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मैं कासी का जुलहा बूझहु मोर गिआना – डा.स

आलेख

ब्राह्मणवाद की विचारधारा ने श्रम-जन्य कर्मों का तिरस्कार करते हुए वर्णधर्मी व्यवस्था के अंतर्गत उत्पादनशील श्रेणियों का शोषण बनाए रखा है।  कबीर की वाणियों में इस ब्राह्मणिक विचारधारा का निषेध किया गया है। दूसरे, कबीर ने वर्णधर्मी व्यवस्था के

सांचि कहौं तो मारन धावै – डा. सुभाष चंद्

आलेख


कबीर दास मध्यकालीन भारत के प्रसिद्घ संत हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रयास किया तथा ब्राह्मणवादी धार्मिक आडम्बरों की आलोचना की। इनकी प्रसिद्घ रचनाएं ‘बीजक’ में संकलित ‘साखी’, ‘सबद’, और ‘रमैनी’ हैं।

 कबीरदास के जन्म के

जाट आरक्षणः हिंसा व आगजनी – सुधीरमणीक

जाट आरक्षणः हिंसा व आगजनी – सुधीरमणीक

कुछ बदहवास और कुछ संभलते-संभालते

फरवरी 2016 में हरियाणा के कई शहरों ने विशेषकर रोहतक में वो मंजर देखा, जिसकी शायद किसी ने कभी कल्पना न की हो। आरक्षण आंदोलन की हिंसा-आगजनी-लूटपाट में सिर्फ दुकानें, घर, सम्पति ही नहीं जले,

घुमंतु जीवनः सिकलीगर समुदाय -अरूण कुमार

घुमंतु जीवनः सिकलीगर समुदाय -अरूण कुमार कैहरबा

कभी कारीगरी थी शान, आज रोटी का नहीं इंतजाम

विकास के दावों के बावजूद आज भी बहुत से समुदाय आर्थिक-सामाजिक पिछड़ेपन के अंधकूप में जीवन-यापन कर रहे हैं। अपने पूर्वाग्रहों के कारण आस-पास के लोग इन समुदायों को समाज की