फ्लाई किल्लर

एस. आर. हरनोट


(एस. आर. हरनोट शिमला में रहते हैं। हिंदी के महत्वपूर्ण कहानीकार के साथ-साथ साहित्य को जन जीवन में स्थापित करने के लिए अनेक उपक्रम करते हैं । साहित्यिक संगोष्ठियां व यात्राएं साहित्य व समाज के बीच जीवंत संबंध पुल बना रही हैं।   हिमाचल का जन जीवन विशेषतौर पर जनजातियों-दलित-वंचित समाज की स्थितियां व  आकांक्षाएं उनके साहित्य के केंद्र में हैं। वर्तमान दौर में  जनविरोधी राजनीति किस तरह से संपूर्ण समाज को प्रदूषित कर रही है इस पर पैनी नजर रखते हुए उन्होंने अपने कहानियों का विषय बनाया है। – सं.)


उस चिनार के पेड़ पर सारे मौसम रहते थे। उसके नीचे लगी लोहे की बैंच अंग्रेजों के ज़माने की थी जिस पर वह बैठा रहता था। वह कई बार अपनी उंगलियों के पोरों पर हिसाब लगाता कि इस चिनार के पेड़ की उम्र इस बैंच से कितनी छोटी रही होगी लेकिन वह सही सामंजस्य नहीं बिठा पाता। वह आस-पास खड़े आसमान को स्पर्श करते देवदारों से बतियाना चाहता, जिन पर वह विश्वास कर सकता था कि इस दुर्लभ चिनार के पेड़ को किस समय और किस मौसम में रोपा गया होगा। वह नगर निगम के माली से भी यह बात पूछ सकता था परन्तु उसे किसी पर विश्वास ही नहीं होता कि कोई इस बारे में सही बता देगा। कुछ भी था वह इस बैंच पर बैठा-बैठा अपने को बहुत स्वतन्त्र और सुरक्षित महसूस किया करता था।

  गर्मियां शुरू होने से पहले चिनार पर चैत्र-बैसाख बैठ जाते और उसके सूखे जिस्म से छोटी-छोटी हरी कोंपलें निकलने लगतीं। बैंच पर बैठा वह अपने भीतर बसंत महसूस करता और उसके अप्रतिम सौन्दर्य से अभिभूत हो जाता। हर पत्ते की ओट में उसे ज्येष्ठ और आषाढ़ भयंकर गर्मी की झुलस से छुपते दिखते। हवाएं जैसे तीव्र लू से बचती, उन्हीं के बीच छुप छुपी करती, शीत झोंकों में तबदील होती लगतीं और तीखी गर्मी में उस बैंच पर बैठा वह अपने भीतर गजब की ठंडक महसूस करता। उसके देखते-देखते चिनार के पत्ते पेड़ पर पूरा यौवन बस जाता और सावन-भादों उन्हें अपने आलिंगन में ले लेते। रिमझिम या भारी वर्षा में भी वह अपने रूमाल से बैंच के मध्य भाग को सूखा कर वहां बैठ जाता। इन दिनों उसके पास एक छाता होता। कई बार बादलों की पतली परतें उसके छाते पर इठलाने लगतीं और उसे अपने शरीर में कांटों जैसी हल्की चुभन महसूस होती। उसे अचानक मां याद आ जातीं जो बरसात में अक्सर उसे समझाया करतीं कि रिमझिम वर्षा के साथ जो सफेद धुंई खेतों में पसरी रहती है उसके कांटे बदन में चुभ जाते हैं।

  अश्विन और कार्तिक के महीनों का आक्रमण जैसे ही उस हरियाते पेड़ पर होने लगता वह विचलित हो जाता। इन महीनों के साथ माघ और फाल्गुन भी चले आते। चारों मिलकर उस चिनार को नंगा और निर्जीव करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। एक-एक करके उसके पत्ते झरते रहते और बैंच के चारों तरफ उनका ढेर लग जाता। वह बैठने के लिए जैसे ही उन्हें हटाने लगता वे अजीब तरह से चीखने लगते। पौष के आते-आते उन पेड़ का कहीं नामोंनिशां नहीं मिलता। माघ और फाल्गुन तो जैसे उसका पूरी तरह चीर हरण कर लेते और वह पेड़ ऐसा लगता जैसे सदियों से सूखा खड़ा हो। निर्जीव। अचेत। निस्तेज। उसकी निराशा, शिथिलता, बुझापन और उल्लासता मानों पूरे परिवेश पर छा गई हो। इन्हीं सभी के बीच वह भी अपने को जैसे निपट नंगा पाता…महसूस करता। उसे ये महीने कई राजनीतिक दल के गठबंधनों जैसे लगते, जिनके मिजाज तो अलग-अलग होते पर उस हरे-भरे पेड़ पर पतझड़ से लेकर शीत-आक्रमण तक वे एकमत हो जाते और उस चिनार के जीवन को विरामित कर देते। पेड़ निर्जीव जरूर दिखता पर वह और अधिक प्रमाणिकता के साथ उन प्रतिकूल प्रहारों को सहते हुए किसी तपस्वी जैसा सम्पूर्ण अक़ीदत के साथ नया जीवन पाने तक विश्रामशील लगता।

««

उस बैंच पर एक साथ चार लोग बैठ सकते थे। वह लंच टाइम में आकर वहीं बैठ जाता और उन मौसमों को अपने भीतर जीने लगता। उसका बैठना बैंच के मध्य इस तरह होता ताकि उसके अकेलेपन में कोई दूसरा खलल न डाले। वह जितनी बार भी वहां आता उसे बैंच खाली मिलता। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि उस पर पहले से कुछ लोग बैठे हों और उसे अपने बैठने का इंतजार करना पड़ा हो। कभी जब उस पर कोई बैठा रहता और उसे सामने से बैंच की ओर आते देखता तो वह या कोई भी दो तीन लोग या बच्चे या औरतें या उसके हम उम्र पचपन साल के आसपास के लोग अचानक उठने लगते जैसे वे सभी उसके सम्मान में बैंच को खाली कर रहे हों। उसे अपने होने पर गर्व होता और वह बीच में बैठ जाता। कुछ पल बैठने के बाद वह मानसिक रूप से स्खलित होने लगता। एकाएक खड़ा हो जाता। अपने कपड़े झाड़ता। अपनी पैंट की जिप को देखता कि कहीं खुली तो नहीं रह गई है। फिर जेब से अपना एंडराएड फोन निकालता और उसकी स्क्रीन में अपना चेहरा देखता। बाल देखता। गले में बंधी टाई हाथ से ठीक करता। अपनी छोटी-छोटी मूंछों को उंगलियों के पोरों से सिधाता। जब पूरी तरह आश्वस्त हो जाता कि उसके यहां होने या बैठने में कोई अवनति, अपकर्ष या अभद्रपन नहीं है जिसकी वजह से वह दुर्यश का कारण बने, वह फिर अपनी पूर्व मुद्रा में बैठ जाता और चिनार के पेड़ पर बैठे मौसम को निहारने लगता।

  कुछ देर बैठने के बाद पता नहीं क्यों उसका अर्जित आत्मविश्वास टूटने लगता और आत्मसंदेह में परिवर्तित हो जाता। उसे लगता कि क्या उस के शरीर से कोई अशिष्ट संकेत तो नहीं मिलने लगे हैं जिससे लोग उससे दूरियां बना लेते हैं। वह अपने भीतर की गंध को महसूस करने लगता। कई बार अपने नाक से सूंघने की कोशिश करते हुए जल्दी-जल्दी ऐसे सांस भीतर और बाहर लेता-छोड़ता मानो सुदर्शनक्रिया का अन्तिम चरण पूरा कर रहा हो। बहुत प्रयास के बाद वह अपने को थोड़ा स्थिर और सहज कर लेता और अपने विश्वास को समेटते हुए आश्वस्त हो जाता कि कहीं कुछ ऐसा दुष्कर नहीं है जिससे लोग उसकी उपस्थिति से असहजता महसूस करने लग जाए।

  किसी भी काम से यदि किसी ने मिलना होता तो वह डेढ़ से दो बजे के मध्य इसी जगह चला आता और खड़े-खड़े उससे बातें करता। उसे अपने ऑफिस, मित्रों और रिश्तेदारों के बीच कई असामान्य गुणों की वजह से ऐसी मक़बूलियत हासिल थी जो आज किसी में भी विरल देखने को मिलती। हालांकि योजना निदेशालय में वह किसी बड़े पद पर तैनात नहीं था फिर भी कम्प्यूटर विज्ञान में महारत हासिल होने की वजह से उसे इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी विंग का इन्चार्ज बनाया गया था। इसलिए कम्प्यूटर और इन्टरनैट से जुड़ी तमाम तकनीकें उसे बखूबी मालूम थीं। गूगल जैसी विश्व प्रख्यात साइट से तो उसका रिश्ता दादी-पोते जैसा हो गया था। अपने देश सहित विश्व भर की तमाम जानकारियां उसके जे़हन में दादी के उपले में रखी आग की तरह छुपी रहती।  बैंच पर बैठा वह कभी किसी को मिलने खड़ा नहीं होता और न ही मिलने वाला उसके अगल-बगल बैठता। लोग उसके पास कई तरह की सलाहें और मशविरें लेने आते रहते जिनमें आधुनिक तकनीक से लैस एंडराएड फोन का कल्चर समझने वाले अधिक होते। किसी का इन्टरनेट नहीं चल रहा होता। किसी की फेसबुक या दूसरे एकाउंट नहीं खुलते। कोई अपना पासवर्ड भूल जाता। कोई अपने थ्री जी फोन को फोर जी में कनवर्ट करने की तकनीक समझता। किसी का फोन हैंग हो जाता तो कोई हिन्दी में टाइप न होने की वजह को जानता-समझता। अब तो लोग विशेषकर उसकी सेवाएं मोबाइल इन्टरनेट बैंकिंग और पे-टीएम को समझने के लिए लिया करते और अपने-अपने बैंक के एकाउंट उससे खुलवाकर साथ-साथ पेटीएम एप भी डाउनलोड करवा लेते। उसके मित्र इस काम के बदले उसे चाय-कॉफी ऑफर करते लेकिन वह साफ मना कर देता। वह इन कामों को करते कभी भी अमृदुल या असहज नहीं होता। वह हमेशा विनम्र बना रहता। किसी ने कभी भी उसके चेहरे पर मायूसी या शिकन नहीं देखी होगी। उसके चेहरे पर हमेशा चिनार के पेड़ की तरह चैत्र-बैसाख बैठे रहते और उस बसंती मुस्कान से उसके मित्र भी उस जैसा बनने का प्रयास करते।

««

  उसकी सेवानिवृत्ति भी उसी मौसम में हुई थी जब अश्विन और कार्तिक के महीनों ने चिनार पर बैठ कर उसके पत्तों को एक-एक कर गिराना शुरू किया था। अपनी सेवानिवृत्ति के दूसरे दिन भी वह पहले की तरह तैयार होकर जब घर से बाहर निकलने लगा तो पत्नी ने पूछ लिया था,

‘जी, ऐसे सजधज कर कहां जा रहे हो ?’

उसके कदम ठिठक गए। क्योंकि आजतक तो कभी पत्नी ने इस तरह टोका नहीं था। खड़े-खड़े वह पीछे मुड़ कर उसके चेहरे को गौर से देखने लगा कि कहीं उसकी तबीयत तो खराब नहीं। इससे पहले वह कुछ प्रतिक्रिया देता पत्नी ने उसकी शंका का समाधान कर लिया था।

‘आप पिछले कल रिटायर हो गए हैं ?’

रिटायर शब्द ने उसे भीतर तक झिंझोड़ दिया। उसे लगा जैसे पल में ही वह चिनार की तरह नंगो हो गया है। वह उस शब्द की विलोम ध्वनि कुछ देर अपने भीतर महसूस करता रहा। सचमुच उसे बिल्कुल याद नहीं था कि वह अब सेवानिवृत्त हो गया था। अपने को सहज करते हुए वह थोड़ा पास आया और प्यार से समझाने लगा, ‘मैं तुम से झूठ नहीं बोलूंगा। सच में मुझे नहीं याद रहा। तुम तो जानती हो 37 सालों तक नौकरी की है और वह भी एक ही दफतर में। अब यह आदत तो धीरे-धीरे जाएगी न। वैसे भी घर से बाहर तो उसी रूटीन में निकलना होगा। नहीं तो कुछ दिनों में ही जड़ हो जाऊंगा।’

‘तो लंच साथ ले जाओ। अब दफतर की कण्टीन तो नहीं है कि भूख लगने पर कुछ मंगा लिया।’

पत्नी ने रसोई में जाते-जाते कहा था।

उसे उसकी बात जच गई। पता नहीं कितना समय लौटने को लगेगा। फिर उसे रिटायरमैंट के बाद के कई काम याद हो आए। अपने पर गुस्सा भी आया कि क्यों उसे इतनी सी बात याद नहीं रही। याद रहती तो पैंडिग कामों की एक लिस्ट ही बन जाती। दफ्तर के भी तो अभी कई काम शेष थे।

इसी बीच पत्नी ने उसे लंच पकड़ा दिया और हिदायत दी कि समय पर खा लें और जल्दी घर आ जाएं।

उसने लंचबाक्स पकड़ कर अपने बैग में डाला और बाहर निकल गया।

बाहर निकलते ही उसे नारों का शोर सुनाई दिया। उसने सामने देखा तो एक विशाल हुजूम गाजे-बाजे के साथ सब्जीमंडी ग्रांउड की ओर जा रहा था। उसे एकाएक झटका सा लगा। उसे याद आया कि पूरे देश में नई पार्टी जीत कर आई है। रिटारयरमैंट की पार्टी और मिलने-जुलने आने वाले लोगों की वजह से पिछले दिन उसे याद ही नहीं रहा कि चुनाव में विपक्ष भारी बहुमत के साथ जीत गया है। पिछली रात को उसने पहली बार इतनी थकावट महसूस की कि समाचार तक ध्यान से नहीं देख-सुन पाया। हालांकि उसके कमरे में टीवी नहीं था, वह अपने कम्प्यूटर पर ही इन्टरनैट से यह काम चला लेता था। समाचार तो वह अपने ऑफिस में लगे टीवी पर ही देख लिया करता।

इन्हीं नारों की ध्वनियों के मध्य वह अपने रास्ते चलता रहा। बहुत से खयाल उसके मन में आते-जाते रहे। सबसे आहत करने वाली बात यह थी कि जिस एक पार्टी को वह बरसों से, या आजादी के बाद से वोट देता रहा, वह पूरी तरह हर जगह हारती चली गई। उसे चिनार पर बैठे मौसम याद हो आए कि परिवर्तन तो समय की मांग है, उसे कौन रोक सकता है। लेकिन किसी भरे-भराए पेड़ पर से सारे मौसमों का इस तरह चले जाना दुःखद तो है ही।

 ««

आज जब वह उठा तो उसे अपने घर में कई परिर्वतन देखने को मिले। पहले उसका बेटा कमरे में आया। उसके हाथ में पांच सौ और हजार के कई नोट थे। फिर बहू आई और उसके बाद पत्नी। उनके हाथों में भी कुछ नोट थे। बेटे ने ही शुरूआत की थी,

‘कैसा लग रहा है डैड फ्री होकर ?’

वह मुस्कुरा दिया था। कहा कुछ नहीं।

‘आप जानते हैं कि पांच सौ और हजार के नोट बन्द हो गए हैं।’

उसे झटका सा लगा।

‘कब हुआ यह सब….’

‘अरे डैड, रात से ही तो टीवी पर आ रहा है।’

उसने कुछ नहीं कहा। वैसे वह इसका बढ़िया जवाब दे सकता था कि घर के दोनों टीवी तो आप लोगों के कमरों में हैं। मनमर्जी के कार्यक्रम देखने के लिए। अब मुझे तो समाचारों के लिए तीसरा टीवी खरीदना होगा। पर वह चुप्पी साध गया।

बेटे ने अपनी पत्नी और मां से नोटों को लेकर उसे पकड़ा दिए थे।

‘डैड! ये नोट हमारे पास थे। कुछ मां के पास भी। आपके पास भी तो होंगे ही। अब समय ही समय है। बैंक जाकर इन्हें बदलवा लीजिए। आपकी तो जान-पहचान भी बहुत है।’

अपना-अपना काम बता कर सभी कमरे से बाहर निकल गए। उसे आज अच्छा लगा कि वह अब अपने परिवार के लिए भी समय दे सकता है। उसका छोटा सा परिवार था। बेटा यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर था और बहू एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका। दो पोतियां थीं जिनकी शादियां हो गई थीं। उसने नोटों को समेटा और अपनी अल्मारी खोली। पांच सौ और हजार के कुछ नोट रखे थे। आज घर में जितना भी धन जिस किसी ने अपने-अपने हिसाब या जरूरत के मुताबिक रखा था वह सभी निकल गया। कुल पैंतालीस हजार के करीब। उसे जोर की हंसी आई कि जीवन कुमार के पास 37 सालों की नौकरी के बाद घर में बस यही काला धन है? उसने पैसों के साथ कुछ दूसरे कागज अपने बैग में डाल दिए। तैयार हुआ और नए काम पर निकल गया।

 ««

आज पूरे शहर का माहौल गर्म था। हर तरफ नोटबंदी की चर्चाएं थीं। बौखलाहट थी। मायूसी थी। हड़कंप था। वह सीधा अपने बैंक में गया। वहां देखा तो सर चकरा गया। तकरीबन पांच सौ लोगों का जमघट लगा था। कई लाइनों में लोग खड़े थे। वह भी एक लाइन में खड़ा हो गया। इधर-उधर झांकता रहा। बैंक में बहुत से कर्मचारी थे जो पूर्व में उसकी सेवाएं लेते रहे थे। लेकिन आज कोई दिखाई नहीं दे रहा था। एक दो बार उसने लाइन से बाहर निकल कर बैंक के भीतर जाने का प्रयास किया लेकिन वहां खड़े पुलिस वालों ने रोक दिया। पूरे दिन वह भूखा-प्यासा खड़ा रहा लेकिन उसकी बारी नहीं आई। थका हारा वह घर चला आया।

कई दिनों तक वह उसी रूटीन में बैंक के चक्कर काटता रहा परन्तु नोट बदलवाने या जमा करवाने में कामयाब नहीं हो पाया। घर में सभी आश्वस्त थे कि वह सभी के पैसों को बैंक में या तो जमा करवा लेगा या बदलवा देगा। आज जब वह घर पहुंचा तो सीधा बिना कुछ बात किए अपने कमरे में चला गया।

उसका माथा पसीने से तरबतर था। जितना पोंछता उतना ही गीला हो जाता। अपने को इतना कमजोर और असहाय कभी महसूस नहीं किया जितना उसने इन दिनों बैंक की लाइन में खड़े खड़े किया था। उसने कई बार बैंक में फोन पर बात करनी चाही लेकिन सभी के फोन बंद मिले। दिन को अब वह बेटे के कमरे में जाकर समाचार देख लिया करता था। जिस चैनल पर भी देखो, बैंक के बाहर लम्बी लम्बी लाइनें ही नजर आतीं। कहीं पैसों के लिए झगड़े होते तो कहीं भीड़ पर पुलिस वाले लाठियां बरसाते रहते। फिर खबरें आने लगीं कि लाइनों में खड़े-खड़े कई बुजुर्ग बेहोश होकर मरने भी लगे हैं। उसके मन में अचानक विचार आया कि उसके साथ भी तो ऐसा ही कुछ हो सकता है। वह एक पल के लिए जड़ सा हो गया। दूसरे पल सोचने लगा कि थोड़े से पैसों के लिए वह अपने को क्यों इतना विवश या मजबूर कर देगा कि वह इस परिस्थिति तक पहुंच जाए। लेकिन जिस तरह का माहौल बन रहा था उससे उसे यह चिंता जरूर थी कि वह समय रहते परिवार के इस छोटे से काम को कैसे निपटा पाएगा ? रिटायमैंट से पूर्व ऑफिस में रहते हुए तो उसके सारे काम चपड़ासी या उसका कोई क्लर्क करवा दिया करता। उसके मन में यह भी ख्याल आया कि क्यों न वह अपने दफ्तर जाकर किसी को इन पैसों को दे दे ताकि वह अपनी सुविधा से जमा करवा दें या उन्हें नए नोटों से बदलवा कर उसे दे दे। फिर उसे कई पहले के रिटायर लोगों का ध्यान आया कि जब वे उसके अपने दफ्तर आते थे तो लोग कैसे उनकी उपेक्षा करने से नहीं चूकते। अब वह भी उन्हीं की श्रेणी में शामिल है। …..यह सोचते-सोचते उसे लगा कि वह ‘रिटायरमैंट’ शब्द कहीं उसकी जीभ पर चिपक गया है। उसने एक दो बार जीभ के मध्य दांत फंसा कर उसे बाहर निकालना चाहा लेकिन वह धीरे-धीरे कहीं भीतर घुसता चला गया था।

