दिनेश हरमन की ग़ज़लें

ग़ज़लें

1

हर तरफ ज़ुल्म है आतंक है तबाही है
और सितम ये है कि रोने की भी मनाही है

तू भले लाख छुपा ले तेरे गुनाहों को
वो जो ख़ुदा है हरिक ज़ुल्म देखता ही हैं

2

मैं खाक़ हूँ, ये जो सोना बता रहे हैं मुझे
ज़हीन लोग हैं चूना लगा रहे हैं मुझे

मैं चाहता हूँ कि रोटी नसीब हो मुझ को
वो चाँद तारों के किस्से सुना रहे हैं मुझे

जो कह रहे थे कि इक पल में भूल जाएंगे
एक अरसा हो गया अब तक भुला रहे हैं मुझे

3

कभी दरों से कभी खिड़कियों से बोलेंगे
सड़क पे रोको गे तो हम घरों से बोलेंगे

कटी  ज़बाँ  तो   इशारे  करेंगे  आँखों  से
जो सर कटे तो हम अपनी धड़ों से बोलेंगे

ये  आसमान  उन्हीं के सुनाएगा किस्से
जो अपनी बात को अपने परों से बोलेंगे

सवाल कर ही लिया हैं तो अब सम्भल जाओ
वो  अब  ज़बाँ  से  नहीं  लाठियों  से  बोलेंगे

हमारा नाम भी लिख लीजे अपनी गोली पर
कि अब निकल के हम अपनी हदों से बोलेंगे

4

जो भी है, बिक जाने को तैयार है, धिक्कार है
हर तरफ बाज़ार ही बाज़ार है, धिक्कार है

वो, किया था छेद जिस ने कल तुम्हारी नाव में
आज उसके हाथ में पतवार है, धिक्कार है

गिद्ध हो तुम, खा रहे हो नोच कर इस मुल्क को
और कहते हो वतन से प्यार है, धिक्कार है

क्या यहाँ कोई नहीं जो रोक ले इस भीड़ को
क्या सभी की ज़ेहनियत बीमार है? धिक्कार है

कल जहाँ जयकार थी उत्साह था उल्लास था
अब वहाँ धिक्कार की दरकार है, धिक्कार है

आइये इक दूसरे को कोस लें हम और आप
ये हमारी ही चुनी सरकार है, धिक्कार है.

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज – 29

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Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।