सहीराम – भाईचारे की अवधारणा और खाप पंचायतें

टूटते सामाजिक मूल्यों और संबंधों के इस दौर में भाईचारा एक बहुत ही पवित्र सी अवधारणा के रूप में सामने आता है। भाईचारे की यह अवधारणा वैसे तो पारिवारिक संबंधों को व्याख्यायित करने वाली अवधारणा ही है क्योंकि स्थूल रूप में भाईचारे का अर्थ होता है-जहां भाइयों जैसा आचार-व्यवहार हो। पर इसका दायरा रक्त संबंधों से बाहर तक जाता है। अपने व्यापक अर्थ में यह लोगों के रहन-सहन के समान स्तर और साझा सुख-दुख को भी समेटती है। इसकी शास्त्रीय परिभाषा में न जाकर इसके व्यापक अर्थ को हम यूं समझ सकते हैं कि एक ही स्तर का जीवन जीनेवाले और अपने सुख-दुख को साझा करनेवाले भाईचारे के इस संबंध के दायरे में आ जाते हैं जिसमें उदार नजरिए से धर्म या जाति की सीमाएं आड़े नहीं आती।

वैसुधैव कुटुंबम की हमारी प्राचीन अवधारणा, जो वास्तव में इंसानी भाईचारे की अवधारणा है, इसे अंतर्राष्टीय फलक प्रदान करती है, जहां राष्ट्र का भाईचारा सामने आता है। पर इसमें भी वही समान स्थितियां और साझा सुख-दुख मुख्य भूमिका निभाते हैं, जिनका जिक्र हमने ऊपर किया है। मसलन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब दुनिया एक नया आकार ग्रहण करने लगी तो सामराज की गुलामी का जुआ ढ़ो रहे राष्ट्र का भाईचारा सामने आया और खुद हमारे राष्ट्रीय आंदोलन और उसके नेताओं ने आगे बढक़र इस भाईचारे का प्रदर्शन किया। इसके बाद गुटनिरपेक्ष देशों का भाईचारा सामने आया, जिनमें अधिकतर वे देश शामिल थे, जो सामराजी शोषण का शिकार रहे थे। फिर दक्षिण अफ्रीका के संदर्भ में विश्व मंच पर रंगभेदविरोधी भाईचारा सामने आया। ऐसा ही भाईचारा फिलिस्तीनियों के साथ एकजुटता के रूप में भी सामने आया।

यहां यह उल्लेखनीय है कि भाईचारे की ये तमाम अभिव्यक्तियां उन्हीं राष्ट्रों तथा जनगणों के बीच सामने आयी जिनके संघर्षों का, समस्याओं का और उनके सुख-दुख स्तर काफी हद तक एक जैसा था। ये वे राष्ट्र और जनगण थे जो कभी सामराज के गुलाम रहे थे, शोषण का शिकार रहे थे और जिन्होंने इस गुलामी से, इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए एक जैसा संघर्ष किया था, कुर्बानियां दी थी और उन्हीं के आधार पर स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद अपने-अपने राष्ट्रों का निर्माण शुरू किया था। गौर करनेवाली एक बात यहां यह भी है कि सामराजी ताकतों के बीच इस तरह का भाईचारा कभी सामने नहीं आया, बल्कि हमेशा उनके स्वार्थों का टकराव ही सामने आता रहा, जिसके चलते दुनिया को दो विश्वयुद्ध और दूसरे अनेकानेक युद्ध झेलने पड़े।

विश्वीकरण के इस दौर में एक तरफ जहां समाजवादी शिविर खत्म हुआ, जिसका विश्व के शोषित-पीडि़त राष्ट्रों और जनगणों की एकजुटता को नैतिक समर्थन हासिल था और जिसके चलते अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भाईचारे में दरारें आयीं, गुटनिरपेक्ष आंदोलन कमजोर हुआ, शोषित-पीडि़त राष्ट्रों और जनगणों की एकजुटता में कमी आयी और फिलिस्तीन जैसा मुद्दा निस्तेज हुआ।

वहीं दूसरी तरफ महाद्वीपीय-उप-महाद्वीपीय या उससे भी छोटे स्तर के संगठन अस्तित्व में आए, जो मुख्यत: आर्थिक हितों की रक्षा के लिए बनाए गए। इसी दौर में कट्टïरतावादी और खासतौर से धार्मिक कट्टïरतावादी आंदोलनों ने जोर पकड़ा। जिसे आज तथाकथित इस्लामिक आतंकवाद या जिहाद कहा जाता है, वह इसी दौर की पैदाइश है। पश्चिम ने इसे सभ्यताओं के टकराव का नाम दिया।

फिर अगर हम राष्ट्रीय पैमाने पर देखें तो भाईचारे का एक रूप वर्गीय भाईचारा के रूप में देखने में आता है, जहां शोषित-पीडि़त जन एकसाथ खड़े दिखाई देते हैं। इस तरह के भाईचारे में एक जैसी समस्याओं और पीड़ाओं से जुझते हुए वे साथ आते हैं और मिलकर उनसे पार पाने, उनसे निजात पाने का रास्ता तलाशते हैं। लेकिन हमारे यहां वर्गीय भाईचारे का यह रूप काफी कमजोर रहा है। फिर भी यह कहना अनुचित नहीं होगा कि यहां भी शोषित का भाईचारा ही दिखाई देता है, शोषकों का नहीं। उनके बीच तो हमेशा स्वार्थों का टकराव ही दिखाई देता है जो अंतत: शोषितों के भाईचारे को भी प्रभावित करता है और फिर विकृत करता है।

फिर भाईचारे का एक और रूप हमारे जैसे बहुभाषायी, बहुधार्मिक, बहुजातीय देश में सांप्रदायिक सद्भाव के रूप में दिखाई देता है और जब इसको निहित स्वार्थों की नजर लगती है तो देश की टूटन सामने आती है और उसकी चीखें तथा कराहें सुनाई देने लगती हैं। ऐतिहासिक रूप से देखें तो हमारे देश में इस सांप्रदायिक भाईचारे को सबसे पहले नजर लगी ब्रिटिश सामराजियों की जिन्होंने 1857 के हमारे स्वतंत्रता संग्राम के बाद बांटो और राज करो की अपनी कुटिल नीति का खुलकर इस्तेमाल किया और जिसकी भयावह परिणति 1947 में देश के बंटवारे के रूप में सामने आयी। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से मिले इस नुस्खे का बाद में खुद हमारे शासक वर्गों और निहित स्वार्थों ने जमकर इस्तेमाल किया जिसका नतीजा देश को खालिस्तान जैसे तरह-तरह के पृथकतावादी आंदोलनों से लेकर अयोध्या जैसे धार्मिक कट्टïरतावादी आंदोलनों के रूप में और अनगिनत दंगों के रूप में भुगतना पड़ा।

मेहनतकशों के इस भाईचारे और उनकी एकजुटता को तोडऩे का काम एक तरफ धर्म और राजनीति के घालमेल ने किया, वहीं दूसरी तरफ यह काम पहचान की राजनीति ने किया। धर्म और राजनीति के घालमेल ने जहां सांप्रदायिक राजनीति को पोषा, वहीं पहचान की राजनीति ने जातिवादी ताकतों को मजबूती प्रदान की। वामपंथ के कमजोर रहने के कारण इन ताकतों को खुलकर खेलने का मौका ही मिल गया। इस तरह एक आदर्श राष्टï्र और आदर्श समाज के लिए भाईचारे-वर्गीय और सांप्रदायिक दोनों ही तरह के भाईचारे के जिस दायरे को उत्तरोत्तर व्यापक होते जाना चाहिए था, इस दौर में आकर उल्टे वह सिकुडऩे लगा। वर्गीय भाईचारा जहां जाति की राजनीति की भेंट चढ़ गया, वही सांप्रदायिक भाईचारा धर्म की राजनीति का शिकार हो गया। यहां यह उल्लेखनीय है कि धर्म की राजनीति करनेवाले बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों ही इसे राजनीति के साथ गड्डïमड्डï करके चलते हैं और अंतत: पृथकतावादी रास्ता ही अख्तियार करते हैं।

लेकिन जैसे धर्म की राजनीति किसी एकता का आधार नहीं हो सकती, वैसे ही जाति की राजनीति भी कोई एकता कायम नहीं सकती। यही वजह है कि मंडल आंदोलन के समय पिछड़ों की जो एकता दिखाई दे रही थी, वह अब विभाजित होकर अतिपिछड़ों के एक नए समूह के रूप में सामने आयी है, जैसा कि बिहार के हाल के चुनाव में देखने में आया है।

पहचान की राजनीति के इस दौर में अपनी अलग पहचान की ललक कितनी बढ़ गयी इसका अंदाजा इसी लगाया जा सकता है कि इधर लगभग हर जाति के महासम्मेलन होने लगे हैं। जातियों की महासभाएं नए सिरे से सवंरने लगी हैं और चुनावों के समय खुलेआम अपनी जाति के नुमाइंदों का नागरिक अभिनंदन किया जाता है, भले ही वे अलग-अलग पार्टियों से चुनाव जीत कर आए हों। आरक्षण की मांग को लेकर जिन जातियों के इधर नए आंदोलन उठे हैं, वे भी जायज हक की लड़ाई से ज्यादा इसी ललक की उपज दिखाई देते हैं जैसे जाटों और मराठों जैसे प्रभुत्वशाली जातिगत समूहों द्वारा उठायी गयी आरक्षण की मांग। इन जातिगत लामबंदियों में भाईचारे का एक और रूप सामने आता है जो गुर्जरों के आरक्षण आंदोलन में देखने में आया जब राजस्थान के गुर्जरों के आंदोलन के समर्थन में हरियाणा, दिल्ली और उत्तरप्रदेश के गुर्जर मैदान में उतर पड़े जबकि उन्हें उस आरक्षण का लाभ नहीं मिलना। लेकिन यह पहचान की राजनीति का हिस्सा है। जबकि व्यापक जनता के भाईचारे की टूट इस रूप में सामने आयी कि गुर्जर और मीणा एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए।

इस माने में यह ऐसा दौर है जब निहित स्वार्थ जनता के आपसी भाईचारे में दरारें पैदा कर अपनी स्वार्थसिद्घि में लगे हैं। विश्व स्तर पर यह काम साम्राज्यवाद करता है जब वह शोषित-पीडि़त जनगणों के भाईचारे को तोडक़र अपने हितों और स्वार्थों को आगे बढ़ाता है, वहीं राष्टï्रीय स्तर पर यही काम शासक वर्ग की पार्टियां करती हैं। और आर्थिक संकट और उससे पैदा होनेवाला सामाजिक संकट ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों जनता के भाईचारे की यह टूटन ज्यादा विकराल रूप में सामने आने लगती है, जब एक तरफ धर्म के नाम पर जनता के व्यापक तबकों को सांप्रदायिक विद्वेष की आग में झौंक दिया जाता है और दूसरी तरफ जाति के नाम पर इन्हीं तबकों को एक-दूजे के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है।

आज हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के क्षेत्रों में खाप पंचायतों के सिलसिले में जिस भाईचारे की दुहाई सामने आती है, यह वह भाईचारा नहीं है जो समाज के बड़े हिस्सों के बीच सुख-दुख के समान स्तरों और उन्हें साझा करने से पैदा होता है, जो आपस में जोड़ता है, तोड़ता नहीं और जिसमें उदारता होती है, स्वार्थहीनता होती है, रचनात्मकता और सकारात्मकता होती है। दूसरे के काम आने में सुख का अहसास होता है। भाईचारे की यह दुहाई बड़े सरोकारों के पीछे छूटने, सिकुडऩे और स्वार्थों की होड़ में टूटते सामाजिक संबंधों तथा मूल्यों से निकली है जिसमें सोच का पिछड़ापन और कट्टïरता है, नकारात्मकता है और बहुत ही छोटे स्तर पर अपने स्वार्थों को आगे बढ़ाने की अंधी होड़ है।

इस समय से अगर थोड़ा ही पीछे लौटकर देखें, जब सरोकार थोड़े बड़े थे तो इन्हीं क्षेत्रों में कोई तीनेक दशक पहले व्यापक किसान आंदोलन उठे थे। उससे जरा सा और पहले जातिगत पंचायतें भी अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए समाज सुधार के झूठे-सच्चे प्रयास कर रही थी जिनमें दहेजविरोध और खर्चीली शादी-ब्याह का विरोध आदि शामिल था।

तब खाप पंचायतें भी कुछ सक्रिय थी और यह मान लेने में किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि वे सक्रिय रही होंगी। क्योंकि वास्तव में तो यह कहा जा रहा है उनका इतिहास बड़ा प्राचीन है और उन्होंने विदेशी आक्रांताओं तक से लौहा लिया है। मध्यकाल में हो सकता है उनकी कोई भूमिका रही हो क्योंकि उस समय जनलामबंदी का और कोई दूसरा रूप था ही नहीं। पर आज जब उनके इस इतिहास की याद दिलायी जाती है तो इसके पीछे एक कोशिश तो उनके लिए वैधता और मान्यता हासिल करने की ही होती है, जो इन्हें हासिल नहीं है। और दूसरी कोशिश उन्हें प्राचीनता के ग्लैमर में पेश करने की होती है, ताकि एक आकर्षण पैदा हो जैसे कि इथनिक चीजों के प्रति होता है और मीडिया इसे ग्लैमरस बनाने में जाने-अनजाने मदद भी करता है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि खाप पंचायतों ने अतीत में अगर कोई रचनात्मक तथा सकारात्मक भूमिका अदा की है, तो आज भी उनका वही रूप कायम होगा। बहरहाल, दो-तीन दशक पहले के जिस वक्त की हम बात कर रहे हैं अगर उस समय खाप पंचायतें सक्रिय थी तो कमोबेश वे भी समाज सुधार की वैसी ही भूमिका अदा कर रही थी,जैसी कि अन्य जातिगत पंचायतें कर रही थी।

लेकिन जिस तरह विश्वीकरण के इस दौर में एक तरफ उदारीकरण की सरकारी नीतियों के चलते और दूसरी तरफ धार्मिक कट्टïरता बढऩे से पैदा हुयी सांप्रदायिकता तथा पहचान की आकुलता से पैदा हुयी जातिगत राजनीति के चलते वह किसान आंदोलन बिखर गया और उसके सरोकार बिसर गए, वैसे ही इन जातिगत तथा खाप पंचायतों के समाज सुधार के सरोकार भी बिसर गए और उनकी जगह धीरे-धीरे कट्टरता ने ली। हालांकि वे पहले भी बहुत उदार नहीं थी। पर आज खाप पंचायतों को इससे कोई सरोकार नहीं है कि उनके समाज में लड़कियों की संख्या कम हो रही है। कन्या भ्रूण हत्या हो रही है। आज दहेज हत्यारों और बलात्कारियों को सजा देने के लिए कोई खाप पंचायत नहीं बैठती। आज खाप पंचायतें चोरी-चकारी, लूटपाट या डकैती करनेवालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती। रिश्वतखोरों या भ्रष्टाचारियों से उनका कोई विरोध नहीं है। बल्कि ज्यादातर तो वे सम्मान ही पाते हैं।