 ««

आज पहले वह बैंक की कतार में लगा रहा। भारी जद्दोजहद के बावजूद उसकी बारी नहीं आ सकी। फिर थका हारा वह कई दिनों बाद चिनार के पेड़ के नीचे लगी बैंच पर बैठने चला आया। वहां पहुंचा तो देखा कि उस पर सूखे पेड़ की कई परतें जमी पड़ी थीं। पतझड़ के महीनें जैसे हर टहनी पर बैठे उम्रदराज पत्तों को एक-एक करके बेघर करने में लगे थे। वह कभी बैंच को देखता तो कभी नंगे होते उस चिनार को। हल्की सी हवा से कोई पत्ता नीचे गिरता तो उसे लगता जैसे अथाह वेदना से वह कराह रहा है। वह घिसटता, लड़खड़ाता सा अधमरा हो कर दूर-पार चला जाता। हवा तेज चलती तो बहुत से पत्ते भुरभुराकर उसके आसपास और कुछ उसके ऊपर गिरने लगते। उसने देखा कि समय के साथ-साथ कितना कुछ नहीं बदल जाता ? यह सोचते वह ‘समय’ शब्द पर अटक गया। एक समय था जब वह नौकरी के लिए शहर आया, एक समय था जब उसकी नौकरी लगी, एक समय था जब उसकी शादी हुई और बच्चे हो गए, एक समय यह भी है जब वह रिटायर है और अकेला-अकेला सा चिनार और पेड़ का सहारा ढूंढ रहा है…..असहाय सा बैंक के बाहर लगी पंक्तियों में दिन भरा खड़ा रहता है और अपने ही थोड़े से पुराने नोटों को बदलवाने में नाकामयाब हो रहा है।

  पर वह इस मौसम का क्या कर सकता था जो अब चिनार के साथ उस पर भी बैठने लगा था। कई रंजना अग्रवाल उसके मन में आए थे…..कि क्या वह भी इस चिनार का ही कोई प्रतिरूप है……क्या वर्ष भर के सारे मौसम उस पर भी ऐसे ही आकर बैठ जाते हैं……..उसका या किसी का भी जीवन इसी चिनार जैसा है…..? उम्र के अंतिम पड़ाव में आदमी का जीवन भी सभी मौसमों से विछिन्न हो जाता है। पर एक मौसम हमेशा उसका साया बनकर उसके साथ अंत तक होता है, कभी विलग नहीं होता–पतझड़। वह निराश होकर कभी उस बैंच को देखता। कभी चिनार को तो कभी अपने ढलते जीवन को। तभी उसे लगता जैसे वह चिनार उससे बतियाने लगा हो…….उस से कह रहा हो कि….देखो मैं भी तो सर्दी में ठिठुरता रहता हूं। सांस भी नहीं ली जाती। फिर भी मुझे डट कर इन प्रतिकूलताओं का सामना करना है, ताकि मौसम खुद-ब-खुद चल कर आए और फिर से मुझे हरा-भरा करे। देखो, मैं कहीं नहीं जाता। एक जगह अडिग रहता हूं। भयंकर अंधेरों में भी। तूफानों में भी। मुसलाधार वर्षा में भी और बर्फ के दिनों में भी।

  इन्हीं खयालों में खोया वह बैंच की तरफ बढ़ा और हाथ से सारे पत्ते हटा लिए। फिर अपनी जेब से रूमाल निकाला और उस पर जमी धूल की परत को साफ कर दिया। बैंच पहले जैसा चमकने लगा था। पता नहीं कितने दिनों से उस पर कोई नहीं बैठा होगा।…..क्या लोग अब किसी पेड़ की छांव में नहीं बैठते होंगे…..क्या लोगों ने अब आराम करना छोड़ दिया होगा…क्या अब सभी के भीतर पतझड़ घुस गया होगा…..उसके मन में ऐसे कई विचार कौंधे और चले गए। उसने महसूस किया कि जैसे चिनार और बैंच उसके जीवन के दो छोर हो। एक जीना सिखा रहा है और दूसरा घड़ी-दो घड़ी उस जीने को ठहराव दे रहा है। यह ठहराव आराम है, जो जीवन का अभिन्न अंग है। इसी के साथ उसने एक ओर बैग रखा और बैठ गया था।

 ««

आज वह बैंच के मध्य नहीं बैठा। किनारे बैठ गया था। इसलिए ही कि शायद कोई दूसरा थका हारा, उस जैसा, आए तो पल दो पल यहां आराम कर ले। बैठते-बैठते उसे नई सरकार के बदलने के बाद के कई परिदृश्य याद आ गए। अचानक वह एंटी रोमियो सेना और गौरक्षक की कुछ असभ्य वारदातों के मध्य उलझ गया। पिछली रात जो कुछ समाचार उसने अपने और कई दूसरे शहरों के देखे-सुने उन्होंने उसे बहुत विचलित कर दिया था।…बैंकों के बाहर लम्बी कतारें, लोगों का आक्रोश, पुलिस का लाठीचार्ज और लड़का-लड़की को एक साथ देख कर पुलिस और लोगों द्वारा उनकी पिटाई। वह उन स्मृतियों और छवियों को अपने मन से ऐसे बाहर निकालने का प्रयास करता रहा जैसे कोई कोट पर बैठी धूल को झाड़ता है, लेकिन उन समाचारों या घटनाओं के धुंधलेपन को वह झाड़ने और बाहर निकालने में पूरी तरह नाकाम रहा था। वह उसी तरह बैंच पर बैठ गया कि दो-चार घड़ी सुकून से गुजारेगा।

  वह अभी बैठा ही था कि सामने से एक लड़की आती दिखाई दी। उसने अंदाजा लगाया कि उसकी उम्र सात या आठ बरस होगी। उसके हाथ में आइसक्रीम थी। उसकी नजर अचानक लड़की के दांई ओर पड़ी, जहां एक बंदर आइसक्रीम को झटकने की ताक में था। वह झटके से उठा और उसे पकड़कर बैंच तक ले आया। लड़की बंदर को देखकर घबरा गई थी। उसने उसे अपने साथ बिठा दिया। उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था। वह स्थानीय नहीं थी। बाहर से अपने परिजनों के साथ घूमने आई थी। उसने उसकी पीठ सहलाई और ढाढस बंधाया कि उसे डरने की आवश्यकता नहीं है। लड़की थोड़ा सहज होकर जल्दी-जल्दी बची हुई आइसक्रीम खाने लगी। वह इधर-उधर देखता रहा कि उसके परिजन उसे लेने आएंगे पर पता नहीं वह उसे छोड़ कहां निकल पड़े थे। वह यूं ही उससे बातें करने लग गया था।

  तभी अचानक दो तीन पुलिस वाले कुछ युवाओं के साथ वहां धमक पड़े। नौजवानों के गले में एक विशेष रंग के पट्टे थे जिन पर लिखा था एंटी रोमियो सेना। उसे कुछ समझ नहीं आया। तभी एक पुलिस वाले ने पूछ लिया,

  ‘तुम्हारी लड़की है’

  ‘नहीं तो…।’

  ‘फिर ये इधर कैसे…’

  वह कुछ बोल पाता, पीछे से एक नौजवान ने आकर सीधा उसका कालर पकड़ लिया।

  ‘हम बताते हैं न अंकल। ऐसे ही तुम इसे फुसलाओगे, बहलाओगे और गलत काम करके निकल जाओगे। जानते हैं हम तुम जैसे बूढ़ों को। ले चलो इसे पुलिस थाने।’

  उस नौजवान की हरकत से पुलिस वाले एक पल के लिए भौचक्क रह गए पर क्या करते अब माहौल ही इसी तरह का था।

  उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है। उस नौजवान ने उसका कालर अभी भी पकड़ा हुआ था। उसने पुलिस वालों की तरफ इस आस के साथ देखा कि वे इस बदतमीजी के लिए उसकी मदद करेंगे। जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उसने झटके से उस नौजवान का हाथ कालर से हटा दिया। झटका इतना तेज था कि वह तकरीबन दस फुट दूर औंधे मुंह गिर पड़ा।

  ‘तुमको इतनी भी शर्म नहीं है कि सीनियर लोगों से कैसे बात करते हैं। मैं तुमको बदमाश, गुण्डा दिखता हूं …?’

कालर सीधा करते हुए वह उन नौजवानों और पुलिस वालों पर टूट पड़ा था। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि पतला-दुबला दिखने वाला वह आदमी पल भर में एक हंगामा खड़ा कर देगा। वे कई लोग थे। उसे क्या मालूम कि अब इस तरह कोई अधेड़ या युवा किसी लड़की के साथ नहीं बैठ सकता। साथ नहीं चल सकता। कोई बच्ची भी किसी पराए आदमी के साथ नहीं बैठ सकती।

  काफी देर वहां हंगामा होता रहा और आखिर उसे पुलिस वालों के साथ थाने में जाना पड़ा। बच्ची के परिजन अभी भी नहीं आए थे।

  पुलिस स्टेशन में जब उसे ले जाया गया तो वह गुस्से से तमतमाया हुआ था। भीतर जाते ही उसने जेब से अपना फोन निकाला और सीधे सिटी के एस0पी0 को लगा दिया। पुलिस वालों ने कभी सोचा भी नहीं था कि इस तरह कुछ हो जाएगा। इससे पहले कि पुलिस वालों को बात समझ आती उसने सारी बात एसपी को बता दी थी। एस.पी ने इस मध्य चौकी इन्चार्ज से बात कर ली थी। चौकी प्रभारी ने स्थिति को ज्यादा बिगड़ने नहीं दिया और समझा बुझा कर इस मामले को खत्म करवा लिया। शायद अब पुलिस वालों और उन नौजवानों को थोड़ा एहसास हुआ होगा कि उन्होंने बिन वजह ही यह हंगामा कर दिया। लड़की अभी भी सहमी हुई थीं। इसी बीच उसके परिजन वहां पहुंच गए थे। पुलिस वालों ने उसे उनके हवाले कर दिया।

  इस छोटे से वाकये ने उसे भीतर तक हिला दिया था। वह सड़क पर चल तो रहा था लेकिन उसे लगा जैसे उन नौजवानों के गले के पट्टे उसके अपने गले में फंसने लगे हों। वह चलते-चलते जैसे उनको गले से उतार कर फैंकने की कोशिश कर रहा हो। उसने इस तरह कई बार कोशिश की लेकिन गले में कुछ नहीं था। वह सड़क में सभी से बच कर चल रहा था। विशेषकर उसे कोई बच्ची या लड़की दिखती तो उसकी सांसें रूक जाती। वह झटपट उनसे दूर हो जाता या भाग कर निकल पड़ता। राह चलते लोगों की आंखें उसे दूर तक जाते देखती रही। उन्हें वह शायद साधारण आदमी नहीं लग रहा था…..कोई मानसिक विक्षिप्त व्यक्ति जो इस तरह की सायास हरकतें करता चला जा रहा है। उसे इस बीच कोई भी परिचित नहीं मिला। वह अपने साथ हुई और अपने द्वारा की जा रही तमाम बातों से इस तरह परेशान हो गया जैसे उसने न जाने आज कितनी शर्मनाक हरकतें कर ली होंगी। शर्म जैसी कोई चीज उसके शरीर और भीतर तक ऐसे महसूस हुई जैसे किसी मोबाइल या कम्प्यूटर में कोई खतरनाक वायरस घुस गया हो। फिर लगा कि यह वायरस कहीं उस नई सरकार के साथ-साथ तो नहीं चला आया है जो इस शहर जैसे कई शहरों में घुस कर उसे अशांत कर देगा। घर तक वह कई ऐसी बातें सोचता रहा था जिनका कहीं कुछ औचित्य नहीं था पर वे जैसे होने को तैयार बैठी थीं। घर पहुंच कर उसे कुछ राहत महसूस हुई पर न जाने क्यों उन पट्टों पर लिखा ‘एंटी रोमियो’ और थोड़ी देर मस्तिष्क में कौंधा ‘वायरस’ शब्द उसकी आंखों में घुस गए। वह सीधा बाथरूम गया और पानी से आंखें धोता रहा। वे शब्द अब आंखों के पारों से निकल कर अपने कानों में पसरते लगे। उसने दांए और बांए हाथ की तर्जनी से कई बार कान खुजलाए लेकिन लगा कि वे कहीं उसके भीतर घुस कर बैठ गए हैं।

 ««

  उस दिन के बाद कई शब्द जैसे उसकी आंख, कान, गले और मस्तिष्क में चिपक गए थे। कभी वे आंखों में चुभने लगते तो अजीब तरह से आंखे इधर-उधर घुमाता। खोलता और बंद कर देता। दूसरे पल कान खुजलाने लगता। उन्हें कुछ पल बंद किए रखता। फिर उसके हाथ अनायास ही नाक के नथूनों को बांए हाथ की तर्जनी और अंगूठे से बंद कर लेते। वह भीतर ही भीतर कपाल-भाती जैसा कुछ करता और जोर से उज्जैयी प्राणायाम की मुद्रा में आ जाता।

  आज फिर सीधा वह बैंक चला गया था। लोगों की पंक्तियां अभी भी समाप्त नहीं हुई थीं, जैसे सभी काला धन लेकर बैंक के बाहर खड़े हों। बहुत मशक्कत और जद्दोजहद के बाद भी वह अपने नोट नहीं बदलवा पाया। वह पिछले कई दिनों से देख रहा था कि एक पतली सी अधेड़ महिला लाठी के सहारे जब भी आती तो सबसे पीछे पंक्ति में खड़ी हो जाती। कुछ देर के बाद वह बैठ जाती। फिर उठती और कुछ हिम्मत जुटा कर लाइन में लग जाती। अचानक वह खांसने लगती तो जैसे सारे शरीर का बोझ दोनों हाथों की हथेलियों से जमीन में गड़ाई लाठी पर सिमट जाता। वह काफी आगे लोगों के मध्य खड़ा होकर उसे देखता तो लाइन तोड़ कर उस औरत को अपनी जगह खड़ा करने का प्रयास करता। लोगों की असंवेदनशीलता और अधैर्य इतना हो जाता कि वह जहां से पंक्ति से बाहर होता उस औरत के वहां पहुंचाने तक लोग एक दूसरे से चिपक जाते और उसे उनसे बहुत अनुनय करके उसे वहां खड़ा करना पड़ता। परन्तु वह देखता कि उसका भी कोई लाभ उस बेचारी को नहीं मिलता और वह दिनभर उसी हालत में खड़ी रहती।

  एक दिन पंक्ति में खड़ी-खड़ी वह अचानक गिरी और बेहोश हो गई। उसने अपने नोटों की परवाह न करते हुए तत्काल उसे अपनी बोतल से पानी पिलाया और 108 एंबुलैंस को बुला कर अस्पताल भिजवा दिया। वह कभी उससे उसके परिजनों के बारे में भी नहीं पूछ पाया। न ही उसने कभी किसी और को उसके साथ देखा। जब उसे एम्बुलैंस में स्ट्रेचर पर रख रहा था तो उसकी मुट्ठी में एक नोट दिखा। उसने धीरे से उसे खींचा और देखा कि वह पांच सौ का पुराना नोट है। वह अचम्भित रह गया कि महज पांच सौ रूपए के लिए वह बेचारी इतने दिनों से परेशान थीं। उसने नोट को अपने पास रख कर अपनी जेब से सौ-सौ के दस नोट निकाले और 108 में सेवारत महिला डाक्टर की उपस्थिति में उसकी जेब में डाल दिए। वह उस के साथ जाना चाहता था पर खुद भी कई दिनों से नोट बदलवाने और जमा करने के चक्कर में परेशान था। इसलिए उसका जाने का मन नहीं हुआ। उसने देखा कि जहां वह खड़ा था वहां अब लोग एक दूसरे से चिपक गए थे। वह अपनी जगह खड़ा होना चाहता था लेकिन लोगों ने उसे लाइन में पीछे खड़े होने के लिए बाध्य कर दिया। सभी के सामने वह घटना घटी थी और वे जानते थे कि उसने लाइन से बाहर होकर एम्बुलैंस बुलाई थी पर किसी को उससे कोई लेना-देना नहीं था। वह आहत, अपराजित, असहाय सा चुपचाप सबसे पीछे खड़ा हो गया था। अब उसने महसूस किया कि वह अधेड़ औरत उसके भीतर पसर गई है। उसने अपने शरीर को बेतहाशा भारीपन से लबरेज महसूस किया और एक पल के लिए जमीन पर बैठ गया। उसे दिमाग में वह पांच सौ का नोट घुसता महसूस हुआ। इस बीच बैंक में लंच हो गया और सभी को दूसरे दिन आने की हिदायत दे दी गई थी कि आज नोट नहीं बदलवाए जाएंगे।

  लोग धीरे-धीरे लाइनों से बाहर हो लिए। सभी के चेहरों पर अपने ही पैसों के बोझ की ऐसी विकट थकान थी जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता था। केवल देखा और परखा जा सकता था। महसूस किया जा सकता था। वह बैठा-बैठा सभी के चेहरों की उस थकान को अपने भीतर कुछ देर जुगालता रहा और फिर ऐसे उठा जैसे टांगों में जान ही नहीं रह गई हो। उसका एक मन हुआ कि वह अस्पताल जाकर उस औरत की सुख-सांद लें पर दूसरे पल सोचा कि इतने बड़े अस्पताल में बिना उसका नाम-पता जाने उसे कहां तलाश करेगा।

  चलते-चलते उसने अपने भीतर पता नहीं कितने शब्द उठते-बैठते, बिलखते, अटपटाते, चीखते, विलगते महसूस किए थे……..सरकार, रोमियो, नोटबंदी, पुलिस, लड़की, आईसक्रीम, चिनार, मौसम, 108 एम्बुलैंस और पांच सौ का नोट…..ये शब्द नहीं जैसे नुकीली छुरियां हों जो उसे भीतर ही भीतर घोंपती चली जा रही हो।

««

थका हारा वह बैंच तक गया और हाथ से पत्तों को साफ करके वहां बैठ गया। अब पत्ते कम होने लगे थे। जैसे वे अपने-अपने घर चले गए हों और जो कुछ बिरल चिनार की टहनियों और बैंच तथा उसके आसपास थे वे मानों किसी का इंतजार कर रहे हों।

  संयोग से उस दिन उसे मिलने कोई नहीं आया। उसे पेड़ पर हल्की सी कांव-कांव की आवाज सुनाई दी। ऊपर देखा तो एक कौवा बैठा उसी की तरफ नीचे देख रहा था। सोचा वह भूखा होगा। उसने उठ कर पास वाली दुकान से एक बिस्कुट का पैकिट लिया। उसे खोला और दो बिस्कुटों को कुतर-कुतर कर बैंच के बांए किनारे डाल दिया। कौवा पेड़ से आकर उन्हें खाने लगा। इसी तरह लगभग पांच मिनट की अवधि में उसने कौवे को सारे बिस्कुट खिला दिए। वह खुश हुआ कि उसकी सेवानिवृत्ति के बाद बैंच और चिनार के साथ उसका एक और दोस्त भी हो गया है। वह इस बात के लिए अपने को धन्य समझ रहा था कि उसने अपने पित्रों को आज खुश कर दिया है। बचपन में स्कूल के समय जब गांव में श्राद्ध होते तो उसकी दादी और अम्मा दोनों मिलकर पहले कौवों को खाना खिलाया करतीं थीं। दादी एक थाली में रोटी के टुकड़े करके आंगन की मुंडेर से ‘आओ कागा,  आओ कागा,  बोल कर आवाजें लगाती तो कई कौवे पलक झपकते ही वहां आ जाते और सारी रोटियां खा जाते। उसके बाद जब वह शहर आया,  जैसे कौवों को देखना ही भूल गया। कभी कभार ही ऐसा होता कि कोई कौआ उसे कहीं पेड़ पर चुपचाप बैठा दिखाई देता। उनकी नस्लें जैसे गुम होने लगी थीं। कौवा तो उड़ गया था लेकिन ‘कौआ’ शब्द उसके सीधे मन में बैठ गया।

  वह बैंच से उठा और घर की तरफ चलने लगा। बैग में रखा पुराने नोटों का बंडल इस दृष्टि से देखा-छुआ कि कहीं गिरा तो नहीं दिया है। एक छोटे से काम के लिए इतनी मशक्कत उसे शायद ही जीवन में करनी पड़ी हो। आज वह इसलिए भी अपनी ही नजरों में अपमानित महसूस कर रहा था कि पहली बार वह अपने परिवार का इतना छोटा सा काम नहीं कर पाया है। चलते-चलते किसी ने उसे बताया कि जिस अधेड़ महिला को उसने अस्पताल भिजवाया था वह अब नहीं रही।

  ‘वह बेचारी अपने सांजे हुए पैसे के लिए मर गई।’

  उसकी आंखें भर आईं थीं। वह उसे नहीं जानता था पर एक इनसानियत का रिश्ता तो था ही। फिर वह तो अभी भी शब्दों में उसके भीतर जिंदा थीं। उसे एकाएक वह कौआ याद आ गया। शायद वह मौत का संकेत लिए वहां आया होगा। उसे एक पल के लिए अच्छा लगा कि उस महिला के लिए ही कहीं वह बिस्कुट का श्राद्ध तो नहीं लगा होगा। अब दो और शब्द उसके भीतर पसर गए थे। श्राद्ध और कौआ। पर उन सब पर भारी ‘मौत’ शब्द था जिस पर वह कई तरह से सोच रहा था। यह बात उसके भीतर कहीं चिपक गई थी कि इस आजाद देश में और वह भी इक्कीसवीं सदी के समय में कोई अपने ही पैसे बैंक से लेने लिए कैसे मर सकता है ? पर सच तो यही था।

