– सोनी सिंह

8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस दुनिया भर में हर साल मनाया जाता है। यह महिलाओं की आर्थिक, राजनीतिक और सामजिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यह कोई सामान्य दिवस नहीं है बल्कि इस के लिए सैकड़ों महिलाओं, मजदूरों ने अपनी जान कुर्बान की है और संघर्ष किया है। आज इसको केवल महिला दिवस या अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में प्रचारित किया जाता है जबकि यह अंतर्राष्ट्रीय महिला मजदूर दिवस है। बाजार ने इस दिवस को अपनी गिरफ्त में ले लिया है और जिन सरकारों के खिलाफ महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया था वह इसका इस्तेमाल उनकी लूट को ज्यों का त्यों बनाए रखने के लिए करने लग गई हैं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस उन आम महिलाओं की कहानी है जिन्होंने इतिहास की रचना की। बढ़ते औद्योगीकरण और पूंजीवादी आर्थिक विस्तारवाद के बीच 20वीं सदी की शुरूआत में पहली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा था।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस माने का प्रस्तव जर्मन की मशहूर कम्युनिस्ट मजदूर नेत्री क्लारा जेटकिन ने रखा था। वह दूसरे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की सदस्या थी। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में यह प्रस्ताव हुआ था कि दुनिया भर की महिलाओं को संघर्ष को एकजुट करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाया जाना चाहिए। क्लारा जेटकिन ने यह प्रस्तव 1910 में कोपनहेगन में हुए अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में रखा जिस में 17 देशों की 100 महिलाओं ने भाग लिया था। इस के बाद पूरे दुनिया में महिला दिवस मानने की परंपरा शुरू हुई।

इसके पीछे संघर्षों का अतीत है

न्यूयार्क के कपड़ा कारखानों में हजारों महिलाएं काम करती थी। इनमें से ज्यादा तर रूस, इटली, पोलैंड से आई हुई थीं। हर रोज 15 घंटे काम करती थी। काम के 15 घंटों के अलावा उनके द्वारा बनाए गए कपड़ों के भी पैसे दिए जाते थे। सुई-धागा, बिजली और कुर्सियों की जगह वे जिन बक्सों का इस्तेमाल करती थी, उनके लिए भी अपने पैसे देने पड़ते थे। देर से आने पर या काम खराब होने पर, बाथरूम में ज्यादा देर करने पर भी जुर्माना लगता था। बच्चों को भी कई घंटे काम करना पड़ता था। 1844 में “लोवेल मजदूर महिला संशोधन संघ” की स्थापना की। और पहली बार काम के 10 घंटे की मांग की।

8 मार्च 1857 को न्यूयार्क शहर में विरोध प्रदर्शन हुआ। कपड़ा कारखाना में काम करने वाली महिलाएं काम की बेहतरी, काम के 10 घंटे, महिलाओं के लिए समान अधिकारों की मांग करते हुए पिकेटिंग (धरना) की। वह अपनी बुरी परिस्थितियों में काम करना पड़ता था, उनके खिलाफ और वेतन कम पाने के खिलाफ खड़ी हुई।

8 मार्च 1908 के दिन न्यूयार्क में दर्जी व्यापार करने वाली महिलाओं में फिर एक बार 18 57 की कवायद को याद दिलाते हुए वोट करने की अधिकार री मांग की, और इसके साथ ही ‘स्वेट शॉप’, बाल श्रम को खत्म करने की मांग की। उसी दौरान विभिन्न सिलाई के कारखानों को बंद करके हड़ताल शुरू किया। इस आंदोलन में 15000 महिलाएं शामिल हुई।

अमेरिका के इतिहास में इन मजदूरों ने कुछ बहुत ही प्रसिद्ध यूनियनों की स्थापना की। उनमें से 1900 में स्थापित अंतरराष्ट्रीय महिला- कपड़ा-मजदूरों का यूनियन उल्लेखनीय है। हमेशा ओवर टाईम काम करना पड़ता था पर उसके लिए अतिरिक्त पैसे नहीं दिए जाते थे। मजदूर महिलाओं की संघर्ष का समर्थन करने वाली मध्यम वर्ग और मेधावी वर्ग की महिलाओं के सहयोग से 1903 में बने नेशनल वूमेन्स ट्रेड यूनियन लीग का समर्थन पाकर ‘शर्ट वैस्ट’ बनाने वाले न्यूयार्क के मशहूर दुकानों में से दोलीसरसन एंड कंपनी, ट्रयांगिल वैस्ट कंपनी- के खिलाफ हड़ताल शुरू किया गया था।

छोटे दुकानों के कार्रवाई के बाद कुछ समय तक आम हड़ताल की घोषणा की, उन महिलाओं ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। यूनियन के अधिकारियों का विरोध करके 22 नवम्बर 1909 को “20 हजार लोगों की विद्रोह” शुरू हुआ। लंबी और कठीन लड़ाई को ज्यादा दिन तक नहीं चला पाएंगी वाली बकवास को झूठा साबित करते हुए, उस लड़ाई ने महिलाओं द्वारा की गई एक दीर्घाकालीन हड़ताल का रूप ले लिया।