खाप पंचायतों का सरोकार अब धीरे-धीरे सिकुडक़र अपनी मर्जी से शादी करनेवाले युवक-युवतियों के खिलाफ फतवे जारी करना या उन्हें सजा दिलाना भर रह गया है। इसके लिए सबसे ज्यादा दुहाई आपसी भाईचारे और नैतिकता की दी जाती है। जहां तक नैतिकता का सवाल है तो यह वह समाज है जहां देवर-भाभी या जीजा-साली के दैहिक संबंधों को सामान्य मानकर चला जाता है। जिनकी गवाही इस सिलसिले में चलनेवाली गालियों या मजाकों से मिलती है।

यह वही समाज है जहां आदर्श तो हैं भाभी के रूप में सीता और देवर के रूप में लक्ष्मण, लेकिन वास्तव में जहां बड़े भाई की मौत के बाद उसकी पत्नी को छोटे भाई की चादर ओढ़ा दी जाती है और किसी को कोई नैतिक कष्टï नहीं होता। यह वही समाज है जहां शादियां न होने पर औरतें खरीद कर लायी जाती हैं और किसी को कोई एतराज नहीं होता।

यह हर कोई जानता है कि किसी भी गांव का माहौल आदर्श और पवित्र नहीं होता। वहां प्रेम संबंध भी बनते हैं। विवाहित स्त्री-पुरूषों में बनते हैं तो कुंवारे लडक़े-लड़कियों में भी बनते हैं। अवैध भी बनते हैं, छल के भी बनते हैं और निश्छल भी। पहले भी बनते थे और आज भी बनते हैं। लेकिन एक फर्क है। पहले इन संबंधों को तरह-तरह के आवरणों में छुपाया जाता था, जो अनैतिक था। बल्कि प्रभुत्वशाली विचार के दबाव में वे खुद भी इन संबंधों को अनैतिक ही मानते थे। आज शिक्षा के प्रसार, साथ-साथ लिखने-पढऩे, साथ आने-जाने, मिलने-जुलने, दुनिया देखने और चेतना का स्तर बढऩे के बाद ये लडक़े-लड़कियां अपने प्रेम संबंधों को छुपाते नहीं। बल्कि उसी रूप में स्वीकार करते हैं, जिस रूप में वे बने हैं और आपस में शादी करके उन्हें समाज से भी उसी रूप में मनवाना चाहते हैं। इस माने में वे बेहद सच्चे और नैतिक हैं और साहसी भी।

नैतिकता के बाद बात आती है भाईचारे की। आमतौर पर दलील यह दी जाती है कि गांव का आपस में भाईचारा होता है। लेकिन यह भाईचारा इस रूप में नहीं कि एक-दूसरे का सुख-दुख बांटें। मुसीबत में एक-दूसरे के काम आएं। अगर कोई सरकार की ज्यादती का शिकार हो रहा है तो उसके पक्ष में खड़े हो जाएं और कोई साहूकार किसी को लूट रहा है तो मिलकर उसका विरोध करें। अगर किसी की बेटी देहज के लिए उत्पीडि़त है तो उसका साथ दें। आर्थिक तंगी के चलते किसी का बच्चा पढ़ाई जारी नहीं रख पा रहा है तो उसकी मदद करें। यह सुखियों का दुखियों के साथ भाईचारा नहीं है और सुखियों के बीच भाईचारा कभी हो नहीं सकता। दुखद स्थिति यह है कि दुखिया के बीच का भाईचारा भी विकृत हो रहा है। और सच तो यह है कि भाईचारे की इस भावना को इतना घुन लग चुका है जिस क्षेत्र की हम बात कर रहे हैं और जहां खाप पंचायतें सक्रिय हैं वहां भाई-भाई ही नहीं, पिता-पुत्र खून के प्यासे हैं। क्योंकि यहां जमीनें इतनी महंगी हो चुकी हैं कि उनके बिकने पर करोड़ों का मुआवजा मिल रहा है और उसके लिए सचमुच खून बह रहा है।

लेकिन किसी जवान लडक़े-लडक़ी के शादी कर लेने पर यह घुन लगा भाईचारा अचानक नवीकृत हो उठता है और फौरन पंचायतें बैठ जाती हैं और फतवे जारी होने लगते हैं। जाने-अनजाने मीडिया भी इसमें योगदान देता है। मसलन उसने ऐसा शादियों के लिए एक शब्द गढ़ लिया है-‘‘सगोत्रीय विवाह’’,जो इन खाप पंचायतों के लिए भारी मददगार साबित हो रहा है।

क्योंकि वास्तव में ऐसी सैकड़ों शादियों में सगोत्रीय विवाह की एक-आध मिसाल ही बमुश्किल मिलेगी। सच्चाई यह है कि न तो इस तरह की शादियां एक ही गांव के लडक़े-लड़कियों में हो रही हैं और न ही एक ही गौत्र में ये शादियां हो रही है।

इनमें ज्यादातर मामले इस तरह के हैं जैसे कि किसी गांव में एक ही जाति के दो-तीन गौत्र के लोग रह रहे हैं। आमतौर पर वहां एक प्रमुख गौत्र होता है और अक्सर गांव उसी गौत्र का कहलाता है। समस्या तब आती है कि जब कम संख्यावाले गौत्र के किसी घर में गांव के उस प्रमुख गौत्र की कोई लडक़ी बहु बनकर आ जाती है। मीडिया में इसे भी सगौत्रीय शादी कह दिया जाता है जबकि वास्तव में यह होती नहीं है। यह पूरी तरह विधिवत शादी होती है, जितने गौत्र छोडक़र शादी करने की परंपरा है, वे भी छोड़े जाते हैं और दोनों पक्षों के परिवारों की सहमति भी होती है।

विरोध होता है तो गांव में रहनेवाले प्रमुख गौत्र के लोगों का, जो अपने गौत्र की बेटी को अपने गांव की बहू के रूप में नहीं देख सकते या इस तर्क से अपने गांव के किसी लडक़े को अपने जंवाई या बहनोई के रूप में नहीं देख सकते। जबकि वास्तव में वह होता नहीं है।

फिर पड़ोस का गांव भी भाईचारे में आ जाता है। आस-पड़ोस के दो गांव के किसी युवक-युवती में प्रेम संबंध बनते हैं और वे आपस में शादी कर लेते हैं तो उसे भी भाईचारे पर कलंक मानकर ही मान्यता नहीं दी जाएगी।
फिर आता है खाप का आपसी भाईचारा। जैसे एक खाप में तीन-चार गौत्र के गांव और लोग शामिल हैं। वे आपस में अपने को भाई मानते हैं इसलिए उनकी शादियां इन गौत्रों में नहीं होंगी। अब आमतौर पर इस क्षेत्र में होता यह है कि तीन गौत्र तो पहले ही छोड़े जाते हैं, उनमें शादी नहीं हो सकती-खुद अपना, मां का और दादी का। पहले नानी का गौत्र भी छोड़ा जाता था, पर अब उसे नहीं छोड़ा जाता। नानी-कानी होने लगी है। बल्कि पश्चिम उत्तर प्रदेशवाले क्षेत्र में तो अब दादी का गौत्र भी नहीं छोड़ा जाता।

लेकिन हरियाणा के बड़े हिस्से में अभी तीन गौत्र छोडक़र शादी करने की ही परंपरा चल रही है। इन तीन गौत्रों को छोडऩे के बाद अगर कोई ऐसे गांव में रह रहा है जहां कोई और गौत्र प्रमुख है तो उसे भी छोड़ा जाएगा। इसके अलावा जिस खाप विशेष में उसका गौत्र आता है उस खाप में शामिल दूसरे गौत्रों में भी शादी नहीं हो सकती। इस तरह जोड़ लीजिए कि कितने गौत्र हो गए।

इतने गौत्रों को छोडक़र तय सामाजिक नियम-कायदों से शादी करना भी व्यवहारिक रूप से भी कितना मुश्किल है इसका सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। ऐसे में इन गौत्रों के किसी लडक़े-लडक़ी के अपनी मर्जी से शादी करना तो बहुत दूर की बात है, अगर माता-पिता की मर्जी से विधिवत शादी हो जाए तो भी पंचायत बैठ जाएगी। और ऐसा सचमुच होता रहा है।

एक जमाने में इस क्षेत्र के एक बड़े किसान नेता छोटूराम ने किसान जातियों का भाईचारा और एका कायम करने के लिए ‘‘अजगर’’ का नारा दिया था। अर्थात अ से अहीर, ज-जाट, ग से गूजर और र से राजपूत। इस भाईचारे का आधार यही माना गया था कि इनके सामाजिक हालात, रहन-सहन और दुख-दर्द एक जैसे हैं।
लेकिन खाप पंचायतों के भाईचारे के लिहाज से देखें तो राजपूतों में शादी के लिए एक खुद अपना गौत्र ही छोड़ा जाता है। बल्कि उनमें तो पहले एक परंपरा यह भी थी कि जिस गांव में लडक़ी ब्याही जा रही है, उस गांव में माता-पिता की सहमति से एक घर ऐसा चुन लिया जाता था, जिस घर की वह बेटी मान ली जाती थी और यह रिश्ता बाकायदा निभाया जाता था।

अहीरों में दो या तीन गौत्र छोडऩे की यह परंपरा है तो जरूर। लेकिन उनकी किसी खाप पंचायत के बारे में कभी न सुनने को मिला और न ही पढऩे को। वास्तव में दो या तीन गौत्र छोडक़र शादी करने की यह पंरपरा इस क्षेत्र की तकरीबन सभी जातियों में है चाहे वे सवर्ण हों, पिछड़ी हों या दलित। लेकिन जाट-गूजरों को छोडक़र बाकी किसी जाति में इस तरह के विवाद सामने नहीं आते, न पंचायतें बैठती हैं, न फतवे सुनाए जाते हैं और न अपने ही बच्चों की हत्या की जाती है। जाटों-गूजरों में इस तरह के जो विवाद सामने आते हैं इसकी वजह मुख्यत: राजनीतिक है। क्योंकि ये दोनों ही इस क्षेत्र की प्रभावशाली जातियां हैं, उनके पास पहले हरित क्रांति की उपलब्धियों मार्फत पैसा आया और अब रीयल एस्टेट के बूम से पैसा आ रहा है। इसलिए राजनीतिक आकांक्षाएं बढ़ रही हैं, जो एक तरफ इस पैसे के बल से पोषित हो रही हैं तो दूसरी तरफ सामुदायिक लामबंदियों से और बलवती हो रही हैं। जिनका बूता बड़े राजनीतिक खेल करने का है वे आरक्षण के आंदोलन चलाते हैं और जो छुटभैये हैं वे इस तरह की पंचायतों के जरिए अपनी आंकाक्षाओं की पूर्ति करना चाहते हैं। बहरहाल, यह हमारा विषय नहीं है।

हम खाप पंचायतों के भाईचारे की ही बात करें तो यह दावा किया जाता है कि खापों में उन गांवों तथा क्षेत्र की सभी जातियां शामिल होती हैं और इन्हें सर्वजातीय खाप पंचायतें ही कहा जाता है। पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है। इनमें आधी आबादी यानि महिलाओं की तो वैसे ही कोई भूमिका नहीं होती और वे इन पंचायतों से पूरी तरह बाहर होती है। फिर इनमें न दलित शामिल होते हैं, न कारीगरी पेशे से जुड़ी पिछड़ी जातियां और न ही ब्राह्मïणों और बनियों जैसी सर्वण जातियां। यहां तक कि अजगर अवधारणा की किसान जातियां भी इनमें शामिल नहीं होती और इस तरह ये खाप पंचायतें मुख्यत: एक जाति विशेष के कुछ गौत्रों के पुरूषों की ही पंचायतें बनकर रह गयी हैं। हो सकता है कभी इनका रूप सर्वजातीय रहा हो। लेकिन तब शायद सरोकार बड़े रहे होंगे। आज जब इन पंचायतों का एकमात्र सरोकार शादी-ब्याह में गौत्रों के चयन का ही रह गया है तो ऐसे में इनका यही रूप रह सकता है।

यहां इस का उल्लेख करना विषयांतर नहीं होगा कि यह समस्या मुख्यत: दिल्ली के आसपास के क्षेत्र की बनकर रह गयी है। बताया जाता है कि इसकी सीमा पश्चिम में हांसी, दक्षिण में चरखी दादरी, उत्तर में कैथल और पूर्व में दादरी है।

जाटों में यह देशवाली जाटों की ही समस्या है। बागड़ी जाटों की नहीं है। इस सिलसिले में चौटाला गांव का उदाहरण अक्सर दिया जाता है जिसका जिक्र मीडिया में भी आया है कि वहां गांव के भीतर ही शादियां हो जाती हैं। जिसकी एक वजह गांव का आकार में बड़ा होना होता है और दूसरी वजह होती कई गौत्रों का उस एक ही गांव में रहना।

बागड़ी जाट-गूजरों में जिस गौत्र में भाई की शादी होती है, उसी गौत्र में बहन की शादी भी हो सकती है। यानि साले का जो गौत्र है वह बहनोई का भी हो सकता है। कोई समस्या नहीं। फिर शादी-ब्याह में आटे-साटे की एक और परंपरा यहां चलती है। इस परंपरा को इस तरह समझा जा सकता है कि जैसे किसी गरीब परिवार के लडक़े शादी नहीं हो पा रही, तो उसकी बहन की शादी के बदले में उसकी शादी करायी जाती है। पहले बहन की उसी तरह के किसी लडक़े से करायी जाती है, जिसकी गरीबी की वजह से शादी नहीं हो रही होती। इस शादी के बदले बहन की ससुरालवाला परिवार अपने किसी रिश्तेदार की लडक़ी की शादी उसके भाई से करा देता है। यह बाकायदा तय ढ़ंग से होता है। इस माने में देशवालियों के मुकाबले बागड़ के रिवाजों में थोड़ी उदारता है।