  वह आज बहुत निराश, आहत और दुखी मन से घर पहुंचा। कई पल दरवाजे के बाहर ऐसे खड़ा रहा जैसे किसी अजनबी घर के बाहर खड़ा किसी का पता ढूंढ रहा हो। बहुत हिम्मत से उसने डोरबैल दबा दी। पत्नी ने दरवाजा खोला था। आज पत्नी ने उसे नहीं टोका कि नोट बदले या नहीं। वह जानती थी कि इन दिनों किसी बुजुर्ग का लाइन में खड़ा होना कितना खतरनाक हो रहा है। टीवी पर दिखाई जाने वाली खबरों से वह पूरी तरह वाकिफ हो गई थीं। वह दबे पांव हारा हुआ सा अपने कमरे में चला गया। आज उसे दरवाजे के पास बूट खोलने की याद भी नहीं रही। उसकी पत्नी ने ही उसके बूट उतारे थे और सामने एक पानी का गिलास रख दिया था। उसने एक ही घूंट में पूरे गिलास को भीतर उड़ेल दिया। बहुत राहत मिली उसे। लगा कि जितने भी शब्द भीतर जोश में उछाल मार रहे थे, वे पानी में कहीं विलुप्त हो गए हैं।

 ««

  उसे नींद आनी कम हो गई थी। वह देर रात तक खबरें देखता और सुनता। उसने अपने जीवन में अखबार और टीवी समाचारों को कभी इतनी गंभीरता से नहीं लिया था, जितना अब लेने लगा था। पहले तो काम के बोझ से वह समय ही नहीं निकाल पाता था। उसने आज एक टीवी रिपोर्ट देखी थी जिसमें भारत में हुए आतंकी हमलों के साथ-साथ दुनिया में हुए कुछ बड़े नर संहारों को भी दिखाया गया था। साथ ही अपने देश में किसानों को किस तरह आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ रहा है, इस पर कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञों की बहस आयोजित की गई थी। 1990 के बाद जिस तरह की परिस्थितियां देश में उत्पन्न हुई, उसने अब तक लाखों किसानों को आत्महत्या करने पर विवश कर दिया। सत्ताएं अपने स्वार्थ और अतिजीविता के लिए कितनी क्रूर और आततायी हो सकती हैं, ये रिपोर्टें उसका अभूतपूर्व उदाहरण थीं।

  एक चैनल पर देश में मासूम लोगों पर गौ-रक्षकों के हमलों से मारे गए कुछ अल्पसंख्यक और दलितों के बारे में रिपोर्ट दिखाई जा रही थी।

  वह इन रिपोर्टों को देखकर बहुत विचलित हो गया था। उसके दिमाग में पहले से घुसे कई शब्दों के बीच अब आत्महत्याएं, आतंकी हमलें, नरसंहार और गौ-रक्षक जैसे शब्द ऐसे घुस गए थे कि वह बार-बार उन्हें याद करके भयभीत होने लगा था। इन शब्दों को अपने दिमाग से कई बार बाहर निकालने का प्रयत्न किया पर उसे लगा जैसे ये शब्द फेबीकोल के जोड़ की तरह मजबूती से भीतर फंस गए हैं।

  उसने अपना कम्प्यूटर बंद कर दिया और अरामदेय कुर्सी पर पीछे की तरफ गर्दन लटकाए आंखे बंद करके बैठ गया। उसने लाइट बुझा दी थी। वह चाहता तो अपने दिमाग को आराम देने की गरज से सो भी सकता था परन्तु उसे लगा कि वह कुर्सी पर आगे-पीछे झूल कर थोड़ी राहत महसूस कर लेगा। पर ऐसा नहीं हुआ। उसका विचलन बढ़ता ही गया। उसने जो टीवी में देखा था और जो कुछ समय-समय पर अपनी स्मृतियों में संजोया था उसके धुंधले से परिदृश्य भीतर उमड़ने-घुमड़ने लगे थे। उसे पहले मुंबई का छग्ब्बीस ग्यारह याद आया। फिर अमेरिका का नौ ग्यारह और पेशावर के स्कूल में मारे गए बच्चे याद हो आए। फिर न जाने दुनिया के कितने आतंकी हमलों ने उसे घेर लिया। उसने अपने भीतर ऐसा घमासान महसूस किया जैसे अभी एक विस्फोट हो जाएगा और अपने घर समेत उसके परखचे उड़ जाएंगे। उसने अंधेरे में ही मेज पर रखी पानी की बोतल का सारा पानी एक सांस में गटक लिया। भीतर ऐसे लगा जैसे ठंडा पानी गर्म तवे पर गिरा हो। वह अप्रत्याशित काले धुंए के मध्य घिर गया और कुर्सी से उठ कर बदहवास सा अंधेरे कमरे में भागता रहा। कुछ देर बाद अचानक एक निस्तब्धता कमरे में पसर गई। उसने सोने का जैसे ही प्रयास किया उसके सिरहाने दुनिया के कई नरसंहार आकर बैठ गए थे।

उसे पहला विश्वयुद्ध याद आया जिसमें अंदाजन एक करोड़ लोगों की जानें चली गई थीं। इससे कहीं अधिक बीमारियों और कुपोषण से मर गए थे। आर्मीनिया उस समय आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद सम्पन्न था। यह नरसंहार आर्मीनियाइयों के प्रति तुर्की सरकार की गहरी नफरत का नतीजा था। वह यह सोचकर दहल गया कि किस तरह सैंकड़ों लेखकों, पत्रकारों, वैज्ञानिकों और अन्य बुद्धिजीवियों को पकड़ कर विशाल रेगिस्तानों में मरने के लिए छोड़ दिया गया था। मजदूरों और आमजन तो कीड़े-मकोड़ों की तरह मसल दिए गए थे।

  अब दूसरे विश्वयुद्ध का नरसंहार हिटलर के रूप में उसकी छाती पर बैठ गया। उसकी आंखों में करीब सात करोड़ लोगों की लाशें तैरने लगी। हिटलर उसे बहुत याद आया क्योंकि वह अपने ऑफिस में अपने कई उच्चाधिकारियों को हिटलर के नाम की संज्ञा देकर नवाज चुका था। हिटलर ने किस तरह अपनी डेथ यूनिट्स को बेरहमी से यहूदियों को कत्ल करने के आदेश दे दिए थे और देखते ही देखते साठ लाख से ज्यादा यहूदियों को बेरहमी से मार दिया गया। उसके तुरन्त बाद उसे हिरोशिमा और नागासाकी याद आ गए। उसका कलेजा जलने लगा जैसे वह भी कहीं ‘लिटल बॉय’ और ‘फैट मैन’ परमाणु बमों के घ्वंस के मध्य आखरी सांस ले रहा हो। उसकी सांसे तेज-तेज चलने लगी थीं। वह बिस्तर से उठना चाह रहा था लेकिन उसे लगा कोई भारी चीज उसे दबाए हुए है।

  काफी देर बाद वह उठ कर बैठ गया था। उसने शांत होने के लिए ओम का मन ही मन उच्चारण आरम्भ कर दिया। लेकिन वे नरसंहार पहले से ज्यादा मुखर होकर कमरे के अंधेरे खोह में विचरने लगे और एक-एक कर पुनः उसके कानों से होते हुए मस्तिष्क में घुसने लगे थे। इस बार उसे चीन के नरसंहार ने परेशान किया जो दुनिया के सर्वाधिक क्रूरतम नरसंहारों में से एक था। उसे अचानक चीनी साम्यवादी नेता माओत्सेतुंग याद आ गए। जिसने भी माओ की सरकार का विरोध किया था वे मौत के घाट उतार दिए गए।

  तदोपरान्त उसके दिमाग में बारी-बारी चलचित्र की तरह युगोस्लाविया, यूगांडा, पूर्वी पाकिस्तान, चिली, कंबोडिया, इथोपिया, इरान, अफगानिस्तान, श्रीलंका और फिलीस्तीन के नरसंहार घूमने लगे थे। उसने मन को थोड़ा एकाग्र और शांत करने के लिए भ्रामरी प्राणायाम का सहारा लिया। उसी बीच वह अपने बाल्यकाल में लौट आया जब वह 10-12 साल का रहा होगा। उसके दादा उस समय शहर में एक अंग्रेज अधिकारी के पास रसोईए का काम करते थे। देश आजाद हुआ तो उसके दादा का अंग्रेज अफसर भी देश छोड़ कर चला गया। दादा फिर काम की तलाश में शहर ही रहे। दादा बताते थे जब देश का बंटवारा हुआ तो कितने लोगों का कत्ल हो गया। भाई-भाई, पड़ोसी-पड़ोसी एकाएक कैसे एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे।

  अब वह भ्रामरी मुद्रा में ही 1984 में पहुंच गया। उसके सामने हजारों सिक्ख भाईयों की लाशों के ढेर बिछ गए। फिर वह 2002 में चला आया और मुसलमान भाईयों के कत्लेआम का साक्षी बन बैठा। वहां से निकला तो किसानों की आत्महत्याओं के मध्य फंस गया। एक पल उसे लगा जैसे वह अपने ही पंखे से लटक गया है और घुट-घुट के मर रहा है। उसने भ्रामरी मुद्रा तोड़ी और दोनों हाथों से गला ऐसा पकड़ा जैसे फांसी की रस्सी को खींच कर निकाल रहा हो। पर वहां कुछ नहीं था। उसकी गर्दन में अथाह पीड़ा होने लगी थी। वह महसूस करने लगा कि उसके पास लाखों का कर्ज है…..साहुकारों और बैंक के दलाल हाथ में डंडे लिए उसके दरवाजे पर खड़े हैं…..जैसे वे उसकी ज़मीन हथिया लेंगे…गौशाला से बैलों को खोल कर ले जाएंगे…उसकी पत्नी और बेटियों से बदसलुकी करेंगे…..? मानो अब उसके पास कोई रास्ता नहीं है और वह अपने कमर में लपेटी चादर को पेड़ में बांध कर उस में लटक गया है….?

  उसे महसूस हुआ कि उसका रक्तचाप बढ़ रहा है। उसने तत्काल बिजली जला दी थी। वह दूसरे कमरे में सोई पत्नी को उठा कर रक्तचाप मापने की मशीन को मंगाकर अपना रक्तचाप देखना चाहता था लेकिन उसकी नजर जब घड़ी पर पड़ी तो वह रूक गया। रात का एक बज रहा था। उसने बिजली बुझा दी और पुनः सोने का प्रयास किया। लेकिन नींद कोसों दूर भाग गई थी। अंधेरे में जैसे ही आंखें बंद कीं उसे कुछ बड़ी राजनीतिक और बौद्धिक हत्याएं याद आ गईं। उसके मस्तिष्क में पहले कई राजनेता आए और बाद में एक-एक कर सफदर हाशमी, दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी बैठ गए। वह सोचता रहा कि स्वतन्त्र अभिव्यक्ति, विचार, लेखन और अभिनय भी कितने घोर अपराध की श्रेणी में आते होंगे कि उसके लिए सत्ता या उसके अंधभक्त उनका खून कर दें। वह सिहर उठा। उसे अपने शरीर में ऐसी कंपकपी महसूस हुई कि बाहर बर्फ गिर रही हो। उसने पास पड़ी रजाई से अपने शरीर को ढक लिया। धीरे-धीरे मन का विचलन, मस्तिष्क की थकान और परेशानियां उसकी आंखों के भीतर पसरने लगी और वह बेहोशी की जैसी हालत में अपने को महसूस करने लगा। अचानक उसे जयपुर में गाय खरीदते हुए पहलू और उसके चार साथी याद आ गए। उसके बाद राजस्थान का अलवर, आन्ध्रप्रदेश का पूर्वी गोदावरी जिला और गुजरात का ऊना याद आया जहां गौ-रक्षकों ने दलितों की न केवल पिटाई की बल्कि कुछ को मार भी दिया था। उसे इस तरह के अनगिनत किस्से याद आए जो सरकार के बदलने के बाद इस देश में आए दिनों हो रहे थे।

 ««

  उसे नहीं पता सुबह कब हो गई। परन्तु उसकी आंखों में नींद की वजह से अजीब सी ऊंघ पसर गई थीं। वह रात भर जो कुछ भी मन की आंखों से देखता रहा उसकी धुंधली सी छवियां अभी तक आंखों में बसी थीं। उसने उठ कर कई बार आंखों में पानी मारा और कुछ देर पलकों को यूं झपकाता रहा जैसे उनके बाहर-भीतर नरसंहार और हत्याओं के कुछ बारीक कतरे फंसे हों।

वह रोज की तरह तैयार होकर बैंक के लिए चल दिया। उसने अपने बैग में रखे पुराने नोटों के बंडल को हाथ से छुआ। आश्वस्त होकर बाहर निकल गया। पत्नी ने उसके चेहरे पर जब नजर डाली तो घबरा गई। उसे ऐसा महसूस हुआ कि वह एक रात में ही इतना कैसे बूढ़ा गया है। उसका मन हुआ कि उसे आज न जाने के लिए कहें, पर पैसे याद आ गए। समय रहते नहीं बदले तो नोट बेकार हो जाएंगे।

अपने से उसने पूरा प्रयास किया कि वह जल्दी जाकर बैंक की पंक्ति में खड़ा हो जाए, लेकिन आज भीड़ पहले से ज्यादा थीं। उसने देखा कि पंक्तियों में असंख्य बिहारी, नेपाली और उत्तर प्रदेश के मजदूर अपनी पासबुकें हाथ में लिए खड़े हैं। कई नेपाली औरतों की पीठ पे बच्चे हैं। उसी भीड़ में कई गांव के किसान भाई भी हैं। मजदूरों का कहना था कि वे अपने खाते बंद करवा रहे हैं क्योंकि अब शहर में काम नहीं रहा। ठेकेदारों के पास पैसे नहीं है। वे अपने-अपने गांव लौट जाएंगे। किसान कह रहे थे कि बिना पैसों के उनके छोटे-छोटे काम रूक गए हैं। खेतीबाड़ी चौपट है। ब्याह-शादियां बंद हो गई हैं। यहां तक कि दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। उसके साथ ही दो-तीन पत्रकार भाई भी थे, जिनके चेहरे से लग रहा था कि उनकी कलम कई दिनों से उनके झोले में बंद पड़ी है और वे लाइनों में या तो नोट बदलवाने या कुछ पैसे निकलवाने के लिए रोज आकर खड़े हो जाते हैं।

  उसका मन लाइन में खड़े होने का नहीं हुआ। उसने दो-चार चक्कर भीड़ के आसपास ऐसे लगाए जैसे वह किसी अखबार का रिपोर्टर हो या किसी एजैन्सी का निरीक्षक। उदास-हताश वहां से आते हुए उसका मन कॉफी पीने का हुआ। पहले उसने सोचा कि वह कॉफी हाउस चले लेकिन वह आज किसी शांत-एकांत जगह पर बैठना चाहता था। कॉफी हाउस के मिजाज से तो वह वाकिफ था कि वहां कितना शोर होता है।

चलते-चलते अब उसके मस्तिष्क में मजदूर, किसान और पत्रकार-लेखक जैसे कुछ और शब्द पसर गए थे जो भीतर पहले विराजमान शब्दों पर भारी पड़ते महसूस हुए। उसे पंक्तियों में इसी तरह के आमजन खड़े मिल रहे थे। जो सम्पन्न थे, या रसूखदार या राजनीति से जुड़े नेता या अफसर, उन्हें तो उसने कभी पंक्तियों में खड़े नहीं देखा। वह सोचने लगा कि क्या यह नोटबंदी हम जैसे आम लोगों के लिए ही है…क्या उन लोगों के पास….पांच या हजार रूपए के नोट नहीं होंगे……क्या उन्हें पैसों की आवश्यकता नहीं होगी…?

यह सब सोचते हुए वह शहर के सबसे बढ़िया रेस्तरां में घुसा और एक किनारे की मेज पर बैठ गया। वेटर ने जैसे ही पानी के गिलास के साथ मैन्यू मेज पर छोड़ना चाहा उसने कोल्ड कॉफी का आर्डर दे दिया। वह यह तय करके कतई नहीं आया था कि कोल्ड कॉफी पियेगा। उसे यदि कुछ ठंडा ही लेना था तो वह बाहर आईसक्रीम या साफ्टी भी ले सकता था, यह सोचते हुए उसे पास ही से ‘चट’ की आवाज सुनाई दी। यह उसे साधारण आवाज नहीं लगी। पता नहीं इस आवाज में ऐसा क्या था कि वह सीधे उसके मस्तिष्क में चुभती हुई दिल पर बैठ गई। उसने सामने ध्यान से देखा। वहां फ्लाई किल्लर लगी थी जिसके समीप जैसे ही कोई मक्खी जाती, चट की आवाज से उसके छिछड़े उड़ जाते। हालांकि उसने किसी मक्खी को मरते हुए नहीं देखा था परन्तु उस मौत की आवाज ने उसे परेशान कर दिया। इसी बीच वेटर कॅाफी लेकर आ गया और मेज पर रखते हुए उसने दो सौ रूपए थमाकर बिल काटने के लिए कह दिया। जैसे ही उसने कॉफी का गिलास मुंह तक लाया पुनः दो-तीन आवाजें उससे टकरा गईं। उसने पूरा गिलास पानी की तरह गटक लिया और यह भी नहीं सोचा कि आस-पास बैठे लोग उसे क्या कहेंगे ? उसने बकाया पैसे भी नहीं लिए और रेस्तरां से उन मौत की भयंकर आवाजों के साथ बाहर निकल गया। एक जगह खड़ा होकर सोचता रहा कि मौत किसी की भी हो शायद उसकी आवाजें ऐसी ही होती होंगी। उसे चिनार से अलग होते पत्तों का स्मरण हो आया और दिमाग पर जोर देकर सोचता रहा कि इस तरह की असंख्य आवाजें उसके भीतर पहले से मौजूद हैं। उसे एक पल के लिए अपने ऊपर गर्व हुआ कि वह दुनिया का शायद पहला आदमी होगा जिसने मौत की आवाज को इतने करीब से महसूस किया है। वह जानता था कि आए दिन रेस्तरां में ये आवाजें बहुतों के कानों तक जाती होंगी लेकिन उनके लिए तो ये आम आवाजें होंगी……केवल एक मक्खी के मरने की आवाज भर।

  वह जिस शांति के लिए रेस्तरां में गया था उसे उन मौत की आवाजों ने भंग कर दिया था। वह अशान्त मन से उसी बैंच पर बैठने चला आया। उसने देखा कि चिनार बिल्कुल नंगा हो गया था। बैंच के ऊपर और आसपास कुछ पत्ते जरूर औंधे मुंह से पड़े दिखे जिन्हें न जाने कितने पैरों ने मसल दिया होगा। उसके भीतर, बैंच पर बैठते-बैठते, उन पत्तों के मरने की आवाजें पसर गईं। वह उनकी वेदनाओं में खो गया। आज चिनार के पेड़ से पत्तों का यूं विलग हो जाना उसे अच्छा नहीं लगा। न ही रेस्तरां में उन निर्दोष मक्खियों का मरना ही। उसकी आंखें भर आईं। वह बहुत देर गर्दन झुकाए रोता रहा था। चिनार की तरह का अकेलापन उसने अपने भीतर महसूस किया। उसे पहली बार ऐसी आतंकानुभूति हुई जो इससे पूर्व उसने कभी महसूस नहीं की थी। वह अपने भीतर के इस मनोविकार में कई कुछ तलाशने लगा था….मन की अस्थिरता…… मस्तिष्क का असंतुलन…न्यूरोसिस या साइकोपैथी जैसा कुछ…या फिर इस चिनार के साथ-साथ उस पर वर्ष भर के मौसमों ने उसकी ज़ेहनीयत या मनोवृत्ति को बिल्कुल तबदील कर दिया है। वह अपने भीतर रिटायरमैंट से पूर्व के जीवन कुमार को ढूंढने लगा जो उसे कहीं नहीं मिला। उसकी जगह उसे अकर्मण्यता, अचेतनता, अजीवंतता, अवसाद और निराशा के चक्रव्यूह में फंसा एक दूसरा ही आदमी दिखाई दिया। वह कई बार खड़ा हुआ और बैंच के दांए-बांए बैठता रहा। उसने अपने को स्थिर करने का भरसक प्रयत्न किया। इस ठहराव में उसे एक बात यह सूझी कि वह व्यर्थ इतनी दुनिया की चीजों को अपने भीतर घुसा बैठा है जिसका शायद कोई मतलब नहीं हो….वह आग को शायद अपने दामन में ढकने का प्रयास कर रहा है। उसने एक गहरी सांस ली और आंखें बंद कर लीं। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी आंख लग गई और किसी अचम्भित करने वाले स्वप्नलोक में चला गया।

 ««

  स्वप्नलोक में उसने जिस दुनिया में प्रवेश किया वह उसके अपने देश जैसी नहीं थी। क्योंकि बचपन से लेकर सेवानिवृत्ति तक जो कुछ उसने देखा या महसूस किया उस जैसा वहां कुछ नहीं था। अपने देश में तो वह अभी 4-जी में ही जी रहा था जबकि जिस दुनिया में वह चला आया था वह 11-जी से भी आगे की दुनिया थी। वह यह देख कर स्तब्ध था कि इस अत्याधुनिक तकनीक से सम्पन्न इस दुनिया के राजा को किन्हीं तीन लोगों की तलाश थीं जिन्होंनें उसका जीना हराम कर रखा था।

  उसने अपने को जहां खड़ा पाया, सामने भीतर प्रवेश के लिए एक विशालकाय गेट था जिसे सोने, चांदी और हीरों से मढ़ा गया था। उसके बीच कई रंगों में नहाई कुछ पक्तियां लिखी थीं जो रोशनियों के साथ रंग बदलती रहती थीं। शीर्ष पर लिखा था —11 जी राष्ट्र। बहुत संकोच से उसने जब भीतर प्रवेश किया तो उसे किसी ने नहीं रोका। वह बहुत भय और संभल के चला जा रहा था। परन्तु सड़कों पर चलते हुए उसे गजब का सुकून महसूस हो रहा था। बहुत देर तक वह इसी में खोया रहा। अचानक कोई चीज उससे टकराई और वह गिरते-गिरते बचा। इधर-उधर देखा, कुछ दिखाई नहीं दिया। वह आगे चलता रहा। चलते-चलते उसे महसूस हुआ कि उसके कंधो पर कोई चीज है। उसने कई बार अपने कंधे उचकाए। गर्दन आड़ी-तिरछी की। आगे-पीछे मुड़ा। सिर कई बार झाड़ा। लेकिन वह कुछ ऐसा था जो कंधे से हिलने का नाम नहीं ले रहा था। परेशान होकर जब वह एक पेड़ के नीचे खड़ा हुआ तो उसे एक आवाज सुनाई दी जिसे वह पहचान गया….कौए की आवाज। वह सोच में पड़ गया कि इस नई दुनिया में कौवा कहां से आ गया। कुछ और सोच पाता, कौवा आदमी की आवाज में बोलने लगा था।

  ‘सुनो जीवन कुमार! मैं भी तुम्हारे साथ हूं। तुम्हारे कंधे पर हूं। मैं पिछले कई सालों से भटक रहा था कि मुझे कोई सुरक्षित जगह मिले। मैं अब तक बहुत मुश्किल से अपने को बचाते हुए जिंदा हूं।’

  ‘पर कैसे ?’

