आदिवासियों की हुंकार

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को वाईल्ड लाई फ्रस्ट और वन विभाग के कुछ आला रिटायर अधिकारियों की याचिका पर सुनाई करते हुए देश के 20 लाख से अधिक आदिवासियों को उनकी जमीनों से बेदखल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि जिन लोगों को वन अधिकार कानून 2006 के तहत दावे खारिज हुए हैं उनको 27 जुलाई से पहले अपनी जमीनें खाली करनी होंगी।

कोर्ट द्वारा किसी भी देश में कानूनी तौर पर विस्थापित किए जाने का यह सबसे बड़ा मामला है। इस का देश और दुनिया स्तर पर भारी विरोध हो रहा है।

आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना है कि –
वन्यजीव समूह द्वारा दायर की गई याचिका में अदालत के आदेश के बेदखली के आदेश के बाद मूलनिवासियों के अधिकार पर खतरा और संकट पैदा हो गया है। इस मामले में केन्द्र सरकार की उदासीनता की निंदा करते हुए उन्हांेने कहा कि वन अधिकार मान्यता कानून के लागू हुए 10 साल पूरे हो रहे हैं जिसमें पूरे देश में 42 लाख से अधिक आदिवासियों के दाखिल दावे के सापेक्ष 38 लाख दावों पर कार्यवाही की गयी और उसमें से 18 लाख परिवारों को वनाधिकार मिला है। इस तरह से 20 लाख परिवार जो दूर दराज वन क्षेत्रों में रहते हैं और उनकी आजीविका का एक मात्र साधन खेती और वनभूमि है उनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस आदेश के खिलाफ ट्वीट कर चुके हैं कि वन अधिकार कानून को चुनौती देकर आदिवासियों को बेदखल किया जा रहा है और भाजपा सरकार मूक दर्शक बनी हुई है.

इस आदेश के खिलाफ कुछ आदिवासी, सामाजिक, जनवादी और प्रगतिशील संगठनों, आदिवासी समाज के शुभचिंतकों ने 2 मार्च को दिल्ली में संसद कूच करने का एलान किया है।

झारखंड के 10 हजार आदिवासी पिछले पाँच दिनों से सड़कों पर है। राजधानी रांची सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों में लोग उग्र विरोध प्रदर्शन करने पर मजबूर हो गए हैं. इसके अलावा आदिवासी बहुल राज्य ओड़िशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि में तीव्र विरोध प्रदर्शन जारी हैं।

देश में स्वराज आन्दोलन से जुड़े डॉ योगेन्द्र यादव शुक्रवार को दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी इलाके कोटड़ा पंहुचे और 22 वें आदिवासी मिलन मेले में शिरकत की । आदिवासियों के हालात को देखकर यादव ने साफ किया कि यहां पर स्थिति आज भी दयनीय है, कैंद्र सरकार हो या राज्य सरकार आदिवासियों के साथ वैसा ही बर्ताव किया जा रहा है, जैसा अंग्रेजों ने भारत के साथ किया था। आज आदिवासियों को देश में बहुत पिछड़ा माना जाता है, स्वराज के नाम पर आदिवासी इलाकों में कुछ भी नहीं है आज भी यहां के लोग गुलामी की जिन्दगी सफर कर रहे है। सरकार ने सारे अधिकार इनसे छिन लिए है। आगामी छ मार्च को जंगल जन जमीन आंदोलन समिति की ओर से संभाग व्यापी आंदोलन किया जा रहा है, अगर सरकार ने फिर भी इनकी मांग को नहीं माना तो आंदोलन अनवरत जारी रहेगा, जिसकी सारी जिम्मेदारी सरकार की होगी

आदिवासियों का जंगल से रिश्ता बहुत गहरा है। उनकी अस्मिता और अस्तित्व जंगल, नदी, पहाड़ से ही परिभाषित होती है। इसलिए जब भी किसी बाहरी ने उन्हें जंगल से बेदखल करने की कोशिश की है, आदिवासियों ने हमेशा विद्रोह किए है। यही नहीं अंग्रेजों के खिलाफ भारत में सबसे पहले किसी ने लड़ाई लड़ी थी तो वह आदिवासी ही थे। भारत सरकार ने आदिवासियों के खिलाफ इतना बड़ा निर्णय लेकर शायद आफत मोल ले ली है।

parirodh march 2 marchसंघर्ष सम्वाद पत्रिका की संवादाता पुजा के अनुसार देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश के बावजूद देश भर के जंगलों में सैकड़ों सालों से रहने वाले आदिवासी अपना घर नहीं छोड़ेंगे .बस्तर ,सरगुजा ,झाबुआ से लेकर उत्तर प्रदेश के आदिवासी अंचल से जो जानकारी आ रही है वह गंभीर है .वे सर्वोच्च अदालत के फैसले को आदिवासियों के खिलाफ अबतक का सबसे बड़ा हमला मान रहे हैं .बस्तर में पहले से ही आदिवासियों पर जुल्म होता रहा है अब इस फैसले के बाद आदिवासियों को बेदखल करने का कानूनी अधिकार मिल जाएगा . आदिवासियों के बीच काम कर रहे जन संगठनों का कहना है कि एक करोड़ से ज्यादा आदिवासी जाएंगे

ज्वाइंट फोरम फॉर एकेडमिक एंड सोशल जस्टिस के आह्वान पर बुलाए गए 2 मार्च के दिल्ली कूच को भारत भर में समर्थन मिल रहा है।

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