इसी तरह जिस क्षेत्र विशेष की यह समस्या है वहां के प्रभावशाली परिवार भी सहज ही इस तरह के संकट से बचकर निकल जाते हैं। मीडिया की ही रिपोर्टों के अनुसार पश्चिम उत्तर प्रदेश में गूजरों के ऐसे अनेक प्रभावशाली परिवार हैं जिन पर लीक से हटकर शादियां करने के बावजूद खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों का कोई असर नहीं हुआ है।
इस सिलसिले में एक और बात गौरतलब है और वह यह कि इन पंचायतों को जितना बड़ा जनसमर्थन हासिल होने की बात कही जाती रही है,वह सच नहीं है। इसका खोखलापन इसी एक तथ्य से उजागर हो जाता है कि खाप पंचायतों में सक्रिय लोग पंचायतों का चुनाव भी नहीं जीत पाते हैं। बल्कि खाप पंचायतें तो कई बार संवैधानिक पंचायत निकायों के खिलाफ ही खड़ी हैं। वास्तव में उन्हें कोई वैधता हासिल नहीं है। अगर नजर डालें तो इन पंचायतों में सक्रिय लोग कौन हैं? इनमें मुख्यत: उन लोग के वारिस हैं जिन्हें भारत के संविधान और संवैधानिक निकायों के अस्तित्व में आने से पहले इन पंचायतों का मुखिया चुना गया था और उत्तराधिकार की सामंती पंरपरा के अनुसार जो अब खुद इनके मुखिया है। फिर रिटायर्ड किस्म के सरकारी कर्मचारी हैं जिनकी समाज निर्माण में कभी कोई रचनात्मक भूमिका नहीं रही। इसके बाद आते हैं निठल्ले जो अक्सर ताश खेलते हुए या गप्पें हांकते हुए अपना जीवन बिताते हैं। फिर वे ग्रामीण लंपट तत्व आते जो न विधिवत शिक्षा ग्रहण कर पाए और न ही जिन्हें कोई रोजगार हासिल है। अर्थात जो अपने लिए कोई रचनात्मक भूमिका तलाश पाए।

ऐसे में खाप पंचायतों के भाईचारे की दुहाई के खोखलेपन को सामने लाना जरूरी है। और इस खोखलेपन का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि इस दौर जब एक तरफ पुरानी मान्यताएं टूट रही हैं, शिक्षा आदि के प्रसार के चलते सामाजिक बंधनों से निकलने की कसमसाहट सामने आ रही है, परिवार छोटे हो रहे हैं तथा एक माने में उनके सामंती मूल्य पीछे छूट रहे हैं तथा बिसराए जा रहे हैं और दूसरी तरफ सामंती जमाने में जिन मूल्यों को सकारात्मक माना जाता था, उन तक में गिरावट आ रही है तब वे उन्हीं सामंती मूल्यों बरकार रखने की कोशिश कर रहे हैं, जो जब उन्हें सकारात्मक माना जाता था, तब भी सकारात्मक नहीं थे।

और इन्हीं मूल्यों को बरकरार रखने की कोशिश में ये खाप पंचायतें अपने ही बच्चों के कत्ल तक करवा रही है। प्रत्यक्ष रूप से नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से तो करवा ही रही हैं। जब खुद जाटों और गूजरों की परंपरागत शादियों में दादी और नानी के गौत्रों को विदाई दी जा रही है तथा कुछ सवर्ण जातियों में तो गौत्र के पैमाने को काफी उदार बना दिया गया है और उसे बड़े लचीले ढ़ंग से लागू किया जाता है, जैसे उदाहरणस्वरूप वर-वधु की अच्छी जोड़ी मिल रही है, दोनों पक्ष शादी के लिए राजी हैं, पर मां के गौत्र मिल रहे हैं तो वर-वधु में से किसी को चाची-ताई के गोद दिखाकर वह शादी कर दी जाती है। जब ऐसे उदार और लचीले पैमाने सामने आ रहे हैं तब खाप पंचायतें शादी के लिए छोड़े जानेवाले गौत्रों में तरह-तरह से इजाफा कर रहे हैं जो कतई व्यवहारिक नहीं है।

ये खाप पंचायतें एक ऐसी हारी हुयी लड़ाई लड़ रही हैं जिसमें उनका सामना अपनी सोच में स्पष्ट, स्त्री-पुरूष संबंधों में नैतिकता को मान देनेवाले और उन्हें सार्वजनिक रूप से स्वीकार करनेवाले साहसी युवक-युवतियों से है जो जीवन की बाजी लगाकर बढ़ती तादाद में सामने आ रहे हैं। जबकि खाप पंचायतों के पाले में खड़े हैं वे लंपट तत्व जिन्हें हत्याएं करने तक से गुरेज नहीं है और बलात्कार को तो वे अपनी मर्दानगी का तमगा ही समझते हैं। इसके लिए वे किसी रिश्ते को सम्मान नहीं देते। गांवों में बढ़ती बलात्कार की घटनाएं इसकी गवाह है जिसकी शिकार ज्यदातर कमजोर वर्ग की बच्चियां ही हो रही हैं। लेकिन वास्तव में तो वे करीब रिश्ते की लड़कियों पर भी उतनी बुरी नजर रखते हैं और मौके मिलने पर रिश्ते का कोई लिहाज नहीं करते।

खाप पंचायत किस्म का यह भाईचारा कितना विकृत हो चुका है इसका उदाहरण नोएडा की पिछले वर्ष की एक घटना है। गे्रटर नोएडा क्षेत्र में एक एम बी ए की छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और बलात्कार करनेवाले थे उसी क्षेत्र के एक गांव के लडक़े। जब पुलिस ने इन लडक़ों को पकड़ा तो पूरा गांव उनके पक्ष में खड़ा हो गया। लेकिन जिस घटना का हम जिक्र करने जा रहे हैं उससे तो खाप पंचायत किस्म के भाईचारे का खोखलापन पूरी तरह ही उजागर हो जाता है। कोई डेढ़-दो साल पहले दिल्ली के बवाना क्षेत्र में एक बाप ने अपनी बेटी का इसलिए बलात्कार करवा दिया क्योंकि उसने अपनी मर्जी से शादी की थी, जिससे परिवार की इज्जत को बट्टा लगा। और बलात्कार करनेवालों में उस लडक़ी का परिवार में ही रिश्ते का एक भाई भी था।

हरियाणा में एक कहावत है कि अपना मारेगा भी तो छाया में ही डालेगा। उर्दू में जिसे गुनाहे-अजीम कहा जाता है, उसे अंजाम देने के बाद उदारता के इस ढ़ोंग को क्या कहा जाए? जब मार ही दिया तो धूप या छाया मरनेवाले के किस काम की। लेकिन खाप पंचायतें ठीक यही कर रही हैं। मार भी रही हैं और भाईचारे की दुहाई भी दे रही हैं। विडंबना यही है।

Advertisements

दंगे में प्रशासन

विकास नारायण राय

स्वतंत्र देश में 1947 के बाद पहली बार कहीं भी खुली राजकीय शह पर अल्पसंख्यकों के  खिलाफ हिंसा का व्यापक तां  व नवम्बर 1984 के सिख दंगों में दिखाई पड़ा। तब तक ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ की हिन्दू जमीन तैयार हो चुकी थी, क्योंकि तब शह केंद्रीय सरकार की ओर से थी, लिहाजा उत्पात कई अनुकूल राज्यों में फैल सका। 1980 में पुन: प्रधानमंत्राी पद पाने के बाद इंदिरा गांधी और उनके गृहमंत्राी जैल सिंह द्वारा पंजाब की चुनावी बिसात पर अकालियों को शिकस्त देने के लिए आगे बढ़ाया मोहरा-भिंडरा वाले-भस्मासुर बनता जा रहा था। पड़ोस के आतंकवादी तनाव की परछाई हरियाणा में भी पड़ती देखी जा सकती थी। 1982 के दिल्ली के एशियाई खेलों में व्यवधान डालने के सिख उग्रवादियों के आह्वान के मुकाबले केंद्र एवं हरियाणा की कांग्रेसी सरकारों ने हरियाणा में सिखों को, सुरक्षा के नाम पर, अलग-थलग करने का सिलसिला शुरू कर दिया। यहां तक कि पाक समर्थिक सिख आतंकवादी गिराहों को स्थानीय भर्ती की पहली बड़ी खेप इस दौर के भुक्तभोगियों के बीच से ही मिली।

  Related image

          इंदिरा गांधी अकालियों के साथ ‘चित मैं जीती पट तुम हारे’ वाला खेल खेल रही थी। सिखों का गैर-अकाली तबका पारम्परिक रूप से कांग्रेस का वोट बैंक था, पर सफल चुनावी समीकरण के लिए जरूरी था कि साथ में हिन्दू वोटों का धु्रवीकरण भी उसके पक्ष में हो। अन्यथा जब भी हिन्दू वोट बंटकर भाजपा, जो अकालियों की सहयोगी पार्टी रहती आई, की झोली में पहुुंचते तो कांग्रेस पीछे रह जाती। अकालियों की नर्म साम्प्रदायिक अपील के मुकाबले भिंडरावाले की उग्र अपील को बढ़ावा देकर कांग्रेस अकालियलों को उग्रतर चोला पहनने को उकसा रही थी। संदेश साफ था कि उनसे डरे हिन्दू केंद्र सरकार यानी कांग्रेस की शरण में जाएं। अंतत: भिंडरावाले के भस्मासुर बन जाने पर उसका सफाया कर सारे देश के हिन्दुओं को कांग्र्रेस का ऋणी बनाकर भी वही मंशा सफल हुई। दरअसल साम्प्रदायिक चुनाव रणनीति का नंगा नाच था यह। सिख-राज में हिन्दुओं को अभयदान, नहीं तो हिन्दू राष्ट्र के सामने सिर उठाते सिख-उपनिचवेश को उसकी औकात दिखाना।

            गुजरात में संघ परिवार ने भी इसी चुनावी एजेंडे पर अमल किया है। जाहिर है एक साम्प्रदायिक मुखौटे का हथकंडा एक गैर साम्प्रदायिक मुखौटे के हथकंडे से कुछ अलग दिखेगा। हिन्दुत्ववादियों ने मुस्लिम इतिहास, मुस्लिम जनसंख्या, मुस्लिम आतंकवाद एवं मुस्लिम व्यवसाय के मनचाहे घालमेल से ऐसा भस्मासुर गढऩा चाहा है जो हिन्दुओं  में भय, घृणा एवं अविश्वास को व्याप्त रखे। इस भस्मासुर से हिन्दुओं को अभयदान के लिए ‘हिन्दू राष्ट्र’ द्वारा मुस्लिम उपनिवेश को, गुजरात शैली में, समय-समय पर उसकी औकात दिखाई जा सकेगी।

Related image

            एक पुलिस अधिकारी के रूप में साम्प्रदायिक घटनाओं से मेरा पहला परिचय 1983 में हुआ। इस सच के साथ कि ऐसी झड़पों में निहित स्वार्थ ही टकराते हैं, जिन्हें प्रशासनिक तत्परता से निष्क्रिय किया जा सकता है।

            फरीदाबाद के धौज नामक एक मेव (मुस्लिम) बहुत गांव में गौ-कशी की शिकायत पर पुलिस ने छापा मारा। मेव राजनीति में एक प्रभावी परिवरा से संबंध रखने वाले चंद आरोपियों ने प्रतिरोध किया पर अंतत: पकड़े गयों से पूछताछ में सामने आया कि बेहद सस्ता होने के कारण गौ-मांस बहुत से हिन्दू भी खरीदते थे और कि मेवात में गौ-कशी का मुख्य व्यापार मांस के लिए नहीं, बल्कि चमड़े के लिए होता है, जिसे मुख्यत: हिन्दू व्यापारी चलाते हैं। यह भी खुली जानकारी जैसा है कि मेवात में पशु अधिकतर पड़ोसी राजस्थान से लाए जाते हैं तथा बिक्री/खरीद/परिवहन के इस व्यापार में भी हिन्दू व मुस्लिम दोनों समुदायों के व्यापारी शामिल हैं। मेवात में गौ-कशी रंगे हाथ पकडऩा तभी आसान हो पाता है जब  कोई जानकार मुखबिर छापा मारने वाले दल को अचानक मौके पर ला सके। घौज में भी एक मुस्लिम मुखबिर था पर जिस पक्ष के लोग पकड़े गए थे, उन्होंने प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए गांव के हिन्दुओं पर उंगली उठाकर मामले को साम्प्रदायिक रंग देना चाहा। इस पक्ष ने दिल्ली से जामा मस्जिद के इमाम बुखारी को बुला भेजा। इस बीच गांव का दूसरा पक्ष भी (मेव ही) सक्रिय हो गया था। जब बुखारी गांव के बाहर पहुंचा तो एक पक्ष उसके स्वागत में और दूसरा गालियां निकालने को तैयार था। पुलिस के बीच में पडऩे से वे सभी गांव के चौपाल में जाकर बुखारी को सुनने को राजी हो गए। बुखारी से पहले गांव के दोनों पक्षों के लोग बोले। दोनों में फर्क इतना ही था कि पुलिस की धरपकड़ की चपेट में आया पक्ष बुखारी के सामने पुलिलस की ज्यादतियों से बचाए जाने की मांग भी रख रहा था, जबकि उनके विपक्षी इस बात को रेखांकित करना नहीं भूल रहे थे कि ‘किसी’ को बाहर से आकर गांव के हिन्दू-मुसलमानों में झगड़ा नहीं खड़ा करने  दिया जाएगा, अन्यथादोनों ही पक्ष यह बताना नहीं भूले कि उनका गांव भगवान कृष्ण के गोत्रा वंशियों का गांव है और देश विभाजन के समय गांधी जी के कहने से ही मेवों ने पाकिस्तान न जानेू का फैसला लिया था।

            बुखारी की बारी आई तो वह लगभग बगलें झांकता हुआ खड़ा हुआ। वह बमुश्किल पांच मिनट बोला, जिसका लब्बोलुबाल था कि जब कोई खास मसला ही नहीं है तो उसे बुलाया ही क्यों गया। जाते  हुए वह अपने बुलाने वालों पर भुनभुनाता गया। यहां तक  कि जब उनमें से किसी एक ने उसे थोड़ी देर के लिए अपने घर में आने की दावत दी तो उसने वह भी स्वीकार नहीं की।

            धौज से बीस किलोमीटर पर फरीदाबाद शहर के वल्लभगढ़ क्षेत्रा के मुख्य बाजार की सड़क पर एक छोटी-सी मस्जिद थी। वहां आसपास के हिन्दू दुकानदारों की नीयत मस्जिद के इर्द-गिर्द की जमीन पर पसरने की रही थी, जिसका मस्जिद का इमाम विरोध करता था। धौज में तनाव का लाभ उठाकर इन दुकानदारों ने कट्टरपंथियों से मिलकर गौ-हत्या के नाम पर वल्लभगढ़ बंद का आह्वान दे डाला। कहीं कोई तनाव नहीं था पर सौ-पचास भाड़े के लुच्चों ने अचानक मस्जिद से दोपहर की नमाज पढ़कर निकलते मुसलमानों को पीटना शुरू कर दिया और मस्जिद में आग लगाने की कोशिश की। पांच मिनट में थाने से पहुंचे अतिरिक्त पुलिस बल की दो मिनट की लाठी-कार्यवाही ने उन बदमाशों का जोश ठंडा कर दिया।