  ‘मेरे पास उस राजा के कोट की 11-जी चिप जो है।’

  ‘मतलब….’

  ‘जैसे टू जी, थ्री जी, और फिर फोर जी। तुम तो अपने देश में फोर जी के माहिर थे। तुम्हारे देश में यही सबकुछ तो चल रहा है। बच्चों और बूढ़ों के हाथों में अब फोर जी-फोन हैं। लेकिन इस दुनिया में तो लोग ग्यारह जी तक पहुंच गए हैं।

  उसकी समझ में कुछ नहीं आया। कंधे उचकाते हुए चिढ़ कर उसने पूछा था,

  ‘तुम क्या बक रहे हो मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा है ?’

  ‘बताता हूं, बताता हूं। सब बताता हूं। मैं जानता हूं, तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। सुनो मैं विस्तार से समझाता हूं।’

  कौवा उसे पूरी कहानी सुनाने लगा था –

  इस दुनिया का जो राजा है वह पहले नमक बेचता था। उसने धीरे-धीरे इस धन्धे से अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया और नमक के व्यापार में देश-विदेश में मशहूर हो गया। वह जिसे भी नमक देता वह उसका दिवाना बनता गया। इसी नमक और अपने वाग्जाल की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते वह राजनीति में पहुंच गया। उस राजनीति की कई सीढ़ियां थीं। घर। पड़ोस। गांव। पंचायत। नगर। शहर। जिले। राज्य और उसके बाद देश। वह धीरे-धीरे देश के आखरी पायदान तक पहुंच गया और देश का एकस्व मुखिया बन गया। अपने झूठे प्रपंच और अनेक कारनामों से उसने देश में ऐसा जादू फैलाया कि वह उस देश का राजा घोषित हो गया। उसने अपने साथ बुर्जुवा किस्म के लोगों को लिया जिसमें अभिजात और रईस किस्म के लोग मौजूद थे। पूंजीवादी समाज का शासक वर्ग और उत्पादन के समस्त साधनों के स्वामी थे। उनके पास इतना पैसा था कि वे देश की 90 प्रतिशत जनता पर भारी थे। उन्होंने उस राजा को राजा बनाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया और अत्याधुनिक तकनीक से लैस कर दिया।

  लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरते रहे, उसके आगे अनेक समस्याएं खड़ी हो गईं। उसके देश में पच्चास प्रतिशत से ज्यादा ऐसे लोग थे जो भूखे थे। नंगे थे। गरीब दलित थे। किसान-मजदूर थे। लेखक पत्रकार थे। हड़तालें होती थीं। विपक्ष किसी को चैन से नहीं रहने देता था। एक तरफ उन साधन सम्पन्न लोगों का पैसा किसी न किसी योजना में लाभ देकर चुकाना था तो दूसरी तरफ वहां गरीबी और बेकारी की समस्याओं से निजात पाना था। धर्म और जाति के नाम पर रोज-रोज दंगे फसाद हो रहे थे। किसानों के पास जमीनें थीं पर वे अन्धाधुंध कर्जो में डूबे हुए थे। आए दिनों वे आत्महत्याएं कर रहे थे। उनकी जमीनों पर उन चन्द बनिया किस्म के लोगों की नजरें गड़ी थीं जो वहां बड़े-बड़े उद्योग लगाना चाहते थे। कामगरों के हाथों का काम अत्याधुनिक मशीनें छीने जा रही थीं। हर तरफ आक्रोश का माहौल बन रहा था। आतंकवाद जोरों पर था। लोग मर रहे थे। पानी के लिए लड़ रहे थे। धर्म एक दूसरे का दुश्मन हो गया था। ईश्वर और जानवरों के प्रतीक भयंकर नर संहार की ओर अग्रसर थे।

  इसीलिए राजा इन सभी समस्याओं से अलग व मुक्त दुनिया बनाना चाहता था। उसकी सोच में फटेहाल लोगों के लिए कोई जगह नहीं थी। वह नहीं चाहता था कि कोई गरीब या नंगा भूखा उसकी दुनिया में रहे। वह जानता था कि यदि गरीब मजदूर और किसान रहेंगे, विभिन्न संस्कृतियां और धर्म होंगे तो अखबारों और पत्रकारों की दुनिया चलेगी। नेताओं की दुनिया जीवित रहेगी। उसकी इच्छा थी कि उसका एकछत्र राज हो जहां ऐसी सम्पन्नता हो कि सभी के पास ऐशो-आराम के साधन हों।

वह चुपचाप कौवे की कथा सुन रहा था। हालांकि उसके मन में कई प्रश्न थे पर वह शांत बना रहा। कौवा बताए जा रहा था……

  अब समस्या यह थी जीवन कुमार कि इन सभी मुसीबतों से राजा को मुक्ति कैसे मिले…? इन्हीं समस्याओं से निजात पाने के लिए उसने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जिसमें महज उसके बेहद विश्वसनीय तीन लोग थे। उन्हें इस काम के लिए पूरी छूट और सुविधाएं दी गईं।

  इससे पूर्व उस राजा को किसी ने एक ऐसा सूट भेंट किया था जिसमें उस देश की पच्चास प्रतिशत जनता जितने राजा के नाम बहुत ही बारीक शब्दों में लिखे गए थे। राजा जहां भी उसे पहन कर जाता वाह वाही हो जाती। उस सूट को पहन कर उसने जिस भी देश की यात्रा की, वही उसका दीवाना होने लगा। लेकिन करोड़ों रूपए के उस सूट ने राजा का जीना हराम कर दिया। देश के आमजन की नजरें उस पर थीं। सभी उसे शक से देखने लगे थे। समाचारों में अब केवल वह सूट ही था। हर आदमी की जुबान पर वह चढ़ गया था। परेशान होकर राजा ने उस सूट को नीलामी के लिए एक उद्योगपति को दे दिया। वह जानता था कि राजा के इस कोट की करोड़ों की बोली लगेगी। परन्तु जो तीन लोगों की समिति राजा ने बनाई थी उन्होंने उस सूट की नीलामी को रूकवा दिया था।

  ‘पर क्यों….?’

उसने थोड़ा रूक कर कौवे से पूछा था।

‘बताता हूं, बताता हूं…जल्दी भी क्या है…?’

  वे कई आलीशान रेस्तरां में जा कर मन्त्रणा करते कि इन समस्याओं से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है। एक दिन वे एक सात सितारा होटल के आलीशान रेस्तरां में उच्चकोटि की शराब और खाना ले रहे थे। हालांकि उन तीनों की पसन्द एक दूसरे से नहीं मिलती थीं पर सोच में वे एक समान थे। पहला केवल ‘पेनफोल्ड्स एम्पूल वाइन’ पीता था जो पेन की शेप जैसी बॉटल में आती थी और उसकी कीमत एक करोड़ ग्यारह लाख तक थी। दूसरा सदस्य उससे हल्की शराब का शैकीन था जिसका नाम ‘शैटियू डी क्यूम’ था जो 85 लाख से ऊपर कीमत की थी। तीसरा शराब का ज्यादा शौकीन नहीं था पर उसे बीफ के साथ ‘द विंस्टन कॉकटेल’ चाहिए होती जो नौ लाख से ज्यादा की कीमत की थी। अक्सर वह 80 हजार रूपए कीमत वाली ‘वियल बॉन सीकॉर्स ऐल’ बीयर ही पीता था।

  उन में से एक की नजर सामने लगी मक्खीमार मशीन पर चली गई। वह उठा और कई पल मशीन के पास खड़ा रहा। उसने होटल के मालिक से मशीन के निर्माता के बारे में पूछा और आदेश दिए कि उसे होटल में बुलाया जाए। आदेशों का तत्काल पालन हुआ। मशीन निर्माता कुछ पलों में वहां पहुंच गया। वह जानता था कि उसकी बैठक आज देश के तीन उच्च राजनेताओं से होने वाली है जो राजा के विशेष दूत हैं। उसने विनम्रता से अपने को उनके सामने प्रस्तुत कर दिया।

  बातचीत शुरू हुई। यह अति गोपनीय मीटिंग जिस कमरे में हो रही थी वहां किसी को भी आने की अनुमति नहीं थी।

  ‘तो यह मक्खीमार मशीन आपने बनाई है ?’ पहले सदस्य ने पूछा।

‘जी सर! यह हमारी कम्पनी की ही क्रिएशन है। हमने देश के हर छोटे बड़े रेस्तरां और होटलों के लिए यह मशीन सप्लाई की है। इसमें अब अत्याधुनिक किस्म के कई फीचर शामिल कर दिए गए हैं।’

‘वैरी गुड, वैरी गुड।’

  दूसरे ने शराब की घूंट पीते हुए कम्पनी मालिक की पीठ थपथपाई।

  ‘तो इसमें मच्छर और मक्खियां ही मरती होंगी ?’

तीसरे ने बीफ के टुकड़े को मुंह में ठूंसते हुए पूछा।

  ‘जी सर। पर इस मशीन की यह खासियत है कि यह दो फुट की दूरी पर से मक्खी और मच्छर को अपनी ओर घसीट कर मार देती है। साथ ही छिपकली जैसी कई चीजों को तो इतनी फुर्ती से निगलती है कि सांप भी देखता रह जाए।’

   ‘एक्सेलैंट जाब डन।’

उसने सोने की डिबिया से दुनिया की सबसे महंगी सिगरेट डनहिल ब्रांड निकाली और उसी डिबिया के किनारे लगे एक माइक्रो लाइटर से सुलगा दिया। उसके कश लेते हुए जब कई रंगों के धुंए निकलने लगे तो बाकी बैठे लोग थोड़ा हैरत में पड़ गए। उसने एक-एक सिगरेट सभी को थमा दी थी।

  पहला सदस्य उठकर मशीन के पास चला गया। उसने कुछ दूरी पर अपना हाथ रखा तो उसे अजीब सी झनझनाहट महसूस हुई। उसने हाथ थोड़ा आगे किया तो ऐसा लगा कि उसके हाथ को कोई अदृश्य तरंगें चुम्बक की तरह अपनी ओर खींच रही हों। वह एकाएक हंस दिया। कई पल की उस हंसी में दोनों सदस्य और मशीन निर्माता भी शामिल हो गए। काफी देर ठहाके लगते रहे। लेकिन उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि पहला सदस्य हंस क्यों रहा है। इस हंसी के बीच सभी ने खूब शराब पी।

  लड़खड़ाती आवाज में पहला सदस्य मशीन मालिक की ओर झुका,

  ‘एक्सेलैंट। मक्खीमार यानि फ्लाई किल्लर।’

  ‘सुनो’।

  उसने मशीन निर्माता को पास खींचते हुए कहा,

‘देखो हम तुम्हें मुंह मांगी कीमत देंगे। पर इस मशीन को ‘फलाई किल्लर’ से ‘वेस्ट किल्लर’ में विकसित करना होगा।’

‘वेस्ट किल्लर’…?

‘मतलब बेकार की चीजों का खात्मा।’

‘पर सर वो तो पहले से हमारी कम्पनी बना रही है। उन्हें कूड़ा संयन्त्र कहते हैं। जिसमें देश का कूड़ा खपाया और जलाया जाता है।’

‘वही तो, वही तो। हम भी देश के बेकार हो रहे ‘जीवित कूड़े’ को खपाना चाहते हैं और फ्लाई किल्लर से बेहतर विकल्प क्या हो सकता है ?’

एक पल के लिए भीतर सन्नाटा छा गया।

दोनों सदस्यों के साथ मशीन मालिक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

चुप्पी देख कर पहले सदस्य ने फिर जोर के ठहाके लगाए। उसके साथ वे तीनों भी ठहाकों में लीन हो गए।

थोड़ी देर बाद पहले सदस्य ने समझाना शुरू किया,

‘ध्यान से सुनो। ये जो फ्लाई किल्लर मशीन है, आपको इसकी तकनीक बदलनी होगी। इसे आपको अत्याधुनिक रूप से विकसित करके जी-11 यानि ग्यारवीं जनरेशन तक पहुंचाना होगा। हम वैसे भी अब 4-जी से धीरे-धीरे वहीं पहुंच रहे हैं। यह एक मानव आकार में परिवर्तित होनी चाहिए। जिसमें विशेष प्रकाश की ट्यूबें लगाई जाएंगी। उस मशीन में अत्याधुनिक कम्प्यूटर फिट होंगे जो तकरीबन सौ फीट से किसी भी अवांछित को अपनी गिरफ्त में लेकर पहले अदृश्य करेंगे और बाद में मक्खी की तरह चूस लेंगे, लेकिन उसमें कोई आवाज नहीं आनी चाहिए। वह साइलैंण्ट किल्लर की तरह काम करेगी।’

  ‘क्यों नहीं सर, बिल्कुल हम बना देंगे। मेरे पास दुनिया के बेहतरीन साफ्टवेयर इंजीनियर हैं। पर एक बात समझ नहीं आई कि वे अवांछित हैं कौन।’

  अब दोनों सदस्यों को पहले सदस्य की सोच समझ आ रही थी। तीनों मंद मंद मुस्करा दिए। पहले सदस्य ने ही कहना शुरू किया,

‘अवांछित’ ?

सभी हंस दिए।

मशीन मालिक अभी भी खामोश था और विस्फारित आंखों से उन तीनों को देख रहा था।

  ‘अरे, अरे इतना मत सोचो। आपकी कम्पनी रातों-रात देश की सबसे बड़ी कम्पनी बन जाएगी। अरबों-खरबों की मशीनें बिकेंगी। मान लो, आपके मजदूर किसी बात को लेकर हड़ताल कर दें तो पिटोगे न। अब तो वो लाल-लाल झण्डों वाले कुछ भी करने पर उतारू हैं। 80 प्रतिशत किसानों की आबादी वाले देश में 76 फीसदी किसान अपनी खेती छोड़ रहे हैं और जगह-जगह मजदूरी कर रहे हैं। ये कभी भी इस सरकार और देश की शक्ल बदल सकते हैं। फिर उनके साथ ये कलमें, पैन वाले, कैमरे और माइक वाले। उनके पीछे विपक्ष के लोलुप नेता लोग। कर्ज में डूबे हलईए। कौन कौन नहीं नारे लगाने आ जाएगा।’

  ‘सर वो तो है। बहुत मुश्किल पैदा कर देते हैं ये लोग।’

‘यही तो। यही तो। समझो। जब ये लोग ही नहीं रहेंगे, न बजेगा बांस न बजेगी बांसुरी। कहावत पुरानी है पर सटीक बैठती है।’

‘जी…जी…जी।’

  ‘पर सर इनका क्या करेंगे। कैसे करेंगे ?’

‘फ्लाई किल्लर भई, उसी में जा मरेंगे सब।’

कमरा ठहाकों से गूंज गया। इस बार मशीन मालिक इतने जोर से हंसा कि तीनों सदस्यों की हंसी उसके ठहाकों में दब गई।

‘मान गए सर आपका दिमाग। कम्प्यूटर से कहीं ज्यादा। मानो किसी दूसरी दुनिया से लाया गया हो।’

‘वही तो, वही तो। हमारे राजा भी ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं जहां एक वर्ग हो। एक रंग हो। एक सोच हो। एक सरकार हो। एक राजा हो। एक धर्म हो। एक ड्रैस कोड हो। एक ही सोच की एलीट सोसाइटी हो। किसानों, मजदूरों का काम केवल रोबोट करें। इन रोज-रोज के झमेलों से तंग आ गए हैं हम। हम भी खुश और विपक्ष भी। सभी अपने-अपने स्वार्थों के लिए तो लड़ते हैं भाई। शुरूआत समाज सुधार से, फिर समाज जाए भाड़ में, अपना सुधार शुरू। आसानी से नहीं मिले तो खून-खराबा, दंगे फसाद, साजिशें, धर्म के नाम पर मारपीट, जाति के नाम पर वोट। ये सब अब पिछड़ों के मुद्दे रह गए हैं। हम एक सम्पन्न दुनिया बनाना चाहते हैं और वह तभी बनेगी भाई जब इन वंचितों का कुछ होगा।’

मशीन मालिक थोड़ी देर चुप रहा। फिर कहने लगा,

‘वह तो ठीक है सर, पर उसकी जद में तो कोई भी आ सकता है।’

‘भई हम आपको इतनी राशि एक मशीन के लिए क्यों दे रहे हैं। बोलो एक करोड़, दो करोड़, पांच करोड़, कितनी राशि चाहिए आपको। तकनीक ऐसी होनी चाहिए ताकि ये वांछित ही उस मशीन के शिकार हों। चुन-चुन कर।’

‘एक बात है सर। हो जाएगा। हो जाएगा। पर आपको उस राजा का जो कोट है उसे हमें देना होगा।’

‘पर किस लिए ?’

‘आप नहीं जानते सर, उसमें राजा के उतने ही नाम हैं जो उनके अपने हैं, उनकी सोच के हैं और सम्पन्नता में हैं। अमीर हैं। उद्यौगपति हैं। यानी बुर्जुवा वर्ग। समझ रहे हैं न आप। इस देश की आधी आबादी जितने।’

‘पर आपको कैसे पता ?’

‘क्या सर, इतना भी नहीं जानते ? उसे हमने अपने राजा की विशुद्ध साम्राज्यवादी सोच के दृष्टिगत ही निर्मित किया था। वह पूरी तरह आधुनिक तकनीक के उच्चस्तरीय कम्प्यूटर से बना है। उसमें राजा के नाम विशेष चिप से गुने गए हैं। और हम उन्हीं चिपों को अपनी सोच के लोगों में वितरित कर देंगे। जिनके पास वह चिप होगी, वे उस मशीन की जद में आ ही नहीं पाएंगे।’

  ‘पर उन्हें अपनी सोच के लोगों में बांटेंगे कैसे ?’

  ‘वह हमारी कम्पनी पर छोड़िए सर। हमारे पास एलियन से ज्यादा दिमाग के इंजीनियर हैं। हम ऐसी तकनीक विकसित करेंगे जैसे एक ही बार एक ई-मेल या संदेश लाखों लोगों को जाता है। उसी तरह हम एक विशेष तकनीक से अपनी सोच के लोगों में वह चिप अति गोपनीयता से फिट कर दें। यानी हमारे कम्प्यूटर यह काम करेंगे। काम भी उनका, चयन भी उनका।

ऐसा कहते ही फिर कमरा ठहाकों से गूंज गया।

बहुत देर बाद जीवन कुमार ने अचम्भित होकर कौवे से पूछा, ‘हमारे पास भी तो चिप नहीं है ?’

  ‘अब तुम इस दुनिया के नहीं हो न। आत्मा हो। जो अभी मरी नहीं। सुप्त अवस्था में है। तुम जानते हो, मैं भी आत्मा हूं। कोई भी आत्मा मेरे बिना अधूरी है। यानी उसकी गति नहीं है मेरे सिवा। तुमने शास्त्र तो पढ़े होंगे। और हम तो किसी को दिखते भी नहीं न।‘

  ‘वह तो है।’

कौवा आगे बताता चला गया।

‘…..और इस तरह लाखों फ्लाई किल्लर मशीनें जगह-जगह लगा दी गईं। और आहिस्ता-आहिस्ता बिना चिप के लोग उसमें मक्खियों की तरह गुम होते चले गए। बहुत कम समय में उन वंचितों का खात्मा हो गया। राजा के लिए कोई समस्या नहीं रही। मनचाही योजनाएं बनी। हर तरफ एक सामंती स्वामित्व तथा प्रत्यक्ष उत्पादकों के शोषण की ऐसी सामंती प्रभुओं वाली संरचना होने लगी कि सब कुछ राजा की सोच के मुताबिक होता चला गया। राजा ने अपनी सोच के मुताबिक दुनिया बना ली। कोई विपक्ष नहीं, कोई बोलने वाला नहीं। कोई लिखने वाला नहीं। कोई विरोध करने वाला नहीं। कोई चीखने चिल्लाने वाला नहीं। पर उसके बाद भी….?’

‘उसके बाद क्या….?’

जीवन कुमार ने उत्सुकता से पूछा था।

‘तीन लोग हैं जो पकड़े नहीं गए हैं। उनके पीछे राजा ने अपनी तमाम फौजें, पुलिस और सुरक्षा एजैंसियां लगा रखी हैं। लेकिन वे नहीं मिल रहे, न ही वे उस मशीन की जद में आते हैं।’

‘पर वे कौन लोग हैं।  ?’

