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Category: हरियाणवी लघुकथा

जाय रोया जाड्डा   

सोनिया सत्यानिता 

रेडियो आळी दादी के नाम से जाने जाने वाली दादी को “ओबरी आळी”भी कह्या करते। बड़ा सी ओबरी, फिर आँगन ठीक दो मंजली घर उसका। भाग की विडंबना। ओबरी आळी दादी के दस किल्ले। पर मालिक कोई

धर्मेंद्र कंवारी – बंडवारा

हरियाणवी  लघुकथा

पहला – मैं तो यो घर लेऊंगा, मैं छोटा सूं
दूसरा – मैं तो इसमैं घणेए साल तै रहूं सूं, तूं प्लाट ले ले
तीसरा – रै मन्नै भी किम्मे देवोगे, मेरे हाड टूट लिए कमा-कमा कै, सबतै

धर्मेंद्र कंवारी – बिजली

हरियाणवी लघुकथा

एक – भाई इस सरकार नै तो आग्गै लोग एक बी बोट ना दें।
दूसरा – कत्ती नाश होर्या सै भाई, इन ससुरा नै न्यूं भी कोनी बेरा अक किस तरियां सरकार चलाणी सै।
टाबर – बाबू बिजळी

धर्मेंद्र कंवारी – बाबाजी

हरियाणवी लघुकथा

होटल बरगै कमरे म्ह एक बड्डे से सोफे पै बाबाजी बैठे थे। एसी फुल स्पीड म्हं हवा देण लागर्या था, मौसम कती चिल्ड। एक-एक करके लोग आवैं अर बाबा जी सबकी कड़पै हाथ धरदे। घंटी बजते ही बाबा