            1983 में केंद्र में एवं हरियाणा में भी कांग्रेसी सरकारें थीं। हरियाणा में तो चुनावी नजरिए से मुसलमान महत्वहीन समूह होता है पर देश के पैमाने पर वह तब कांग्र्रेसी वोट बैंक का महत्वपूर्ण हिस्सा गिना जाता था। लिहाजा राजधानी के नजदीक उस जरा से तनाव की खबर ने भी सत्ताधारियों की त्योरियां चढ़ा दी। यहां  तक  कि कुछ समय तक स्थिति पर लगातार जिला प्रशासन ने रपटें मांगी जाती रहीं।

            1984 में मैं करनाल पहुंच गया। करनाल जिला भौगोलिक रूप से ही पंजाब के करीब नहीं है, वहां सिखों एवं हिन्दुओं की भी खासी आबादी है। तब पानीपत, जो अब अलग जिला है, करनाल का ही हिस्सा था। दरअसल पानीपत शहर हर लिहाज से करनाल शहर से बड़ा था-जनसंख्या, अपराध एवं औद्योगिक गतिविधियों में तो निश्चय ही। पंजाब में चल रहे आतंक के दौर का तनाव सारे जिले में देखा जा सकता था। करनाल शहर के पुराने हिस्से में कई सालों से आपस में सटे एक गुरुद्वारे एवं एक मंदिर की होड़ चलायी जा रही थी। पुराना हिस्सा संकरी गलियों वाले रिहायशी इलाकों एवं तंग बाजारों से भरा था। वहीं कुछ अंदर एक छोटे से गुरुद्वारे से लगी एक दुकान को मंदिर में बदलने से होड़ शुरू हुई। गुरुद्वारे और मंदिर की ऊंचाई बढ़ाते-बढ़ाते कई-कई मंजिलों तक पहुंचाई जा चुकी थी। हर त्यौहार पर बढ़-चढ़कर प्रदर्शन से तनाव पैदा हो जाता था। ज्यों-ज्यों ये स्थल लोगों के बीच चर्चा का केंद्र होते गए, आसपास के व्यवसायिक हितों की दिलचस्पी इस प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने में होती गई। हर आयोजन पर पुलिस की उपस्थिति भी अनिवार्यत: बढ़ती गई और जैसा कि होता है शांति रखने के नाम पर प्रशासन की बातचीत करने का सिलसिला भी बढ़ता गया। ऐसी प्रशासनिक कवायदों से वास्तव में जो हासिल होता रहा वह इस प्रकार है–साम्प्रदायिक तत्वों को एक सीमा तक तनाव पैदा करने एवं छिटपुट वारदातों की छूट, तमाम सामुदायिक मामलों में उनके दखल की घोषित स्थापना, व्यवसायिक निहित स्वार्थों को प्रोत्साहहन कि वे साम्प्रदायिक रास्तों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

            याद रखिए समाज में साम्प्रदायिक स्वार्थों को वैधानिकता/स्वीकार्यता चरण दर चरण मिलती है न कि अचानक किसी मोदी के सत्तासीन हो जाने से। कोई भिंडरावाला आसमान से नहीं टपकता।

            करनाली 1982 में ही इंदिरा गांधी के आगामी सिख भस्मासुरी प्रयोगों की एक झलक पा भी चुका था। एशियाई खेलों के दौरान विरोध दर्ज कराने के लिए सैंकड़ों की संख्या में पंजाब से ट्रकों, बसों, ट्रैक्टर-ट्रालियों में दिल्ली के लिए चले सिखों को करनाल शहर से दस किलोमीटर दिल्ली की तरफ मुख्य राजमार्ग पर मधुबन (मुख्यालय, हरियाणा सशस्त्रा पुलिस) पर घेरा जा सका। वहां घंटों की कशमकश एवं बाद में लाठी/गोली के प्रयोग के बाद भीड़ तितर-बितर हुई। बहुतों को चोटें आई, पचासों गिरफ्तार हुए और शेष तामझाम को पंजाब  के रास्ते पर वापिस धकेल दिया गया। उस दौरान पंजाब से लगती सारी हरियाणा सीमा पर, उत्तर में अम्बाला से पश्चिम में सिरसा तक, पुलिस द्वारा पंजाब की नाकेबंदी की हुई थी। पंजाब में छुट्टा छोड़े भिंडरावाले गिरोह के उत्तेजनापूर्ण बयानों की पृष्ठभूमि में ऐसी सरकारी कवायदें आशंकित हिन्दुओं को ‘आश्वस्त’ करने के लिए होती थीं? अन्यथा इसके भी काफी बाद, तब कांग्र्रेस में महासाचिव, राजीव गांधी ने चंडीगढ़ में भिंडरावाले को संत बताया।

            उत्तरोत्तर यह स्पष्ट होता जा रहा था कि बतौर एक मुखौटा पंजाब में भिंडरावाले की उपयोगिता पाक सत्ताधारियों द्वारा समर्थित उग्रवादी गिरोहों के लिए ज्यादा थी, न कि अकालियों से चुनावी लड़ाई में इंदिरा कांग्रेस के लिए। पर पंजाब से बाहर उग्रवाद का होवा कांग्र्रेस के पक्ष में जा रहा था। अगले आम चुनाव 1985 में होने थे, उससे पहले कभी भी इस मुखौटे को धराशायी कर व्यापक जन समर्थन की आशा की जा सकती थी। इस बीच, चोट से पहले, लोहे को ओर गर्म होने दिया जा सकता था।

            जून 1984 में स्वर्ण मंदिर में भिंडरा-गिरोह पर सरकारी चढ़ाई से पहले, हरियाणा में उबाल वाली स्थिति पहुंच चुकी थी। उत्तर भारत में पहला जानलेवा सिख विरोधी उत्पात 19 फरवरी 1984 को पानीपत में हुआ, जिसमें राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थिति एक गुरुद्वारा जलाकर आठ व्यक्तियों  को जान से मार दिया गया। सरकारी रणनीति रही थी कि हिन्दुओं को सिख उग्रवाद से डराओ और फिर उससे सुरक्षा या  उसके सफाए के नाम पर वोट बटोरो। पंजाब में, उग्रवादियों द्वारा हजार उकसाने के बाद भी, सामुदायिक सामंजस् ऐसा था कि एक भी हिन्दू विरोधी दंगा नहीं हो सका था। पर यदि हरियाणा या अन्य जगहों पर सिख विरोधी दंगे चल पड़ते तो पंजाब में उग्रवाद का जनाधार व्यापक होना सुनिश्चित था। दूसरे सिख दंगों को रोकने में होने वाला सरकारी बल प्रयोग कांग्रेस के पक्ष में हिन्दू वोटों के धु्रवीकरण की राह में बाधा बनता। पानीपत के उत्पात से इंदिरा सरकार के चौकन्ना होने का आलम यह था कि 19 फरवरी ‘84 की शाम ही केंद्रीय ग्रह मंत्राी ने वहां का दौरा किया। उसके बाद भिंडरावाले के सफाए को उसका अकाल तख्त में होना भी नहीं रोक सका।

            19 फरवरी ‘84 की दहलीज पर हरियाणा में हिन्दू-सिख तनाव के अगुवा भाजपाई नहीं कांग्रेसी पृष्ठभूमि के लोग थे। पंजाब में पारम्परिक हित में अकाली व भाजपाई मिलकर कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लड़ते थे। देश के इस भाग में विभाजन के अनुभवों से घनीभूत कट्टर भाजपाई संस्कारों में एक यह भी है कि सिख भी हिन्दू राष्ट्र का अभिन्न हिस्सा होता है। हरियाणा में भी बढ़ती उग्रवादी वारदातों को लेकर भाजपाई स्वाभाविक असमंजस में थे। पर कांग्रेस में कोई असमंजस नहीं था। करनाल में भी कांग्रेसी सेवा दली से जुड़े लोग तनाव के मुख्य किरदार बने हुए थे। पर जहां व्यवसायिक हितों का दखल आ जाता, कांग्रेसी या भाजपाई एक जैसे हो जाते। उस दौरान प्राय: यह घटनाक्रम देखने को मिलता: उग्रवादियों द्वारा कहीं कोई सनसनीखेज वारदात होती (जिसमें ज्यादा लोग मारे गए हों या या किसी नामी हस्ती पर आक्रमण हुआ हो) अखबारों में भड़काऊ तस्वीरें एवं बयान छपते, मुख्य किरदारों द्वारा बंद/प्रदर्शनप की पुकार दी जाती, भाड़े के लुच्चावें पर इक्का-दुक्का सिखों को अपमानित करने/पीटने का सिलसिला चलाया जाता, किसी सिख की दुकान या अलग-थलग गुरुद्वारा पथराव-आगजनी का निशाना बनता, अफववाहों की हवा पर अलग-थलग गुरुद्वारा पथराव-आगजनी का निशाना बनता, अफवाहों की हवा पर तैरता तनाव शहर में एक छोर से दूसरे छोर तक डोलता रहा। यहां तक कि जबरदस्ती बंद की गई दुकानें, उत्तेजित तमाशाबीन और मुख्य किरदारों की आड़ में सक्रिय लुच्चों का समूह ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ के किरदार में नजर आने लगते।

            तो भी तब के हरियाणा में संवेदनशील जगहों पर प्रशासन को एक संतुलित शक्ल देने की कोशिश की जाती थी। मसलन करनाल में पुलिस के मुखिया (एसपी) एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनका तनाव के प्रमुख हिन्दू किरदारों से सौहार्दपूर्ण रिश्ता जगजाहिर था। मुझे ऐसों के प्रति सख्त रवैये वाला अधिकारी माना जाता था। उपद्रवियों से निपटने में प्राय: एसपी के विमर्श से अधिक कठोर कार्यवाही करने पर भी ऊपर से मेरी रोकटोक नहीं होती थी। सरकार ने वहां एक नर्म छवि के सिख सज्जन को बतौर उपायुक्त लगाया हुआ था, जिससे आम सिखों में सुरक्षा को लेकर ढांढस रहे। पर इस तस्वीर से सिर्फ अस्पष्ट संकेत ही लोगों तक पहुंच सकते थे।

            उस दौर में स्थानीय प्रशासन को जैसे स्पष्ट दिशा-निर्देशों की जरूरत थी, वह कांग्रेसी सरकारों  की परम्परा में शायद ही कभी शामिल रहा हो। तभी देश में कांग्रेस के लंबे शासन में तमाम राज्यों में जब-जब साम्प्रदायिक उत्पातों  का सिलसिला भी चलता ही रहा है। ऐसी स्थिति में यह स्थानीय प्रशासन की सुविधा पर निर्भर होता है कि वह निहित स्वार्थों के बीच क्या भूमिका कहां तक निभा पाता है। तो भी तब चुनावी/व्यवसायिक संदर्भों में कांग्रेसी सरकारें साम्प्रदायिकता की प्रशासनिक कवायदों को वैसे आतंकवादी आयाम नहीं दे पाती थीं, जैसे अब गुजरात में भाजपाई सरकार के लिए संभव हुए हैं। दोनों दलों में यही मूलभूत भिन्नता बनी रही है। श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या पर  सिख-संहार के आयोजन व्यापक कांग्र्रेसी राजनीति का नहीं, कांग्रेस में छाते नौसिखिया एवं लुच्चा  प्रभाव का परिचायक थे, अन्यथा कट्टर आतंकवाद की पृष्ठभूमि में हुई उस हत्या ने चयुनावों में कांग्रेस की अभूतपूर्व सफलता वैसे ही निश्चित कर रखी थी।

            करनाल शहर में तनाव के पैटर्न को समझने में हमें ज्यादा दिन नहीं लगे और न उससे निपटने के तरीके बनने में। सारी दुनिया में जेहा दी आयोजनों के कार्यकत्र्ता आर्थिक रूप से पिछड़े तबकों से मिलते हैं। करनाल में भी बंद की पूर्व संध्या पर ऐसी बस्तियों के चुनिंदा ठिकानों पर चुपचाप रुपया और शराब पहुंचा कर अगली सुबह की भड़काऊ कार्यवाही सुनिश्चित की जाती थी। हमने भ शाम से ही अगले दिन तनाव की समाप्ति तक ऐसे संभावित ठिकानों के आसपास पुलिस की तेजतर्रार उपस्थिति रखनी शुरू कर दी। इससे भाड़े के कार्यकर्ताओं की गतिविधियों पर खासी लगाम लग जाती। उपद्रवियों की अगली कतार जिससे हमें  निपटना था, मध्यवर्गीय साम्प्रदायिक स्वयंसेवकों की होती, जिनमें बहुतायत व्यवसाई तबके की रहती। ये पुराने शहर की संकरी गलियों से झुंड बनाकर बाहर निकलते और आसपास की मंडियों व बाजारों में पसर कर जबरदस्ती दुकानें बंद कराते तथा चुनिंदा सिख दुकानों व प्रतिष्ठानों को तोड़-फोड़/आगजनी का निशाना बनाते। जब तक एक जगह उनके सक्रिय होने की खबर आती तो वे पुलिस के पहुंचने तक कहीं ओर निकल गए होते। पुलिस को देखकर तितर-बितर हो जाना और थोड़ी ही देर में पुन: झुंड बना लेना भी उनकी तरकीब में होता। जवाब में  तनाव के दिन हमपने पुराने शहर से निकलने वाली गलियों को काफी पहले यानी आधी रात के बाद से ही उनके मुहाने पर पुलिस लगाकर नियंत्रित करना शुरू कर दिया। इन मुहानों पर अक्सर पुलिस पर अंदर से जमकर पथराव होता। कई बार उत्पादियों के समूह हमारे लाठीचार्ज का भी डटकर मुकाबला करते। मेरा सिद्धांत था कि उत्पातियों की मंशा प्रकट होते ही प्रभावी लाठीचार्ज हो जो औरों के लिए भी सबक बने। यह फलदायक होते हुए भी हमेशा लागू नहीं हो पाता था। पर हर जगह मैंने कनिष्ठ पुलिसकर्मियों को अपने वरिष्ठों का आसानी से अनुसरण करते पाया। यानी यदि नेतृत्व सही रहता तो कार्यवाही भी ठीक होती थी, अन्यथा उत्पाती कुछ न कुछ कर जाते।