कौवा उसके कन्धे से उतर कर एक सुन्दर पेड़ पर बैठ गया। उसने पेड़ के नीचे लगी एक बैंच पर जीवन कुमार को बैठने का इशारा किया। यह कोई ऊंची जगह थी जहां से बहुत दूर-दूर तक देखा जा सकता था।

कौवा जीवन कुमार को उन तीनों के बारे में बताने लगा था।

‘एक के पास हल है, दूसरे के पास कलम और तीसरे के पास हथोड़ा है। राजा को यह समझ नहीं आ रहा है कि इन तीनों के लिए कौन सी मशीन विकसित की जाए जिसकी जद में वे जहां भी हो तुरन्त आ जाएं।’

  कौवा अभी यह बता ही रहा था कि सामने से राजा की फौजें आती दिखी। जीवन कुमार भूल गया कि वे उसे नहीं देख सकते। वह आतंकित हो गया। भागा, जितना भी भाग सकता था और एक अंधेरी खाई में गिर गया। होश आया तो अपने को बदहवास सा चिनार के नीचे बैंच पर बैठे पाया। उसे दायीं तरफ के कन्धे में कुछ खिंचाव सा महसूस हुआ। गर्दन घुमाई तो देखा कि  बगल में लटके बैग के भीतर एक गाय मुंह घुसाए कुछ चबा रही है। उसने जैसे ही अपने बैग को छुड़ाया, गाय के मुंह में वही पुराने नोटों की गठ्ठी थी जो अब आधी-अधूरी झाक के बीच दिख रही थी। वह बौखलाया सा जैसे ही उसके मुंह से उन नोटों को छुड़ाने उठा सामने वही विशेष पट्टे वाले लोग खड़े थे।

  ‘क्यों अंकल! आज दूसरा धन्धा शुरू। गाय को बेचने ले जा रहे हो…..?’

बोलने वाला वही व्यक्ति था, जिसने उस मासूम लड़की के चक्कर में उसका कालर पकड़ लिया था।

यह सुनकर उसका मुंह खुले का खुला रह गया। तभी अचानक उसको याद आई कि वह जिस दुनिया से लौटकर आया है वहां का राजा अभी तक भी उन तीन लोगों को पकड़ने में असमर्थ है। उन परिदृश्यों को याद करते हुए सिर उठा कर उसने चिनार के पेड़ की तरफ देखा जिस पर  चैत्र-बैशाख अपने शाही अंदाज से बैठ रहे थे। …..और इसी के साथ वहां से निकलते हुए इतनी जोर से ठहाका लगाया कि पास के पेड़ पर बैठे पक्षी भी उड़ गए।

वे विशेष पट्टे वाले लोग किंकर्तव्यविमूढ़ से दूर तक जीवन कुमार को जाते देखते रहे।

 

संपर्कः  ओम भवन, मोरले बैंक इस्टेट, निगम विहार, शिमला-171002  मो. – 98165 66611

Advertisements

दरअसल

कहानी


तारा पांचाल

(तारा पांचाल 28 मई,1950 – 20 जून, 2009।  ‘सारिका’, ‘हंस’, ‘कथन’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘पल-प्रतिपल’, ‘बया’, ‘गंगा’, ‘अथ’, ‘सशर्त’, ‘जतन’, ‘अध्यापक समाज’, ‘हरकारा’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में पाठक उनकी कहानियों से निरन्तर परिचित होते रहे हैं। ‘गिरा हुआ वोट’ संग्रह की दस कहानियों समेत तारा पांचाल की कुल चालीस के आसपास कहानियां हैं, जिनमें कुछ अप्रकाशित हैं। तारा पांचाल हरियाणा के जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। । हरियाणा की साहित्य अकादमी ने भी वर्ष 2007-08 का बाबू बालमुकुन्द गुप्त सम्मान प्रदान करके  तारा पांचाल की रचनात्मक प्रतिभा का सम्मान किया। प्रस्तुत है उनकी कहानी  – सं.)

यह देखते हुए कि गोष्ठी में राष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं, सैक्रेटरी को मन्त्री जी का समापन समारोह का भाषण तैयार करने में पूरी मेहनत करनी पड़ी थी। देश में अन्तरिक्ष, टेलिविजन, इलेक्ट्रानिक्स आदि के क्षेत्र में वैज्ञानिकों की उपलब्धियों के साथ-साथ प्रधानमन्त्री के जायके का खयाल रखते हुए भाषण में इक्कीसवीं सदी का जिक्र भी लगभग हरेक पैरे में किया गया था। यहां तक कि पूरे भाषण से एक ही बात स्पष्ट हो रही थी- इस मन्त्री की पार्टी की नीतियों के फलस्वरूप ही इक्कीसवीं सदी देश में आ रही थी- अन्य किसी पार्टी की सरकार होती तो जादू-टोने वाला यह देश शायद बीसवीं सदी में ही पांव पीटता रहता। दूसरे, भाषण से यह भी लगता था कि हिमालय की ऊंचाई और गंगा-जमुना की पावन धाराएं भी इस मन्त्री की पार्टी के प्रयासों के फलस्वरूप ही वर्तमान थीं। भाषण के अंत में जैसा कि आम तौर पर होता है, स्पष्ट कहा गया था कि प्रधानमन्त्री की इन नीतियों को फलीभूत करने के लिए देश के वैज्ञानिक आगे आयें…

अपनी कोठी के लॉन में धूप सेंकते हुए मन्त्री जी परसों पढ़े जाने वाले इसी भाषण का पाठ कर रहे थे। उन्हें उच्चारण में या कहीं पर समझने में कोई दिक्कत न आये, सैक्रेटरी वहीं मौजूद था। यूं वह विज्ञान एवं टेक्नोलोजी सम्बन्धी सरकारी आंकड़ों की फाइलें भी साथ ले आया था। उन्होंने चश्मा उतारकर धोती से साफ करते हुए कहा, ‘किसान और मजदूरों का थोड़ा कम जिक्र हुआ है – और एक पैरा अगर ये भी जोड़ दो तो ठीक रहेगा कि सरकार वैज्ञानिकों को और अधिक सुविधाएं जुटाने के लिए कृतसंकल्प है ताकि हमारे देश के वैज्ञानिक बाहर के देशों में न जाकर अपने देश की, देश के लोगों की, गरीब किसान और मजदूरों की सेवा में ही रहें…मेरा मतलब है ऐसा ही कुछ…‘सैक्रेटरी ने भाषण के पृष्ठ ले लिए, उनमें मन्त्री जी के सुझावों को कहां फिट किया जाये, देखने लगा।

तभी चपरासी एक चिट लिये आया। मन्त्री जी ने चिट को देखा और तटस्थ भाव से कहा, ‘कहो, मैं आ रहा हूं।’ चपरासी जाने लगा तो कुछ पल सोचकर वे बोले, ‘ठहरो, मैं ही जाता हूं…तुम ऐसा करो कि यहीं पर कुछ कुर्सियां और डाल दो और बल्लू को चाय के लिए बोलो’, इतना कहकर वे उन्हें लाने के लिए स्वयं ही अपनी कोठी के साथ बने रिसैप्शन में गये और उनके स्वागत में जुट गये, ‘आओ जी…आओ सेठ जी…राम-राम जी… नमस्ते जी…नमस्ते -और क्या हाल है…आओ… आओ…इधर बाहर ही बैठते हैं धूप में…आओ… कुर्सियां और रखवाओ यहां और चाय का प्रबन्ध करवाओ…पहले पानी पिलवाओ’ उसने सैक्रेटरी को भी बोल दिया जिससे थोड़ा अपनत्व आने के साथ-साथ उनके स्वागत में भी बढ़ोतरी हो गयी थी।

‘और सुनाओ जी, हलके की बातचीत…कोई नया समाचार…लो पानी पियो…अं आपका डी.सी. अब तो ठीक चल रहा है ना…होम सैक्रेटरी से भी खिंचवा दिया था उसको…मैंने तो खींचा ही था…अभी जवान खून है ना धीरे-धीरे ठंडा होगा…और, वो एक शिकायत आयी थी, कौन आया था भला…एक्साइज अफसर की शिकायत थी शायद…साला बड़ा ईमानदार का पुतर बनता था…अब तो सैट है न वो…और हां याद आया…एक गणेश रिफाइण्ड ऑयलवालों का मिलावट का केस आया था…उसका क्या रहा…आपका फोन आते ही मैंने एस.पी. और कमिश्नर को फोन तो कर दिया था…इधर भी दे पानी…चाय ला रहा है बल्लू ?…पीछे कुछ दिन हुए अखबारों में आपकी म्युनिसिपेलिटी के सफाई कर्मचारियों के आन्दोलन की भी काफी खबरें आती रही…इनको भी सरकार ने ज्यादा ही सिर चढ़ा लिया है…लो चाय लो जी…लो जी, कोई नी लेता हूं मैं भी…आप भी लो जी…हां अब बताओ कैसे आना हुआ दल-बल के साथ ? हां एक बात और याद आ गयी…पीछे कोई एक परचून वाला आया था…फंसा हुआ था-माप-तोल वालों ने उसके बाट चैक किये तो सब-के-सब कम उतरे। केस बना तो यहां आकर गिड़गिड़ाने लगा। जब मैंने कहा कि गलत काम करते ही क्यों हो तो पट्ठा कहता है – अगर सही होता तो आपके पास आता ही क्यूं…’ मन्त्री जी हंसे थे और उनके हंसने के साथ ही वे सब भी मुस्कराये थे। मन्त्री  जी हंसते-हंसते ही बोलने लगे थे, ‘जैसे हम यहां सारे-के-सारे गलत काम ही करवाने के लिए बैठे हैं।’

हंसते-हंसते ही उन्होंने कप अपनी ओर सरकाया और गम्भीर होते हुए बोले, ‘वैसे देखा जाए तो श्रीचन्दजी, निन्यानवे फीसदी इसी तरह के उट-पटांग काम ही हमें करवाने पड़ते हैं…अरे बिस्कुट भी लो ना…कोई बात नहीं …आप लो…लेता हूं मैं भी…’ पूरे वार्तालाप में सेठ श्रीचन्द ही शरीक था, बाकी सब-के-सब उन दोनों पर ही ध्यान केन्द्रित किये हुए थे। जैसे भाव उन दोनों के चेहरों पर आते लगभग वैसे ही भाव उन सबके चेहरों पर भी स्वत: ही आ-जा रहे थे।

‘हां, अब बताओ सेठ जी, आज अचानक कैसे आना हुआ ?’ मन्त्री जी ने मसूढ़ों और गालों के बीच फंसे बिस्कुट के मैदे को जीभ से इधर-उधर सरकाते हुए पूछा।

‘ये हैं जी अपने पंडित देवकीनन्दन जी…आजकल शहर की बहुत सेवा कर रहे है…आप कभी गये हो पुराने तालाब की तरफ, जहां एक बड़े से पीपल के नीचे हनुमान जी की मढ़ी होती थी…वो उधर गोगू बस्ती की ओर जहां हमें सबसे ज्यादा वोट मिले थे…लेकिन मन्त्री जी के चेहरे पर असमंजस देखकर श्रीचन्द ने खुद ही कहा था, ‘नहीं , हम इधर से ही वापिस आ गये थे…वह थोड़ा दूर पड़ता है…तो जी इन्होंने खुद घूम-घूम कर लोगों से एक-एक दो-दो रुपया इकट्ठा करके वहां मन्दिर खड़ा किया है और मन्दिर के पिछवाड़े ही अपनी रिहायश भी बना ली है…’

मन्त्री जी ने रिहायश बनाने की बात को लेकर, ‘बहुत खूब…बहुत खूब’ कहा और बड़े ही रहस्यमय ढ़ंग से मुस्कराकर उस लीडर-सरीखे नौजवान पंडित जी की ओर देखा जैसे मन-ही-मन उसके दिमाग की दाद दे रहे हो और यह सोचकर बराबर का मान रहे हो, ‘मैं महात्मा गांधी के नाम का खा रहा हूं और तुम हनुमान जी के नाम का।’ पंडित जी ने भी जैसे सब कुछ समझते हुए दोनों हाथ फैलाकर ‘सब बजरंगबली की किरपा है जी…’ कहा फिर अपने आपको ढीला छोड़ते हुए बुड़बुड़ाये, ‘जै हो बजरंगबली महाराज की…सबको सुखी राखियो…खुशी राखियो…’

श्रीचन्द ने फिर कहना शुरू किया, ‘लेकिन अभी ना तो मन्दिर ही पूरा हुआ है और ना इनकी रिहायश ही इतनी अच्छी बन सकी है…इन्होंने अब एक बजरंग दल की स्थापना की है और मुझे उसका प्रधान बनाया है…’

‘प्रधान’ शब्द आते ही अब तक हल्के-फुल्के मूड में बात कर रहे मन्त्री जी सचेत होकर सीधे हुए और पूछा, ‘इन निक्करधारियों को तो कहीं हावी नहीं  होने दिया दल में ?’

‘अजी कहां…हमारे होते…’

‘नहीं …नहीं , इन संधियों को आप नहीं   जानते…ये समझते हैं राम, कृष्ण, हनुमान, गीता सब इन्हीं के हिस्से की चीजें हैं…’

‘अजी पूछो न…गंगाधर क्रोकरीवाले को उसी के लोगों से वो पटकी दिलवायी कि याद करेगा…हमारा बनाया हुआ ‘बजरंग दल’ और प्रधान बने संघी’, कहकर सेठ श्रीचन्द ने साथ आये लोगों के चेहरों पर देखा जहां उनके लिए ‘वाह जी सेठ जी…आप भी अपनी किस्म के एक ही हैं’ जैसे भाव थे।

‘शाबाश…क्या बात है, मान गये सेठ जी…अरे भई इसीलिए तो हम निश्चिन्त हुए यहां बैठे हैं…हमें पता है आप जैसों के होते हलके में कोई भी गलत काम हो ही नहीं   सकता…’ मन्त्री जी अब ‘हो…हो’ करके हंसे थे और खूब हंसे थे, हंसते-हंसते ही उन्होंने चश्मा उतारकर धोती के पल्ले से आंखे पोंछी थी-जो शायद खुशी में नम हो गयी थी। साथ ही वे सब भी हंसे थे।

‘अब बात ये है जी कि पिछले महीने इसी बजरंग दल की मीटिंग थी। मीटिंग में हमने फैसला किया था कि इस बार हनुमान जयन्ती समारोह अपने उसी मन्दिर में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाये।’ श्रीचन्द ने ‘अपने उसी मन्दिर’ को जोर देकर कहा।

साथ आये एक और सज्जन ने थैले से एक बड़ा-सा पोस्टर निकालकर मन्त्री जी की ओर बढ़ाते हुए थोड़ा मुस्कराकर बताया, ‘मैं प्रचारमन्त्री हूं जी…’और कन्धे पर गड़ रही कागजों से भरे थैले की तनी को थोड़ा सरकाया।

‘हुम’ पोस्टर पर बनी हनुमान जी की तस्वीर देखकर मन्त्री जी का सिर थोड़ा झुका। इतना अधिक भी नहीं   कि साष्टांग प्रणामवाला पुराना फुहड़पन झलके और इतना कम भी नहीं   कि हनुमान जी के बुरा मानने का अन्देशा मन में रह जाये। या इन लोगों को भी पता न चल सके। उन्होंने पोस्टर को सरसरी नजर से देखते हुए मेज पर रख दिया। ‘विज्ञान एवं तकनीकी संगोष्ठी’ के कार्ड पर से पेपरवेट उठाकर पोस्टर पर रखा और अपना चश्मा उतारकर पेपरवेट की जगह उस कार्ड पर रखते हुए बोले, ‘हां…सेठजी…तो बताओ मेरे लिए क्या हुक्म है…मैं क्या सेवा कर सकता हूं…आप बतायें पंडित जी, आपने तो अभी कुछ कहा ही नहीं  …’

युवा पुजारी थोड़ा तना। अपने जापानी सिल्क के कुरते की बाजू ऊपर खींची जिससे उसकी कलाई पर बंधी गोल्डन घड़ी चमक उठी। लम्बे-काले बालों में अंगुली फिराते हुए उसने अपने पान रचे लाल होंठ हिलाये, ‘सेवा हमारी क्या जी…हनुमानजी की करनी है…जैसा कि सेठजी ने बताया है कि शहर में बजरंग दल बनाया है…परसों हनुमान जयंती समारोह धूम-धाम से मनाना चाहते हैं…अगर जनाब उसका उद्घाटन कर सकते…’

‘परसों…लेकिन…’

‘बड़े उपकार का काम है जी…यूं तो आप जानते हैं कि कितने ही मिनिस्टर, एम.एल.ए., एम.पी. पड़े हैं…पर आपकी अपने हलके में और धर्म-कर्म में रुचि है…’ पंडित जी की बात बीच में ही काटकर मन्त्री जी ने फिर ‘हुम’ किया और हुम के साथ ही गरदन भी हिलायी। उनका सारा ध्यान अब मेज पर पड़े हनुमान जी के पोस्टर पर था। जब उनका ध्यान अचानक हनुमान जी के ऐन मुंह पर रखे पेपरवेट पर गया तो उन्हें झटका लगा। धीरे से उन्होंने पेपरवेट मुंह पर से सरकाकर एक ओर हटा दिया और मेज की ओट से ही दोनों हाथ जोड़कर हनुमान जी से इस गलती के लिए क्षमा मांगी।

अब तक वहां बैठे चुपचाप विज्ञान गोष्ठीवाले भाषण में फेर-बदल कर रहे सैक्रेटरी के चेहरे पर उनकी बातों से उलझन उभरी और उसने मन्त्री जी की ओर देखा। उनके चेहरे पर उलझन थी। मन्त्री जी सोच रहे थे-सेठ श्रीचन्द ने इलेक्शन में खुलेआम और पल्ले के नीचे से भी काफी चन्दा दिया था। बदले में इसे स्टील-सीट का कोटा और ‘इम्पोर्ट’ का लायसेन्स दिलवाकर फायदा तो मैंने भी इसका किया है-इसके और इसके भेजे आदमियों के और कई काम भी करवाये हैं…पर फिर भी आदमी काम आने वाला है…ये पुजारी भी दमदार लगता है…बाकी ये जो आठ-दस आदमी और साथ आये हैं ये भी थोड़े-बहुत दमदार जरूर होंगे…लल्लू-पंजू होते तो श्रीचन्द इन्हें साथ ना लाता। हलके में भी इलेक्शन के बाद लोगों से मिलना नहीं   हो सका है। तीसरा साल गुजर रहा है। पता नहीं   कब इलेक्शन हो जायें…ये मौका अच्छा है इन लोगों का और जनता का दिल जीतने का…लेकिन विज्ञान गोष्ठी? उसने चश्मा लगाकर गोष्ठी का कार्ड उठाया। सरसरी निगाह से देखा…कोई हल न पाकर फिर रख दिया। ‘हलके के एक बार तो दर्शन करने ही चाहिए…ये विज्ञान गोष्ठियां तो चलती ही रहती हैं…संसद में दोबारा तो मुझे ये लोग ही पहुंचायेंगे…ये गोष्ठियां क्या देंगी…आजकल विरोधी पार्टी वाले भी कभी पद-यात्रा कभी जन-सभा अभियान छेड़े हुए हैं लेकिन ये गोष्ठी…और परसों का पूरा प्रोग्राम…ये गोष्ठी भी अभी अडऩी थी बीच में…पर राजनैतिक रूप से तो मेरा और पार्टी का हित हनुमान जयन्ती समारोह में जाने से होगा…इससे तो हाईकमान भी खुश होगी…ठीक है हनुमान जयन्ती समारोह में ही जाया जाये…’ उन्होंने एक बार फिर बड़े गौर से हनुमान जी की तस्वीर को देखा और मन-ही-मन ‘पवन पुत्र हनुमान की जै’ बोलकर श्रीचन्द से कहा, ‘ठीक है सेठ जी , मैं पहुंच जाऊंगा…’

तभी सैक्रेटरी बीच में ही बोला, ‘लेकिन सर वो गोष्ठी…परसों सुबह की फ्लाइट से सीट भी बुक है और फिर सारा-का-सारा प्रोग्राम…?’

