अनुवाद

हिंदी भाषा चुनौतियां और समाधान – मोहम्मद इरफान मलिक

मोहम्मद इरफान मलिक
अरबी विभाग
पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला

यह लेख हरियाणा सृजन उत्सव 2019 में पंजाबी युनिवर्सिटी पटियाला, अरबी विभाग के मोहम्मद इरफान मलिक ने पेश किया था। प्रस्तुत है उसका हिंदी अनुवाद।

हिंदी भारतीय सभ्यता, संस्कृति और समाज की भाषा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इक्कीसवीं सदी में कोई भी भाषा ऐसी नहीं है, जिसको चुनौतियां का सामना नहीं करना पड़ रहा । हालांकि किसी भाषा के सामने चुनौतियां कम है और किसी के सामने ज्यादा हैं। आज हम सभी जानते हैं कि हिंदी अपनी पहचान बनाए रखने के लिए बहुत सारी मुश्किलों और चुनौतियों का सामना कर रही है। जिन पर खासतौर से ध्यान देने की जरूरत है।

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21वीं सदी वास्तव में कंप्यूटर और इंटरनेट की सदी है। कंप्यूटर आज की शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। क्योंकि समय के साथ-साथ शैक्षिक प्रणाली में भी परिवर्तन हुए हैं, और इस प्रणाली को डिजिटल प्रौद्योगिकी से जोड़ा गया है। नई कक्षा के छात्र इसकी मदद से जल्दी भाषा सीख सकते हैं। लेकिन भले ही अधिकांश घराने हिंदी शिक्षा के लिए पुराने ढ़र्रे पर रहे हैं, जबकि बच्चे आंखें खोलते ही मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर और टैबलेट के साथ खेलते दिखाई दे रहे हैं। यानी आंखें खोलते ही वह खुद को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के करीब पाता है। लेकिन होश संभालते हुए जो शिक्षा प्रणाली उनके सामने पेश की जाति है उनमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। जबकि आज के दौर में वही भाषाएं जिंदा रहेंगी जो अपने आप को बदलते हुए इलेक्ट्रॉनिक और तकनीकी पटल के साथ जुड़ने की क्षमता रखती हैं। किसी भी भाषा की तरक्की का दरोमदार उसके बोलने वालों के ऊपर होता है कि वह किस हद तक अपनी भाषा को बदलते हुए हालतों के साथ खुद को जोड़ते हैं।

जिन लोगों को हिंदी का दर्द है, वे थोड़ा नजर दौड़ाकर देखें कि हिंदी के अलावा किसी दूसरी भाषा की ऐसी हालात तो नहीं है। पंजाब में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर के हजारों स्कूल हैं। जहाँ हिंदी विषय पढ़ाया जाता है। एक जमाना था जब हिंदी मीडियम स्कूलों की भरमार थी। अब सवाल यह है कि जब तक हिंदुस्तान की स्कूल प्रणाली में अगर पढ़ने का माध्यम हिंदी नहीं होगा, छात्रों को पहली भाषा के तौर पर हिंदी पढ़ने का मौका नहीं मिलेगा तो हिंदी का खोया हुआ रुतबा तो क्या हिंदुस्तान की क्षेत्र की बोली बन कर रह जाएगी।

21 वीं सदी में, अगर हमें वाकाई हिंदू से हमदर्दी होती, तो हम अपने बच्चों को हिंदी शिक्षा से वंचित नहीं करते। मैं यह नहीं कहता कि हिंदी वाले अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर या पायलट और वैज्ञानिक मत बनाएं। जरूर बनाएं लेकिन साथ में हिंदी भी तो सिखानी चाहिए। क्योंकि अगर किसी राष्ट्र को गुलाम बनाना हो तो पहले उसकी भाषा खत्म की जाती है। उसकी जड़ें काटी जाती हैं। अगर हम खुद अपनी भाषा को तव्वज्जो नहीं देंगे तो अपनी पहचान खो देंगे और अपनी जड़ें अपने आप काटने के लिए मजबूर हो जाएंगे।

