बुद्ध प्रकाश

18वीं शताब्दी के अंत में भू-सम्बन्धी संकट के कारण, कृषकों ने अपने जमींदार मुखियों के नेतृत्व में देश के अधिकतर भागों में विद्रोह किए। दिल्ली के आसपास के प्रदेशों में जाट शासन के विरुद्ध उठ खड़े हुए तथा उसे काफी हानि पहुंचायी। उनके मुखियों में से मथुरा का राजाराम जाट 20,000 जवानों के साथ उठ खड़ा हुआ। औरंगजेब ने उन्हें दबाने का भरसक प्रयत्न किया, परन्तु इसके लिए उसके 4,000 सैनिक मारे गए। अम्बेर के राजा राम सिंह ने भी उन पर हमला किया, परन्तु उनका दमन नहीं हो सका। राजाराम की मृत्यु के पश्चात् जाटों का नेतृत्व भज्जा के पुत्र चूड़ामन के हाथों में चला गया। कुछ समय तक उसने हमले तथा लूटमार करना जारी रखा, परन्तु 1707 में जाजू की लड़ाई के पश्चात्, वह मुस्लिम खां के माध्यम से बहादुर शाह के पास गया और उसे 1500-500 की मनसबदारी तथा दिल्ली-आगरा के बीच की सड़क का कार्यभार दे दिया गया। तत्पश्चात् उसने सिक्खों के विरुद्ध अभियान में भाग लिया। राज्य के लिए जहांदार शाह तथा फर्रुखसियर के मध्य की लड़ाई में उसने जहांदारशाह का साथ दिया। परन्तु उसका पतन देखते हुए उसके शिविर तथा अन्तःपुर को लूटने वाला वह प्रथम व्यक्ति था। तथापि, फर्रुखसियर ने आगरा के गवर्नर, छबेला राम नागर को उसे दण्ड देने का आदेश दिया, परन्तु उसे बहुत कम सफलता मिली। उससे अगला गवर्नर, खान-ए-दौरान चूड़ामन को प्रलोभन देकर क्षमा कर दिए जाने के लिए राज्य दरबार में लाया। उसे दिल्ली से चम्बल तक के मुख्य मार्ग का कार्यभार पुनः दे दिया गया, परन्तु साम्राज्य के प्रति निष्ठावान होने की बजाए, उसने इस सुअवसर का प्रयोग अपनी जागीर बढ़ाने, पथ-कर लगाकर अपनी आर्थिक अवस्था सुदृढ़ करने तथा गुप्त रूप से शस्त्रों तथा असले का निर्माण करके अपने सैन्य बल को सुदृढ़ करने के लिए किया। इस प्रकार अपनी स्थिति सुदृढ़ करके, उसने थून के स्थान पर कच्चा किला बनाया और इसे अपना मुख्यालय बना लिया। संभवतः सैयद भाई, जिनका राजा दरबार में बहुत प्रभाव था, उसे गुप्त रूप् से प्रोत्साहन तथा सहायता प्रदान कर रहे थे।

राजा जय सिंह

सितम्बर, 1715 में फर्रुखसियर ने राजा जय सिंह को जाटों के विरुद्ध अभियान के लिए भेजा। कुछ टालमटोल के पश्चात् नवम्बर, 1716 में राजा ने 50,000 सैनिकों के साथ कूच किया, परन्तु घने जंगलों, विरोधी लोगों, रसद की कमी तथा परिवहन संबंधी कठिनाइयों के कारण उसकी प्रगति अवरुद्ध रही। मेवाती तथा अफगान वेतनभोगियों द्वारा जाटों को पुनः बल प्राप्त हो गया। राजधानी में सैयद अब्दुलखां ने अभियान की आलोचना की। अंत में अब्दुल्ला खां के चाचा खान-ए-जहां द्वारा जय सिंह के परामर्श के बिना ही समझौता कर लिया गया, जिसके अनुसार जाट नेता 50 लाख रुपए राज्य को तथा 20 लाख रुपए वज़ीर को देने तथा थून तथा डिंग के किले देने पर सहमत हो गया। यद्यपि उसे शांत कर दिया गया था, परन्तु विजित नहीं किया गया था, अतः वह सरकार को परेशान ही करता रहा। उस समय स्थिति पराकाष्ठा को पहुंच गई, जब उसके पुत्र मुखम सिंह ने आगरा के गवर्नर मादत खां के डिप्टी नीलकंठ नागर को मार डाला। अतः अप्रैल, 1722 में पुनः जयसिंह को उसके विरुद्ध सेना लेकर कूच करने को कहा गया। सितम्बर, 1722 में जब उसने वास्तव में कूच किया, तो चूड़ामन की मृत्यु हो चुकी थी तथा उसके पुत्र मुखम सिंह ने उसका स्थान ले लिया था, परन्तु उसका चचेरा भाई बदन सिंह आक्रामक सरदार के साथ मिल गया था। इस मतभेद तथा द्रोह के परिणामस्वरूप, जय सिंह ने अविलम्ब थून पर आधिपत्य करके इसे भूमिसात् कर दिया तथा तिरस्कार-स्वरूप इस पर गधों द्वारा हल चलवा दिया। मुखम सिंह भाग गया तथा बदन सिंह ने आगामी दो दशकों में भरतपुर, कुम्मेर, डिंग तथा बेर के किले बनवाकर सावधानीपूर्वक अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। उसका उत्तराधिकारी सूरजमल एक चतुर तथा निपुण शासक सिद्ध हुआ, जिसके संबंध में आगे बताया जाएगा।