मन्त्री जी को सैक्रेटरी के टोकने से झुंझलाहट की बजाय भीतर-ही-भीतर खुशी हुई क्योंकि इससे उन लोगों पर और अहसान लद गया था। फिर भी प्रत्यक्षतः यह दिखाने के लिए कि मैं हलके की जनता की खुशी के लिए कुछ भी कर सकता हूं-थोड़ा तल्खी से बोले, ‘वो सब देखना तुम्हारा काम है…मुझे अपने लोगों के बारे में भी सोचना है…और फिर सेठ साहब के साथ इतने लोग आये हैं…’ उन सभी के हाथ स्वत: ही बंध गये गरदने मन्त्री जी के सम्मान में आधा-आधा इंच और झुक गयीं। ‘ठीक है सेठ जी…परसों का पक्का रहा…लेकिन एक ध्यान रखना…परसों नहीं  …मैं शायद कल ही पहुंच रहा हूं…अभी किसी को कुछ नहीं   बताना…कल मेरे आने के बाद ही कुछ करना…कहना…।’

‘बड़ी मेहरबानी जी आपकी…महावीरजी आपको, आपके परिवार को सदा सुखी रखें…आप जैसे दानी-ज्ञानी परम भक्तों और धर्मात्माओं के सहारे ही पृथ्वी कायम है जी…बजरंगबलीजी आपको तरक्की दिलवाएं, आपके बाल-बच्चों की उम्र लम्बी करें…’ कहते हुए पंडित देवकीनन्दन इतना झुके कि मन्त्री जी के पांव छूने को हो गये तो मन्त्री जी ने उन्हें कंधों से पकड़कर सीधा करते हुए कहा, ‘अरे-अरे ये क्या कर रहे हो…क्यों मुझ पर पाप चढ़ा रहे हो…पॉंव तो मुझे छूने चाहिए आपके…खैर, छोड़ो, ये तो पुरानी बातें हैं…देश इक्कीसवीं सदी में जा रहा है…’ फिर भी एकदम श्रीचन्द के कान के पास फुसफुसाये, ‘मेरी ओर से हनुमान जी के निमित जो भी दान-वान मन्दिर में या पंडित जी को देना हो वो आप…’

‘हां…हां…वो मैं सब कर लूंगा…आप निश्चिन्त रहिये…’ और भी कई बातें थीं जो उसी समय एक साथ मन्त्री जी और सेठ श्रीचन्द ने आंखों-ही-आंखों में तय कीं। मन्त्री जी उन्हें गेट पर खड़ी उनकी कारों और टैक्सियों तक छोड़ने आये। हाथ जोड़कर विदा लेते हुए उन्होंने फिर कहा, ‘बस यह ध्यान रखना कि कल मेरे आने के बाद ही प्रचार करवाना…’

मन्त्री जी सीधे ड्राइंग रूम में गये। उनके चेहरे पर अब भी उलझन थी। उन्होंने सोफे पर पसरकर सैक्रेटरी को भी वहां बुला लिया। एक नौकर को एक पैग ह्विस्की बनाने को कहा और दूसरे को, दिन होने के कारण पान लेने को दौड़ाया। इनके शुभचिन्तकों का दावा है कि ये दिन के समय कभी नहीं लेते – हां जब भी कभी कोई राष्ट्रीय या अन्तराष्ट्रीय समस्या उन्हें उलझा देती है-तब उस समस्या को हल्का करने के लिए दिन में भी ले लेते हैं और यह विडम्बना ही थी कि मन्त्री जी इधर काफी दिनों से लगातार ले रहे थे।

सैक्रेटरी गोष्ठीवाला भाषण हाथ में लटकाये खड़ा हुआ मन्त्री जी के अगले हुक्म की प्रतीक्षा कर रहा था। मन्त्री जी ने पैग की चुस्की लेकर एक काजू मुंह में रखा और सैक्रेटरी को शाम तक ही हनुमान से सम्बन्धित तथ्यपूर्ण भाषण तैयार करने को कहा। वे मुंह चलाते हुए समझाने लगे, ‘भाषण में रामायण की कुछ चौपाई हों, कुछ अंश रामचरित मानस का वो उतर काण्ड है या दक्षिण काण्ड है, उसमें से ले लेना और हां…खूब याद आया…क्या बात…सोने पर सुहागा…वाह…वाह…क्या मौके पर याद आया है’, पैग खाली करके उन्होंने कहना जारी रखा, ‘भाषण में ‘राम जन्म भूमि मुक्ति’ के लिए सरकार के हाल ही में किये गये प्रयासों का जिक्र जरूर करना…और कई बार करना…लेकिन थोड़ा संभलकर और दबी जुबान में…’ मन्त्रीजी रुके। काजू चबाते हुए कुछ सोचते रहे। सैक्रेटरी के चेहरे पर उलझन बढ़ती जा रही थी। मन्त्री जी ने उससे धीरे-से पूछा, ‘कहीं से हनुमान की जात का सही-सही पता लग सकता है ? रामचन्द्रजी क्षत्रीय थे…भीलनी नीच जात की थी…परशुराम ब्राह्मण थे…नल-नील दस्तकार थे…उनको लुहार या बढ़ई कहा जा सकता है…लेकिन इस हनुमान के बारे में पता नहीं  कहीं कुछ लिखा है या नहीं …कोशिश तो करना…यूनिवर्सिटी के किसी प्रोफेसर को पूछ देखना…शायद कुछ पता चल जाये…सरकार इतना पैसा खरचती है शिक्षा पर तो क्या ये प्रोफेसर आज तक हनुमान की जात का पता नहीं  लगा पाये होंगे…’ कुछ स्पष्ट नहीं था कि वे बुड़बुड़ा रहे हैं या वे सब सैक्रेटरी को कह रहे हैं।

दूसरा पैग बनाते हुए अपनी इस उलझन को हल्का करते हुए फिर बोले, ‘इस ‘इक्कीसवीं सदी’ ने और तंग कर लिया। अब भाषण तो देना है हनुमान जयन्ती पर, बताओ यहां इक्कीसवीं सदी कैसे घुसेड़ें…?’ यह शराब की घूंट बोली थी वर्ना मन्त्री जी इतना बोलने की हिम्मत सपने में भी नहीं  कर सकते थे। वे कुछ संभले और तल्खी को दारू की कड़वी घूंट के साथ गटकते हुए बोले, ‘ऐसा कुछ लिख देना कि आं…कि देश…हां…माना कि इक्कीसवीं सदी में जा रहा है लेकिन निस्वार्थ सेवा और न्यायप्रियता के प्रतीक अंजनी सुत हनुमान जी को हमारे देश के लिए छोड़ पाना कठिन ही नहीं  असम्भव भी है…चाहे वह बाईसवीं सदी ही क्यों न हो…और मेरे खयाल से तालियां भी इसी बात पर ज्यादा बजेंगी…खैर छोड़ो…तालियां-वालियां तो बजती ही रहती हैं…आखिर में थोड़ी-बहुत धर्मनिरपेक्षता की बात जरूर कह देना।’ मन्त्री जी अब पूरी तरह उलझन से बाहर थे। उन्हें यदि कोई उलझन थी तो वह थी हनुमान की जात का पता लगाने की…क्योंकि इससे हनुमान की जात की वर्तमान पूरी बिरादरी को खुश किया जा सकता था।

लेकिन यह सब सैक्रेटरी के गले के नीचे उतर ही नहीं पा रहा था। वह मानसिक रूप से भी विज्ञान-टेक्नोलोजी-कम्प्यूटर और इक्कीसवीं सदी में कुछ देर पहले तक इतना रम गया था कि एकदम हनुमान युग में वापिस जाना उसे काफी कठिन लग रहा था। दूसरे, परसों सुबह की फ्लाइट से सीट बुक है, प्रोग्राम के कार्ड बंट चुके हैं…अखबारों वाले भी बात को उछाल सकते हैं…कोई नया रंग देकर भी प्रस्तुत कर सकते हैं..आदि ऐसी ही बातें उसे उलझाये हुए थीं।

मन्त्रीजी ने उसके चेहरे को पढ़ा-उनके होंठो पर मुस्कान आयी, ‘इस समय तुम्हारी उलझन वाजिब है…लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं  है। आओ बैठो…नोटबुक ले आओ…हां  अब अखबारों के लिए कुछ न्यूज आइटम तैयार करो। इन्हें तुम खुद अपने हिसाब से वहां  के लोकल, कुछ बड़े और नेशनल लैवल के अखबारों में लगवा देना। दो-चार संवाददाताओं को तो अभी फोन कर लेना। मेरी ओर से उनका हाल-चाल ही पूछना-बस, और ऐसा ही एक फोन वहां  के हस्पताल के सी.एम.ओ. को भी करना। वह भी कल शाम आयेगा। हां  लिखो-पहले कल के लिए-

नम्बर एक-मन्त्रीजी का हलके में अचानक दौरा। जनता में खुशी की लहर।

दो-मन्त्रीजी का हलके में अचानक दौरा। स्थानीय प्रशासन में खलबली।

तीन-मन्त्रीजी का हलके में अचानक दौरा। कई जगह पैदल ही गलियों-मुहल्लों में घूमे।

परसों के लिए-

नम्बर एक-हलके में दौरे पर गये मन्त्रीजी का स्वास्थ्य अचानक खराब। स्थानीय हस्पताल में भर्ती।

दो-मन्त्रीजी के स्वास्थ्य में गिरावट के कारण उनका विज्ञान-गोष्ठी का समापन समारोह का प्रोग्राम रद्द।

तीन-मन्त्रीजी ने आपसी भेदभाव को भुलाकर लोगों को परस्पर प्यार से मिलकर रहने को कहा।

चार-मन्त्रीजी ने धर्म-निरपेक्षता पर जोर देते हुए सभी धर्मों को समझने पर बल दिया।

पांच-मन्त्रीजी ने राजनीति को धर्म से दूर रखने को कहा। हां, एक न्यूज लोकल अखबारों में जरूर लगवानी है-लिखो-रात देर तक लोगों से मिलते रहने के कारण मन्त्रीजी का स्वास्थ्य गिरा लेकिन हस्पताल में भर्ती होने के बावजूद जनता के आग्रह पर मन्त्रीजी ने हनुमान जयन्ती समारोह में भाग लिया।

बस ठीक है, इतना काफी रहेगा।’ मन्त्रीजी ने एक पैग और बनाया। सैक्रेटरी को ऑफिस में फोन कर जरूरी फाइलें कोठी पर ही लाने को कहा और सोफे पर पसरकर नये सिरे से हनुमानजी की जात के बारे में सोचने लगे।

सांप

रत्न कुमार सांभरिया

  • वरिष्ठ साहित्यकार रत्न कुमार सांभरिया कहानी के नामचीन हस्ताक्षर हैं। कहानी सृजन के क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। उनकी कहानियों में ठेठ देसीपन व जमीनी गंध है। इन दिनों सांभरिया ‘सांप’ नामक उपन्यास का लेखन कर रहे हैं, जो घुमंतू जाति सपेरा-कालबेलिया के जीवन लोक, सामाजिक स्तर, शिक्षा, रीति-रिवाज और दुर्दशा पर आधारित है। रत्न कुमार सांभरिया ने उन दलित-वंचित-शोषित लोगों के कष्टमय जीवन को उकेरा है, जो आज भी धरती बिछाते हैं। आकाश ओढ़ते हैं, अपने पसीने से नहा लेते हैं और भूख खाकर सो जाते हैं। ‘सांप’ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 से पूर्व प्रारंभ होता है। यहां पर प्रस्तुत है उपन्यास का एक अंश-सम्पादक

सांप पकड़वाने की धड़क, अवचेतन में गाड़ी चलाते लाये थे, सेठजी। गाड़ी ने प्लाट के सामने एक गड्ढे में धचका खाया। वे खुद में लौटे और सावचेत हो गये थे।

भाई सरूपानाथ की दर्दनाक मौत की व्यथा, गाड़ी में बैठे चले आये लखीनाथ को चेत हुआ। वह संभला। जांघ पर धरी टोकरी संभाली।

दोनों का मुकाम एक था और वे मुकाम पर पहुँच गये थे। दोनों की आंखें एक साथ उधर गईं। नींव के बिल में घुसे नाग को देखने वालों का बड़ा भीड़-भड़ाका था। नींव के गिर्द ठ_ जुड़ा था।

सेठजी गाड़ी से उतरे, आंखों पर चश्मा चढ़ाये, धोती के छोर अंगुलियों की चिकौटी से उठाये।

लखीनाथ गाड़ी से उतरा, अपनी टोकरी लिये, बांहें संगवाये।

चिहुंकें हुईं-”आ गया। सपेरा आ गया। सांप पकड़ेगा। सांप पकड़ेगा। टोकरी साथ है, ले जाएगा बंद करके।’’

चिहुंकें लखीनाथ सपेरा के कानों में पड़ीं। चिहुंकें सेठ मुकुंददास के कर्णपटों से टकराईं।

चिहुंकें फिर गूंजी-”सपेरा आ गया। सांप पकड़ेगा।’’

”कैसे पकड़ेगा? गहरी खुदी है, नींव। नींव की बिल में है, सांप। पूंछड़ी कटी है, सांप की। फण काढ़े मधुमक्खी के छत्ते सा। छोह भरी दोहरी जीभ लपलपाती है, मौत सी। सांप डरावना है। खूंखार हुआ है। दिल दहलता है।’’ आवाजें थीं।

फिक्रज़दा मिलनदेवी सांस भूली थी। उसने कपड़ा बंधी टोकरी बगल में दबाये आता सपेरा देखा। उसकी सांसें संबल पाने लगी थीं। रुमाल से आंसू पोंछ लिये थे, सुबकियां सहज होने लगीं थी,सुबकन पर प्रसन्नता उभर आई थी।

सेठजी और लखीनाथ तमाशबीनों को छितराते-बितराते नींव के निकट पहुंचे। सेठजी का तो देखा भाला था, सब। चिंता सबब थी बस।

ठेकेदार सरिया थामे खड़ा था। हलवाई के हाथों में झर था। सपेरे को देख, दोनों के फिक्र का ग्राफ गिरा।

पंडितजी भी वहीं उपस्थित थे। उनके हाथ में नाग-नागिन का जोड़ा था। वह जोड़े को वैसे ही पकड़े थे, जैसे पहले पकड़े थे। उनके हाथों अब भी कंपकपाहट थी, जैसे पहले थी। उनके दिल में अब भी धड़क थी, जैसे पहले थी। विश्वास और अविश्वास की ऊहा के बीच कहीं थीं, उनकी सांसें।

लखीनाथ नींव के किनारे बैठ गया था। आंखें केन्द्र बिन्दु पर थीं, जहां सांप का फण था। उसकी निगाह छिटकी और सांप की कटी पूंछड़ी पर ठिठक गई थी। पूंछड़ी पर चींटी दल टूटा था घिरे घन सा।

वह कनपटी पर उंगली रखे उस जुगत को साधता रहा, सांप पकड़ आये। उस सकत (सूफ) को बूझता रहा, सांप काबू आये। कानिपानाथ को याद कर दोनों के कुण्डल छूकर झोपड़ी के बाहर चौतरी पर रूपे नाग देवताओं का स्मरण करता रहा, फूल, बताशे प्रसाद की मनौतियां मन-मन मानता रहा। सांप पकड़ा जाये।

‘आज आया ऊंट पहाड़ के नीचे’ वाली कहावत उसे रह-रह कर याद आई। उसने छान-छप्पर की आती-बाती, घरों के ओने-कोने, फैक्ट्रियों के पाइपों में भड़े (घुसे), बिल-बांबी में सुस्ताते सांप पकड़े थे। आज का खौ$फ उसे दिन में तारे दिखाई देने लगे थे। यहां वह चुनौती नहीं थी, जिसे वह खेल समझता आया था, अपितु जान पर खेलने जैसा शहीदाना कदम था। अभिनेता के द्वारा पर्दे पर रबड़ का सांप पकड़ कर विजयोल्लास की दर्शक-तृप्ति भी यहां नहीं थी, नींव में घुसे बैठे पूंछ कटे विकराल रूप नाग को पकड़ कर टोकरी में बंद करने जैसा साहसिक दमखम दिखाना है।

नींव के बाहर फैली मिट्टी पर चिंतातुर बैठा लखीनाथ हथेली पर चबुक टिकाये था।

पंडितजी ने सेठजी की ओर इस नजऱ निहारा, सपेरा निरा है। बेजा लाये। खामखाह वक्त बीता। मुहूर्त टलवा दो, दस पांच दिन। कीड़ा-कांटा एक जगह नहीं टिकता, सांप सरक जायेगा कहीं।

पंडित जी की तंज करती आंखें देख कर उन्होंने लखीनाथ की ओर अनुरोध और आदेश मिश्रित निहा भरी।

लखीनाथ की सूझ, असूझ रही। कई दफा ऐसे अवसर सामने होते हैं, तब समझदार की समझ भी भोथा हो जाया करती है। मेधा पर ज़ोर दे कर हल खोजा जाता है।

उसकी आंखें उधर घूमीं और गर्दन ने झटका खाया। मानो करंट दौड़ा हो शरीर की शिराओं में। करंट! रोम-रोम चुनौती की स्वीकरोक्ति का संचार था।

वह सपेरा है। पटेबाज है। आसपास की सपेरा कालबेलिया, घुमक्कड़, खानाबदोश बस्तियों में उसका काम-धाम है। नाम है। अग्रज सरूपानाथ की तरह। सपेरा ने सांप से घबरा कर मुंह मोड़ लिया, वह सपेरा नहीं, कुजात हुआ। उसने सांस खींच कर सांस छोड़ी-”मां को दुनिया में सबसे असल माना गया है। मां सपेरन का जाया-जना है, लखीनाथ।’’

उसने हथेली पर हथेली थपकी। उठा। अंगड़ाई ली। लखी! करो या मरो।

टैण्ट वाले के पड़े पाइपों पर उसकी नजऱ थी। आठ-आठ फीट लंबे लोहे के दो पाइपों को उसने उठा लिया था। पाइप, संबल-सहारा। नींव में उतर सांप को पकड़कर बाहर आने का एक सेतु। उसने दोनों पाइप नींव के साथ खड़े किये और नीचे उतर गया था।

लखीनाथ नींव में खड़ा था। नाग बिल में अड़ा था। दोनों के तोर-गौर एक हुए। सांप का सिमटा फण लहराया। उसके भीतर क्रोध और कराह जाग उठे थे। लखीनाथ ने आंखें गड़ायीं। सिफ्त सूझी।

सरिया हाथ में लिए खड़ा ठेकेदार पैनी निगाह उधर ही देखे जाता था। लखीनाथ ने उसकी ओर हाथ बढ़ाये-”सरिया दो।’’

धर्म-दीन के धनी सेठजी ने उसे टोका-”नहीं, लखीनाथ नहीं, सांप मारना नहीं है। पकडऩा है, जिंदा। मेहनताना ड्योढ़ा लो, भले।’’

लखीनाथ ने सहजता से कहा-”सेठजी नाग म्हारो देवता होवै। इको दियो हम खावां। ना मैं मारूं। ना मैं छेडूं। माटी हटा-हटा, खुरच-खुरच जगहा बनाऊंगो। हाथ खोंस फण पकड़ सकूं।’’

ठेकेदार से सरिया लेकर लखीनाथ ने कानों के कुण्डल छुए। आराध्य कानिपानाथ को सुमरा। उसने नाग के फण के थोड़ी दूर अंदर की ओर से मिट्टी झाडऩी ली, सरिया से।

स्पंदन हुआ। सांप में अदावत अरड़ाई। फण काढ़ा और दोहरी जीभ लपलपाई। वह बिल में फंसा था। खूब कसमसा कर भी असहाय था। अगर निकल पाता…..।

लखीनाथ बिल के साथ-साथ इस तरकीब मिट्टी झाड़ता खुरचता, छीलता गया, सांप स्वयं ना निकल पाये। वह सांप को फण से पकड़ कर पाइपों पर पैर रखता ऊपर जाये, सांप खिंचा आये। रति-मासा चूक हुई, भाई सरूपा की भांति काल के मुंह में जाएगा। रमती फिर रांड हो जाएगी। सपरानाथ सरीखे मंडराएंगे।

उसकी आंखों ने कूत की। ज़ेहन सधा। यक़ीन पगा। बिल के साथ-साथ सांप के पास-पास मिट्टी खुरच गई है और सांप का फंसापन कम हुआ है। उसकी देह हिले मिट्टी हिलती है। नेक (तनिक) बेर हुई, सांप बिल से बाहर हुआ।

लखीनाथ ने सरिया ऊपर फेंक दिया था, नाग के लहराते फण के निकट उसकी अनुभवी अंगुलियां मिट्टी में खुंसती गईं। उसने सांप के फण को तर्जनी तथा अंगूठे की दाब से दबाया अनामिका तथा कानी अंगुली से भींचते दबाव बनाया। मौत का टेंटुआ पकड़ा हो। उसने कितने ही सांप पकड़े थे। उन सांपों जैसा सहमापन, दुबक और कातर यहां नहीं थी। अकड़ थी, प्रतिशोध भरी।

वह पाइपों पर पैर जमाता ऊपर आने लगा। सांप अटके रस्से की भांति खिंचता आया था, उसके हाथों। एकाएक एक पाइप डिगा और लखीनाथ का पैर फिसल गया। वह फिर नींव में था।

सांप का फण उसकी मु_ी में था। नाग और बाघ बड़े घाघ हुआ करते हैं। सहज काबू नहीं आते। छटपटाहट के साथ सांप ने बलें खाईं। क्रोध से उन्मत नाग लखीनाथ के बदन से लिपट गया था। इधर नाग लखीनाथ के तन को कसता जाता था, उधर लखीनाथ के पास प्राण-पण का एकमात्र उपाय सांप को जकड़े रखना था।

मौत और जिंदगी! सैनिक शत्रु को धराशायी कर स्वयं को सुरक्षित पाता है। कौन धराशायी होगा, कौन सुरक्षित रहेगा!

