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Category: हरियाणवी लोक-विनोद

बख्त की इसी-तिसी होर्यी सै

एक बै की बात सै एक ताऊ रेल में सफर करै था। छोरा तो उसके था नहीं, वो खुदे बेटी के पीलिया जावै था अर एक गठड़ी तीलां की लेर्या था। इतनै में एक टी.टी आग्या। टी.टी. नै उस ताऊ

आज सार्यां नै सस्पैंड करकै जान्दा

एक बै की बात सै-एक स्कूल के बारणै आग्गै कार रूकी और उसमें तै एक पढ्या-लिखा सा आदमी उतर कै उसे कमरे में जा बड्या जित बालक घणां शोर कर र्ये थे। उसके भीतर आंदे बालक चुप हो गए अर

महादे-पारवती

लोक कथा


एक बर की बात सै। पारबती महादे तैं बोल्ली – महाराज, धरती पै लोग्गाँ का क्यूकर गुजारा हो रह्या सै? मनै दिखा कै ल्याओ।

महादे बोल्ले- पारबती, इन बात्ताँ मैं के धरया सै? अडै सुरग मैं रह, अर

हरियाणवी चुटकले

हरियाणवी चुटकले

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एक बै एक आदमी ने बस खरीद ली अर चलाण खात्तिर एक ड्राईवर राख लिया। ओ मालिक था घणाए बेईमान, सारी हाठा न्यूं सोचदा अक् कड़े यू ड्राईवर किमे न किमे राछ ना बदल ले। ड्राईवर ने