उस समय हरियाणा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली एक अन्य शक्ति सिक्ख थे। बागड़ में बन्दा बहादुर सक्रिय तथा सुदृढ़ था और उसने सिहरी तथा खांडा ग्रामों के निकट अपने मुख्यालय बनाए हुए थे। उसने सोनीपत पर अधिकार कर लिया और वहां से कैथल तथा थानेसर के आसपास के क्षेत्रों पर आधिपत्य करता हुआ उत्तर की ओर बढ़ा। सरहिन्द तथा उत्तरवर्ती क्षेत्र शीघ्र ही उसके अधिकार में आ गए। परन्तु 1710 में बहादुरशाह ने सिक्खों का विरोध किया तथा निर्दयतापूर्वक उनका दमन किया। बन्दा को प्राणदण्ड देने से कुछ समय के लिए उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ा।

बंदा सिंह बहादुर

इसी बीच मुगल दरबार में शत्रुता एवं कलह का वातावरण बन गया। 1729 में दिल्ली में जूते बेचने वालों के दंगा-फसाद ने असंतुष्ट सैन्यदल, जो क्रोध से भीतर ही भीतर जल रहे थे, को और बल मिला। उस समय नादिरशाह के आक्रमण ने आग में घी का काम किया, जिससे मुगल साम्राज्य मृतप्राय हो गया।

1736 में लुटेरा तुर्क, नादिरशाह ईरान की गद्दी पर बैठा। उसकी परिमित महत्वाकांक्षाओं, आर्थिक आवश्यकताओं, भारत के धन-दौलत के प्रलोभन, दिल्ली में झगड़ों के समाचारों तथा मराठा शक्ति के उपद्रव ने उसे भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह सर्वज्ञात था कि मुगल दरबार का एक दल, विशेषतः निजामुलमुल्क तथा सादतखां, आक्रमकों के साथ मिले हुए थे। 12 जनवरी, 1739 को नादिरशाह ने लाहौर पर आधिपत्य जमा लिया और दिल्ली की ओर बढ़ा। मुगल सेनाओं ने शाही ठाठ से धीरे-धीरे चलते हुए दिल्ली से कूच किया और करनाल के छोटे से मार्ग को तय करने में दो माह लगा दिए। दोनों सेनाओं का करनाल के निकट सामना हुआ। 12-13 फरवरी की रात को अवध का गवर्नर सादत खां अपनी सेना सहित वहां पहुंच गया। सम्राट बड़ी अधीरता से उसकी प्रतीक्षा कर रहा थाा। अगली प्रातः वह सम्राट से मिला। संग्राम संबंधी योजनाओं पर विचार-विमर्श प्रारंभ हुआ। उसी समय उन्हें सूचना मिली कि फारसी सेनाओं ने अवध सेना की माल गाड़ी के 500 ऊंटों को लूट लिया था। इससे सादत खां को बहुत क्रोध आया। वह स्वयं को संयत कर पाने में असमर्थ हो गया तथा तत्काल नादिरशाह के विरुद्ध कूच करने के लिए बैठक से उठ गया। निजामुलमुल्क जैसे कुछ सरदारों ने उसे रुकने का परामर्श दिया ताकि अवध सेना लंबी यात्रा के पश्चात् थोड़ी देर विश्राम करके नाजादम हो सके, परन्तु सादत खां ने किसी की बात नहीं सुनी और फारसी सेनाओं के विरुद्ध तेजी से बढ़ता गया। यह देखते हुए उसके साथ मिल जाने के अतिरिक्त सम्राट के पास और कोई चारा नहीं था। अतः किसी भी योजना, या सेना के अग्रभाग में तोपखाने की व्यवस्था के बगैर ही भारतीय सेना लड़ने के लिए आगे बढ़ गई।