करतबबाज मौत के कुआं में आइटम दिखाया करता है। वह उसके दैनंदिन शो की पार्ट अदायगी होती है। सीना सवानी नींव में खड़ा सर्पलिपटा लखीनाथ, शिवजी की मूर्ति सा लखीनाथ कोई खेल-तमाशा या जादुई इल्म नहीं दिखा रहा था। अपनी जुबान और सपेरा कर्म के धर्म अपनी जान सांसत में डाले था।

वहां खड़े लोगों का ठट्ठ का ठट्ठ हक्का-बक्का था। किसी का मुंह खुला था। किसी के होंठों तले अंगुली दबी थी। कितने हाथ जुड़े थे। कितने ओष्ठ अपने इष्ट के मंत्र बुदबुदा रहे थे। कोई अपना जंतर (ताबीज) पकड़े था। सेठजी, पंडितजी, ठेकेदार सकते में थे। मुहूर्त टल जाता। सांप इधर-उधर हो जाता। सपेरा मरा। हम बंधे।

अपने पति सेठ मुकुंद दास की मना करती निगाह को नजऱअंदाज कर मिलन देवी नींव के किनारे आ खड़ी हुई थी। उसने नाग लिपटे महादेव के चित्र देखे थे। मूर्तियां देखी थीं। सपेरे के बदन पर एक ज़हरीले नाग को लिपटा देख वह सदमा गई थी। गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगे उसके ललवई होंठ ना खुल पा रहे थे, ना बंद हो पा रहे थे। अद्र्ध खुले थे। आंखें फटीं-फटीं थीं, प्रतिमा हो। जंगल की झाडिय़ों में फंसी वीरान हिरणी की भांति दुश्ंिचताओं से घिरी, चौकड़ी भूली थी।

एकाएक लखीनाथ ने किसी कलाबाज की भांति दोनों पाइपों पर एक पैर जमाया और पछाड़ सी खाता बाहर आ गिरा था। उसने नाग को वैसे ही जकड़ा था, जैसे नाग ने उसका गात कसा था। ताकतें तुली थीं, दो थोक। वह उठ खड़ा हुआ था। संकट की घड़ी कमजोर टूट जाता है। कठोर मजबूती पाता है।

औसान भूले तमाशबीन दूर-दूर जा छिटके थेे। भय देख भेड़ें भाग खड़ी होती हैं।

लखीनाथ ने सांप को अब दोनों हाथों से जकड़ लिया था। जितना जोर लखीनाथ में था, उसकी मुट्ठियों में समाया था। इतना दम तो कालिया नाग को काबू करते श्रीकृश्ण ने भी नहीं लगाया होगा। जितना जोर नाग में था, लखीनाथ को कसने में लगाया था। इतना दमखम तो कालिया नाग ने कृष्ण जी को भींचते नहीं लगाया होगा।

सपेरे लखीनाथ के सामने सांप उन्नीस निकला। हिम्मत जवाब दे गई थी, उसकी। सपेरा के मतबूत हाथों भिंचता नाग कसाव छोड़ता निश्तेज हुआ, लटक गया था। सहेजने की सूखी फली लटकी हो, डाल से। कलांत।

आवाज़ें गूंजीं-”वाह! वाह! शाबाश! शाबाश! खूब। बहुत खूब।’’ तालियां पिटीं। जयकारे उठे।

अंबर ने सराहा। अवनि ने पीठ थपथपाई। साहसिक करिश्मा। अतुल्य।

टोकरी रखी थी, कपड़ा बंधी। उसने सेठजी की ओर गर्दन मार कर इशारा किया-”सेठजी टोकरी धरी है, कपड़ा बध्ंाी। जल्दी खोलो। ढक्कन हटाओ ऊंको। नाग बंद करूंगो।

सेठजी ने ठेकेदार की ओर हुक्मराना आंखों से देखा।

ठेकेदार ने उसी तोर उस मजदूर को तका, जिसे वह लंबू कहता है।

मजदूर ने तत्परता दिखाई। कपड़े की गांठ खोली। टोकरी अलग की। टोकरी का ढक्कन दूर रखा। पूंछड़ी कटे क्रोध भरे नहूष का गुस्सा ठण्डा हो गया था। विवश मन अपना फण समेटता, टोकरी के घेर कुण्डली मारता गया था। लखीनाथ ने टोकरी का ढक्कन बंद किया। उसे कपड़े पर रखा। लपेटा। ऊपर तले दो गांठें मार दी थीं, गोल।

पसीना-पसीना और रेतमरेत लखीनाथ ने अपने माथे का श्रम-स्वेद अंगुलियों से सूता और नीचे छींट दिया था।

उनका मन हुआ था इस अकल्पनीय साहस के लिये सपेरे की कमर थपक दूं। बड़ी जात हाथ छोटी जात कमर की ओर नहीं बढ़ पाये। सेठजी लखीनाथ को पचास रुपये में तय करके लाये थे। सौ रुपये का एक नोट उसकी ओर बढ़ाया-”लखीनाथ यह मेहनताना भी है और इनाम भी है, तुम्हारा।’’

आकुल-व्याकुल हुई मिलन देवी तो मानो अपना संसार पा गई थी। सावन-भादों की झड़ी में खुशी के मारे जैसे मोर नाचता है, हर्षोल्लास की इस घड़ी उसका मन मयूर नाच उठा था। उसने अपने बटुए में खनखनाते चांदी के सिक्कों में से एक सिक्का खींच लिया था। वह सिक्का उसने लखीनाथ की ओर बढ़ाया और गद्गद् कंठ बोली-”सपेरा तेरा इनाम।’’

अहमभरी की इस कठोरता में आत्मीयता मुलायम थी, बादाम में गिरी सी।

लखीनाथ ने मिलन देवी की ओर एक जऱ निहारा। ललाट पर लटकी स्वर्ण-बिंदिया से लेकर पैरों की अंगुलियों में पहने स्वर्ण बिछुए तक सोने से लकदक थी, वह। सोने की गोट-किनारी कढ़ी साड़ी से सजी-धजी थी। मानो किसी देवी की मूर्ति को प्राण-प्रतिष्ठा से पूर्व सजाया-धजाया हो। या हो सोने की खान, जहां से निकल कर आई हो, अभी।

ऐसी खूबसूरत स्त्री लखीनाथ अपनी चौबीस बरस की उम्र में पहली दफा देख रहा था। कुदरत के हाथों फुरसत में गढ़ी नपी-तुली-सुती काया। सारस सी गर्दन। गदराया जोबन। यह सब लखीनाथ के लिये दिवास्वप्न था। वह अपने बचपन में दादी-नानी-मां से परियों और रानियों की सुंदरता के बखान सुना करता था। यह महिला कहीं वही तो नहीं।

मिलन देवी से रू-ब-रू लखीनाथ की आंखों में उसकी छोटी जात का मान था। मिलन के नयनों में उसकी बड़ी जात का कायदा था।

मिलन देवी सिक्के को अंगुलियों की चिकौटी में पकड़े लखीनाथ की ओर हाथ बढ़ाये थी।

लखीनाथ ने गर्दन हिलाकर कहा-”नांह-नांह, सेठानी जी मेहनतानो पा लियो सेठजी से। बात कम की थी, खूब घणो दे दियो उनने। गरीब की तो मिनत बरकत करे।’’

मिलन देवी ने अपनी सुरमई आंखें गोल कीं। एक आंख में अनुनय था, दूसरी में आग्रह। ऐसे द्विभाषी नेत्रों के सम्मुख भला कौन पुरुष नतमस्तक नहीं होता।

लखीनाथ ने मिलन देवी के सिक्के को कुरते की अपनी उस जेब में नहीं रखा, जिसमें सेठजी का नोट रखा था।

वह चांदी के पांच सिक्के लाई थी, पंडितजी के लिये। एक लखीनाथ सपेरे को दे दिया था। सबके सब अवाक देखते रहे थे। सेठजी ने एक बार मिलन देवी की ओर कड़ा देखा, लेकिन आंखें झुका ली थीं। नि:संतान पत्नी पर पति का ज्यादा वश नहीं रहता है।

लखीनाथ का गेरुआ रंग का कुरता रेत और सांप की लपेट से गंदा-संदा हो रहा था। सिर की लटें बिखरी थीं। मिलन देवी ने एक बारगी विचारा, यह सपेरा कोई भाण्ड़-भगतिया नहीं, जोगी-जति है। अपनी साड़ी के पल्लू से इसका रेत झाड़ दूं। अंगुलियों की कंघी से इसकी बिखरी लटें संवार दूं। संकोच से उसकी आंखें नीची हो गई थीं। उसने अपनी पलकों से उसकी रेत छड़क दी थी। मन की अंगुलियों से लटें उसकी संवार दी थीं।वह चुपचाप पंडितजी के आसन के निकट आ बैठी थी, मुहूर्त होगा।

हलवाई भट्टी की ओर बढ़ गया था। पंडितजी अपने आसन आ विराजे थे। ठेकेदार नींव के पत्थर रखवाने को उद्यत था। तमाशबीनों की भीड़ छंट गई थी।

मुहूर्त घड़ी सवाये होती है। आधा घण्टा शेष रहा। लखीनाथ को उसकी झोपड़ी छोडऩा है, सेठजी अपनी गाड़ी के पास आ गये थे। लखीनाथ टोकरी संभाले उनके साथ था। उसने गाड़ी का गेट खोला और आगे की सीट पर बैठ गया था, जैसे बैठा आया था।

वह मजदूर अभी गाड़ी में ही बैठा हुआ था, डरा। सुध-बुध खोया। सेठजी ने उससे कहा-”अरे जिस सांप से तू डरा हुआ है ना और मरा जाता है, बिल्कुल, उसे लखीनाथ ने पकड़ कर अपनी टोकरी में बंद कर लिया है। टोकरी उसकी जांघों पर रखी है। वह गाड़ी में बैठा है, सांप को दूर कहीं जंगल में छोड़ेंगे। अब निश्ंिचत हो कर काम कर जा।’’

मजदूर गाड़ी से नीचे उतर गया था। उसने लखीनाथ को देखा। उसकी जांघों पर रखी टोकरी देखी। ठण्डी आह ली और उधर मुड़ गया था, जहां ठेकेदार खड़ा था।

लखीनाथ को अपनी पास वाली सीट पर सांप की टोकरी जांघों पर रखे बैठा देख, सेठजी के अंतस में हठात धक हुई। यह धक वह नहीं थी, जो नींव की बिल में घुसे नाग को लेकर थी। यह धक सांप के भय की धक भी नहीं थी। सांप टोकरी में बन्द था। टोकरी कपड़े बंधी थी। लखीनाथ अपनी दोनों कुहनियां टोकरी पर रखे बैठा था। यहां हिकारत थी और बड़ी जात का हिंस्र अहम पगुराया था।

गाड़ी की डिक्की खोलते हुए उन्होंने लखीनाथ से कहा-”सपेरा डिक्की खोल दी है, मैंने। टोकरी रख दे उसमें। और पीछे की सीट पर बैठ जा, जहां मजदूर बैठा था।’’

लखीनाथ को सेठजी का व्यवहार खुदगर्ज लगा। सूल सी चुभी।

उसकी मुटिठ्यां कस गई थीं, जैसे सांप का फण पकड़े कसी थीं। उसकी आंखें लाल हो गई थीं, जैसे सांप को पकड़ते हुई थीं। उसने आक्रोश भरे कंठ कहा-”सेठजी आप गाड़ी-वाड़ी रहने दो अपनी। मैं खुद चलो जाऊंगो, अपने पैरों। कोहनी मारे गुड़ ना फूटे।’’

वह गाड़ी से नीचे उतरा। टोकरी बगल में दबा ली और मुट्ठी भींचे बढ़ गया था, जंगल की राह।

वह आंकी-बांकी पगडंडियों से होता हुआ खेतों की ओर आ गया था। कंटीली झाडिय़ों के पास बाम्बी सी दिखने वाली एक जगह,जिसके इर्द-गिर्द बिलें थीं, उसने टोकरी रख दी थी।

लखीनाथ सपेरा की भिंची मुट्ठियां तब खुलीं, जब वह भुजंग को छोडऩे के लिए टोकरी बंधे कपड़े की गांठ खोलने लगा।

सम्पर्क-भाड़ावास हाउस, सी 137, महेश नगर, जयपुर-302015,

मो.: 94604-74465

खाली लौटते हुए – तारा पांचाल

किसना और भागो दो-ढाई घण्टे से उस ऊॅंचे बैंच के पास ही खड़े थे जिस पर उनका दस साल का बेटा रमेश लेटा था। वह जितना अधिक निश्चेष्ट दिखने लगता थे वे दोनों उतने ही अधिक बेचैन होने लगते। डॉक्टर की हिदायत के बावजूद भी कभी मां तो कभी बापू बारी-बारी से उसे टोक रहे थे, ‘मेरे ला…मेसी…बेट्टे मेसी…’ मां की इस आवाज से उसकी आंखें थोड़ी-सी खुलतीं और फिर बन्द हो जातीं। सफेद-सफेद निर्जीव होंठ भी लगता था कि कांप रहे हैं और इसी से उन दोनों को थोड़ी तसल्ली होती। मां फिर भी मुंह फेरकर अपनी गीली हुई आंखों को पोंछती और उसके माथे पर हाथ रखती, उसके बालों को सीधा करती और फिर कह बैठती, ‘मेरे लाल ! किसने की नजरें वहां फट्टियों पर धूल जमी दवाइयों की शीशियों, एक खूटी पर टॅंगी गर्म पानी की पुरानी रबड़ की बोतल, एक कोने में खाली सफेद-पीली शीशियों से भरी लकड़ी की पेटी और ऊपर छत पर बड़े-बड़े पंखों वाले पंखे से फिसलकर फिर बेटे पर आ टिकती। वह उसकी हथेली अपनी दोनों हथेलियों के बीच हल्के से दबाता और फिर कुछ देर दबाये ही रहता जैसे कि अपनी सारी गर्माहट बेटे को देना चाह रहा हो। मां भी उसके सिर से पांव की ओर जाती, उसके ठण्डे पड़ते तलवों को हल्के-हल्के सहलाती हुई गर्माने की कोशिश करती और फिर सिर की ओर आ जाती।

वे दोनों खुद भी ठिरे जा रहे थे। किसना लॅंगोटी जैसी छोटी-सी धोती बांधे था जो कि गोड़ों के ऊपर ही टॅंगी थी। खाली एक कमीज और सिर पर परना लपेटा हुआ था। भागो ने भी बड़े ही झीने कुरता-सलवार पहन रखे थे और उसके लाल रंग के ओढऩे में भी जाड़ा थामने की गुंजाइश नहीं थी। उसकी  सलवार के दोनों गोड़ों पर दो अलग-अलग रंग की बदरंग थेगलियां लगी थीं। पांवों में दोनों ही चप्पल पहने हुए थे। ड़ाक्टर अब तक उसे तीन इंजेक्शन दे चुका था पर उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हो पा रहा था। वह जब भी अन्दर आता-वे दोनों लगभग एक साथ पूछते, ‘डॉक्टर जी, कोई ईसी-ऊसी बात तो नहीं?’ और सुबह से कहे जा रहे डॉक्टर के इस वाक्य  ‘घबराओ नहीं किसना, भगवान भला करेंगे’ को नजरअन्दाज कर एक साथ ही दोनों की विश्वास-अविश्वास के बीच भटकती नजरें डॅाक्टर के चेहरे को पढ़तीं और भीतर-ही-भीतर कांपता हुआ विश्वास उन्हें सहारा देता, ‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।’

उनके इस विश्वास का कारण एक तो ‘जिन्दगी में हमने कभी कीड़ी तक भी नहीं सतायी, ना कभी किसी का बुरा चाहा’ था और दूसरे यह डॉक्टर चौधरी था। इस डॉक्टर के बारे में लोगों की आम राय थी-इसके हाथों में जश है-इसके हाथ की दी हुई राख की चुटकी भी लग जा है! वैसे यह इतना पढ़ा-लिखा नहीं है। -पर एक तो शहर के और डॉक्टरों की तुलना में यह कम खाल छीलता है और दूसरे अपने हर मरीज को उसका नाम लेकर बोलता है-अपनी दुकान के आगे इसने एक बड़ा-सा साइन-बोर्ड लगा रखा है जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘चौधरी दवा-खाना लिखा है। इसके नीचे पुरानी से पुरानी और नजला-जुकाम से लेकर मिरगी और दमा जैसी हर बीमारी का इलाज तसल्ली-बख्श करने का दावा भी लिखा है। और बिल्कुल नीचे  लिखा है डॉ. ए.पी.चौधरी, आर.एम.पी.। वैसे  तो पिछले कुछ सालों से एम.बी.बी.एस. डॉक्टरों की दुकानें भी इस कस्बे में कईं खुली हैं पर उनकी फीस ज्यादा होने के कारण इस डॉ.चौधरी की प्रैक्टिस पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा था। देहाती, खासकर  गरीब तबके को इसी का सहारा लेना पड़ता है।

यूं कस्बे में हस्पताल भी है पर जब बेटे को लेकर गांव से चला था तो कइयों ने एक ही बात कही थी, ‘चौधरी पर ही ले जाना, किसी और अच्छे डॉक्टर को दिखा लेना पर हस्पताल के चक्कर में बिल्कुल न पडऩा। हां, यदि नोट फरकाने की गुंजाइश हो तो फिर बेशक हस्पताल में दिखा लेना’, उनकी बात सच्चाई के निकट भी थी। हस्पताल के बाहर गार्डरों पर खड़े-बड़े-बड़े साइन-बोर्ड खूब लम्बी-चौड़ी घोषणाएं तो करते थे पर मरीजों को उनकी छाया तक का आराम नहीं था। इसके अतिरिक्त सिफारिश के हिसाब से ही वहां के थर्मामीटर तापमान बताते थे और रिश्वत की मात्रा के हिसाब से ही स्टैथोस्कोपों से उनके कानों तक मरीज की धडक़नें पहॅुंचती थी। डॉक्टर नौकरों की तरह ड्यूटी पर आते थे और दुकानदारों की तरह जेब सम्भालते हुए चले जाते थे।

इस बार डॉक्टर के जाते ही किसने से सवा रुपया लेकर बेटे के माथे से छुवाकर अपने ओढऩे से बांधते हुए भागो बुदबुदाई थी, ‘मेरे लाल को ठीक कर माई रानी, हे गुगापीर जी माराज, हे मेरे दादा खेड़े…थारी सबकी सवा-सवा की सीरनी बांटूंगी।’ इससे उसका कांपता विश्वास कुछ पक्का भी हुआ था, पर तभी किसने ने डूबती आवाज में कहा था, ‘बेट्टा तो…’ पर आगे वह कुछ भी नहीं कह पाया था और उसकी ठण्डी हथेलियों को बेट्टे…बेट्टे…कहते हुए जोर-जोर से रगडऩा शुरू कर दिया था। किसने ने डॉक्टर को आवाज दी थी पर इससे पहले कि डॉक्टर देहरी लांघकर वहां पहुंच पाता, बेटा उनके हाथों से निकल चुका था।

देख्रेते ही समझ तो डॉक्टर भी गया था-पर एक तो वह अब तक उनकी हैसियत से अधिक पूरे पैसे ले चुका था और दूसरे कहीं यह सब बाहर वाले हिस्से में बैठे ग्राहक ना जान लें, फिर से बार-बार स्टैथोस्कोप लगाकर देख रहा था और डूब चुकी नाड़ी को टटोल रहा था। वहां से हटकर वह उन दोनों को खींचकर पीछे एक कोने में ले गया था और धीरे से बोला था, ‘सुनो, होनी बड़ी बलवान होती है-लेकिन मेरा मतलब है, तुम्हें अब हिम्मत रखनी होगी। अगर तुम रोओ-पीटोगे और यहां या शहर से में ज्यादा देर लगाओगे तो हो सकता है पुलिस तुम्हें यहीं रोक ले और हस्पताल में इसकी चीर-फाड़ करवाने लगे…’ डॉक्टर के परोक्ष रूप से बेटे को मृत घोषित किये जाने पर भी पुलिस और चीरफाड़ के भय से दोनों की सिसकियां हल्की-हल्की ही निकल सकी थीं।

चीर-फाड़ के नाम से तो वे ज्यादा ही घबरा गये थे और एकदम उनके जेहन में गॉंवों में हुए पोस्टमार्टमों की घटनाएं घुस गयीं थीं। अभी कुछ दिन हुए उनके दसेक घर छोडक़र एक घर में हुई मौत उनके सामने आ खड़ी हुई थी। वह बिल्कुल हट्टा-कट्टा था। शहर गया तो एक दुकान पर चाय पती-पीते ही लुढक़ गया था। पुलिस केस बना था और उसका पोस्टमार्टम हुआ था। खून के धब्बे लगी सफेद चादर में जब उसे गांव लाया गया तो सभी हैरान थे ‘क्या यह लाश उसी की है?’ पांच-छह पंसेरी रह गयी माटी पर चेहरा ही उसकी पहचान था। हर पोस्टमार्टम के बाद गांव भर में खूब खुसरपुसर भी होती रही है-डॉक्टर दिल निकाल लेते हैं, पेट काटकर कलेजा निकाल लेते हैं। आंखे भी निकाल लेते हैं-लाशें कई-कई दिन तक सड़ती रहती हैं-आदि।

भागो किसने की अपेक्षा अधिक कांपी थी। गाल पर थप्पड़ मारकर उॅंगलियों के निशानों को देख-देखकर ही चोट का अन्दाजा लगाती रहने वाली मां। पांव में लगे कांटे को काढ़ते हुए सुई की हर टकोर को अपने कलेजे में महसूस करने वाली मां और वह मां, जो पूरी रात अपने सोये बच्चे की गर्दन के नीचे से अपनी सुन्न पड़ती बांह इसलिए नहीं खींचती कि उसकी नींद न खराब हो जाये-अब कैसे सोचे कि उसके बेटे की खाल को उधेड़ दिया जाये और बेटे की जगह हड्डियों का पिंजर ममता की झोली में डाल दिया जाये। इसी के कारण वह रोते हुए बेटे की लाश से लिपटी, धीरे से यही कह पायी थी, ‘हाय! लोगों, मैं लुट गयी रे!’ पर फिर भी किसने ने उसके मुंह पर हथेली रख दी थी और सहमते हुए कहा था, ‘सांस भी न काढ़, नहीं तो अस्पताल के डॉक्टर इसका सारा कुछ काढ़ लेंगे, थाने वाले भी तंग करेंगे, चल भाग ले।’ किसने के कहने से भागो जहां और सहमी थी, वहीं अब तक सहमे डॉक्टर का मनाव कुछ कम हुआ था, ‘हां तुम खुद ही समझदार हो…देखो मैं तुम्हारे सामने ही सुबह से कोशिश कर रहा हूं, लेकिन तुम लोग मरीज को तब तक घर से बाहर निकालते ही नहीं, जब तक वह बीतने को नहीं हो जाता…।’

