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Category: हरियाणवी लोक-विनोद

ना तो तिसाइये रह ज्यागी

लोकविनोद


एक बै एक गादड़ अर एक गादड़ी रैहट पै पाणी पीण चले गए जब गादड़ी पाणी पीण लागदी तो रैहट की कटा-कट की आवाज तै पाणी पीणा छोड़ देंदी। गादड़ बोल्या-के बात सै? गादड़ी बोली अक् जब मैं पाणी

तेरा बाब्बु भी आर्या सै

लोक-विनोद


मां के मर्यां पाच्छै रमलू नै एक दिन पूच्छा करवाई तो उसनै न्यूं बता दिया अक् तेरी मां कुतिया की जोनी में गई है, तूं उसकी सेवा करेगा तो तेरे जरूर लाभ होवैगा। रमलू जाण लागर्या था, राह में

एक घी का पीपा दे द्यांगे

एक बै एक जणा छोरी का रिश्ता खात्तर छोरा टोहंदा फिरै था। रिश्तेदारी में एक नै छोरा बता दिया। जिस छोरे खात्तर वोगया था, वे देही का तो कमजोर था। ए, आख्यां पै चश्में भी चढऱ्ये थे। लड़के के बाप

हम पढऩे-लिखने वालों की तो बात ही कुछ ओर है

तीन चूहे बड़े जिगरी यार थे। घणे दिनां में फेट्टे तो उनमें एक जुणसा मरियल था-न्यूं बोल्या अक् रै कड़ै रह्या करो-वे दोनों मोटे ताजे थे। उनमैै तै एक बोल्या-मैं तो भाई बड़े जमींदार कै रह्या करूं सूं-खाण की कोए