सरबजीत सोही

गुस्ताखी माफ करना गुरु जी!
मैं कहना तो नहीं चाहता,
पर हर जन्म में आपने छला है,
मेरी प्रतिभा को,
कभी शुद्र का सूत कह कर
तो कभी गुरु दक्षिणा के नाम पर
मेरे हाथ के अंगूठे की