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एकलव्य का लेख

सरबजीत सोही

गुस्ताखी माफ करना गुरु जी!
मैं कहना तो नहीं चाहता,
पर हर जन्म में आपने छला है,
मेरी प्रतिभा को,
कभी शुद्र का सूत कह कर
तो कभी गुरु दक्षिणा के नाम पर
मेरे हाथ के अंगूठे की

मनु ने बोए आरक्षण के बीज

मनु ने बोए आरक्षण के बीज

लेख


दीपंचद्र निर्मोही

आरक्षण की अवधारणा का जन्म जातियोंं के जन्म से ही जुड़ा लगता है। जाति-प्रथा के अंकुर वैदिक-काल में ही फूटते देखे जा सकते हैं। ऋग्वेद के पुरुष सुक्त का ऋषि घोषणा करता है-

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य:कृत:।