            यदि पुलिस की कार्यवाही भारी पडऩे लगती, तो  उत्पातियों की ढाल बनकर उनकी अग्रिम पंक्ति के नता निकलने लगते। इनमें शहर के रसूख वचाले लोग होते–मुख्यमंत्राी या मंत्रियों के आगमन पर उनके इर्द-गिर्द डोलने वाले, व्यापारिक संगठनों में शामिल लोग, अधिकारियों के साथ शांति कमेटियों में हिस्सा लेने वाले और रोजमर्रा के प्रशासनिक कामों में दखल रखने की हैसियत  के मालिक। ये लोग प्रशासन पर ज्यादती का आरोप लगाते हुए मौके के पुलिस वालों पर चीखते-चिल्लाते, ड्यूटी पर प्रशासनिक अधिकारियों से बहस में उलझते और चंडीगढ़/दिल्ली फोन घुमाना शुरू कर देते। पुलिस अधीक्षक एवं उपायुकत तक पहुंचना उनके बेहद सरल होता। उनकी भागदौड़  के परिणामस्वरूप ‘ऊपर’ से सलाह आने लगती कि स्थिति को ‘टैक्ट’ से निपटा जाए। दोपहर ढलना शुरू होते-होते शहर में तनाव भी ढलना शुरू हो जाता और सारा ध्यान उन थानों/चौकियों पर केंद्रित हो जाता, जिनमें उपद्रव के दौरान पकड़े गए लोग रखे गए होते। उत्पाती नेताओं और जिला अधिकारियों के प्राय: शाम तक ‘बीती ताहि बिसार दे’ की मुद्रा में पहुुुुंचने पर अधिकांश को छोड़ दिया जाता।

            उस माहौल के तनाव में यह आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा कि सिख प्रतिनिधियों के लिए उपायुक्त से और हिन्दू नेतागण का पुलिस अधीक्षक से मिनटों में सम्पर्क बन जाता था। प्रशासनिक लिहाज से  किसीी विस्फोटक स्थिति में बीच-बचाव के लिए यह समीकरण फायदेमंद रहता, पर स्पष्ट था कि सरकारी दिशाहीनता से निकला प्रशासनिक दिशाहीनता का रास्ता जनता को भटका रहा था। एक स्वस्थ समाज में जिन लोगों की औकात दो टके की होनी चाहिए थी वे उस तनाव भरे माहौल में सामुदायिक राजनीति पर छाए जा रहे थे।

            19 फरवरी 1984 की घटना को बचाया जा सकता था। पर यह शायद कुछ ऐसा ही तर्क कि स्वर्ण मंदिर के विध्वंस से बचा जा सकता था या पंजाब त्रासदी की जरूरत ही नहीं थी। 19 फरवरी को एक बंद का आह्वान किया गया था। करनाल शहर की जिम्मेदारी मेरी थी। राज्य गुप्तचर विभाग की खबर थी कि बड़े पैमाने पर हिंसा हो सकती है, विशेषकर पानीपत शहर में जहां दो लफंगे सिरफिरों ने ‘हरियाणा देशम’ नाम की पार्टी के गठन का इसी अवसर पर ऐलान कर दिया था। उनकी आड़ में हिन्दू साम्प्रदायिक स्वार्थों ने उस अवसर पर हिंसा फैलाने में अपनी ताकत झोंक दी थी। उस दिन वहां के उपपुलिस अधीक्षक (डिप्टी एसपी) तथा उपमंडल मैजिस्ट्रेट (एसडीएम) पूरी तरह नकारा सिद्ध हुए। दो दिन पहले से ही ऊपर से बार-बार उनसे दोनों लफंगों को गिरफ्तार करने को कहा जा रहा था। जहां तक  मुझे याद पड़ता है एक शाम पहले खुद मुख्यमंत्राी ने भी करनाल एसपी को इस बाबत फोन पर कहा, पर वे दोनों पानीपत पलिस द्वारा काबू नहीं किए जा सके।

            सुबह से ही करनाल शहर में भी माहौल गर्म होने लगा। हमने संवेदनशील बस्तियों की नाकेबंदी और पुराने शहर की गलियों की घेराबंदी में ढील नहीं आने दी। कई जगह पथराव इत्यादि के बीच लाठीचार्ज किया गया और दस-साढ़े दस तक तनाव ठंडा पडऩे लगा। रात का निकला मैं घर में घुसा ही था कि पुलिस वायरलेस पर खबर आने लगी कि पानीपत में स्थिति बिगड़ रही है और भारी भीड़ ने राष्ट्रीय राजमार्ग पर गुरुद्वारे को घेर रखा है। वहां से अतिरिक्त पुलिस बल मांगा जा रहा था। कुछ ही समय में पुलिस अधीक्षक ने मुझे दो प्लाटून (करीब 40 पुलिस कर्मी) के साथ पानीपत जाने को कहा। 35 किलोमीटर की दूरी तय कर जब मैं वहां पहुंचा तो हजारों की भीड़ से सारा मार्ग अवरुद्ध था। गुरुद्वारे के दोनों ओर राजमार्ग पर आधा-आधा किलोमीटर तक लोग ही लोग थे। पर थे वे तमाशबीन ही, क्योंकि मेरी जीप और पीछे आ रही दोनों बसों को गुरुद्वारे के पास तक पहुंचने का रास्ता मिलता गया। आसपास की गलियों में भी लोग जमा थे और जहां नजर जाती लोग छतों को भी भरे हुए थे। गुरुद्वारे का मुख्य द्वार बगल की गली में था। वहां और गुरुद्वारे के सामने राजमार्ग पर पचासों पुलिस वाले हताश से बिखरे खड़े थे।

            सक्रिय उत्पातियों की संख्या पांच सौ से ज्यादा नहीं रही होगी और वे बिखर कर गुरुद्वारे की ओर बीच-बीच में पत्थर मार रहे थे–बहुतों के हाथ में लाठियां भी थीं। पुलिस ने बस किसी तरह उन्हें गुरुद्वारे में घुसने से रोका हुआ था। हमने पहइुंचते ही मुख्य द्वार वाली गली  में हल्ला बोला और वहां से उत्पातियों को खदेड़ दिया, पर वे घूम कर अन्य तरफ पहुंच गए और प्रतिक्रिया में पत्थर वर्षा तेज हो गई, आसपास की कुछ छतों से भी। तमाशबीनों के भी दो हिस्से थे–करीबतर छोटा हिस्सा उत्पातियों का मनोबल बढ़ा रहा था और दूर वाला हिस्सा पूरी तरह निष्क्रिय था। समस्त पुलिस दल को संगठित रूप से गुरुद्वारे के चारों तरफ तैनात करने में और 15-20 मिनट लगे। उन हालातों में यह रक्षात्मक तैनाही ही हो सकती थी। उतनी बड़ी उग्र भीड़ पर लाठीचार्ज का कोई मतलब नहीं होता और जहां तक गोली चलाने के विकल्प की बात थी उस लिहाज से स्थिति के आंकलन में बहुत से तमाशबीनों के निशाना बनने का खतरा भी शामिल होता।

            जाहिर था कि स्थिति को वहां तक प्रशासनिक निष्क्रियता से ही पहुंचने दिया गया था–उत्पातियों का कानून से भय का रिश्ता नहीं रह गया था, एक समर्थक हजूम का कवच मिला हुआ था और हजारेां की संख्या में तमाशाबीन किसी प्रभावी पुलिस कार्रवाई की संभावना की राह में रोड़ा बने हुए चारों ओर जमे हुए थे।

            प्रशासन शायद इस इंतजार में हाथ पर हाथ धरे सुबह से मूकदर्शक रहा था कि तनाव के बावजूद बंद का आह्वान हमेशा की तरह कुछ छिटपुट वारदातों के साथ गुजर जाएगा। सुबह से ही शहर में जगह-जगह उत्तेजित समूह में इक्_ा होने का सिलसिला चल रहा था, फिर शहर के तमाम इलाकों से होता हुआ उत्तेजित नारों से भरा हुआ जुलूस शुरू हुआ जिसमें लाठी-डंडे वाले भी शामिल होते गए। जीटी रोड पर पहुंचने पर अचानक अफवाह शुरू कर दी गई कि जीटी रोड वाले गुरुद्वारे  में बाहर से आतंकवादी आए हुए हैं। इस तरह जुलूस को गुरुद्वारे  पर ले जाकर खड़ा कर दिया गया। यद्यपि जुलूस ने रास्ते में इक्का-दुक्का मिलने वाले सिखों को अपमानित भी किया था। पर उल्टे शहर में प्रचार किया गया कि गुरुद्वारे के अंदर से जुलूस पर गोली चलाई गई है। लिहाजा गुरुद्वारे पर तमाशबीनों की भीड़ बढ़ती गई और बात पुलिस के वश से बाहर होती गई।

            उस दिन इतवार के कारण आसपास के गांवों से भी लोग गुरुद्वारे में आए हुए थे। इसी बिना पर ही बाहर से उग्रवादियों के आने की बात फैलाई गई थी। जो लोग पानीपत शहर के थे और बहुत से अन्य भी भीड़ की उग्रता भांप कर गुरुद्वारे से निकल गए पर दूर असंध एवं निसिंग इलाके के करीब 60 मर्द, औरतें, बच्चे अंदर फंसे रह गए।

            किसी प्रकार पुलिस की टुकडिय़ों को रक्षात्मक रूप से तैनात करके मैंने अपने साथ लाई दोनों पुलिस बसों को गली में गुरुद्वारे के दरवाजे पर लगाया। इन बसों में पथराव से बचयने के लिए शीशों पर लोहे की जालियां लगी हुई थीं अंदर जाकर हमने सभी फंसे लोगों  को बाहर बसों में बैठने को कहा, जिससे उन्हें सुरक्षित कहीं ओर ले जाया जा सके। प्रशासन पर उनके अविश्वास का आलम यह था कि करीब आघा घंटा लगा सभी को समझा कर बाहर बसों में बिठाने में। आगे मैंने अपनी जीप लगाई और बरसते पत्थरों के बीच हम धीरे-धीरे भीड़ से बाहर निकलते गए। हमें कई हवाई फायर करने पड़े और साथ पैदल चल रहे पुलिस कर्मिैयों ने अपनी बांस की टोकरियों पर पत्थर झेले और यदा-कदा लाठी भी चलाई। गनीमत है कि भीड़ पर सीधे गोली चलाने से हम बच सके, अन्यथा तमाशबीन तो मरते ही, अफवाहें शहर के दूसरे हिस्सों में भी हिंसा को ले जातीं।

            पानीपत-करनाल राजमार्ग पर पानीपत से करीब 18 किलोमीटर दूर घरौंडा थाना है। वहां उन फंसे हुए लोगों को सुरक्षित उतार कर जब मैं पानीपत की ओर लौटने लगा तब तक करनाल से पुलिस अधीक्षक भी वहां आ पहुंचे। हमने इक्_े पानीपत पहुंचने पर पाया कि तमाशबीनों से घिरा गुरुद्वारा जल रहा है और अंदर-बाहर सात सिखों की लाशें पड़ी हैं। बाद में एक और सिख की लाश कुछ दूर एक गली से मिली। ये आठों पुलिस से छिपकर गुरुद्वारे के बारातघर में चारपाइयों इत्यादि की आड़ में रह गए थे। यहां तक कि उन्होंने बारातघर में बाहर से ताला भी लगवा रखा था। उन्हें प्रशासन पर भरोसा था ही नहीं कि उनकी भीड़ से जान बचाई जा सकेगी।

            हुआ यह कि हमारे घरोंडा की ओर जाने के बाद उत्पाती गुरुद्वारे में घुसे और आग लगा दीं  उनसे व आग से बचने के लिए छपे लोग इधर-उधर भागे और डंडों से पीट-पीट कर मार दिए गए। पानीपत के डीएसपी के पास सैंकड़ों पुलिस वाले होते हुए भी उसने कुछ नहीं किया जबकि उस समय पुसि का गोली तक चलाना हर लिहाज से वैध था। मैं नहीं समझता कि वह डीएसपी उत्पातियों से मिला हुआ था। पर निश्चित ही वह किकर्तव्यविमूढ़ था जिससे उत्पातियों के हौसले बढ़ते चले गए थे। रात आने तक सरकार ने उसे निलंबित कर दिया और उसके विरुद्ध ड्यूटी में कोताही दिखने के लिए विभागीय जांच के आदेश भी दे दिए। 1986 में एक दूसरी सरकार (कांग्रेेसी ही) आई। उसने इस डीएसपी को न सिफ बहाल कर जांच समाप्त कर दी, बल्कि किन्हीं पूर्व सेवाओं के एवज में उसे रिटायरमेंट के बाद हरियाणा के सबआर्डिनेट सेलेक्शन बोर्ड का चेयरमैन भी बना दिया। में तमाशबीनों को उस पशुवत हत्याकांड में शरीक नहीं समझता, यद्यपि पुलिस की उपस्थिति ने भी उनकी नैतिक या सामाजिक जवाबदेही को कूंद रखने में सहयोग दिया होगा। गुजरात में दंगों के बंाद उत्सुकतावश मैंने हत्या व आगजनी के उस मुकद्दमें के नतीजे का पता किया तो बताया गया कि कुल 55 अभियुक्तों के विरुद्ध 18 साल बीतने पर भी अदालत में चार्ज नहीं लग सका है।

            अभी हम घटनास्थल पर ही थे कि अचानक बेमौसम तेज-तेज ओले पडऩे शुरू हुए और करीब आधा घंटे पड़ते ही रहे। इससे उत्तेजना पर अवसाद हावी हो गया और लोग तेजी से तितर-बितर होते गए। हम शहर में गश्त पर निकले तो माहौल से लगा कि जैसे हिन्दू-सिखों  के उस रले-मिले शहर को सामूहिक पश्चाताप से अपने मजबूत घूटनों में जकड़ रखा हो। देर शाम मैं माडल टाऊन में एक पुराने सहयोगी रिटायर सिख डीएसपी के घर उन्हें ढांढस देने गया। सरदारनी एक ही सांस में अमृतसर के अकाल तख्त में छिपे भिंडरवाले और दिल्ली  के तख्त पर बैठी इंदिरा गांधी को गालियां दे रही थी। यानी ऐसा  नहीं था कि लोग उस राजनीति से अनजान थे जो उनके जीवन को अस्थिर एवं असुरक्षित बना रही थी।

            मुश्किल से डेढ़-एक महीना निकला होगा कि एक अन्न्य सनसनीखेज वारदात (संभवत: ‘पंजाब केसरी’ घराने के प्रमुख रमेश चंद्र की हत्या) को लेकर एक ओर आक्रामक बंद का आह्वान किया गया। आशंका थी कि इस बार पानीपत में और अधिक बवाल खड़ा किया जाएगा। आतंकवादी  गिरोहों की सीनाजोरी और उनसे निपटने में सरकारी विफलता के चलते लोगों में असुरक्षा एवं रोष की गहरी भावना थी। इसकी आड़ में सिखों के विरुद्ध हमलों के आयोजन को ‘स्वाभाविकता’ में शामिल किया जा सकता था, विशेषकर क्योंकि उस आतंकवाद की केंद्रीय कमान सिख धर्म के पवित्रातम स्वर्ण मंदिर से काम कर रही थी। मुझे एक दिन पहले ही अतिरिक्त पुलिस बल के साथ पानीपत भेज दिया गया।