अपराहन का समय था भारतीय सेना ने भयंकर आक्रमण किया। फारसी अश्व सेना पीछे हट गई और झांसे में आकर भारतीय सेना को फारसी तोपखाने का सामना करना पड़ा। जब भीषण लड़ाई चल रही थी, निजामुलमुलक अपनी सेना के आगे हाथी पर बैठा हुआ आराम से काफी की चुसकियां ले रहा था तथा वजीर कमरुद्दीन खां और मीर आतश, सदुद्दीन खा उदासीन होकर यह सब देख रहे थे। किंतु भारतीय सेना बहुत बहादुरी से लड़ी। रुस्तम अली की तारीख-ए-हिन्द के अनुसार, भारतीय योद्धाओं, सैयदों, शेखों, अफगानों तथा राजपूतों ने अपनी भयंकर तलवारों से ऐसा घमासान युद्ध किया कि यदि रुस्तम तथा अफ्रेसियाब उस समय जीवित होते, तो इस भयंकर युद्ध को देखकर वे भी दहल जाते। ईरानी सैनिकों ने इन वीर योद्धाओं की तलवारों से डरकर युद्ध क्षेत्र छोड़ दिया और कुछ दूरी से अपनी बन्दूकों से गोलियां चलाकर भारतीय सैनिकों, जो युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े होने की अपेक्षा मृत्यु को श्रेष्ठ समझते थे, की लाशों के ढेर लगा दिए। (इलियट तथा डाउसन, दी हिस्ट्री आफ इण्डिया एज़ टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्ट्रारियन्ज, खंड-8, पृ. 61-62)। इस निर्णायक अवसर पर मुगल सरदारों के आपसी विरोध, ईर्ष्या तथा मनमुटाव के संबंध में मैडिवल इण्डिया: ए मिसलैनी खंड-1, अलीगढ़ 1969, पृ. 199-226 में देखिए-जहीरुद्दीन मलिक खान-ए-दौरान, मुहम्मद शाह का मीरबक्षी।)

परन्तु खान-ए-दौरान के पक्ष के बहुत से महत्वपूर्ण व्यक्ति मारे गए। वह स्वयं घायल हो गया, सादत खां पकड़ा गया तथा नादिरशाह के सम्मुख लाया गया। रात्रि हो जाने के कारण दोनों ओर की युद्धरत सेनाओं ने युद्ध बंद कर दिया। खान-ए-दौरान अपने शिविर में बैठा अगले दिन के युद्ध के लिए योजना बना रहा था कि उसकी मृत्यु हो गई। दूसरी ओर सादत खां ने नादिरशाह को अभिसूचित किया कि भारतीय सैन्य दल में खान-ए-दौरान जैसे बहुत से सरदार हैं। इस समाचार से नादिरशाह तथा उसकी सेना भयभीत हो गई। जैसा कि अब्दुल करीम कशमीरी की बयान-ए-वाक़ाए में लिखा है ‘अफगानी बन्दूकों की गोलियां का मुकाबला तीर-कमानों से करने वाले भारतीय सैनिकों द्वारा प्रदर्शित बहादुरी तथा भयंकर युद्ध को देखकर फारसी लोग भयभीत हो गए थे, वे सोचते थे कि यदि तोपखाने के अभाव में भारतियों ने इतनी शूरता एवं दिलेरी का परिचय दिया है, अब जबकि सम्राट अपने पूर्ण तोपखाने के साथ उनका साथ देने को तत्पर था, वे क्या करेंगे’ (इलियट एण्ड डाडसन, के ग्रंथ, पृ. 84 से उद्धृत)।

हाल ही में ईरान में रूस के राजदूत, कालुश्किन के पत्रों की खोज से इस प्रसंग की कुछ नई घटनाएं प्रकाश में आई हैं। नादिरशाह-अभियान में भाग लेने वाले एक व्यक्ति से प्राप्त पत्र के आधार पर उसने अपनी सरकार को रिपोर्ट भेजी कि करनाल की लड़ाई में नादिरशाह परास्त हो गया था और वह पीछे मुड़ने तथा भारत को छोड़ देने की तैयारी कर रहा था। मुगल दरबार की आन्तरिक अव्यवस्था तथा आशंकाएं ही मुगल सेना के आगे बढ़ने में बाधक बनी रहीं  और नादिरशाह की पराजय विजय में बदल गई। (के.ओ. ऐण्टोनोवा, इण्डो-रशियन इन दी सैवनटीथ एंड एटीन्थ सैंचरीज, मास्को, 1963, पृ.11)।