तीन महिनों तक की बर्फ की तरह ठंडे मौसम में 16 से 25 साल उम्र वाली महिलाओं ने हर रोज धरना किया। गिरफ्तार हुई, पुलिस लाठियों की मार खाईं। यह हड़ताल महिनों चली थी। सभी दुकानों के समझौता करने पर हड़ताल टूट गई फिर भी महिलाओं की निपुणता और सहनशक्ति ने दिखा दिया था कि मजदूर संघ केवल पुरुषों के लिए ही नहीं होते। यह कामयाब हुई थी, पर इस विद्रोह ने कुछ खास चीजों को बदल दिया। यह अनपढ़ प्रवासी महिलाएं कुछ भी नहीं कर सकेंगी, इस धारणा को ललकारा, बहुत से महिलाओं में, प्रवासी लोगों में, शोषण के शिकार विस्तृत जन समूहों में आत्म सम्मान और शक्ति को जगाने में कामयाब हुआ।

इसके एक साल बाद 25 मार्च 1911 में ट्रयांगिल आग-दुर्घटना हुई। यहां काम करने वाली 146 महिलाएं आग के लपटों में जलकर राख हो गई। इनमें कई 13-25 साल उम्र की थी जो नई-नई अमेरिका आई थी। इस घटना का कारण सुरक्षा की कमी बताया गया था।

अमेरिका की महिला मजदूरों की गाथाओं को मदर जोन्स,एल्ला रीव ब्लूएर, केट मुल्लानी, कोजर्नर ट्रूथ, एलिजाबेथ हर्ली र्फलन जैसी महान आंदोलनकारी वीर नारियों के नाम से जाना जाता ही। ये स्वतंत्र महिलाए थी जो संगठन बनाने, लड़ने, जीतने-हारने का काम किया, वे ऐसी महिलाएं थी जिन्होंने यह जाना कि अगर हमें नष्ट नहीं होना है तो साथ खड़े रहकर योजनाएं बनानी है। उन महिलाओं ने केवल जिंदगी चलाने के लिए ही नहीं, सम्मान से जीने के लिए जरूरी मांगों को लेकर भी संघर्ष किया।

जर्मनी की सुप्रसिद्ध महिला नेता क्लारा जेटकिन ने कहा था कि हर साल एक निश्चित दिन को दुनिया के सभी देशों की महिलाएं अपनी मांगों पर जोर देने के लिए जुट जाएंगी। उन्होंने यह भी घोषणा किया कि “महिला दिवस को एक अंतरराष्ट्रीय लक्षण से युक्त होना बहुत जरूरी है।” 1913 तक दुनिया के अलग-अलग देशों में विभिन्न तारिखों पर मनाया गया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दिवस महिलाओं के वोट-अधिकार से जुड़े आंदोलनों को महत्व देने के लिए मौका देता रहा।

1911 से 1915 कई यूरोपीय शहरो में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, महिला रैलियों के रूप में मनाया जाता रहा। 1 मई के मजदूर दिवस के मौके पर भी इस दिवस को मनाया गया था।

19 मार्च 1911 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का निर्णया लिया था। इस तारीख को यूं ही नहीं चुना गया था। जर्मनी के मजदूरों के साथ उस तारीख का ऐतिहासिक महत्व जुड़ा था, 19 मार्च 1848 को पहली बार जनता की ताकत को पहचानने वाला प्रशिया का राजा मजदूर वर्ग की बगावत के डर से पहले ही घुटने टेक चुका था। उन्होंने जो वादे किए थे, निभा नहीं सका, उनमें महिलाओं के वोट डालने के अधिकार का वादा भी था।

1911 में जब पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया तो इस दिन जर्मनी, आस्ट्रिया उबलते महिला सागर बन गए थे। छोटे शहरों, गांवों के हॉल भी इतना भर गए थे कि महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों पर बैठे पुरूष मजदूरों को उठने के लिए कहना पड़ा। एक खास बदलाव के लिए अबतक घर में बंदी बैठी महिलाए समारोह में जाने लगी और पुरूष घर में बच्चों की देखभाल करने लगे। 30,000 महिलाओं द्वारा अत्यंत भारी सड़क-प्रदर्शन किया गया।

 

भारत में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च 1943 को मुंबई में आयोजित किया गया था। इस का आयोजन सोवियत संघ की मित्र नाम संस्था ने किया था। इसके बाद 1950 में नेशनल फैडरेशन ऑफ विमेन द्वारा हर साल 8 मार्च को महिला आंदोलन को मानने का निर्णय लिया गया और इसकी पूरे भारत में शुरूआत हुई। 8 मार्च 1971 का पूणे नगरपालिका कामगारों की महिलाओं का आंदोलन बेहद महत्वपूर्ण है। इस दिन महिलाओं ने अपनी मांगों के लिए पूरे शहर में जुलूस निकाला था।

इस के बाद जैसे-जैसे जागरुकता बढ़ती गई तो देश भर में विभिन्न किस्म के महिला संगठनों, राजनीतिक पार्टियों के महिला संगठनों, स्वतंत्र जनवादी महिला संगठनों ने भी 8 मार्च पूरे भारत भर में मनाना शुरू किया।

भूमंडलीकरण के बाद देखा जा रहा है कि महिला दिवस को बाजार ने अपने गिरफ्त में ले लिया है और इस को अन्य दिवसों की तरह मात्र एक और दिवस बनाकर छोड़ दिया है। इस संघर्ष के पीछे महिलाओं के संघर्ष को दबा कर इसको केवल उपहारों में दबाया जा रहा है। जबकि महिला दिवस महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष का प्रतीक है।

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