            हमारी रणनीति यह रही कि उत्पादी समूहों को एक साथ इक्_ा न होने दिया जाए, जिससे वे भीड़ या जुलूस की शक्ल न ले पाएं। ज्ञात शरारती तत्वों पर इस बार पहले से दबिश डाली जा रही थी और संवेदनशील इलाकों में रात से ही पुलिस लगाई हुई थी। यह सब पुलिस  के जाने-पहचाने तरीके होते हैं और उत्पातियों द्वारा इनकी काट निकाल लेना भी मुश्किल नहीं होता। मसलन, एक-दो दिन पहले से ठिकाना बदल लेना, जिससे पूर्व गिरफ्तारी से  बचा जा सके या किसी ऐसे इलाके में अचानक उतपात छेडऩा जहां पुलिस कम दिखे, क्योंकि हर समय हर जगह बड़ी संख्या में पुलिस हो नहीं सकती। लिहाजा हमने अनेकों  गतिशील हस्तक्षेपी दस्ते बनाए जिनके बीच सारे शहर में घूमते रहने और संभावित उत्पाती समूहों के विरुद्ध कार्यवाही का जिम्मा बांट दिया गया। प्रत्येक दस्ते में एक जीप में वरिष्ठ अधिकारी, साथ में एक बड़ी गाड़ी में 20-25 लाठीधारी व 3-4 रायफलधारी और पीछे कुछ पुलिस वाले एक खाली ट्रक में होते, जिसमें मौके से पकड़े लोगों को रखा जाता। मुख्य दस्ता, जिसके जिम्मे राजमार्ग उवं साथ लगते इलाके थे, सीधे मेरे नेतृत्व में था।

            उस रोज हम बेहद प्रभावी सिद्ध हुए दरअसल हमारे सुबह आठ बजे से शुरू होने  के दो घंअे के भीतर ही उबाल का सारा दौर चूक गया। कई जगह हम पर पत्थर भी पड़े और मुकाबला भी हुआ। पर ज्यादातर उत्पाती इक्_ा होना शुरू करते हीं कि कया गली कया सड़क बस हमारे डंडे शुरू हो जातमे। मुझे पिछले अनुभवों से आभास था कि ऐसे समूहों को सिफ तितर-बितर  करने से वे जल्द ही पुन: इक्_ा हो जाते हैं और यदि पुलिस के हाथों चोट खाए हों तो और भी उत्तेजना के साथ। लिहाजा हर ऐसे  समूह से कुछ एक के हाथ-पैर तुड़वाकर अस्पताल पहुंचने के साथ जब दो-चार की धरपकड़ भी की गई तो उनके शुभंचिंतकों का ध्यान भी तामीरदारी उवं पैरवरी पर जा लगा और जल्द ही सड़कें और गलियां सामान्य अवस्था में लौटनी शुरू हो गई।

            सुरक्षा एवं शांति बनाए रखने के लिए किसी ने हमें तगमे तो नहीं दिए पर किसी ने उन कठोर कदमों के लिए टोका भी नहीं। जाहिर था कि सरकार 19 फरवरी जैसीे जवाबदेही से बचना चाहती थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि पानीपत के एक बड़े उद्योगपति ने मुझे एक मुहल्ले में रोक लियां वह अपने चमचों से घिरा चीख रहा था कि मुख्यमंत्राी का ठिकाना बताओ और पुलिस की ज्यादतियों  के लिए वह मुझे सबक सिखाएगा। उसे न सिर्फ मुंहतोड़ जवाब दिया गया बल्कि यह भी जता दिया गया कि यदि वह भी कानून तोड़ता मिला तो उसका भी हश्र दूसरों जैसा ही होगा। क्या उत्पातियों व उनके रहनुमाओं को सबक सिखाने वाली वह वही  पुलिस नहीं थी जो 19 फरवरी को  मूकदर्शक बनी बर्बर संहार देती रही थी? क्या अपने-अपने काम में लगा यह वही शहर नहीं था जो  19 फरवरी को तमाशबीन बना अंधे कुएं में मौत की छलांगें देख रहा था? तब से बदला क्या था? आज प्रशासन के सामने दिशा थी और उत्पातियों के सामने दीवार।

            उत्पातियों की प्रशासनिक रोकथाम की कुंजी रही–उनके स्वार्थ का निषेध एवं उनके लिए खतरों की पराकाष्ठा। साम्प्रदायिक दंगों के आयोजक चाहे जितने भी आध्यात्मिक तर्क दे लें पर साध वे किसी न किसी भौतिक स्वार्थ के ही रहे होते हैं और यदि कुकर्म सार्वजनिक रूप से किए जा रहे हैं तो जाहिर है कि उनके सामने खतरों का अभाव है।

(लेखक भारतीय पुलिस सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं)

औरंगज़ेब और हिन्दू मंदिर – बी.एन. पाण्डे

औरंगज़ेब और हिन्दू मंदिर

बी.एन. पाण्डे

बिश्वम्भरनाथ पाण्डे प्रसिद्ध इतिहासकार, गांधी दर्शन के मर्मज्ञ कवि, प्रखर स्वतंत्रता सेनानी, और साम्प्रदायिक सद्भावना के प्रबल समर्थक थे। उनका पहला ग्रंथ ‘विश्व का सांस्कृतिक इतिहास’ सात भागों में सन् 1952 में प्रकाशित हुआ।  हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू में लगभग 25 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। उनके सम्पादन में 4 जिल्दों में ‘स्पिरिट आफ इंडिया’ सन् 1975 में प्रकाशित हुई, जिसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। श्री पांडे उत्तर प्रदेश की विधान सभा और विधान परिषद् के भी विधायक रहे हैं। 1976 से 1982 तक राज्य सभा के मनोनीत सदस्य, 1982-83 में निर्वाचित सदस्य और 1988 में पुन: उन्हें राष्ट्रपति ने 6 वर्ष के लिए राज्य सभा का सदस्य मनोनीत किया। सन् 1983 से 1988 तक उड़ीसा के राज्यपाल के पद पर आसीन रहे। अपने लंबे कारावास जीवन में संसार के विविध धर्मों का गहरा अध्ययन किया है। सन् 1980 से गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के कार्यवाही अध्यक्ष और बाद में उपाध्यक्ष की हैसियत से सम्बद्ध रहे। सन् 1976 में उन्हें पदम्श्री की उपाधि से सम्मानित किया गया।  – सं.

जिस तरह शिवाजी के संबंध में अंग्रेज़ इतिहासकारों ने ग़लतफ़हमियां पैदा की, उसी तरह औरंगज़ेब के संबंध में भी।

एक उर्दू शायर ने बड़े दर्द के साथ लिखा है-Related image

तुम्हें ले  दे के, सारी दास्तां में, याद है इतना;
कि आलमगीर हिन्दुकुश था, ज़ालिम था, सितमगर था!

बचपन में मैंने भी इसी तरह का इतिहास पढ़ा था और मेरे दिल में भी इसी तरह की बदगुमानी थी। लेकिन एक घटना ऐसी पेश आई, जिसने मरी राय बदल दी। मैं सन् 1948-53 में इलाहाबाद म्युनिसिपैलटी का चेयरमैन था। त्रिवेणी संगम के निकट सोमेश्वरनाथ महादेव का मंदिर है। उसके पुजारी की मृत्यु के बाद मंदिर और मंदिर की जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए। दोनों ने म्यूनिसिपैलटी में अपने नाम दाखिल ख़ारिज की दरख़ास्त दी। उनमें से एक फ़रीक़ ने कुछ दस्तावेज़ भी दाख़िल किए थे। दूसरे फ़रीक़ के पास कोई दस्तावेज़ न था। जब मैंने दस्तावेजों पर नज़र डाली तो देखा कि वह औरंगज़ेब का फ़रमान था, जिसमें मंदिर के पुजारी को ठाकुर जी के भोग और पूजा के लिए जागीर में दो गांव अता किए गए थे। मुझे शुबहा हुआ कि यह दस्तावेज़ नकली है। औरंगज़ेब तो बुतशिकन, मूर्तिभंजक था।  वह बुतपरस्ती के साथ कैसे अपने को वाबस्ता कर सकता था। मैं अपना शक रफ़ा करने के लिए सीधा अपने चैंबर से उठकर सर तेज बहादुर सपू्र के यहां गया। सप्रू साहब फ़ारसी के आलिम थे। उन्होंने फ़रमान को पढ़कर कहा कि यह फ़रमान असली है।

मैंने कहा-‘डाक्टर साहब! आलमगीर तो मंदिर तोड़ता था। बुतशिकन था, वह ठाकुर जी को भोग और पूजा के लिए कैसे जायदाद दे सकता था?’

डा. सप्रू साहब ने अपने मुंशी को आवाज़ देकर कहा-‘मुंशी जी ज़रा बनारस के जंगमबाड़ी शिवमंदिर की अपील की मिसिल तो लाओ।’ डाक्टर सप्रू इलाहाबाद में इस मुकद्दमें के एक पक्ष के वकील थे।

मुंशी जी मिसिल लेकर आये तो डाक्टर सप्रू ने दिखाया कि उसमें औरंगज़ेब के चार फ़रमान और थे जिनमें जंगमों को माफ़ी की ज़मीन अता की गई थी।

डाक्टर सप्रू हिन्दुस्तानी कल्चर सोसायटी के अध्यक्ष थे, जिसके पदाधिकारियों में डाक्टर भगवान, सैयद सुलेमान, सैयद सुलेमान नदवी, पंडित सुंदर लाल और डाक्टर ताराचन्द थे। मैं भी उसकी गवर्निंग बाडी का एक मैंबर था। डा. सपू्र की सलाह से मैंने भारत के प्रमुख मंदिरों की सूची प्राप्त की और उन सबके नाम पत्र लिखा कि अगर उनके मंदिरों को औरंगज़ेब या मुग़ल बादशाहों ने कोई जागीर दी हो, तो उनकी फोटो कापियां मेहरबानी करके भेजिये। दो तीन महीने की प्रतीक्षा के बाद हमें महाकाल मंदिर (उज्जैन), बालाजी मंदिर (चित्रकूट), उमानन्द मंदिर (गोहाटी), जैन मंदिर (गिरनार), दिलवाड़ा मंदिर (आबू), गुरुद्वारा रामराय (देहरादून) व$गैरह से सूचना मिली कि उनको औरंगज़ेब ने जागीरें अता की थीं। एक नया औरंगज़ेब हमारी आंखों के सामने उभर कर आया।

Image result for महाकाल मंदिर (उज्जैन), बालाजी मंदिर (चित्रकूट), उमानन्द मंदिर (गोहाटी), जैन मंदिर (गिरनार), दिलवाड़ा मंदिर (आबू), गुरुद्वारा रामराय (देहरादून)

 

औरंगज़ेब ने इन मंदिरों को जागीरें अता करते हुए मंदिंर के पुजारियों से यह अपेक्षा की थी कि अपने ठाकुर जी से वह इस बात की प्रार्थना करें कि उसके खानदान में ताक़यामत हुकूमत बनी रहे।

हमारी तरह हमारे आदरणीय मित्र और अन्वेषक श्री ज्ञानचन्द्र एवं प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डा. परमेश्वरीलाल गुप्त ने भी अपने शोध प्रबंधों  से हमारे इस कथन की पुष्टि की है। उनके अनुसार :

‘हिन्दूद्रोही और मंदिर भंजक के रूप में जिस किसी इतिहासकार ने औरंगज़ेब का यह चित्र उपस्थित किया, उसने अंग्रेजों को अपनी फूट डालो और राज करो वाली नीति के प्रतिपादन के लिए एक जबरदस्त हथियार दे दिया। उसका भारतीय जनता पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा है कि उदार राष्ट्रीय विचारधारा के इतिहासकार और विशिष्ट चिंतक भी उससे अपने को मुक्त नहीं कर सके हैं। उन्होंने भी स्वयं तटस्थ भाव से तथ्यों का विश्लेषण न कर यह मान लिया है कि औरंगज़ेब हिन्दुओं के प्रति असहिष्णु था।’

‘इसमें संदेह नहीं, औरंगज़ेब एक धर्मनिष्ठ मुसलमान था। उसने ऐसे अनेक कार्य किए, जिनसे उसकी इस्लाम के प्रति निष्ठा प्रकट होती है। उसने सत्तारूढ़ होते ही अपने सिक्कों पर उस कलमा के अंकन का निषेध किया, जिसे पूर्ववर्ती प्राय: सभी मुसलमान शासक इस्लाम धर्म का मूल मंत्र मानकर अपने सिक्कों पर अंकित करना अपना परम कत्र्तव्य मानते थे। औरंगज़ेब ने इस बात को सवर्था भिन्न दृष्टि से देखा। उसकी अपनी मान्यता थी कि सिक्के ऐसे लोगों के हाथों में भी जाएंगे, जो इस्लाम धर्म के अनुयायी नहीं हैं। इसी प्रकार उसके द्वारा जजि़या कर का जारी किया जाना भी उसकी इस्लामी सिद्धांतों के प्रति आस्था का प्रतीक है। इस्लामी शरीयत के अनुसार, किसी इस्लामी शासक की सेना में यदि कोई ग़ैर मुसलमान व्यक्ति सैनिक न बनना चाहे तो सैनिक सेवा के बदले उससे एक हल्का सा कर लेने का विधान इस्लामी शास्त्रविदों ने किया है, उसे ही जजि़या कहते हैं। यह कर इस देश में मुसलमानों के शासन के आरंभ से ही प्रचलित था और इसके प्रति कभी किसी को किसी प्रकार का अनौचित्य नहीं दिखाई पड़ता था। अकबर ने अपनी उदार नीति के कारण इस कर को अपने समय में बंद कर दिया। औरंगज़ेब ने इतना ही किया कि उसे फिर से जारी कर दिया।

‘औरंगज़ेब के इन तथा इसी प्रकार के अन्य कार्यों को यदि तटस्थ भाव से देखा जाए तो उनमें ऐसी कोई बात नहीं मिलेगी जो उसकी अपनी धर्मनिष्ठा भावना के अतिरिक्त किसी अन्य बात का प्रतीक हो और हिन्दू अथवा किसी दूसरे ���र्म के प्रति विद्वेष अथवा असहिष्णु भाव की अभिव्यक्ति हो। अत: हमारे इतिहासकारों की औरंगज़ेब के संबंध में क्या धारण रही है, इसको जानने और मानने की अपेक्षा अधिक उचित यह होगा कि हम औरंगज़ेब के समसामयिक बुद्धिवादियों के कथन को महत्व दें और देखें और जानें कि औरंगज़ेब के संबंध में उनकी क्या धारणा थी।’