…और किसने ने अपराध बोध से आंखे झुका ली थी, क्योंकि भागो भी पिछले तीन दिन से लगातार कह रही थी, ‘बेटे को शहर दिखा लाओ, बेटे को शहर दिखा लाओ तकलीफ बढ़ रही है।’ पर वह भी क्या करता? वह मालिक नहीं बल्कि नौकर है…लम्बरदार का सिरी। आज भी उसने बड़े तडक़े उठकर पहले लम्बरदार के सारे काम निपटाये थे फिर कहीं उसने आने दिया था।…इसी बीच डॉक्टर ने कहा कि ‘अब तुम इसे चादर में लपेटकर गोद में ले लो और सिर कॅंधे से लगाकर जितना जल्दी हो सके, शहर से निकलने की करो…’ कहकर वहां से चला गया था और अपने आपको बाहर बैठे मरीजों में व्यस्त करने की कोशिश करने लगा था। पर तभी मेज पर रखी जो भी शीशी हाथ मे आयी, बिना पढ़े कि क्या है, भीतर जाकर किसने के हाथ में थमा दी थी, ‘लो , यह शीशी हाथ में ही रखना कोई भी शक नहीं करेगा। अब जल्दी करो।’

भागो फिर लाश के ऊपर गिर आई थी और घुटी-घुटी सिसकियां भरती हुई चूमने लगी थी। किसने के हाथ भी बेटे से लिपटने को बढ़े थे पर उसने अपने आप पर काबू रखते हुए अपने बढ़े हुए कांपते हुए हाथों से भागो को एक ओर हटाया था। उसे चादर में लपेटते हुए कन्धे से लगाने के लिए उठाने लगा था। उठाते-उठाते भ उसे लगा था कि बेटा शायद अब भी जिन्दा है और सोचा था कि सीधा बड़े हस्पताल में ले जाये पर जेब में इतने पैसे नहीं थे जिनके बल पर वह वहां बेटे की अॅंगुली पकड़े बाहर निकलने की सोचता। उल्टे माटी खराब करने वाली बात थी, उसने लाचारी से उसे कन्धे से लगा लिया था। उसकी टांगे बाकी शरीर की बजाय ज्यादा कांप रही थी जैसे कि सामथ्र्य से अधिक बोझ उठा लिया हो। सुबह की तरह उसने बेटे का हाथ गर्दन के गिर्द लिपटाना चाहा था पर लकड़ी हो चुका हाथ सीधे का सीधा ही नीचे झूल गया था। किसने के भीतर से एक जोर की चीख उभरी थी जिसे दबाता हुआ वह चुपके से डॉक्टर की दी हुई शीशी पकड़े, सडक़ पर आ गया था। पीछे-पीछे घूंघट में भागो आ रही थी।

वे दोनों सडक़ से काफी हटकर चल रहे थे। किसना शीशी वाला दाहिना हाथ काफी आगे किये हुए था, ताकि शीशी सबको नजर आये। काफी कोशिश करने पर भी वह ज्यादा तेज नहीं चल पा रहा था। थोड़ा-सा चलने के बाद भागो ने कहा था, ‘स्यात कहीं सांस अटके हों। एक बार बड़े अस्पताल में दिखा लाते…वहां तो बड़ी-बड़ी मशीनों से इलाज बनते हैं।’ मन की बात होते हुए भी किसने ने उसे झिडक़ दिया था, क्योंकि बेटे की मृत हो गयी देह का ठण्डा स्पर्श वह अपने भीतर तक महसूस कर रहा था और फिर वही पैसे की लाचारी, पर्वत से भारी। उस पर हावी थाने और चीर-फाड़ की दहशत। उसने और तेज-तेज चलने की कोशिश की थी। सिर पर से चादर न फिसले…भागो बार-बार उसे खींचकर उसके मुंह पर कर देती थी। भागो ने कुछ दूर चलकर फिर किसने से सटते हुए धीरे-से कहा था-‘सिपाई।’ किसने ने देखा तो उसका शीशी वाला हाथ अपने आप और आगे आ गया था। उसने भागो से कहा था कि ‘उस ओर न देख वह ताड़ जाएगा। सीधी चलती रह…’लेकिन वह खुद नीचे ही नीचे उसी ओर देखता रहा था। एक बार तो उसे लगा भी कि वह उन्हीं को घूर रहा है-उसने और भी तेज-तेज चलने की कोशिश करते हुए शीशी काफी ऊॅंची उठा ली थी।

सिपाही पीछे रह गया तो किसने ने महसूस किया था-कितनी बार पहले भी वह इस शहर में आया था। कभी बैलगाड़ी हांकते हुए लम्बरदार की जींस बेचने, कभी उसके खाद के थैले लेने और कभी-कभार खुद अपने घर के लिए मिट्टी का तेल या कोई और छोटी-मोटी चीज लेने पर इस शहर की भीड़ इतनी बेगानी-बेगानी और घूरती हुई कभी नहीं लगी जितनी आज लग रही है। गर्मियों में जींस बेचने आया वह तांगा-स्टैण्ड के पास खड़ी रेहड़ी से बर्फ पर लगा ठण्डा लाल-लाल तरबूज भी खाता रहा था। बाहर चुंगी के पास वाले खोसे पर बैठकर चाय भी पीता रहा था। पर आज-उसने टूटकर अपने आपसे ही, भागो को सुनाते हुए कहा था, ‘आज तो अड्डा भी दूर सरक गया’ भागो ने सिसकारी भरी थी-घुटी हुई, आंखों से ढलके आंसु घूंघट का पल्लू पी गया था।

दोपहर होने के बावजूद भी ठण्ड अधिक थी। बने-सॅंवरे और कपड़ों में लिपटे-सिमटे लोग इधर से उधर आ-जा रहे थे। मूंगफलियों की रेहडिय़ों से खूब जोर-जोर की आवाजें आ रही थीं। फुटपाथ पर बैठे छोटे-मोटे दुकानदार एक-दूसरे से बढ़-चढक़र आवाजें लगा रहे थे। उसके पास से कई युवक कानों से ट्रांजिस्टर लगाये कमेन्ट्री सुनते हुए गुजर गये थे। पर उन्हें एक-एक कदम चल पाना ही पहाड़ पर चढ़ने जैसा लग रहा था। किसना यह कहने ही वाला था कि मैं और नहीं चल सकता कि भागो ने गले में ही घरघराती आवाज में कहा था, ‘मेरी टांगों का तो सारा सत्त निचुड़ लिया, मेरे से नहीं चला जा रहा।’-किसने ने ‘हिम्मत से काम ले’ कहा था और खुद भी अधिया-धोती से बाहर दिख रही कांपती टांगों को मजबूती से टेकने और ज्यादा तेज-तेज पांव उठाने की कोशिश करने लगा था।

किसना थोड़ा रुका था। और उसने एक कदम पीछे चल रही भागो के बराबर आने पर पूछा था, ‘इसकी जेब में क्या पड़ा है? मेरी छाती में चुभ रहा है’ उसने चाहा था कि भागो उसकी जेब में हाथ डालकर देखे। असल में आते हुए अड्डे से डॉक्टर तक भागो उसे उठाकर लायी थी।

इसीलिए किसने ने जानना चाहा था कि शायद उसे पता हो। पर जब शब्द गले से नहीं निकले तो भागो ने चलते-चलते ही पता नहीं किस तरह हाथ हिला दिया था। किसना चुभन को नजरअन्दाज कर दर्द को पीता हुआ तेज और तेज चलने की हिम्मत जुटाता रहा था। अड्डे तक पहुंचते-पहुंचते वे पूरी तरह चुक गये थे। किसना बैठना चाहता था और बैठक एक बार बेटे का मुंह देखना चाहता था पर उसे लिए-लिए बैठना सम्भव नहीं था। अत: खड़ा ही रहा। फिर उसने चाहा था कि उसकी जेब में पड़ी कंकर या वैसी ही कोई और चीज निकाल दे। पर वह कुछ भी नहीं कर पा रहा था। कांपती टांगों को स्थिर करता खड़ा रहा था, बस।

जब खड़ा भी नहीं रहा गया तो उसने धीरे से भागो को कहा था, ‘धुर गांव वाली बस में तो अभी ज्यादा टाइम है। दूसरी में ही चल पड़ते हैं’ वह जानता था कि दूसरी बसें गांव से दो-ढाई कोस की दूरी से गुजरती हैं और वह दो-ढाई कोस का सफर पैदल ही तय करना पड़ेगा, लेकिन ऐसी स्थिति में प्रतीक्षा करनी भी आसान नहीं थी और फिर वे कुछ सोच भी नहीं पा रहे थे। किसने ने फिर कहा था, ‘देख, शहर तो पार हो गया, अब बस में भी इसी तरह हिम्मत रखना, अगर किसी को भी शक हो गया कि…’ आगे वह कुछ भी कह नहीं पा रहा था, उसकी आवाज खरखरी होने लगी थी। भीतर शब्द तो थे पर निकल नहीं रहे थे ‘अगर अपने पास इतने पैसे होते जिससे कि कोई सवारी करके ढंगसर इसे घर ले चलते तो बेट्टा हाथों से यूं ना…’ वह फिर रुक गया था और नाक में भर आये पानी को सुडक़ता हुआ दूसरी तरफ देखने लगा था।

किसना बस में चढ़ गया था। भीड़ अधिक थी क्योंकि पांच-सात सवारियां ही उतरी थीं। पर चढ़ी थी ज्यादा। किसना अपने आपको संभालता कंधे से लगे बेटे को भींचे एक सीट के साथ लगकर खड़ा हो गया था। साथ ही, चादर में ढंके बेटे के मुंह पर नजरें जमाये भागो खड़ी थी। गोद में बालक और हाथ में दवा की शीशी देखकर साथ की सीट पर बैठीं दोनों सवारियां उन्हें बैठ जाने के लिए कहकर खड़ी हो गयी थीं। भागो खिडक़ी की ओर सीट पर पांव समेटकर बैठ गयी थी और बेटे का सिर और धड़ अपनी गोद में रख लिया था। किसने ने अपनी धोती नीचे खींचते हुए उसकी टांगें अपने गोडों पर ले ली थीं। इस तरह वह उन्होंने सीधे का सीधा डाल लिया था और अच्छी तरह चादर से ढॅंक दिया था।

किसने ने आस-पास की सवारियों पर नजर डाली थी। उसने शुक्र मनाया था कि बस में कोई जान-पहचान का या गांव का नहीं है। जब उसने देखा कि बराबर वाली सीट पर बैठा बूढ़ा उन्हीं की ओर देख रहा है तो किसने को लगा कि कहीं कुछ कमी है। वह कुछ घबरा गया था। दिल बड़ा करके उसने झुककर बूढ़े को सुनाते हुए ऊंची आवाज में पूछा था, ‘बेट्टे रमेश, पानी लाऊं?’

‘…’

‘पा पीयेगा…’

‘सेब लेगा…’

‘…’

किसना खुद के कहे से खुद ही टूटा था क्योंकि इस नकली पूछने के साथ ही वह बेटे के चादर फेंकते हुए सिर हिलाकर सच्ची-मुच्ची की ‘हां’ करने की आशा कर बैठा था। फिर भी दिल में उठी टीस का दबाकर उसने फिर ऊपर झुकते हुए कहा था, ‘थोड़ी-सी चा तो ले-ले बेटे!’ बीच में ही भागो ने पल्लू से हाथ निकालकर ‘न’ में हिला दिया था जैसे कि उसने बेटे की न सुनी हो। मानो चाह रही हो, ‘अभी इसे तंग न कर, आराम से लेटा रहने दे।’ तभी बस चल पड़ी थी।

कण्डक्टर ने टिकट काटने को कहा तो किसने ने दो टिकटों के पैसे उसे दे दिये थे जिस पर कण्डक्टर ने कहा था, ‘आधी बच्चे की…कितना साल का है?’ गोद में सीधे का सीधा पड़ा होने के कारण उसकी लम्बाई से उम्र का सही-सही अन्दाजा लगाया जा सकता था, पर आदत के अनुसार उसने पूछ लिया था। इस पर भागो को हिचकी आने को हुई थी और उसने खांसी में उलझते हुए खिडक़ी से बाहर थूक दिया था। किसना बड़ी मुश्किल से अपने आपको सामान्य रखते हुए कह पाया था, ‘दस का…पांचवीं जमात में पढ़ता…….।’ वह ‘पढ़ता था’ कहते-कहते सम्भल गया था। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा था, ‘पर, जी, ये तो बीमार है। पैसे बचे नहीं….सारे के सारे इसकी दवाइयों पर खर्च हो गये जी’… उसकी भीगी आंखें देखकर और उसकी आवाज से कण्डक्टर को उसके दर्द का अहसास हुआ था और उसने उसके हाथ में दो टिकटें दी थीं। पर वह ‘आ जाते हैं घर से,

पूरे पैसे लाते नहीं।’ जैसे शब्द बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गया था।

बस लम्बे रूट की थी और तेज गति से चल रही थी। किसने के अड्डे तक केवल तीन ही स्टाप थे, फिर भी उसे बस की कम गति कचोट रही थी। उसने आसपास की सवारियों पर नजर दौड़ायी थी। लगभग सभी सवारियों को अपनी ही बातों में या अखबार पत्रिका पढऩे में व्यस्त और कुछ को गुप्प-चुप्प पाकर वह थोड़ा आश्वस्त हुआ था। लेकिन उसका ध्यान फिर उसकी दाहिनी ओर बैठे उस बूढ़े पर अटक गया था जिसकी नजरें उसे चादर के भीतर तक घुसती हुई लगी थीं। ‘अगर यह बूढ़ा चादर हटाकर उसे छूकर देखने लगे और और….’ किसना आगे नहीं सोच पाया था क्योंकि इस समय वह बस से नीचे उतारे जाने की कल्पना से ही डर गया। उससे नजरें बचाता वह बाहर देखने लगा था, लेकिन खिडक़ी में भागों का सिर अढ़ा हुआ था। उसका ध्यान अचानक एक जगह से भीगे उसके घूंघट पर गया, वह विचलित हो उठा था। कहीं यह बूढ़ा तो नहीं देख रहा? दु:ख के साथ-साथ उसे गुस्सा भी आया था-कितना समझाया था-रोना नहीं, रोना नहीं। पर यही तो फर्क है औरत और मर्द में, ना ये खुशी पी सकती है ना दु:ख और फिर थोड़ी-सी देर की तो बात है। किसने ने यह सोचा जरूर था पर खुद भी उसका मन रोने को, खूब चीखकर रोने को हो रहा था। उसने निढाल हुई भागो को धीरे से कोहनी मारकर चेताया था। पर तभी अब तक चुप बैठा बूढ़ा पूछ बैठा था, ‘क्या हुआ?’ किसने ने धीरे से लेकिन पूरे आत्मविश्वास के  साथ ‘निमोनिया’ कहा था और फिर चारों ओर से पहले से ही ठीक लिपटी चादर को ठीक करने लगा था। उसने भागो से भी कहा था, ‘ये शीशा अच्छी तरह से बन्द कर ले…ठण्डी हवा आ रही है। कभी इसे फिर जाड़ा चढ़ जाये…’ भागो  ने शीशा खींचने की कोशिश की थी पर वह पहले से ही सही था।

‘…किसकी दवाई दी?’

‘चौधरी की’ कहकर उसने शीशी वाला हाथ कुछ और ऊपर उठा लिया था।

‘ओफ्ओ…उस ठग पर क्यूं गये…वो तो पानी से सूए लगा के और बीमार कर देगा…बड़े हस्पताल में दिखाते…लोग मानते ही नहीं उस पर जाये बिना, पर लोग भी क्या करें और कहां जायें…।’ वह स्वयं ही कह रहा था , स्वयं ही नकार रहा था और सुन भी स्वयं ही रहा था, ‘ये हस्पताल तो गोरमिन्ट ने पब्लिक के लिए नहीं, डॉक्टरों और नर्सों के लिए बनवाया है…।’ स्वयं से ही तर्क-वितर्क करता हुआ फिर वह किसने से बोला था, ‘भाई, तुम कहो निमोनिया है पर रिजाई भी नहीं लाये…। इस पतली-सी चादर में तो ये और बीमार हो जायेगा, घर जाते ही इसे सेंक देना…एक अंगारू सौ-दारू बराबर माने गये हैं। जितना सेंकोगे उतना ही आराम होगा…।’ किसना और भागो कुछ भी ध्यान से नहीं सुन रहे थे। पर ‘सेंक’ शब्द से उनके जेहन में बेटे की धू-धू करती चिता घूम गयी थी। भागो ने किसने की बांह पूरी शक्ति से दबाई थी। किसने का भी दिल किया था कि वह दहाड़ मारकर रो पड़े, पर…पर वह तो खुलकर सिसक तक नहीं पर रहा था। उसने उकसकर ड्राइवर को देखा था-कितना तगड़ा है, फिर भी तेज नहीं चला रहा, वह झुंझलाया था। बूढ़ा बोले जा रहा था, ‘लौंग, सौंठ, बनकसा तुलसी का काढ़ा…अण्डे…एक ढक्कन देसी दारू…सेंक… छाती पर… पीठ पर… गर्म ईंट से…खाट के नीचे से सेंक…।’

आसपास की कुछ सवारियां भी बूढ़े के नुस्खे ध्यान से सुनने लगी थीं। और उनमें नीम हकीमों की बढ़ती संख्या और साथ ही बीमारियों की किस्मों में बढ़ोत्तरी पर चर्चा चल पड़ी थी। बातें घटती खुराक, फसलों में अधिक खाद की मात्रा, मंहगे इलाज और चाय आदि से चलती-चलती देसी नाडि़ए वैद्यों पर आ टिकी थीं। कण्डक्टर भी इसी बीच टिकिट-टिकिट करता हुआ दो चक्कर लगा चुका था।

किसने और भागो की सारी कल्पना अब धीरे-धीरे दहशत से निकलकर मोटी कलम से टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखे बेटे के शरारती सफों में गहरी टीस बनकर उलझने लगी थी। बस्ता लटकाये स्कूल जाना, स्कूल से रेत-मिट्टी में सने हुए आना और आते ही रोटी मांगना, नूण से नहीं खानी, गुड़ के लिए जिद्ध करना, रूठना, दादी की लाठी या नसवार की डिब्बी उठाकर भागना, दादा का हुक्का भरना और दादा की ही गुदड़ी में सोन की जिद्द करना।

अभी दो-एक महीने पहले तो पिटाई भी करनी पड़ी थी। कहने लगा कि मैं बाल नहीं कटवाता, स्कूल के और बच्चे भी बालों को तेल लगाकर मांग काढक़र आते हैं। समझाया भी था कि इस तरह बालों को तेल-साबुन की जरूरत होती है। हम कहां से लायेंगे। पेट बांधकर तुझे पढ़ा भी मुश्किल से रहे हैं। पर कहां माना था।

बस्ते की सभी कापियां बस में ही उनके आगे सफा-सफा करती खुलती जा रही थीं और वे भीतर-ही-भीतर रो रहे थे। उनके फेफड़ों के पास एक गुब्बारा-सा फुलता जा रहा था जिससे कि उनके फेफड़े और दिल भिंचकर कम काम करने लगे थे। ‘आज तो गाम तो दूर यो अड्डा भी काले पानी सरक गया।’ किसने ने धीरे से कहा था और ड्राइवर की सुस्ती पर झुंझलाया था।

वे भीतर-ही-भीतर टूटते-बिखरते हुए चुप्प-चुप्प रोते रहे थे। अब उनकी कल्पना में अपने मां-बाप का बिलखना भी शामिल हो गया था। किसना अपने बूढ़े बाप की गोद में पोते की लाश को कैसे डालेगा?… कैसे मुंह दिखा पायेगा वह अपने मां-बाप को? इन सब बातों से वह अपने आपको अपराधी-सा महसूस करने लगा था। अब ज्यों-ज्यों अड्डा नजदीक आने लगा था।

उनका अड्डा आ गया था। किसना उसे अपने कॅंधे से लगये हुए पहले से ही सम्भलकर खड़ा हो गया था। भागो से जब खड़ा नहीं हुआ गया तो असने किसने का सहारा लिया था। बस रुकी थी तो पहले किसना उतरा था। हवा के झोंके से लाश के मुंह की चादर उड़ी तो पीछे से देख रही भागो गिरते-गिरते बची थी। बस चली तो वह बूढ़ा खिडक़ी से सिर निकालकर फिर कह गया था, ‘सेंक देना….एक अंगारू…।’

अपने पर काबू रखते हुए किसने ने लाश को सडक़ से हटाकर रख दिया था और सीधा खड़ा होते ही अब तक हाथ में पकड़ी वह शीशी उसने जोर से सडक़ पर दे मारी थी। इतनी देर में भागो दोहत्थड़े मारती हुई लाश से लिपटकर बिलख पड़ी थी। किसना चाहता था कि किसी भी तरह चुपचार घर तक पहुंचा जाये पर अब तक का रुका हुआ उसका दर्द भागो के बिलखने से और भी तेज चीख बनकर निकला था।