जहां तक ​​रोजगार के की बात है, तो माता-पिता को यह डर सताता रहता है कि प्रतियोगिता के दौर में हमारे बच्चे उन बच्चों से पिछड़ जाएंगे जो आधुनिक शिक्षा ले रहे हैं। और उनके बच्चों को कोई रोजगार हासिल नहीं हो पाएगा। यह सिर्फ एक वहम है। हिंदी पढ़ने का मतलब यह नहीं है कि बच्चे किसी अन्य भाषा को नहीं पढ़ेंगे, और न ही इसका अर्थ है कि हिंदी पढ़ना रोजगार में सहायक नहीं होगा।

रोजगार की समस्या आज हर व्यक्ति को है। क्या कला और विज्ञान वर्ग के छात्र रोजगार के लिए भटक नहीं रहे हैं? फिर हम क्यों इस खौफ में अपनी भाषा छोड़ रहे हैं? हमें यह न भूलें चाहिए कि हिंदी हमारी भाषा है, और इस से काटकर हम इसकी पहचान खो देंगे क्योंकि भाषा किसी कौम और देश के जमीर की आवाज होती है, उसका मन और उसकी संस्कृति चेहरा होती है। हिंदी की नई नस्ल को यह एहसास दिलाया जाए कि भले ही हिंदी रोजगार दे या न दे, लेकिन वह हमारी विरासत और पहचान हैं, इसलिए हिंदी से उनका जज्बाती लगाव होना चाहिए। यदि हम रूसी और चीनियों की तरह अपनी भाषा के महत्व को समझ जाएं तो हम इस को मुहब्बत करेंगे और हमारी तरक्की के रास्ते में भी कोई बाधा नहीं आएगी।

हिंदी भाषा को जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ वह यह कि हिंदी केवल हिंदूओं की भाषा नहीं थी, लेकिन सांप्रदायिक धार्मिक ताकतों ने इस का खूब इस्तेमाल किया और भाषा की राजनीति करने वालों ने इसको धर्म से जोड़ दिया। हिंदी देवनागरी लिपि होने के कारण हिंदूओं की समझी जाने लगी। और उर्दू फारसी लिपि होने के कारण मुसलमानों की मानी जाने लगी। जबकि उर्दू और हिंदी दोनों भाषाएं सगी बहने हैं। एक आम अंदाजे के मुताबिक उर्दू में सत्तर फीसदी शब्द हिंदी भाषा के  हैं। अरबी और फारसी के  केवल बीस या तीस फीसदी शब्द हैं। इसी प्रकार लगभग एक तरह के मुहावरों व कहावतों का इस्तेमाल दोनों भाषाओं में समान होता है। दोनों ने एक दूसरे को प्रभावित किया है और एक दूसरे से प्रभावित हुई हैं। हर व्यक्ति यह भी अच्छी तरह से जानता है कि भाषाओं का कोई धर्म नहीं होता है। हिंदी से मुसलमान भी उतना ही प्यार करता है जितना गैर मुसलमान करते हैं।

अब, आम तौर पर यह माना जाने लगा है कि हिंदी पढ़ने से कुछ लाभ नहीं होगा। इन परिस्थितियों में, 21 वीं सदी में हिंदी के विकास की हालात कैसी होगी इस का अंदाजा लगना मुश्किल नहीं है। हमें हिंदी की इस सुरत-ए-हाल के समाधान के लिए और उसकी बेहतरी के लिए हमें कुछ अहम कदम उठाने होंगे।

हम यह न भूलना चाहिए कि कोई भी शुभ काम अपने घर से ही शुरू करना होता है, इसलिए हमें अपने घरों में हिंदी का माहौल बनाना होगा ताकि हमारे बच्चे हिंदी में पीछे न रहें। उन्हें हिंदी भाषा सिखाएं, हिंदी भाषा सिखाएं और पढ़ाएं और हिंदी भाषा की शिक्षा दें। कम से कम एक अखबार और एक पत्रिका जरूर मंगवाएं। नियमित रूप से किताबें खरीदें और बच्चों की किताबें हिंदी में खरीदें और उन्हें उपहार देने की आदत डालें। यह भी हिंदी के विकास का एक प्रयास है।