गुर्जर कवि भगवतीदास का औरंगज़ेब के संबंध में कहना है-

नरपति तिहां अै राजै नौरंग,
जाकी अज्ञा बहै अखण्ड
ईत भीत व्यापै नहीं कोय,
इह उपगार  नृपति के होय।

इसी प्रकार जैन मुनि रामचंन्द्र ने लिखा है-

मरदानो अे महाबली औरंगशाहि नरन्द,
तासु राज में हर्ष सूं, रच्यो शास्त्र आनन्द।

इन कवियों से अधिक हिन्दी भाषा-भाषियों का परिचय सबलसिंह चौहान से है। उन्होंने औरंगज़ेब के शाासनकाल में  महाभारत को हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया था। उन्होंने शल्यपर्व के अंत में लिखा है-

औरंगशाह दिल्ली सुलताना,
प्रबल प्रताप जगत सत जाना।

यदि औरंगज़ेब के मन में हिन्दू धर्म अथवा किसी अन्य धर्म के प्रति किसी प्रकार की कोई कटुता अथवा असहिष्णुता का भाव होता अथवा ये कवि उसके व्यवहार में किसी प्रकार की गंध अनुभव करते, तो  वे जो औरंगज़ेब के दरबारी कवि नहीं थे, उसे कभी इन शब्दों में स्मरण नहीं करते।

यदि हम किसी कारण कवियों की इन बातों को महत्व न दें तो भी हिन्दुओं के प्रति औरंगज़ेब के भावों को स्पष्ट करने वाले प्रमाणों की कमी नहीं है। औरंगज़ेब और उसके अधिकारियों द्वारा ब्राह्मण और पुजारियों को दिए खैरात (दान) और निसार (निछावर) संबंधी अनेक आदेशपत्र उपलब्ध हैं। उनकी प्रमाणिकता  को स्वीकार करना ही होगा।

उज्जैन के महाकालेश्वर के मंदिर का हिन्दू मतावलम्बियों में विशेष मान-सम्मान है। इस मंदिर के पुजारियों के पास, उनके पूर्वजों के नाम मालवा के सुबेदारों द्वारा औरंगज़ेब के शासनकाल के 7वें वर्ष से  48वें वर्ष के बीच जारी की गई 13 सनदें सुरक्षित हैं। इनमें से एक सनद औरंगज़ेब के आठवेें राज्यवर्ष में मालवा के सूबेदार मुहम्मद समी द्वारा जारी की गई है। इससे ज्ञात होता है कि मुरार और कूका नामक दो ब्राह्मण भाइयों को पिछले पचास वर्षों से ईश्वर की सेवा करने (बन्दगान ए आला हज़रत) के उपलक्ष में  प्रतिवर्ष 50 दाम प्राप्त होता रहा। उसे इस सनद द्वारा मुहम्मद समी को आगे निरंतर दिए जाते रहने का आदेश दिया है। स्पष्ट है, यह ब्राह्मण या तो किसी मंदिर के पुजारी थे अथवा हिन्दुओं के पुरोहित। उन्हें राज्य की ओर से जो सहायता पहले से मिलती चली आ रही थी, उसे औरंगज़ेब के शासनकाल में भी बदस्तूरी $कायम रखा गया। यदि औरंगज़ेब के हृदय के कहीं किसी कोने में हिन्दू धर्म के प्रति दुर्भावना होती तो उसका सूबेदार इस प्रकार की सनद कदापि जारी न करता।

उज्जैन की उपर्युक्त सनदों में से दस सनदों से ज्ञात होता है कि औरंगज़ेब के 7वें राज्यवर्ष में सूबेदार नजावत खां ने कूका ब्राह्मण को खैरात के रूप में चबूतरा कोतवाली की आय से नित्य तीन मुरादी टंक दिए जाने का आदेश दिया था, ताकि वह जीवनयापन कर सके और राज्य की समृद्धि के लिए प्रार्थना किया करे। 17वें राज्य वर्ष में कूका की मृत्योपरांत यह खैरात उसके पुत्र कांजी को देने का आदेश हुआ और 19वें राज्यवर्ष में हबीबुल्लाह अल-हसनी ने उसे बढ़ाकर चार आना कर दिया। 26वें राज्यवर्ष में सूबेदार खान ज़मां द्वारा इस खैरात को मान्यता दी गई। 48वें राज्यवर्ष में मुगलखां की सूबेदारी में इस $खैरात को स्थायी कर दिया गया। दो अन्य सनदों से, जो क्रमश: 18वें और 19वें राज्यवर्ष में जारी की गई हैं, पता चलता है कि राज्य की समृद्धि की प्रार्थना करने के निमित्त कांजी को हर साल खरीफ़ के समय ख़्ौरात स्वरूप साढ़े दस रुपए मिलते थे। ये सनदें इस बात का प्रतीक हैं कि औरंगज़ेब के शासनकाल में खैरात वितरण में हिन्दू मुसलमान जैसा भेद न था। खैरात का अधिकारी ब्राह्मण भी समझा जाता था।

इन सनदों के संबंध में कहा जा सकता है कि सनदें औरंगज़ेब ने स्वयं जारी नहीं की है, उसके अधिकारियों  ने उसके परोक्ष में अपनी दयानतदारी के फलस्वरूप जारी की होंगी। अत: उचित होगा कि स्वयं औरंगज़ेब द्वारा जारी किए गए फ़रमानों की ही चर्चा की जाए। अस्तु, औरंगज़ेब ने अपने 9वें राज्यवर्ष के 2 सफ़र को एक फ़रमान दखिनकुल सरकार स्थित परगना पाण्डु के पट्ट बंगेसर के प्रमुख अधिकारियों, चौधरी, कानूनगो, मुकद्दम तथा किसानों के नाम जारी किया था। इस फ़रमान में कहा गया है कि भूतपूर्व शासकों ने उमानन्द मंदिर के पुजारी सूदामन और उसके बेटे को सकरा ग्राम में ढाई बिस्वा जमीन, जिसकी जमा (आय) 30 रुपया है, प्राप्त रही है।  उनका यह अधिकार प्रमाणित है। अत: उक्त ग्राम के महसूल (आय) से बीस रुपया नकद और शेष इंटाखाली ग्राम की जमा को छोड़ कर जंगल के रूप में दी जाती है, ताकि वह उसका उपयोग देवता के भोग और अपने जीवनयापन में कर सकें और राज्य के चिरस्थायी बने रहने की कामना करते रहें। इस फ़रमान में अधिकारियों को आदेश है कि जो आय और भूमि उन लोगों (सुदामन और उनके बेटे) के अधिकार में है, उनके अधिकार में छोड़ दी जाए और उनके इस अधिकार में किसी प्रकार की कोई बाधा न दी जाए। इस सनद में द्रष्टव्य यह है कि औरंगज़ेब ने ब्राह्मण पुजारियों को भूमि न केवल जीवनयापन वरन् भोग (मंदिर की पूजा) के लिए भी दी थी।

इस फ़रमान के संबंध में कहा जा सकता है कि यह औरंगज़ेब का अपना दान नहीं है। वरन् पिछले राजाओं द्वारा दिए गए  दान की पुष्टि मात्र है। अत: उसके अपने दानों के फ़रमानों का उल्लेख अधिक संगत होगा। 1908 हिजरी का उसके द्वारा जारी किया गया एक फ़रमान है, जिसमें कहा गया है कि बनारस में गंगा किनारे बेनीमाधो  घाट पर दो टुकड़े ज़मीन बिना निर्माण के खाली पड़ी है और बैत-उल-माल है। इनमें से एक बड़ी मसजिद के पीछे रामजीवन गुंसाई के मकान के सामने है और दूसरा उससे कुछ ऊंचाई पर है। इस भूमि के इन दोनों टुकड़ों को हम रामजीवन गुसांई और उसके लड़के को बतौर इनाम देते हैं, ताकि वह उस पर धार्मिक ब्राह्मणों और साधुओं  के रहने के लिए सत्र बनवाएं और ईश्वर साधना में रत रहकर देव प्रदत्त साम्राज्य के स्थायी बने रहने की कामना करते रहें।

काशी में शैव सम्प्रदाय के लोगों का एक सुविख्यात मठ जंगमबाड़ी है। इस मठ के महंत के पास औरंगज़ेब द्वारा कतिपय फ़रमान हैं। इनमें से पांच रमज़ान 1071 हिजरी को जारी किया गया औरंगज़ेब का फ़रमान है, जिसके द्वारा उसने जंगमों को परगना बनारस में 178 बीघा ज़मीन अपने सिर के निसार (निछावर) स्वरूप प्रदान किया है और कहा है कि यह भूमि मा$फी समझी जाए ताकि वह उसका उपयोग कर सकें और राज्य के चिरस्थायी बने रहने की कामना करते रहें। इसी भूमि से संबंधित एक दूसरा फ़रमान भी है जो एक रबी-उल-अव्वल 1078 हिजरी का है। इसमें उक्त दान की पुनरुक्ति है और आदेश दिया गया है कि उस भूमि पर जंगमों के अधिकार में कोई हस्तक्षेप न करे।

ये राजपत्र इस बात की स्पष्ट अभिव्यक्ति करते हैं कि औरंगज़ेब का हिन्दू धर्म के प्रति कोई विद्वेषात्मक भाव न था। यह बात मूर्तियों और मंदिरों के संबंध में भी कही जा सकती है।

ऊपर हमने उज्जैन के महाकालेेश्वर के मंदिर का जिक्र किया है। इस मंदिर में दिन-रात घी का दीप जलता रहता है। इस दीप को ‘नन्ददीप’ कहते हैं। इस दीप के प्रज्जवलन के लिए अतीत काल से राज्य की ओर से घी दिया जाता था और यह प्रथा मुग़लकाल में भी प्रचलित थी। यह मुरादबख़्श के एक फ़रमान से प्रकट होता है, जिसे उसने पिता शाहजहां के शासनकाल में 5 शव्वाल 1061 हिजरी को जारी किया था। इस फ़रमान के अनुसार, चबूतरा कोतवाली के तहसीलदार को आदेश दिया गया था कि वह मंदिर को नित्य चार (अकबरी) सेर घर दिया करे। यह फ़रमान मंदिर के पुजारी देवनारायण के आवेदन पर जारी किया गया था। आवेदन में कही गई बात की तसदीक़ मुहम्मद मेंहदी नामक वाक़यानवीस ने की थी और उसके तसदीक़  करने पर ही फ़रमान जारी किया गया था। इस फ़रमान की मूल प्रति तो महाकालेश्वर के पुजारी के पास नहीं है ङ्क्षकंतु उसकी एक प्रमाणित प्रति, जिसे 1153 हिजरी में मुहम्मद सादुल्लाह ने जारी किया था, उनके पास उपलब्ध है। इस नकल के आधार पर यह अनुमान सहज में किया जा सकता है कि इस फ़रमान में दिए हुए आदेश का कम से कम 1153 हिजरी तक निरंतर पालन होता रहा। यदि ऐसा न होता तो महत्वहीन राजपत्र की नक़ल प्राप्त करने का प्रयास करने की किसी को आवश्यकता न थी। यदि वह अनुमान सही है तो कहा जा सकता है कि औरंगज़ेब के शासनकाल में, जो मूल फ़रमान और नक़ल के बीच का काल है, महाकालेश्वर के मंदिर के मंदिर को राज्य की ओर से घी प्राप्त होता था।

मंदिरों के प्रति सद्भावना के इस परोक्ष प्रमाण के अतिरिक्त प्रत्यक्ष प्रमाण स्वरूप उस फ़रमान का उल्लेख किया जा सकता है, जिसे औरंगज़ेब ने उमानन्द के पुजारी के हक़ में जारी किया था और जिसकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं। इस फ़रमान के अनुसार, पुजारी को जिस  उद्देश्य से भूमि दी गई थी, उसमें मंदिर का भोग भी सम्मिलित था। यदि औरंगज़ेब भोग के लिए भूमि दे सकता था तो कोई कारण नहीं कि पहले से चली आई परम्परा के अनुसार महाकालेश्वर के नन्ददीप के लिए घी न दिया हो।

मंदिरों के प्रति उसका दृष्टिकोण एक अन्य फ़रमान से भी स्पष्ट होता है, जिसे उसने 10 रजब 1070 हिजरी को अहमदाबाद के नगरसेठ सहसभाई के पुत्र शांति-दास जौहरी के आवेदन पर जारी किया था। इस फरमान के द्वारा पालिताना ग्राम, शत्रुन्जय पर्वत तथा उस पर मंदिर श्रावक जैन समाज को प्रदान किया गया है। इस फ़रमान में कहा गया है कि शत्रुन्जय पर्वत पर जो भी इमारती लकड़ी और ईंधन उपलब्ध हो वह श्रावक समाज  की सम्पति है वे उसका उपयोग जिस रूप में चाहे करें, जो कोई शत्रुन्जय पर्वत और मंदिर का प्रबंध करेगा, उसे पालिताना की आय प्राप्त होती रहेगी, ताकि वे राज्य के चिरस्थायी बने रहने की प्रार्थना करते रहेंं।

औरंगज़ेब की भावना को स्पष्ट करने की दृष्टि से अधिक महत्व का वह फ़रमान है जिसे उसने जालना के एक ब्राह्मण की फ़रियाद पर जारी किया था। उस ब्राह्मण ने अपने घर में गणेश की एक मूर्ति प्रतिष्ठित की थी। उसे वहां के एक मुसलमान अधिकारी ने हटवा दिया था। इस कार्य के विरुद्ध उस  ब्राह्मण ने औरंगज़ेब से फ़रियाद की। औरंगज़ेब ने तत्काल मूर्ति लौटा देने का आदेश दिया और इस प्रकार के हस्तक्षेप का निषेध किया।

इन सबसे अधिक महत्व का है वह फ़रमान, जो ‘बनारस फ़रमान’ के नाम के इतिहासकारों के बीच प्रसिद्ध है और जिसको लेकर यदुनाथ सरकार सदृश गंभीर इतिहासकार ने अपनी ‘हिस्ट्री आफ़ औरंगज़ेब’ में यह मत प्रतिपादित किया है कि औरंगज़ेब ने हिन्दूधर्म  पर अपना आक्रमण बड़े छद्म रूप में प्रारंभ किया। इस फ़रमान का सहारा लेकर यदुनाथ सरकार ने औरंगज़ेब को धर्मान्ध सिद्ध करने के प्रयत्न में इस फ़रमान के केवल कुछ शब्द ही उद्धृत किए हैं। यदि इन इतिहासकारों ने ईमानदारी बरती होती और समूचे फ़रमान को सामने रखकर सोचा होता तो तथ्य निस्संदेह भिन्न रूप में सामने आता और औरंगज़ेब का वह रूप सामने न होता जो इन इतिहासकारों ने प्रस्तुत किया है।

