करते हुए महावतों को मार डाला। इस दौरान भयंकर मारधाड़ ने हाथियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। आक्रमण शिथिल हो जाने पर अली कुली खां ने हेमू की पिछली सेना पर आक्रमण कर दिया। एक विशालकाय हाथी पर बैठे हुए स्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए, हेमू संकटग्रस्त सैन्य भाग की ओर लपका और अपने हाथियों से बार-बार प्रति-आक्रमण करता रहा। उन आक्रमणों के दौरान उनके सर्वश्रेष्ठ योद्धा नायक भगवान दास तथा शाही खां कक्कड़ मारे गए, परन्तु उसने निरंतर भीषण युद्ध जारी रखा। जबकि युद्ध जोरों पर था, एक सनसनाता हुआ तीर हेमू की आंख में आकर लगा। उसने तीर को निकाल कर अपनी आंख पर स्कार्फ से पट्टी बांध ली तथा युद्ध जारी रखने का आदेश दिया, परन्तु शीघ्र ही वह मूर्छित होकर हौदे में गिर पड़ा, जिससे उसकी सेना में भगदड़ मच गई तथा उसकी हार हो गई। अब अकबर हिन्दुस्तान का स्वामी था तथा 1857 तक दिल्ली पर मुगलों का आधिपत्य रहा।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृः 44

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