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Category: हरियाणवी लोकगीत

मीह बरसा दे राम – हरियाणवी गीत (तारा पाँचाल)

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भूल गई रंग चाव, ए भूल गई जकड़ी

राजेन्द्र सिंह

आज के इस युग में जब स्वयं हाशिए पर चले गए हिन्दी साहित्य में भी प्रकाशन का अर्थ सिर्फ  कहानियों, कविताओं या कुछ हद तक उपन्यास के प्रकाशन तक सिमट कर रहा गया है, तथा शोध के नाम

मेवाती लोक गीत -मां मेरा पीसणों, कितनो पीसो री

मेवाती लोक गीत


मां मेरा पीसणों, कितनो पीसो री।
जितनी दगड़ा में रेत, जणी सू कहियो री।

इतनो गूंदो री, जितनी पोखर में कीच।
जणी सू कहियो री…

मां मेरो पीसणो, कितनो पीसो री।
इतनो पोयो री, जितना पीपळ में

मेवाती लोक गीत – हुकम करो तो मईयां आऊं तेेरे र भवन में

मेवाती लोक गीत


हुकम करो तो मईयां आऊं तेेरे र भवन में।
गइया को दूध हमारे बछड़ा ने बिगाड़ो।
कांई की धार चढ़ाऊ, मईया तेरे र भवन में।
कुआं को जल, तेरी मछली ने बिगाड़ो।
कांई सू तोय नहवाऊं, मइया