इस फरमान के संबंध में 1905 में ई. से पूर्व किसी भी इतिहासकार को कोई जानकारी न थी। उस समय तक वह काशी के मंगला गौरी मुहल्ले के एक ब्राह्मण परिवार में दबा पड़ा था। उस वर्ष किसी पारिवारिक विवाद के प्रसंग में गोपी उपाध्याय के दौहित्र मंगल पाण्डेय ने इस फ़रमान को सिटी मैजिस्ट्रेट की अदालत में उपस्थित किया। वहां से इसकी गन्ध इतिहासकारों को प्राप्त हुई और इसकी चर्चा एक शोध पत्रिका में की गई। उस पत्रिका में यह फ़रमान अविकल रूप में उद्धृत है किन्तु उसे देखने की चेष्टा नहीं की गई। अत: कुछ कहने से पहले आवश्यक है कि इस फ़रमान को अविकल रूप में उद्धृत किया जाए। यह फ़रमान 15 जमादी-उल-सानी 1069 हिजरी को बनारस के स्थानीय प्रशासक अबुल हसन के नाम जारी किया गया है:

‘मुराहिमें-जाती व मक़ारिमें-जिबिल्ली हमगो हिम्मत वाला नेअमत
व तमामी नीयते हक्क़ तबीयत बर रिफ़ाहिते जमहूरे बनाम व
इंतज़ामे अहवाल तवक़्कात-ए-खास-ओ-आम मसरुफ अस्तव अज़रुए
शरए शरीफ़ व मिल्लते मनीफ मुक़र्रर चुनीं अस्त की देरहाय बरन्दाख्त
न शवद व बुतकदए ताज़ा बिना नयावद व दरीं अहयाये मादलत
इन्तज़ाम व अजऱ् अशरफ़े अक़दस अरफ़ा आला रसीद कि बाज मुर्दम
अज़ रहे अनफो तअद्दी व हुनूदे सकनाअे क़स्बये बनारस व बरुखी
अमकनाहाये दीगर कि बनवाहिये आं वाक़े अस्त व जमाअते बरहमनान
सकनए आं महाल कि सदानते बुतखानाहाय क़दीमें आंजहा व
आं हां तअल्लुद दारद मज़ाहिम  व मोअतरिज़ मी शवद व मी
काहन्द कि ईनां राह अज़ सदानत कि अज़ मुद्दते मदीद व आहा
मुतअल्लिक अस्त बाज़ दारन्द। व ईमानी बाइसे परेशानी व
तफ़रक़ाये  हाले ई्रगिरोह मी कर्द लिहाज़ा  हुक्मेवाला सादिर मी
शबद कि बाद अज़ वरुदे मनशूर ई लामे उन्नूर मुक़र्रर कुनद
कि मिन बाद अहदे बवजूद तआरु व तशबीश व अहवाले बरहमनान
व दीगर हनुदमुतबत्तिनान आं मुहाल न रिसानद ता आं हा
बदस्तूर ऐयामे पेशी बजा व मुक़ामे खुद बूदा।
व जमीयते खातिर व दुआये बकाये दौलत अबद मुद्दत अजल बुनियाद क़ायम नुमायन्द दरीं बाब ताकीद दानद।’

इस फ़रमान का शब्दानुवाद इस प्रकार होगा-‘हमारी व्यक्तिगत एवं स्वाभाविक सद्भावनाएं समग्र रूप से ऐसी दिशा में झुकी हुई हैं कि जिससे जनता की भलाई और देश में रहने वालों का सुधार हो तथा हमारे देश में ऐसा निश्चित है कि मंदिर क़तई न तोड़े जाएं और नए मंदिर न बनवाए जाएं। हमारे न्यायपूर्ण राज्य में यह सूचना मिली है कि कुछ लोग बनारस के रहने वाले हिन्दुओं पर और उसके पास अन्य रहने वालों पर, वहां के रहने वाले ब्राह्मणों पर, जो कि मंदिरों का इन्तज़ाम करते रहे हैं, हस्तक्षेप कर अत्याचार करते हैं और चाहते हैं कि वहां का प्रबंध, जो चिरकाल से उनके हाथ में है, छीन लें। इस कारण वे लोग बहुत परेशान और बेहाल हैं। अत: यह आदेश भेजा जाता है कि इस फरमान के पहुंचने के साथ ही दृढ़ता के साथ यह घोषित कर दिया जाए कि कोई भी व्यक्ति किसी भी कारण इन ब्राह्मणों और इस स्थान के रहने वाले अन्य हिन्दुओं को बिल्कुल न छेड़ें और न उन्हें परेशान करें। वे पूर्ववत् अपनी जगह और अपने मकान पर रहकर शांतिपूर्वक ह��ारे शासन के स्थायित्व के लिए सदैव प्रार्थना करते रहें। इस आदेश को आवश्यक और गंभीर समझा जाए।’

इस फरमान में कहीं भी ऐसा कुछ नहीं है, जिसे यदुनाथ सरकार की शब्दावली में ‘छद्म रूप से हिन्दू धर्म पर आक्रमण’ की संज्ञा दी जा सके। वरन् इस फ़रमान से, इसके विपरीत, यह ज्ञात होता है कि हिन्दुओं और ब्राह्मणों के धार्मिक मामलों-मंदिरों के प्रबंध में कुछ लोग अनुचित हस्तक्षेप कर रहे थे और उन्हें तंग कर रहे थे। हो सकता है, मंदिरों को तोड़े जाने की बात भी की जा रही हो। इन सबकी शिकायत जब औरंगज़ेब के पास पहुंची तो उसने यह फ़रमान जारी कर उसकी आवश्यकता और गंभीरता पर ज़ोर देते हुए दुष्टता करने वालों को कड़ी चेतावनी दी। स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सम्राट के धर्म अर्थात् इस्लाम में यह आदेश है कि मंदिर क़तई न तोड़े जाएं और नए मंदिर न बनवाए जाएं।

यदि तटस्थ भाव से देखा जाए तो इस फरमान में हिन्दुओं के विरुद्ध औरंगज़ेब के अपने किसी आदेश की कोई गंध नहीं है। नए मंदिरों के बनवाने पर प्रतिबंध दिल्ली के पठान सुल्तानों के समय से ही चला आ रहा था। उन्होंने नए मंदिर बनवाने और पुराने मंदिरों की मुरम्मत कराने पर रोक लगाई थी। यह आदेश उस समय कठोरतापूर्वक पालन किया जाता रहा। मुग़लकाल में बाबर ने मंदिरों की सुरक्षा का आदेश दिया। अकबर की धार्मिक सहिष्णुता और उदारता का गुणगान करते हुए हमारे इतिहासकार नहीं थकते, किन्तु उसके शासनकाल में भी इस प्रतिबंध के हटाये जाने की कोई घोषणा स्पष्ट शब्दों में नहीं की गई। काशी के विश्वनाथ मंदिर के निर्माण की बात जब अकबर के समय में उठी तो यह आवश्यक समझा गया कि उसके निर्माण से पूर्व उसके लिए सम्राट की अनुमति प्राप्त की जाए और अनुमति प्राप्त करने के बाद ही उसका निर्माण हो सका। यदि इन तथ्यों को ध्यान में रखा जाए तो औरंगजेब के प्रति हिन्दूद्वेषी और मंदिर विनाशक कहने की कोई भावना नहीं उभरती।

इन सब तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उभरता है कि यदि औरंगज़ेब का वस्तुत: इस कथन में विश्वास था कि मंदिर न तोड़े जाएं तो फिर क्यों उसी के शासनकाल में और उसी के आदेश से ज्ञानवापीवाला विश्वनाथ मंदिर तोड़ा गया? इस संबंध में हम पाठकों का ध्यान पट्टाभि सीतारामैया की पुस्तक ‘फेदर्स एंड स्टोन्स’ की ओर आकृष्ट करना चाहेंगे। उन्होंने इस ग्रंथ में लिखा है कि लखनऊ के किसी प्रतिष्ठित मुसलमान सज्जन (नाम/नहीं दिया है।) के पास कोई हस्तलिखित ग्रंथ था जिसमें इस घटना पर प्रकाश डाला गया है। सीतारामैया का कहना है कि इस ग्रंथ का समुचित परीक्षण किए जा सकने के पूर्व उक्त सज्जन का निधन हो गया और वह ग्रंथ प्रकाश में आ सका। उस ग्रंथ में इस घटना के संबंध में जो कुछ कहा गया था उसका सीतारामैया ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है। उनके कथानुसार घटना इस प्रकार है :

‘तत्कालीन शाही परम्परा के अनुसार, जब मुग़ल सम्राट किसी यात्रा पर निकलते थे, तो उनके साथ राज सामन्तों की काफी बड़ी संख्या चलती थी और उनके साथ उन सबका अन्त:पुर भी चलता था। कहना न होगा, मुगल दरबार में हिन्दू सामंतों की संख्या काफी बड़ी थी। उक्त ग्रंथ के अनुसार, एक बार औरंगज़ेब बनारस के निकट के प्रदेश से गुज़र रहे थे। ऐसे अवसर पर भला कौन हिन्दू होता जो दिल्ली जैसे दूर प्रदेश से आकर गंगा स्नान और विश्वनाथ दर्शन किए बिना चला जाता, विशेष रूप से स्त्रियां। अत: प्राय: सभी हिन्दू दरबारी अपने परिवार के साथ गंगा स्नान करने और विश्वनाथ दर्शन के लिए काशी आए। विश्वनाथ के दर्शन कर जब लोग बाहर आए तो ज्ञात हुआ कि उनके दल की एक रानी गायब है। इस रानी के संबंध में कहा जाता है कि कच्छ की रानी थी। लोगों ने उन्हें मंदिर के भीतर जाते देखा था पर मंदिर से बाहर आते वह किसी को नहीं दिखीं। लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वह मंदिर के भीतर ही कहीं रह गई है।  काफी छानबीन की गई तो मंदिर के नीचे एक दुमंजिले तहखाने का पता चला जिसका द्वार बाहर से बंद था। उस द्वार को तोड़कर जब लोग अंदर घुसे तो उन्हें वस्त्राभूषण विहीन, भय से त्रस्त रानी दिखाई पड़ी। जब औरंगज़ेब को पण्डों की यह काली करतूत ज्ञात हुई तो वह बहुत क्रुद्ध हुआ और बोला-जहां मंदिर के गर्भ-ग्रह के नीचे इस प्रकार की डकैती और बलात्कार हो, तो वह निस्सन्देह ईश्वर का घर नहीं हो सकता। और, उसने उसे तुरंत गिरा देने का आदेश दिया। आदेश का तत्काल पालन हुआ। जब उक्त रानी को सम्राट के इस आदेश और उसके परिणाम की सूचना मिली तो वह अत्यंत दु:खी हुई और उसने सम्राट से कहला भेजा कि इसमें मंदिर का क्या दोष, दुष्ट तो पण्डे हैं। उसने यह भी हार्दिक इच्छा प्रकट की कि उसका फिर से निर्माण करा दिया जाए। औरंगज़ेब के अपने धार्मिक विश्वास के कारण, जिसका उल्लेख उसने बड़ी स्पष्टता से अपने उपर्युक्त ‘बनारस फरमान’ में किया है, उसके लिए फिर से नया मंदिर बनवाना संभव न था। अत: उसने मंदिर के स्थान पर मसजिद खड़ी कर रानी की इच्छा पूरी की।

यह घटना कितनी ऐतिहासिक है, यह कहने के लिए सम्प्रति कोई साधन नहीं है किंतु इस प्रकार की घटनाएं प्राय: मंदिरों में घटती रही हैं, यह सर्वविदित है। यदि ऐसी कोई घटना औरंगज़ेब के समय में घटी हो तो कोई आश्चर्य नहीं। उसी की अनुगूंज इस अनुश्रुति में होगी जिसे सीतारामैया में लिपिबद्ध किया है। यदि ऐसी घटना वस्तुत: घटी थी तो औरंगज़ेब सदृश मुसलमान नरेश ही नहीं, कोई भी न्यायप्रिय शासक यही करता। यदि इस घटना के परिप्रेक्ष्य में विश्वनाथ मंदिर गिराया गया था तो उसके लिए औरंगज़ेब पर किसी प्रकार का कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता।

फिर भी औरंगज़ेब के प्रति लोगों के मन में दुर्भावना इस प्रकार घर कर गई है कि यह प्रश्न उठ सकता है कि यदि ऐसी घटना किसी मसजिद में घटी होती तो क्या औरंगज़ेब उसे भी गिरवा देता? इस  प्रश्न का उत्तर देने के लिए किसी कल्पना की आवश्यकता नहीं है। तथ्यपूर्ण उदाहरण उपलब्ध है। गोलकुण्डा के सूबेदार तानेशाह ने जो राज-कर एकत्र किया था, उसका पूरा-पूरा हिसाब वह औरंगज़ेब के सम्मुख उपस्थित न कर सका। उससे जब इस संबंध में पूछताछ की गई तो तो उसने किसी मस्जिद का नाम लेकर कहा कि उसने उस धन को जामे मसजिद के नीचे गाड़ रखा है। उसके इस कथन से औरंगज़ेब को बहुत क्रोध आया और उसने उस मसजिद को गिराकर उस धन को ढूंढ निकालने का आदेश दिया और वह मसजिद सचमुच उसके आदेश से गिरा दी गई।

साभार – भारतीय संस्कृति मुगल विरासत:औरंगज़ेब के फरमान

                                           

ईद मुबारक

एक दूजे को गले लगाएँ
मिलकर गीत प्यार के गाएँ
वैरभाव को छोड़ के पीछे 
आओ हम-तुम ईद मनाएँ।

ईद सिखाती गले लगाना
सबको अपना मीत बनाना
मन की कटुता को बिसराएँ
आओ हम-तुम ईद मनाएँ।

Related image

आती है जब ईद निराली
सलमा, कम्मो, मुन्नी, लाली
खीर-सेवइयां रज-रज खाएँ
आओ हम-तुम ईद मनाएँ।

बाज़ारों में रौनक आती
दादी खेल खिलौने लाती
बालक फूले नहीं समाएँ
आओ हम-तुम ईद मनाएँ।

राम बधाई देने आता
रहिमन संग मिठाई खाता
दोनों खड़े गली में गाएँ
आओ हम-तुम ईद मनाएँ।

जितने भी हैं दर्द हमारे
मिलकर बाँटें सुख-दुख सारे
एक-दूजे का साथ निभाएँ
आओ हम-तुम ईद मनाएँ।

कौन है हिन्दू कौन मुसलमां
एक हैं आखिर हम सब इन्सां
मज़हब पर न लड़ें-लड़ाएं
आओ हम-तुम ईद मनाएँ।।

-अविनाश सैनी