Advertisements

Category: हरियाणवी कविता

बखत पुराणा – विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’

बखत पुराणा

बखत पुराणा ए चोखा था,
बेशक चीजा का टोटा था ।
धी-बेटी थी सबकी बराबर,
नेग पुगाणा भी सोखा था।।

दूध-दही का खान-पान था,
सबका देसी बाणा होता था।
सखी-सहेली गीत गावती,
जब तीज-त्योहार का मौका था।।

बङे-बुजर्गा

धर्मेन्द्र कंवारी

हरियाणवी  कविताएं

धर्मेन्द्र कंवारी

मोल की लुगाईImage may contain: 1 person, glasses and close-up

रामफळ गेल या कै मुसीबत आई

किल्ले तीन अर घरां चार भाई

मां खाट म्ह पड़ी रोज सिसकै

मन्नै बहू ल्यादौ, मन्नै आग्गा दिक्खै

 

हरियाणा म्हं रिश्तां की साध ना बैठै

किल्लां