हिंदी के विकास के लिए, हमें अपने हस्ताक्षर, दुकानों के फ्लेक्स बोर्ड, अपने  विजिटिंग कार्ड, शादी के कार्ड इत्यादि में हिंदी का इस्तेमाल करना चाहिए। क्योंकि हिंदी एक ऐसी भाषा है जो आसानी से हर वर्ग को समझ आती है। हिंदी के विकास के लिए हमें सरकारी और गैर-सरकारी कार्यालयों में हिंदी को प्रोत्साहित करना होगा। हिंदी की किताबों को महत्व देना होगा जहां भी सुविधा मौजूद है, सरकारी कार्यालयों में प्रार्थना पत्र या दरख्सातें हिंदी में लिखें। हिंदी वालों को चाहिए कि वह अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी अपना पता लिखें। अपने घरों, दफ्तरों पर नाम की तख्तियां हिंदी में लगाएं। कार्यालयों में हिंदी का उपयोग हो, बैंक आदि में पैसा निकलवाते या चैक देते वक्त हिंदी का इस्तेमाल करें, सभी बस स्टैंडों और बसों, रेलवे स्टेशनों, नगर निगमों, कार्यालयों, तहसीलों और स्वास्थ्य केंद्रों के अलावा अन्य सभी जगह बोर्ड हिंदी में होने चाहिए। इन सुझावों के अलावा अन्य और इस तरह के आम सुझावों पर ध्यान दिया जा सकता।

हिंदी शिक्षा के दायरे को फैलाने के लिए हमें उसे घर-घर पहुंचना चाहिए, हिंदी पढ़नी चाहिए, हिंदी पढ़नी चाहिए, हिंदी और हिंदी लिखनी चाहिए, एक आंदोलन के तौर पर लोगों से संपर्क करना चाहिए। वाट्स एप या फेसबुक पर हिंदी का प्रयोग करें। सरकारी स्तर पर हिंदी के विकास के लिए लैंगवेज-लैब बनाई जाए। हिंदी को सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के रोजगार से जोड़ना भी आवश्यक है ताकि नई पीढ़ी अपने भविष्य को रोशन कर सके। प्रिंट मीडिया या विज्ञापनदाता समूहों को भी हिंदी पर ध्यान देना चाहिए ताकि हिंदी को रोजगार से जोड़ा जा सके।

जिन विद्यालयों, कॉलेजों में हिंदी के छात्रों की संख्या कम हो रही है, उनके शिक्षकों को आस-पास के क्षेत्रों में हिंदी के लिए अभियान चलना चाहिए। आज के आईटी युग में, हमें यह भी आकलन करना चाहिए कि क्या प्राथमिक स्कूलों में दी जा रही शिक्षा वर्तमान आईटी के लिहाज से परिपूर्ण है या नहीं? इस लिए हिंदी के सलेबस को आईटी आधारित बनाया जाना चाहिए। हिंदी सॉफ्ट वेयर के विकास में काम करें। क्योंकि अगर वर्तमान तेजी के युग में वह इस में पीछे रह गई तो पिछड़ जाएगी। हिंदी के विकास में लगे हुए सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों को एक मंच पर आकर वर्ष में कम से कम एक बार हिंदी की चुनौतियों और मुश्किलों पर चर्चा करनी चाहिए, उनको हल करने की कोशिश करनी चाहिए। रिक्त पड़े हिंदी पदों को केंद्रीय व राज्यों सरकारों को तुरंत भरना चाहिए। बेहतर हिंदी शिक्षकों और उसके सेवकों को आवार्ड देन चाहिए।

अंत में, हम कह सकते हैं कि 21वीं सदी में हिंदी की हालात को देखते हुए कुछ जिम्मेदारियां हमारी भी बनती हैं। क्योंकि हिंदी भाषा के विकास के लिए दूसरों की प्रतीक्षा करने या किसी दिव्य शक्ति की प्रतीक्षा करने के बजाय, आप जो भी कर सकते हैं, अकेले करें या समूह के आकार में करें। इन जिम्मेदारियों को लागू करना हमारा पहला कर्तव्य होना चाहिए। मुझे पूरी उम्मीद है कि हालात और बेहतर होंगे। इन्हीं अंधेरे से सूरज निकलेगा। और हिंदी  उसकी वास्तविक जगह मिलेगी।

बूझने नहीं दूंगा शमा-ए-मोहब्बत
हर चंद जमाने की हवा ठीक नहीं है

मोहम्मद इरफान मलिक सुपुत्र मोहम्मद इकबाल,
मोहल्ला कच्चा कोट, हाउस नंबर 188, वार्ड नंबर 24,
देहली गेट के अंदर,
मालेरकोटला, जिला संगरूर (148023) पंजाब
मो. 98149-60259

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