बुद्ध प्रकाश

अकबर के राज्यकाल में हरियाणा दिल्ली प्रांत में शामिल था। इसके पूर्व में आगरा, उत्तर-पूर्व में अवध प्रांत का खैराबाद, उत्तर में पर्वत-श्रेणियां, दक्षिण में आगरा तथा अजमेर और पश्चिम में लुधियाना था, दरिया सतलुज इसे लाहौर प्रांत से अलग करता था। इसकी मुख्य नदियां गंगा और यमुना थीं, घग्घर छोटी नहर रह गई थी। यहां का जलवायु शीतोष्ण था, वर्षा पर्याप्त मात्रा में होती थी तथा कहीं-कहीं वर्ष में तीन-तीन फसलें होती थीं। यह फलों तथा फूलों के लिए प्रसिद्ध था (अब्बुलफजल, आइन-ए-अकबरी, अनु. फ्रांसिस ग्लैडविन, पृ. 373)। दिल्ली, हांसी, हिसार, सरहिन्द, थानेसर, हस्तिनापुर आदि इसके प्रसिद्ध नगर थे। दिल्ली, बदायूं, कुमाऊं, साम्भल, सहारनपुर, रिवाड़ी, हिसार तथा सरहिन्द इसकी आठ सरकारें थीं, जो 232 परगनों में उपविभाजित थी। इसकी समंजित भूमि 28,546,816 बीघे 16 बिस्वे थी, जिससे 601,615,555 दाम का राजस्व प्राप्त होता था। इसमें में से 33,075,739 का सेयुर्घल (वही, पृ. 380) या अनुदान था। दिल्ली सरकार ने 123, 012, 590 दाम राजस्व प्राप्त होता था और 10,990,260 दाम सेयुर्घल के थे और यह 2 हजार घुड़सवारों और 32,980 पैदल सेना जुटाती थी, बदायूं सरकार से 34,717,363 दाम का राजस्व प्राप्त होता था और 457,118 दाम सेयुर्घल के थे और यह 2,850 घुड़सवार तथा 26,700 पैदल सेना जुटाती थी। कुमाऊं सरकार से 40,437,700 दाम का राजस्व प्राप्त होता था तथा यह 3 हजार घुड़सवार और 50 हजार पैदल सेना का प्रबंध करती थी। साम्भल सरकार से 66,341,431 दाम राजस्व प्राप्त होता था और 2,892,394 दाम सेयुर्घल के थे तथा यह 4,375 घुड़सवार, 50 हाथी तथा 31,550 पैदल सेना का प्रबंध करती थी। सहारनपुर सरकार से 87,839,359 दाम राजस्व प्राप्त होता था और 4,991,485 दाम सेयुर्घल के थे और यह 3,955 घुड़सवार और 22,280 पैदल सेना देती थी। रिवाड़ी सरकार से 29,358,635 दाम राजस्व प्राप्त होता था और 739,268 दाम सेयुर्घल के थे और 2,175 घुड़सवार और 14,600 पैदल सेना देती थी। हिसार फिरोजा सरकार 55, 004,905 दाम राजस्व और 1,406,519 दाम सेयुर्घल के रूप में तथा 6,875 घुड़सवार तथा 55,700 पैदल सेना देती थी। सरहिन्द सरकार 160,790,594 दाम तथा 55,700 पैदल सेना देती थी। इन आंकड़ों से प्रांतों की राजस्व प्रशासनिक व्यवस्था की सुदृढ़ता तथा वहां के लोगों की समृद्धि का पता चलता है। (वही पृ. 527-534)। तथापि, हिन्दुओं के विभिन्न वर्गों में भी मत-सम्बन्धी तथा साम्प्रदायिक कलह भी जारी रहे, जो कभी-कभी गंभीर मुकाबलों का रूप धारण कर लेते थे। कुरुक्षेत्र के तालाब पर जोगियों तथा सन्यासियों के बीच हुए युद्ध को, जिससे अकबर ने लाभ उठाया और यहां तक कि उसे प्रोत्साहन दिया, निजामुद्दीन की तबकत-ए-अकबरी के अनुसार एक उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जा सकता है। (इलियट एंड डाडसन, हिस्ट्री आफ इण्डिया, एज टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टीरियन्ज खण्ड-5, पृ. 318)। परन्तु इन झाड़ों के बावजूद थानेसर सतत् विकासशील नगर रहा, जैसा कि फिच के उल्लेख से सिद्ध होता है। उसने इसके नौशादर निर्माण के सफल उद्योग के संबंध में लिखा है। हकीम महारतखां ने अपनी बाहजातुल आलम में इसको घनी आबादी वाला नगर कहा है।

साभार-बुद्ध प्रकाश, हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृः 48

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