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Category: खेती-बाड़ी

डा. जोगिन्द्र सिंह मोर – बदलते हालात-पिछड़ती कृषि

                धरती की सदियों से इकट्ठी की हुई उत्पादन शक्ति को आधी सदी से भी कम समय में हमने  उसे निचोड़ कर रख दिया है। हमने धरती से निकाला ज्यादा है और उसे दिया कम है। अपनी खर्च हो चुकी उत्पादन

राजकिशन नैन – सिमट रही है आज अंजरि मेंं उनकी धरा-किसानी

हरियाणवी अंचल के गांवों में वैश्वीकरण के दानवी पंजे ने सदियों से चले आ रहे लोकजीवन के ताने-बाने को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले पुश्तैनी काम-धंधों का पूरा गणित एक बारगी ही बदल गया है। ग्राम्यांचलों

कमलेश चौधरी – हरित क्रान्ति और हरियाणा का विकास

लेख


हरियाणा का नाम आते ही कृषि व किसान पर आधारित प्रदेश की छवि आँखों में उभर आती है। जो हरा भरा व सम्पन्न है, पर सच्चाईयाँ कुछ इससे इतर भी है।

हरियाणा का निर्माण हुए 51 साल बीत गये

विनोद स्वामी – राजस्थान में किसान आंदोलन

बीजो ना इब बाजरी, बीजो हिवड़े आग।
क्रांति फसलां काटस्यां, किस्सा काती लाग।।

राजस्थानी साहित्यकार रामस्वरूप किसान ने जब यह दोहा लिखा, तब राजस्थान का किसान नई सदी राह पर विरासत में मिले अकाल की परम्परा को जेहन में लिए