Advertisements

Category: हरियाणवी गजल

हाली की कविता चुप की दाद | विनोद सहगल

Advertisements

सीली बाळ रात चान्दनी आए याद पिया

 

कर्मचन्द ‘केसर’ 

ग़ज़ल

सीळी बाळ रात चान्दनी आए याद पिया।
चन्दा बिना चकौरी ज्यूँ मैं तड़फू सूँ पिया।

तेरी याद की सूल चुभी नींद नहीं आई,
करवट बदल-बदल कै मेरी बीती रात पिया।

उर्वर धरती बंजर होज्या जोते बोये

धरम घट्या अर बढ़ग्या पाप

 

कर्मचन्द ‘केसर’ 

ग़ज़ल

कलजुग के पहरे म्हं देक्खो,
धरम घट्या अर बढ़ग्या पाप।

समझण आला ए समझैगा,
तीरथाँ तै बदध सैं माँ बाप।

सारे चीब लिकड़ज्याँ पल म्हँ
जिब उप्पर आला मारै थाप।

औरत नैं क्यूँ समझैं हीणी,
पंचैत

हालात तै मजबूर सूं मैं

कर्मचन्द ‘केसर’ 

ग़ज़ल

हालात तै मजबूर सूँ मैं।
दुनियां का मजदूर सूँ मैं।

गरीबी सै जागीर मेरी,
राजपाट तै दूर सूँ मैं।

कट्टर सरमायेदारी नैं।
कर दिया चकनाचूर सूँ मैं।

लीडर सेक रह्ये सैं रोटी,
तपदा होया तन्दूर सूँ मैं।