आनन्द राम मुखलिस के अनुसार, नादिरशाह ने शांति का औपचारिक प्रस्ताव मुगल सम्राट को भेजा। निजाम इस प्रस्ताव के विरुद्ध था, परन्तु सम्राट इसके पक्ष में था। अतः निजाम तथा अजीमुल्लाह शांति की शर्तों पर विचार-विमर्श के लिए नादिरशाह के पास गए। नादिरशाह हर्जाने के तौर पर 50 लाख रुपए लेकर वापिस जाने के लिए तैयार था, जिसमें से 20 लाख उसी समय अदा किए जाने थे तथा शेष उसके अटक पहुंचने तक किश्तों में दिए जाने थे। परन्तु निजामुलमुल्क ने, जो इन संधिवार्ताओं का निर्देशन कर रहा था तथा खान-ए-दौरान की मृत्यु के पश्चात मीरबख्शी नियुक्त कर दिया गया था, सादत खां की ईर्ष्या को भड़काया। निजामुलमुल्क की बातचीत को निष्फल कर देने तथा नादिरशाह को वापिस भेजने और मुगल साम्राज्य को बचाने के यश से उसे वंचित करने के लिए, उसने फारसी आक्रान्ता को इतना कम हर्जाना स्वीकार न करके एक भारी रकम प्राप्त करने के लिए उकसाया।

बाद में जब निजामुलमुल्क नादिरशाह से मिला, तो नादिरशाह ने अपनी मांग 50 करोड तक बढ़ा दी। चूंकि निजामुमुल्क किसी प्रकार का वचन देने में असमर्थ था तथा मामले का अंतिम रूप से निपटारा किए बिना उसे वापिस जाने की अनुमति नहीं थी। अतः उसने सम्राट को फारसी सेना के शिविर में बुला भेजा। नादिरशाह ने उसे और उसके अन्य अधिकारियों को वस्तुतः बन्दी बना लिया। इसी बीच उसने मुगल शिविर में इतनी कड़ी घेराबंदी की कि वहां आटा 4 रुपए सेर के भाव बिका और रसद की सख्त कमी पेश आई। अतः अपनी नितांत अकर्मण्यता तथा सूझबूझ की कमी के कारण यह स्थिति उत्पन्न करने वाले सम्राट के पास एक लाख सैनिकों की सेना का स्वामी होते हुए भी फारसी अधिकारियों के सम्मुख समर्पण करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। सादत खां तथा अजीमुल्लाह खां को नादिरशाह के शासन की उद्घोषणा करने के लिए दिल्ली भेजा गया। नादिरशाह, मुगल सम्राट सहित सेनाओं के साथ आगे बढ़ा। आनन्द राम के शब्दों में ‘मुगल राज्य का अंत दिखाई पड़ता था’ (इलियट तथा डाउसन, के ग्रंथ, पृ. 87 से उद्धृत)।

10 मार्च, 1739 को दिल्ली में जामा मस्जिद से नादिरशाह के सम्राट होने की उद्घोषणा की गई, परन्तु सायं 4 बजे एक अफवाह फैल गई कि एक बन्दूकची की गोली से नादिरशाह बुरी तरह घायल हो गया है। इस पर लोग फारसी लोगों पर टूट पड़े और लगभग 3 हजार व्यक्तियों को कत्ल कर दिया गया। सारी रात दिल्ली में हल्लागुल्ला होता रहा। जब प्रातः हुई नादिरशाह क्रोध में आपे से बाहर हो गया। प्रातः 9 बजे वह चांदनी चैक में रोशनुद्दौला मस्जिद में गया, वहां पर लोगों के सामने खड़े होकर भारतीयों के जनसंहार का आदेश दिया। आधा दिन तक राजधानी में हत्याकांड तथा लूट-खसोट चलती रही। लगभग 20,000  व्यक्तियों को मौत के घाट उतार दिया गया और हजारों लोगों ने आत्महत्या कर ली। चांदनी चौक, दरीबा बाजार, फ्रूट मार्केट तथा जामा मस्जिद के क्षेत्रों को भूमिसात कर दिया गया। अन्त में अपराह के तीन बजे, मुहम्मदशाह की प्रार्थना पर पर्शियन सम्राट ने अपना आदेश वापिस लिया और भयंकर खून-खराबे की समाप्ति हुई। तब भयानक लूट-खसोट तथा यातनाओं के पश्चात आक्रान्ता 80 करोड़ रुपए की दौलत लेकर वापिस चला गया।

साभार-बुद्ध प्रकाश,हरियाणा का इतिहास, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, पृः 54 

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